मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह == बदलता युग

महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह == बदलता युग
------------------------------------------------

कविताएँ
........................

1 गिर नहीं सकती
2 मिटाते चलो
3 कुर्बानियाँ
4 तूफ़ान
5 सर्वनाश
6 बंगाल का अकाल
7 नौ-सैनिक विद्रोह
8 जय हिन्द
9 विकल है देश
10 साम्प्रदायिक दंगे
11 आज़ाद मस्तक को उठा लेता
12 दमित नारी
13 साम्प्रदायिक विष
14 हम एक हैं
15 एकता
16 हिन्दू-मुसलमान
17 संयुक्त बनो
18 विवशता में
19 युद्ध-क्षेत्र पर
20 देशी रजवाड़े
21 मलान सावधान
22 अफ़सोस है
23 विरोधी शक्तियाँ
24 मिल मज़दूर
25 शराबी
26 शराबी से
27 सोओ नहीं
28 स्थितियाँ और द्वन्द्व
29 जनवाणी
30 बदलता युग
31 नया प्रकाश
32 आज तो
33 बदल रही है ...
34 मुसकान के रंग
35 मेरे देश में
36 रक्षा
37 धरती की पुकार
38 मालवा में अकाल
39 अमन की रोशनी
40 जंगबाज़
41 ज़िन्दगी कैसे बदलती है
42 नयी नारी
43 मुक्ति-पर्व
Ä


(1) गिर नहीं सकती
..................................

गिर नहीं सकती कभी
विश्वास की दीवार !
निर्मित तप्त जन-जन के लहू से,
वज्र-सी / फौलाद-सी
दृढ़ हड्डियों से;
नींव के नीचे पड़े
कातर अनेकों मूक जन-बलिदान !
.

यह विश्वास
जीवन के नये भवितव्य का
धुँधला नहीं निस्सार !
गिर नहीं सकती कभी
अगणित प्रहारों से
नये विश्वास की दीवार !
.

वर्षों बाद
की निविड़ान्धकार सुरंग
जन-चेतना की शक्ति से
द्रुत पार,
ज्योतिर्मय हुआ संसार,
धधका सत्य का अंगार,
लोहे-सी खड़ी
जन-शक्ति की दीवार !
.

त्रस्त-शोषित-सर्वहारा-वर्ग
रक्षा के लिए
अपना उठाये सिर;
चुनौती दे रही उसको —
सतत साम्राज्य-लिप्सा-रक्त-नद में
वर्ग जो डूबा हुआ।
.

वह गिर नहीं सकती कभी
जन-संगठित-बल की
नयी दीवार !
टकरा लौट जाएगी
विरोधी धार !
बारम्बार लुण्ठित,
खा करारी हार !
......

(2) मिटाते चलो
.............................

सदियों के बंधन मिटाते चलो तुम,
तम के ये परदे हटाते चलो तुम,
अवरुद्ध राहों के पत्थर सभी ये
निर्झर सदृश सब उड़ाते चलो तुम !
.

विष दासता का पिलाया गया जो,
शोषण का कोल्हू चलाया गया जो,
असफल सभी नीति ऐसी करो —
जिससे उठे सिर, दबाया गया जो !
.

जन-युग समर्थक, प्रजातंत्र का बल
शत-शत स्वरों से यह गुंजित हो प्रतिपल,
जनपद जगे ले विजय की मशालें
श्रम से अभावों के फट जायँ बादल।
.....

(3) कुर्बानियाँ
.........................

विश्व के परतंत्र देशों की
जटिल दृढ़ शृंखलाएँ
टूटने को
आज झन-झन बज रही हैं !
आज प्रतिक्षण रण,
अमित कुर्बानियाँ
स्वातन्त्र्य-हित
प्रतिपल मचल कर हो रही हैं !
.

सिर्फ़ —
मरघट में चिताएँ हैं
शहीदों की,
नहीं ज्वाला बुझी,
धू-धू भयंकर और भीषण
हो रही है,
जल रही है,
बढ़ रही है !
.

यह उमड़ता ज्वार जनता का
कहीं पर रुक सका है ?
स्वर —
अवनि गिरते हुए तारक सरीखा,
क्या किसी भी घोर रव से
दब सका है ?
.

युद्ध की आवाज़,
एटम बॉम्ब का है नाम !
पर, ललकार —
इण्डोनेशिया छोड़ो,
भगो,
बर्मा व हिन्दुस्तान छोड़ो !
एशिया क्या —
विश्व के लघु राष्ट्र सारे,
एक बिगड़े सिंह जैसे
जग उठे हैं !
एक घायल साँप जैसे
फन उठाये दीखते हैं !
अन्त है फ़ासिज़्म का,
औ’ नष्ट होने जा रही हैं
विश्व की साम्राज्यवादी शक्तियाँ !
.

शोषण दमन का चक्र
जो अगणित युगों से चल रहा था,
आँख मींचे
फेक्टरी के बॉयलर में
कोयले के स्थान पर
श्रम-जीवियों के,
शोषितों के,
पद-दलित नत नीग्रों के
प्राण झोंके जा रहे थे
स्वार्थ-लोलुप-देश निर्दय !
.

आज वे सब
फड़फड़ा कर उठ रहे हैं !
घृणित दुखदायी हुकूमत को
पलटने उठ रहे हैं !

जो खड़े इनके शवों पर
तुच्छ रजकण से गये बीते समझकर
और बन कर बेरहम
करते रहे मर्दित पदों से,
लड़खड़ा कर गिर रहे हैं
एक करवट से !
.

उठे अब धूल से औ’ रक्त से रंजित,
चाहते —
अधिकार, आज़ादी, व्यवस्था।
पतित मानव की प्रगति का
चित्र सुन्दर : रूप अभिनव।
.
साम्य का संगीत गूँजे,
रोक बन कर जो खड़े हैं —
आज
तूफ़ानी प्रबल आघात,
विप्लव ज्वाल,
प्रतिपल दृढ़ हथौड़े से
निरंतर चोट खाकर,
एक पल में बुद्बुदों-से,
आह भर
मिट जाएंगे।
.

ध्रुव सत्य —
जनता की विजय।
संक्रांति के जो इन क्षणों में
छा रही जड़ता, निराशा
वह नहीं वातावरण होगा,
प्रगति की आश का
दुर्दम प्रभंजन
विश्व के पीड़ित उरों में
दौड़ जाएगा प्रखर बन।
.

(4) तूफ़ान
...................

समय संक्रांति का,
असफल निराशा का,
अधूरे स्वप्न ले मानव,
अधीर अशांति में
प्रतिपल विकल साँसें,
दमन के दिन
रहे हैं गिन,
रहे हैं गिन।
.

मिटा समुदाय सारा
खा गया है ज़ंग,
दीमक और फोड़ों से
हुआ जर्जर, हुआ जर्जर !
बिगड़ दोनों गये हैं लंग्स।
.

हिंसक और भक्षक
व्यक्ति का भीषण,
शुरू अब हो गया है नाच,
नंगा नाच !
जिसके पैर के नीचे
मनुजता का दबा है वक्ष,
क्रन्दन की पुकारें और आहें
बन रहीं
तबलों-मजीरों की घमक,
निर्दय कुचलता जा रहा है
आज !
पैरों से मसलता जा रहा है
आज !
दोनों हाथ जो अपने
डुबोकर रक्त में
होली मनाए,
क्रूर भूतों-सी हँसी हँसता
ज़मीं पर
वार कर हर बार
निर्मम बन
गिराता है रुधिर की धार !
सारा लाल है संसार !
सारा चीखता संसार
रो-रो आह भरकर आज
देखो बढ़ रहा तूफ़ान !
करने विश्व को आज़ाद,
देने को नया जीवन,
बसाने साम्य की दुनिया
मिटाने दुःख की घड़ियाँ !
युगों की
सख़्त काली लौह की कड़ियाँ
बजीं झन-झन,
बजीं झन-झन !
हुईं सब ग्रन्थियाँ ढीली,
खुले बंधन !
कि बोला अब नया इंसान —
जनता राज ज़िन्दाबाद,
जनता को मिले अधिकार !’

सारे विश्व में
स्वातन्त्र्य झंझावात
बहता तोड़ता
प्राचीन-चिन्तन बाँध,
राजा, काल्पनिक भगवान, डिक्टेटर
हुक़ूमत के ज़माने के
कफ़न पर कील अन्तिम
ठुक चुकी है आज।
जीवन जागरण के गान के स्वर
विश्व के प्रत्येक कोने से
सुनायी दे रहे हैं आज !
आया मुक्ति का तूफ़ान !
पूरे हो रहे अरमान !
अभिनन्दन !
प्रगति की शक्तियाँ सारी
तुम्हारे साथ !
दुर्दम मुक्ति का तूफ़ान !
निश्चय जीत का वरदान !
बढ़ता आ रहा तूफ़ान !
.

(5) सर्वनाश
......................

हिल गया तल तक
कि चारों ओर,
चीखा जन-समुन्दर घोर !
.

कण-कण ध्वस्त पर
क्रोधित हुए हैं लाल भीषण नेत्र,
जन-जन का उबलता ख़ून,
हिंसक बन गये कानून !
सम्मुख क्रूरता नर्तन
पतन का आज चरमोत्कर्ष
भीषण दानवी संघर्ष है दुर्द्धर्ष !
.

दुर्बल बाहुओं में
शक्ति का संचार,
नूतन वेग !
दृढ़ इंसान जम कर छीनता अधिकार !
स्वर - युग-धर्म का गूँजा,
मनुज सन्मुख प्रहारों से बिगड़ जूझा,
सबल ‘ग्रेनाइट’ से बंधन झुके,
रज-मेड़ से टूटे बहे
‘लोयस’ सदृश — जिसका न बस,
आ चीर दे कोई,
उड़ा दे देह —
बहता जल, मृतक-सा मेह !
घना कुहरा समाया
दिग-दिगन्तों में,
कि चारों ओर — आये घोर
.

दृग को बन्द करते अंध,
क्रोधित बन गरजते घन
घुमड़ते हैं, उमड़ते हैं,
कि दुर्दम साथ में
तूफ़ान भी आया !
पकड़ लो प्राण !
मेरे हाथ,
दुर्गम पंथ से चलकर
भयंकर नाश का सामान लाया
आज यह तूफ़ान !
.

कहते कापुरुष हैं डर
कि है सब व्यर्थ
सारी शक्ति, साहस अर्थ !
यह क्षण में कुचल देगा,
अभी देंगे दिखायी हम
अवनि-लुण्ठित, धराशायी !
हमारी चीख की आवाज़ भी देगी
नहीं बिलकुल सुनायी।
.

क्योंकि ये हुंकारते हैं मेघ,
भीषण सनसनाती आँधियाँ,
काले क्षितिज पर
कड़कड़ाती बिजलियाँ,
औ’ शीत की तलवार-सी है धार,
जिसमें सब जकड़ कर हिम
खोकर चेतना जड़वत्
बना निष्क्रिय
हमारे प्राण का कंपन
हमारी धमनियों का रक्त !
.

(6) बंगाल का अकाल
....................................

बंग भू पर हो रहा क्रन्दन-मरण व्याकुल स्वरों में !
.

घुल रहे हैं किस तरह विद्रोह रोके चिर-बुभुक्षित,
होश में हैं मौन मुरदे आज रोते क्यों मरण हित ?
वृन्तच्युत कोमल तड़पते भूख से शिशु-प्राण अंबुज,
पेट की ख़ातिर यहाँ सर्वस्व नारी बेचती निज,
और हैज़ा दीखता है आज कितने ही नगर में,
हैं बिछी अगणित कतारें हाय! लाशों की डगर में,
तड़पते अरमान इनके रोटियों की चाह में ही,
सो गये हैं जो सदा को एक व्याकुल आह में ही,
कौन देखे ? कौन रोये ? सड़ रहे मानव घरों में !
.

कह रहा जग आज साराµन्याय क्या, अन्याय है
आज का शासन कहाँ असहाय है, निरुपाय है ?’
ओ मरण के अस्थि-पंजर ! आज बल अपना दिखा दो,
घोर विप्लव ही मचा दो, आज सागर को हिला दो,
मौन है उच्छ्वास कह दो आज उनसे, ‘पुनः जागो !’
छीन लो अधिकार अपने, दीन बनकर कुछ न माँगो,
क्रूर अत्याचार जग के साम्य के पथ से हटा दो,
तोड़ युग के पूर्ण बंधन क्रांति की ज्वाला जला दो !
रूप ऐसा ओ प्रवर्तक ! आज हों लपटें करों में !
.

मंदिरों ने, मसजिदों ने क्या किसी को भी बचाया ?
सांत्वनामय धैर्य इनका क्या किसी के काम आया ?
धर्म के पोथे करोड़ों सड़ रहे हैं नालियों में,
आज चाँदी के न टुकड़े हैं प्रसादी थालियों में,
ईश पर विश्वास कैसा ? कौन ले अवतार आया ?
ढोंग मंदिर, ढोंग मसजिद भूल यह, ‘गुण गा न पाया।’
भाग्य का लेखा ? नहीं, वह था यही केवल बहाना
लूटना या चूसना था, या हमें उल्लू बनाना,
हाय ! मानव अधमरे ही, बह रहे हैं निर्झरों में !
.

हो रहा है नृत्य पथ पर, हो रहा रोदन कहीं पर,
बन रहे सुख-दुख भयंकर, मूक है जीवन यहीं पर
कह उठेगी मूर्ख दुनिया, ‘विश्व का ही यह नियम है,
भाग्य में इनके लिखा था, ईश की लीला विषम है।’
भूल है, जो कह रहे हैं, स्वार्थ का संसार उनका,
चल रहा है यह युगों से खोखला व्यापार उनका,
आज अंतिम दृश्य देखो नाट्य-घर बंगाल में आ,
जाग विप्लव, जाग नवयुग अस्थि के कंकाल में आ,
आज धड़कन, आज कंपन हो बुभुक्षित के उरों में !
.

(7) नौ-सैनिक विद्रोह
.......................................

मचली हिन्द सागर में सबल विद्रोह की लहरें
हिन्दुस्तान को छूने चली आतीं बिना ठहरें !
.

जब बंगाल की खाड़ी, अरब सागर हिले डोले
सदियों के दमित सीने नया दृढ़ जोश पा बोले !
.

लेंगे छीन आज़ादी कि हममें शक्ति है इतनी,
लो प्रतिशोध युग-युग का कि ज़ुल्मों की कथा कितनी !
.

नौ-सैनिक चले मिलकर जहाज़ों को उड़ाने को,
भीषण गोलियाँ बरसीं गुलामी को मिटाने को !
.

‘गोरे’ आततायी सब छिपे डरकर सभी भागे,
दुश्मन कौन था जो आ सका बढ़ कर वहाँ आगे !
.

जन-जन मुक्ति-आन्दोलन मशालें जल उठीं अगणित,
पशु-बल जा छिपा उल्लू सरीखा बन भयातंकित !
.

नव-आलोक से सारी दिशाएँ जगमगायी थीं !
नूतन चेतना से सब दिवारें डगमगायी थीं !
.

धक्का शक्तिशाली जब लगा जन-तंत्र का नारा,
सागर पार सिंहासन गया हिल राज्य का सारा !
.

सड़कों पर पड़े अगणित क़दम फ़ौलाद से दुर्दम,
जाग्रत देश के जन-जन अथक लड़ते रहे हरदम !
.

कीं कुर्बानियाँ तुमने उठायी आँधियाँ भीषण
जिससे कट गये जकड़े गुलामी के सभी बंधन !
.

लपटें जल उठीं दुगनी, पड़ा जब-जब दमन-पानी,
औ’ प्रतिरोध भी दुगना बढ़ा, की ख़ूब मनमानी !
.

यह साम्राज्यवादी गढ़ विकल हो बौखलाया था,
जिसने शक्ति का कण-कण कुचलने में लगाया था !
.

लेकिन बुझ न पायी जो वतन ने आग सुलगायी,
बरसों की बढ़ी जिसमें पुरानी जुड़ गयी खाई !
.

(8) जय हिंद!
...........................

हिंद फौज़ का स्वतन्त्र वीर
गिरि, समुद्र, वन विशाल चीर,
मृत्यु-द्वार-सा मिला समीर,
आफ़तें कठिन, चरण रुके न
पंथ पर, सदा बढ़े प्रवीण !
.

मुक्त राष्ट्र का सप्राण गीत,
जागरण प्रकाश में अतीत,
पर्व है महान, यह पुनीत,
हिन्द की विजय सही, जहान
रूप बन चला स्वयं नवीन !
.

(9) विकल है देश
...............................

गुलामी से विकल है देश, यह निष्प्राण-सा सारा,
उदासी और असफलता, पलायन का हुआ नारा !
.

दुखी, ठंड़ी मरण साँसें, मलिन जीवन, अमित बंधन,
कृशित तन, नग्न, मरणासन्न, कुंठितमन-निराशा क्षण !
.

प्रगति अवरुद्ध, विपदा लक्ष, शोषण है मनुज बंदी,
मिटा बिगड़ा समाजी तन, पतन की है लहर गंदी !
.

दशा युग की करुण है, आज वाणी में नहीं बँधती,
नहीं बँधती, विषम है साधना स्वर में नहीं सधती !
.

पड़ी कटु फूट आपस में, नहीं है मेल किंचित भी,
निरंतर बढ़ रहे नव दल, विभाजन है नवीन अभी !
.

कहाँ जनता ? पड़ी निर्जीव-सी बनकर, घिरा है तम,
निजी कुछ स्वार्थ में अंधे मनुज बस पूजते कि अहम् !
.

सिपाही छोड़ दो आलस, कहीं दुश्मन न खा जाये,
नहीं अब नींद के झोंके, बुरी हालत न आ जाये,
.

तुम्हारे देश के दीपक बुझाए जा रहे हैं जब,
नज़र के सामने लाकर मिटाए जा रहे हैं जब !
.

खड़े हो नाश के अन्तिम किनारे पर, सरल गिरना,
कि दुश्मन एक धक्के से मिटा देगा यहाँ वरना !
.

(10) साम्प्रदायिक दंगे
........................................

नगर-नगर व गाँव-गाँव में, दहक रही यह आग है,
डगर-डगर व पाँव-पाँव पर, भभक रही यह आग है !
.

कि आसमान चीरती हुई, विनाश की हवा चली,
हुआ अधीर, लाल-लाल बन जहान, सृष्टि सब जली,
.

कराहती व चीखती सनी हुई यह रक्त से गली-गली,
मनुज विवेक हीन, हिंस्र हो गया कठोर, जंगली !
.

कि ख़ून आँख में, कटार का कटार से जवाब है,
कि बस, यहाँ स्वच्छंद मज़हबी गँवार ही नवाब है !
.

न दीखती कहीं मनुष्य में ज़रा समीप लाज भी,
वही लिए कराल आदि जानवर शरीर आज भी !
.

असभ्य मद-प्रमत्त डोलती हैं हिंसकों की टोलियाँ,
सुलग रही असंख्य बेक़सूर व्यक्तियों की होलियाँ !
.

जलन के दर्द से कराहती औ’ काँपती वसुन्धरा
कि आज एक बार फिर जगी चँगेज़ की परम्परा !
.

कि आज एक बार फिर उखड़ रहे हैं बेशुमार घर !
कि आज एक बार फिर दिलों में छा रहा निरीह डर,
.

उतर रहे हैं मौत घाट लाख-लाख बालकों के सर
कि खा रही पछाड़ विश्व-माँ लुटी हुई सिहर-सिहर !
.

मनुष्य का कठोर रूप यह भयावना है किस क़दर,
कि धर्म जाति गत प्रभाव का ज़हर उगल रहा ग़दर !
.

स्वदेश छोड़, अश्रु साथ ले ये चल पड़े हैं काफ़िले
अनेक रोग ग्रस्त, चोट त्रस्त हैं, अनेक अध-जले !
.

कि रोक लो शहीद बन तमाम औरतों की आबरू !
महात्मा, पटेल, शेख, राष्ट्र-कर्णधार नेहरू !
.

रुको प्रगति, विकास और राष्ट्रीयता के दुश्मनो !
गुलाम-वृत्ति अब नहीं, रुको स्वतंत्रता के दुश्मनो !
.

तुम्हें क़सम है चाँद की, तुम्हें क़सम है पाकतम क़ुरान की,
तुम्हें क़सम ज़मीन की, तुम्हें क़सम है आसमान की !
.

मदद करो निरीह की उठो न, क्योंकि कर्बला के वीर हो,
अरब महान देश के बहादुरो! उठो कि तुम अमीर हो !
.

शिवा-प्रताप की परम्परा के पुत्र तुम बदल गये,
महानता के स्वप्न को लिए हुए कहाँ फिसल गये ?
.

तुम्हीं वतन की शान-बान को गिरा रहे, मिटा रहे,
कि हिन्द की उदार भावना स्वयं घटा रहे !
.

कि मेल से रहो, यही करीम और श्याम की पुकार है,
कि एक हिंद हो यही रहीम और राम की पुकार है !
.

(11) आज़ाद मस्तक को उठा लेता
..........................................................

लूट हिंसा का मनुज पर जब नशा छाया,
रूप ले हैवान का मज़हब उतर आया,
रक्त की इन्सान की यदि प्यास बुझ जाती
ख़त्म हो जाती बनी नेतागिरी माया !
.

इसलिए विद्वेष का झण्डा उठाया है,
क़त्ल करने का घृणित नारा लगाया है,
मतलबी साम्राज्यवादी चंद लोगों ने
देश को मेरे क़साई घर बनाया है !
.

आग की लपटें गगन में घिर घहरती हैं
जल रहे गृह, रूह जन-जन की सिहरती है,
मौत की आवाज़, मनहूसी समायी है,
भूमि पर सरिता हलाहल की लहरती है !
.

आज तो गुमराह पागल झुण्ड मदमाते
शस्त्रा ले फरसे छुरे हिंसक, चले आते,
दृश्य भीषण नाश का बर्बर मचाते जो
गीत, पर, अल्लाह या हनुमान का गाते !
.

मिट गये सब वृद्ध नारी शिशु व रोगी तक,
शर्म है जो छीन जीने का लिया है हक़,
आततायी शक्ति ने हा! क्रूर निर्दय बन
स्वार्थ के हित में मिटाये शांति के साधक !
.

भग्न औ’ वीरान कर डाले अनेकों घर,
यन्त्राणा निष्ठुर रुधे हैं आज भय से स्वर !
जल रहे धू-धू नगर सब ग्राम जीवित जन
चाहिए उजड़े हुओं को त्राण का अवसर !
.

क्या पता था देश का यह भाग्य आएगा !
दूर हो अंग्रेज़ बैठा मुसकराएगा !
काट डालेंगे गले, लड़ आज आपस में !
हिंद की औलाद को यह रूप भाएगा !
.

आँधियाँ बंगाल के नभ में उठी थीं जब
रोक लेना था मगध प्रतिशोध का विप्लव !
फिर न पड़ती देखनी पंजाब की पशुता,
और यह सीमान्त के निर्दोष मानव शव !
.

आज सड़कों पर खड़ी है मौत की दहशत,
नग्न भूखी राह में जनता पड़ी आहत,
क्षीण जर्जर त्रस्त दुर्बल उन्मना व्याकुल,
आत्म-गौरव, आत्म-वैभव नष्ट है आनत !
.

व्योम में उठती मुसीबत की किरण चमकी !
रक्त की छाया दिशाएँ लाल हो दमकीं,
फ़ैसला है आज किस्मत की अनेकों का
ज्वाल बढ़ती जा रही है, जो नहीं कम की !
.

सृष्टि का संघर्ष क्षण प्रत्येक धड़कन का
स्नेह पावन से मिटा दो शेष मद रण का,
हो, चुका नरमेध मानवता जगो, गाओ !
मुक्ति का संगीत, आशा गीत जीवन का !
.

आज तो बेचैन अस्त-व्यस्त है तन-मन
यह न होनी बात, नाशक देख आयोजन !
गर्व से आज़ाद मस्तक को उठा लेता,
लड़ गया होता विषमता से कहीं जीवन !
.

(12) दमित नारी
................................

मिट्टी-मिट्टी बोल रही है !
बोल रही हैं नंगी काली ऊँची चट्टानें,
बोल रहे हैं सूखे-सूखे रक्तिम नाले,
चीख़ रही है सरिता-सरिता !

लानत है इंसान !
किया तुम्हीं ने नारी पर
अत्याचार प्रहार,
लानत है
युग-युग की चिर संचित संस्कृति,
जिसकी पशुता ने
नारी की अस्मत पर हाथ उठाया !
.

लानत है मज़हब
जो बनता मानवता का पहरेदार,
जिसने दुर्बलता पर हावी हो,
आज किया मनमाना भक्षक व्यापार !
घृणित ख़ुदा के बोल सभी ;
क्योंकि केवल वे ही ज़िम्मेदार
कि जिनने जन-जन की नस में
भर दिया भयंकर विष
जो निकला फूट
मनुजता की नींव हिला,
जिसकी आज विषैली ज्वाला
कोने-कोने में फैल गयी है;
मन के नैतिक बंधन
जिसने ढीले कर डाले हैं !
सोच नहीं सकता कोई,
पागलपन के उठे बगूले
काँपी धरती, कण-कण काँपा,
आसमान से तारा-तारा काँपा,
.

पर, रुक न सका
हैवानों का चलता चक्र अरे !
जिसने नारीत्व
धरा पर लुण्ठित कर,
माँ पर हाथ उठाया,
बना दिया विधवा-विधवा !
पुत्रा विहीना !
घायल-घायल
रो-रो सूख गये हैं जिनके आँसू,
सूख गये हैं केश कहीं
ख़ूनी धारों से,
सूख गये हैं होंठ !
तुम्हारी निर्मम आवाज़ों से
.

भयभीता नारी
गिन-गिनकर
साँसें छोड़ रही है !

वह देश असभ्य -
किये जिसने ऐसे काम,
वह इंसान नहीं इंसान,
पशु से भी बदतर है !
जिसने मातृत्व किया पद-मर्दित,
नारीत्व किया अपमानित,
निर्बल से खिलवाड़ !
.

(13) साम्प्रदायिक-विष
........................................

आज नूतन शक्ति का संचार !
नस-नस में फड़कता जोश
दुर्दम मानवी दृढ़ !
होश की करवट
कि देखा सामने मरघट,
पड़ीं लाशें मनुज की,
चीत्कारें !
.

ध्वस्त गृह अट्टालिकाएँ,
धूल उड़ती,
नाश की चलती हवाएँ,
ख़ून के सागर
धरा पर बह रहे,
ज्वालामुखी लावा उगलते,
हो रहा है मृत प्रलय
ताण्डव प्रखर,
.

गिरते धरा पर शीश अगणित
वार से होकर पराजित,
अवनि लुण्ठित, चरण मर्दित,
.

थूक ठोकर से मसलता
आदमी जब आदमी को
तब जगे हैं प्राण !
उन्मद वेग ज्वाला
सर्व भक्षक क्रूर लपटें
आ गयीं जब, खा गयीं जब,
युग-युगों की शक्ति,
संचित धन, मनुजता !
.

जो कभी सोचा न हो मन में
कभी देखा नहीं हो स्वप्न तक में,
क्रूर बर्बरता, हिला दे दिल !
जगत इतिहास के
सौ-वर्ष तक के युद्ध
फीके बालकों के खेल
बन कर रह गये, उपहास !
होगा, सच, नहीं विश्वास !
हिंसा का, मरण अतिरेक !
घिस गया चंगेज़ !
फीका पड़ गया तैमूर !
औ’ औरंगज़ेबी ज़ुल्म ढह
जलियानवाला बाग !
हिंसक आततायी
लोमहर्षक, क्रूर,
फैली रोशनी के, सामने
‘सरवर गुलामी’1 ज़ुल्म !
.
[1. पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) का तत्कालीन साम्प्रदायिक नेता।]
.

(14) हम एक हैं
..............................

तूने कर दिया बरबाद
मेरे देश का वैभव
कि मेरे देश का गौरव !
.

मुझे है याद —
मेरी भूमि पर बहता कभी था
नीर-सा घी-दूध,
जैसे आज बहता
युद्ध के मैदान में
पेट्रोल अथवा ख़ून !
जन-जन तृप्त थे
निश्चिन्त,
जीवन में सुखी !
.

पर, आज
तूने कर दिया मुहताज,
भूखों मार !
दुख, आतंक,
गोलों और तोपों का भरा भंडार !
.

लड़ते देश के बालक
झगड़ गोबर सरीखी चीज़ के ऊपर !
धृणित !
तूने जमाया पैर माँ के वक्ष पर,
जिसके करोड़ों लाल
हिन्दू और मुस्लिम को लड़ाया,
फूट का बो बीज,
भू-सम्पत्ति का विक्रय !
.

नया भावी मनुज,
जब नीति तेरी
याद किंचित भी करेगा तो —
उबलकर क्रोध से अपने,
भरे प्रतिशोध ज्वाला,
दाँत लेगा पीस !
अपने बाप-दादों की
मरण-सी बेबसी पर,
अश्रु की धारा बहाकर !
तोड़ देगा गर्व सब !
.

पर, आज तो ये आँख मेरी
देखतीं वह दृश्य —
जीवन में
कभी भी स्वप्न तक में
जो न सकता सोच !
क्या मिट सभ्यता सारी गयी ?
वर्षों हमारी साधना का —
एकता का प्रयत्न,
सब साहित्य का वरदान,
मिट्टी हो गया ?
.

होना असम्भव है !
रुकेगी यह नहीं आवाज़ —
‘सब इंसान जग के एक हैं !
हम एक हैं !
.

(15) एकता
......................

कर्बला प्रयाग है,
प्रयाग कर्बला !
क़ुरान वेद की नसीहतों से
व्यक्ति का करो भला !
टले अशुभ घड़ी
व मृत्यु भय बला !
.

कि जाति-द्वेष छोड़कर उठो,
कि धर्म-द्वेष छोड़कर उठो,
वतन की एकता के वास्ते,
वतन की नव-स्वतंत्रता के वास्ते !
.

महान हिंद की महानता बनी रहे !
उदार हिन्द की उदारता बनी रहे !
.

सभी दिलों की चाह जो
वही सतत किये चलो !
महान ध्येय के निमित्त तुम
जलो, जलो, जलो !
.

(16) हिन्दू-मुसलमान
........................................

एक है सबका ख़ुदा, जिसने बनाये जीव सारे !
.

ख़ून की नदियाँ बहाकर
देश की रक्षा न होगी,
धर्म का ले नाम यों पथ-
भ्रष्ट मानवता न होगी,
सभ्यता का हार जिसमें
उच्च भावों को पिरोये
हैं युगों से क़ीमती मोती
अनेकों प्राण खोये।
एक होकर ही रहेंगे, हिन्द तेरे जन-सितारे !
.

भूत सिर पर छा गया
हैवानियत का क्रूर निर्दय,
शक्ति का आह्नान कर
जागो, मनुजता की कहो जय !
छोड़ संयम हो गये सब
क्रोध से हिंसक व निर्मम
और भाई का गला भाई
गिराता है, यही ग़म,
याद करलो, उस ख़ुदा को हैं सभी जन-प्राण प्यारे !
.

(17) संयुक्त बनो
.............................

अपने ही हाथों से अपने हमने आज कुल्हाड़ी मारी,
ग़लती पर ग़लती कर आज जुए में जीती बाज़ी हारी,
ले न सके हम वह जिसके पाने के युग-युग से अधिकारी;
दिल टूक-टूक होता है, यह निर्मम कितनी रे लाचारी !
मेरा देश बँटा है टुकड़ों में अनगिन,
समझूँ जन-जन की आज़ादी या दुर्दिन ?
.

आज़ादी हित हमने अगणित अविराम महा बलिदान किये,
जलियाँवाला कांड सहा, औ’ ममता के बंधन छोड़ दिये,
चुप कि कराह न उठने दी थी पीड़ा के सारे घाव सिये,
विपदाओं के बादल हँस-हँस हमने अपने ही शीश लिये,
पर, यह भारत माता तो आज अभागिन,
नाची है रणचण्डी आ क्रूर पिशाचिन !
.

सन उन्नीस-सौ-बयालीस उठाया जनता ने आन्दोलन,
‘भारत छोड़ो’ के नारे पर फाँसी झूले आ मुक्त-तरुण,
पशुबल की गोली से हिल काँप उठा था यह सम्पूर्ण गगन,
हम मतवाले थे आज़ादी के अविचल निर्भय सैनिक बन ;
जब जूझे दुश्मन से, हम मरते गिन-गिन !
विधवा होती जाती थीं, हाय सुहागिन !
.

जन-जन निर्भय हो अत्याचारी अंग्रेज़ों से जूझा था,
बच्चों, माता, पत्नी और पिता का डर न कहीं सूझा था,
वापस भग आने के कायरपन को न किसी से पूछा था,
इनने अपने बीहड़तम पथ को न किसी से झुक बूझा था,
निकली थीं बनकर अबलाएँ अभिशापिन,
कूदीं रण-ज्वाला में बनकर उन्मादिन !
.

‘लीगी’ वाले भारत को अगणित काफ़िर ‘नीरो’ सिद्ध हुए ;
जिनके ‘क़ौमी’ प्रचार से एके के सब पथ अवरुद्ध हुए,
अतएव प्रगतिशील प्रखर जनबल दुर्दम संस्कृत क्रुद्ध हुए ;
अच्छे और बुरे के फिर ऐसे विनष्टकारी युद्ध हुए
हावी होकर आया कटु य’ कसाईपन
मज़हब का नंगा नाच हुआ खन-खन-खन !
.

निर्दयी बनी दीवानी, भोली जनता औ’ गुमराह बनी,
आपस में काट रहे आज गले भूमि रक्त से हाय सनी,
ललकार उठा तब सरहद्दी सूबे में पठानसिंह ‘गनी’,
हर जन-तन्त्रा बसाने वाले की छाती फूली और तनी,
गांधी, खान, जवाहर रोकेंगे क्रन्दन,
आराजकता का हो जग से आज मरण !
.

दिन दूर न होगा जब नक्शे से ख़ुद पाकिस्तान हटेगा,
ऊँचे-ऊँचे भवन गिरेंगे शोषण, पूँजीवाद मिटेगा,
शक्तिमना अविजित उन्नत मेरा यह हिन्दुस्तान बनेगा,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबका है यह देश, जगेगा,
गले मिलेंगे भेद भूल कर ये जन-जन
खिल जाएगा रे सूखा उजड़ा उपवन !
.

फिर हम देंगे जग को अपनी नूतन संस्कृति का ज्योति दान,
सत्य, अहिंसा, औ’ चर्खे का गाएंगे हम उन्मुक्त गान,
फैलेगी सारे लोकों में भारत की सुन्दर श्रेष्ठ शान,
उठो-उठो अब ओ मेरे बन्दी चिन्तित देश अमर महान !
अखंड, संयुक्त बनो ! मुक्त करो जीवन !
जर्जरता मिट जाये, आये नव-यौवन !
.

(18) विवशता में
.................................

विवशता की
असह उन मूक घड़ियों में
गगन को चीरती आएँ
तुम्हारे प्यार की किरणें !
कि फिर
युग-युग पिपासित होंठ पर जग के
बहें मधु स्नेह के झरने !
मनुजता के पतन-निर्मित
अँधेरे के समय-पट पर,
गगन को चीरती आएँ
तुम्हारे प्यार की किरणें !
.

बहा ले जा घृणा के तृण,
अरी झेलम, अरी गंगा !
क्षितिज से उठ रहीं लपटें,
महा बर्बर विनाशी आपसी दंगा,
लुटेरा है खड़ा नंगा !
.

कि काले मेघ आओ तुम
कि काले मेघ छाओ तुम,
बरस लो आज झर-झर-झर,
कड़क कर आततायी के
हृदय में आज भर दो डर,
गिरा करका,
ढहा दो सब अशिव के गढ़ !
अरे ओ, त्राण के दुर्दम चरण !
उठ-चढ़
फिसलनी इन बड़ी ऊँची दिवारों पर,

समूची शक्ति के बल पर,
कि तेरे दृढ़ प्रहारों से
लगे ढहने,
सभी दीवार ये गिरने !
गगन को चीरती आएँ तभी
निर्देश पथ को दूर से
करती हुई किरणें !
तभी बाहें उठें तेरी
सभी पीड़ित उरों की गोद में भरने !
.

सदियाँ बीत जाएंगी,
कि नदियाँ सूख जाएंगी,
धरा यह डूब जाएगी,
नयी धरती उभर कर शीघ्र आएगी,
मगर विश्वास है इतना —
विरासत में मिलेगी यह
तुम्हारी भूमि की संस्कृति,
इसे केवल न जानो इति।
उठो ऐसा न हो मानव
भविष्यत् थूक दे तुम पर,
बनो मत मूक,
पशुता के चरण पर
नत नहीं हो शीश !
यह आशीष
दोनों ने दिया है —
शाप ने, वर ने।
गगन को चीरती आएँ
तुम्हारे प्यार की किरणें !
.

(19) युद्ध-क्षेत्र पर
..............................

खंडहर हैं, खंडहर हैं, खंडहर !
शिलाएँ टूटतीं भू पर !
.

भयंकर ध्वंस निर्मम,
धूम्र-तम है,
अग्नि की भीषण शिखाएँ लाल
इधर-उधर !
कि कर्ण परदा फाड़ता है स्वर !
.

मिटाता साथ में सब
खेत, गृह, अट्टालिकाएँ, जीर्ण कुटियाँ,
क्रूरता, विस्फोट,
बॉम्ब को पटक,
झपट लटक उतर पेराशूट से
ले शीघ्र निर्मम
नाश के कटु यंत्र,
ये सब भूत से बन
मानवों के पूत,
ख़ाकी वर्दियों में रौंदते हैं
वक्ष दुनिया का।
आँसू रक्त की है धार !
सारा लाल है संसार !
चारों ओर धुआँ-धार !
.

(20) देशी रजवाड़े
....................................

प्रतिगामी, जनता के दुश्मन
जो जन-बल के सदा विरोधी,
जिनने जनता के शव पर चढ़
किया अभी तक चैपट शासन !
.

जन घोर उपेक्षा, लगा दिया
यहाँ ज़मीदारों का जमघट
अंग्रेज़ों को शीश झुकाया
औ’ भारत का अपमान किया !
.

राजा और नवाब विलासी
महलों में सुख के भर साधन,
फ़ौज़ पुलिस के गुर्गों से जो
लगवाते जन-जन को फाँसी !
.

ख़ुद निश्चिन्त हमेशा रहते
उठता रहता है कहीं धुआँ,
जलते गाँव, उजड़ जाते जन
अकाल, बीमारी को सहते !
.

करते रहते जो मनमानी,
अपने औ’ पुरखों के फोटो
औ’ स्टेच्यू पथ में लगवाते
पर, न लगी है झाँसी की रानी !
.

एक नवाब बनाता मसज़िद
आर्य-समाज न बनने देगा,
धर्मों की संकीर्णता बढ़ी,
छीने हैं हक़, यह कैसी ज़िद !
.

यह भारत जब आज़ाद हुआ
तब इनने भी यह ही चाहा;
हम आज़ाद बनें, पर न पता
अंग्रेज़ मरा, बरबाद हुआ !
.

पनपा इनकी सीमा में बढ़
हिन्दू, मुस्लिम, हरिजन में घुस
जाँति-पाँति का भेद भाव रे
ये प्रतिक्रियावादी दृढ़ गढ़ !
.

ये हिजड़े कायर लड़ न सके !
जब अग्रेंज़ी राज बना था,
मुट्ठी भर ‘गोरे’ बढ़ते थे,
ये कर न सके कुछ, सिर्फ़ झुके !
.

चलती आयी अब तक सत्ता
संगीनों के, गोलों के बल,
अब न टिकेगा ताज कहीं भी
जाग उठा हर पत्ता-पत्ता !
.

‘शेरे कश्मीर’ बना हर जन
ट्रावनकोर, हैदराबाद कि
भोपाल व कश्मीर शत्रु हैं
अतएव करो जन-आन्दोलन !
.

फिर भारत में जनतंत्र जगे !
जनता का राज बने ऐसा,
हिल न सके जब आये झंझा,
ये ताज पटक कर शीघ्र भगें !
.

(21) मलान सावधान
.......................................

मिटी नहीं अभी
मनुष्य की पशुत्व-वृत्ति,
ले रहा अशान्त श्वास
जंगली हृदय मलान
रंग-भेद के बुझे हुए चिराग़ पर !
गये नहीं अभी
समाज से विचार —
रक्त-पान के
अपार लूट के, खसोट के,
‘सुवर्ण’ की विनष्ट शान के
मनुष्य के मनुष्य पर प्रहार मौत के !
.

असभ्य दासता प्रथा बनी रहे,
‘सुवर्ण’ चाह
आज भी बना रही सवेग योजना,
गले पुकार कर रहे
अशक्त सृष्टि-स्वप्न घोषणा दहाड़ !
ले विनाश शस्त्र-बल शरण,
सहस्र राक्षसी चरण
विषाक्त साथ में घृणा पवन!
.

अनीति ढोल
बन्द कर श्रवण
प्रमादवश
बजा रहा, बजा रहा !
गुलाम विश्व के
मिटे हुए असार चिन्ह
फिर बना रहा !
ज़मीन पर न, आसमान में
क़िले बड़े-बड़े असीम
कर रहा सृजन !
उबल रहा मलान का
प्रखर सुधार श्वेत-रक्त,
गॉड का महान भक्त,
गौर-वर्ण-जाति का नवीन दूत
.

यह ग़लत कि वह मनुष्य बीच भूत !
.

अजेय शक्ति उठ रही,
नवीन ज़िन्दगी मचल रही,
विनाश का धुआँ
बिखर-बिखर अनन्त में समा रहा,
विरोध-मेघ व्योम घेर कर लहर रहे,
मनुष्यता उतर रही,
नये समाज का विधान हो रहा !
बड़ा कठिन लकीर पीटना
वही - पुराण जाति-भेद, रंग-भेद की !
मलान सावधान !
.

(22) अफ़सोस है!
................................

अफ़सोस है, अफ़सोस है !
.

उजड़ा हुआ संसार है,
रोदन यहाँ हर द्वार है,
बिगड़ा हुआ, पीड़ित, दुखी, मिटता हुआ समुदाय है !
अफ़सोस है, अफ़सोस है !
.

भीषण क्षुधा की ज्वाल है,
सूखी जगत की डाल है,
अम्बर-अवनि में गूँजता बस एक ही स्वर, ‘हाय है’ !
अफ़सोस है, अफ़सोस है !
.
नीरस मनुज का गान है,
झूठा लिए अभिमान है
गतिहीन जीवन है जटिल, असहाय है, निरुपाय है !
अफ़सोस है, अफ़सोस है !
.

(23) विरोधी शक्तियाँ
........................................

घेर रहा है जग को प्रतिपल, उठता जड़ता का काला तम,
बढ़ता जाता है जीवन में, अतिशय क्रन्दन, अतिशय विभ्रम,
छाते जाते अविरल नभ में, काले, भयग्रस्त, अमा-से घन,
मति खो, अनियन्त्रित आज बना निष्प्राणित, अपमानित जीवन !
.

रोक रहा है कौन उठा कर, आज भुजा से जन का इंजन !
गति प्रेरक पहियों में, अवनति-हित कौन रहा है भर उलझन ?
बर्फ़ीली आँधी में जीवित मानव धधका सेंक रहा है —
कौन दिवाकर-दीपित मुख पर, परदा, ढकने, फेंक रहा है ?
.

किन पापों की रात क्षितिज से, पथभ्रष्टा बन उतर रही है,
डायन-सी प्रतिमा लेकर, नव युग की झोली कतर रही है,
कौन विरोधी-धारा, फैली बस्ती पर आ दौड़ रही है,
कौन विरोधी धारा, नूतन, दीवारों को तोड़ रही है ?
.

किसने इस क्षण आभा को कर म्लान, अँधेरे से मन जोड़ा,
अक्षय संचय जिससे रह-रह कर होता जाता है थोड़ा !
जूझो युग के सजग पथिक तुम थक जाने का अवसर न अरे,
रे नाविक ! विधि सोचो ऐसी, जिससे युग-नौका आज तरे !
.

(24) मिल-मज़दूर
....................................

लम्बी-लम्बी
चैड़ी-चैड़ी
हलकी नीली
कुछ मटमैली
गड्ढ़ों वाली
टूटी-टूटी
डम्बर की सड़कें
रोज़ सबेरे तड़के
मीलों के उन
मज़दूरों से
ख़ूब खचाखच
भर जाती हैं !
.

अगणित नारी,
बालक, नर
रोटी लेकर
हँस-हँस कर
जल्दी-जल्दी
सिर्फ़ मशीनों की
धुनबुन में
बढ़ते जाते हैं
रोज़ क़तारों में !
.

उस काले-काले
इंजन-सा ही
जिनका जीवन
धड़-धड़ करता
दौड़ रहा है !
किस्मत अपनी
फोड़ रहा है !
.

मैले-मैले
कपड़े पहने,
वे क्या जानें
कैसे गहने ?
कपड़ों के निर्माता
वैभव के निर्माता
पर अध-नंगे
और अचानक
एक दिवस फिर
आहें भर कर
होकर जर्जर
भूखे नंगे
चल देते हैं
स्वर्ग-पुरी को !
बेहद महँगा
जिनका बनता
मरघट का क्रम !
.

ऐसे मानव
बालों में भर
कानों में भर
रूई के कण,
आँखें मलकर
डगमग करते
बढ़ते जाते,
जीवन से डट
लड़ते जाते,
पर्वत छाती
चढ़ते जाते,
टीले ऊँचे
खंदक नीचे
चलते जाते,
गरमी सरदी
वर्षा ओले
तन को खोले
औ’ बिन बोले
जीवन भर औ’
हँस-हँस कर
आघात निरंतर
भीषण तर
सहते जाते !
.

आबाद रहे
यह धरती भी
हर रोज़ भरें
ये राहें सब,
हर रोज़ छुए
यह धूल चरण
इन मानव की
इस महिमा पर !
.

(25) शराबी - 1
...............................

हमेशा देखकर जिसको किया करते मनुज नफ़रत
कि दुनिया में नहीं मिलती कभी जिसको ज़रा इज़्ज़त,
पड़ा मिलता कभी मैली-कुचैली नालियों के पास
कि जिसका ज़िन्दगी का, ठोकरें खाता रहा इतिहास,
ऐसा आदमी केवल
शराबी है, शराबी है !
.

नहीं रहती जिसे कुछ याद दुनिया की, लँगोटी की,
कि भर दुर्गन्ध जीवन की, सदा हँसता हँसी फीकी,
हमेशा चाटते रहते सड़क पर मुख अनेकों श्वान,
हज़ारों गालियाँ देते, हज़ारों लोग पागल जान
ऐसा आदमी केवल
शराबी है, शराबी है !
.

शराबी को हमेशा काल पहले मौत आती है,
कि पहले फूल-सी कोमल जवानी बीत जाती है,
हज़ारों व्यक्तियों में एक पैसे का बना मुहताज,
कि जिसकी भूल कर कोई कभी सुनता नहीं आवाज़
ऐसा आदमी केवल
शराबी है, शराबी है !
.
(1 पंजाब सरकार के अनुरोध पर लिखित।)
.

(26) शराबी से – 1
........................................

मनुष्य हो अगर तो फिर शराब मत पिया करो !
.

तुम्हारे हाथ में भरा हुआ गिलास जो,
उसे समझ ज़हर तुरन्त आज फोड़ दो,
बुझा सके कभी न दिल की हाय! प्यास जो
उसे गलीज़ व्यर्थ जान जल्द छोड़ दो,
मनुष्य हो अगर तो फिर नशा नहीं किया करो !
.

स्वतंत्र - जो बिना सुरा के शान से जिए,
शराब है बुरी सदा अमीर के लिए,
शराब है बुरी छुरी सदा ग़रीब के लिए,
शराब है सदा बुरी शरीर के लिए !
मनुष्य हो अगर तो सभ्यता के सामने डरो !
.
(1 पंजाब सरकार के अनुरोध पर लिखित।)
.

(27) सोओ नहीं
.............................

सोओ नहीं, सोओ नहीं !
.

यह रात है दुख से भरी,
इस रात डूबेगी तरी,
तुम बाहुओं में शक्ति भर
कर जागते निशि भर रहो !
इंसान हो तो भीत जीवन में कभी
होओ नहीं, होओ नहीं !
.

यह रात काली है बड़ी,
पथ पर भयानकता जड़ी
तुम ज्वाल हाथों में लिए
आवाज़ यह करते रहो —
अवसर प्रलय संगर प्रबल तुम भूलकर
खोओ नहीं, खोओ नहीं !
.

(28) स्थितियाँ और द्वन्द्व
..............................................

निश्चिन्त भी, भयभीत भी !
.

यह ज़िन्दगी जब दाँव पर,
संघर्ष है प्रति पाँव पर,
नव भैरवी भी बज रही,
रुकना न सम्भव है कहीं
है हार भी औ’ जीत भी !
निश्चिन्त भी, भयभीत भी !
.

हम सुन रहे हैं राग सब
अनुराग और विराग सब
कोई बुलाता — लौट आ,
कोई सजाता कह, ‘विदा !’
रोदन करुण भी, गीत भी !
निश्चिन्त भी, भयभीत भी !
.

शिव में अशिव आभास भी,
छलना जहाँ — विश्वास भी,
अभिशाप भी वरदान है,
मिट्टी निरीह महान है !
अपवित्र और पुनीत भी !
निश्चिन्त भी, भयभीत भी !
.

ललकारता है कौन यह ?
पुचकारता है कौन यह ?
मानव विरोधी द्वन्द्व में,
मानव सदा आनन्द में !
यह शत्रु भी है मीत भी !
निश्चिन्त भी, भयभीत भी !
.

(29) जनवाणी
................................

जो जन-जन के भावों और विचारों को वहन करे
वह जनवाणी है !
वह युगवाणी है !
.

तम का छाया-नर्तन
आतंक भरा शासन
जन-जागृति ज्योति-किरण
करती है निर्वासन,

जो हर अवरोधी सामाजिक ताक़त का दमन करे
वह जनवाणी है !
वह युगवाणी है !
.

शोषक-वर्ग भुजाएँ
नाशक तेज हवाएँ
मेघों-अस्त्रों से कर
नव-शक्ति प्रहार प्रखर,
जो जन-बल के सम्मुख श्रद्धा आदर से नमन करे
वह जनवाणी है !
वह युगवाणी है !
.

उठते गिरते हरदम
नंगों भूखों का श्रम,
क्षण भर होकर आहत
पर, पा लेता क़ीमत,

जो सामूहिक पीड़ा, आँसू, क्रन्दन को सहन करे
वह जनवाणी है !
वह युगवाणी है !
.

सुनकर उठते विप्लव,
बिछ जाते भू पर शव,
उठता ज्वाला भैरव,
गु×िजत कर क्रन्दन-रव,

जो गिरती दीवारों पर नूतन जग का सृजन करे
वह जनवाणी है !
वह युगवाणी है !
.

वेग रुके जन बल का,
स्वर बनकर हलचल का
छा जाता अम्बर में
धरती पर घर-घर में,

जो दुनिया की शोषित जनता का एकीकरण करे
वह जनवाणी है !
वह युगवाणी है !
.

(30) बदलता युग
....................................

लो बदलता है ज़माना !
.

ज्वाल जग में लग गयी है,
आग जीवन की नयी है
जल रहा है जीर्ण जर्जर टूट मिटता सब पुराना !
.

ध्वंस की लपटें भयंकर
छा रहीं सारे गगन पर
वेग अन्धाधुन्ध है जिसका असम्भव है दबाना !
.

बढ़ रहा प्रत्येक जन-जन,
रोशनी में मुक्त कन-कन,
वास्तविकता सामने आयी, न अब कोई बहाना !
.

रोष इससे तुम करो ना,
द्रोह साँसें भी भरो ना,
यह सतत बढ़ता रहेगा, व्यर्थ काँटों को बिछाना !
.

(31) नया प्रकाश
..............................

नया प्रकाश है
नया प्रकाश !
दीप्यमान ओर-छोर
अंधकार मिट रहा अछोर घोर !
.

वास्तविक स्वरूप नग्न सामने -
असंख्य क्षीण-दीन,
जीर्ण-शीर्ण
भग्न
सामने खड़े हुए
क़तार में मनुज !
धुआँ-धुआँ
घिरा !
.

कि आसमान में
घुमड़ रहे
डरावने विशाल मेघ !
चीरता हुआ गगन
नवीन विश्व का
नवीन शिशु निकल
समाज के प्रवीण रंगमंच को
निहार बढ़ रहा।
.

प्रकाश देख काँपती
परम्परा,
प्रकाश देख डगमगा रहीं
सकल पुराण रूढ़ियाँ !
नवीन चेतना,
नवीन भावना,
विचार नव्य-भव्य औ’
नवीन आश है !
नवीन आश है !
नया प्रकाश है,
नया प्रकाश है !


(32) आज तो
.............................

आज तो चली अजब हवा
दब गया दमन का दबदबा,
भय विहीन,
है ज़मीन !


मात चाँद की अरे कला ;
शक्ति गीत गा रहा गला,
हर मलीन
है नवीन !


रूप है समाज का अजब,
हर मनुष्य है स्वतंत्र अब,
ना अधीन
है न दीन !


(33) बदल रही है
..............................

बदल रही है आज हमारी
पहली नक़ली तसवीर,
(खाओ भूखो ! हलवा पूरी
और गरम मीठी खीर !)


बदल रही है आज हमारी
फटी पुरानी पोशाक,
(अब न कटाना जग के सम्मुख
अपनी यह ऊँची नाक !)


बदल रही है आज हमारी
डर की हलकी आवाज़,
(दूर बहुत ही दूर भगी है
अब तन की मन की लाज !)


बदल रही है आज हमारी
यह जाड़ों मारी शॉल,
(आज बना लो भैया अपनी
मोटी नव-चादर लाल !)


(34) मुसकान के रंग
.....................................

दुनिया के जिगर से
जो उट्ठा था धुआँ
अब दहकते हुए शोलों में
बदल गया !
.

आयी थी जो आवाज़ कि पहले
अब उसका हर उतार-चढ़ाव
सब साज़ नया !
.

दिखता था
समुन्दर की जो छाती पर !
‘भाटे’ का उतरता हुआ जल,
अब तेज़ बड़ी लहरों में
पलट गया
बीत चुका
गुज़रा हुआ कल !
.

चेहरे पर थी जो
मूक मुसीबत की शिक़न
लाखों अपमानों की जलन,
अब मुसकान के रंगों की चमक
रोशन जिससे उन्मुक्त-गगन !
.

(35) मेरे देश में
.............................

आज
मेरे देश के आकाश पर
काली घटाएँ वेदना की
घिर रही हैं !
कड़कड़ा कर गाज
टूटे,
फूस-मिट्टी के हज़ारों छप्परों पर
गिर रही है !
और गहरा हो रहा है
ज़िन्दगी की शाम का
फैला अँधेरा,
पड़ रहा
चमगादड़ों का, उल्लुओं का,
मौत के सौदागरों का,
ख़ून के प्यासे हज़ारों दानवों का,
ज़िन्दगी के दुश्मनों का
भूत की छाया सरीखा
आज डेरा।
.

कर दिये वीरान
कितने लहलहाते खेत
जीवन के,
सुनायी दे रहे स्वर
दुख, अभावों और क्रन्दन के !
.

करोड़ों मूक जनता
आज भूखी है,
विवशता के धुएँ में
मुश्किलों से साँस लेती है !
किसी के द्वार पर
दम तोड़ देती है !
कि निर्बल हड्डियों का
क्षीण पंजर छोड़ देती है !
.

(36) रक्षा
...................

डूबे गाँव,
बढ़ी है बाढ़ !
नदी के कूल गये पथ भूल,
कि चारों ओर
मचा है शोर !
सेठों के रक्षक-दल भागे
आगे-आगे,
बिड़ला-डालमिया ने
धोती-कम्बल बाँटे,
.

बनकर दान-दया के वीर !
चलाकर मीठे रस के तीर !
दिये हैं अपने घर के चीर !
कल जब बाढ़ बढ़ेगी और,
भगे-उखड़ों की नहीं मिलेगी ठौर,
तब ये बाहर आधे नंगे रहकर
अपनी बैठक दे देंगे सत्त्वर,
और स्वयं सो जाएंगे यों ही
खोल ‘कला सज्जित-कक्ष’ गरम !
.

जल से भीग गये हैं खूब,
तभी तो काँप रही है देह,
नहीं उठते हैं आज क़दम
लख कर पीड़ा गये सहम !
मज़लूमों की रक्षा हित
सेवा करने निकले,
बेदाग़ पहन कर कपड़े !
देने आश्वासन —
न डरो,
हम कर देंगे सभी व्यवस्था
विधवा-आश्रम खुलवा देंगे,
धीरे-धीरे
सब का ब्याह करा देंगे !
मरे हुओं को गंगा-यमुना में
या लकड़ी-इंधन देकर
पार लगा देंगे।
सच मानों,
बेहद चिन्तित हैं प्राण,
हमारे कहते हैं अख़बार —
‘अर्जुन, नवभारत, विश्वमित्र, हिन्दुस्थान’ !
.

(37) धरती की पुकार
.......................................

उट्ठो युवको !
धरती तुम से जीवन माँग रही है !
जीवन तुमको देना होगा,
फिर चाहे
मोटी-मोटी हरियाली की लोई में
मुँह ढक कर सो जाना,
खेतों-खलिहानों के
अथवा
गेहूँ-चावल के
सपनों में खो जाना !
.

पर, आज अभी तो
जगना होगा,
पीली-पीली लपटों में
तपना होगा,
आगे-आगे
लम्बे-लम्बे क़दमों को
रखना होगा,
पथ के काँटों की नोकों को
फ़ौलादी पैरों की रेती से
घिसना होगा !
.

आओ युवको !
धरती तुमसे धड़कन माँग रही है !
बदले में जितनी चाहो तुम
उसकी ज्वाला ले सकते हो,
पर, अपने प्राणों की धड़कन
उसमें भरनी होगी !
यदि मृत्युंजय बनकर रहना है,
यदि निर्भय
अन्तर की बातें कहना है,
तो इस क्षण
अपने से ऊपर उठना होगा
फिर चाहे
हँसती दुनिया की तसवीर
बनाने में जुट जाना,
भूखों-नंगों को
अपनी बाहों में भर लाना !
.

(38) मालवा में अकाल
........................................

अकाल-ग्रस्त मालवा !
हताश जन,
निराश जन
भूख, भूख, भूख !
नष्ट हो गयी फ़सल,
दर असल ?
.

दूर-दूर से,
उदास
छोड़ गाँव आ रहे
कुटुम्ब-के-कुटुम्ब,
और यह अवन्तिका नगर
कि कालिदास की प्रसिद्ध
कर्म-भूमि
घिर गयी अकाल से !
.

दैत्य भूख का खड़ा हुआ अकड़,
खोल सर्व-भक्ष्य-मुख !
.

पर,
अकाल है ग़रीब के लिए,
दर्द, भूख, त्रास, दुःख हैं
ग़रीब के लिए !
मिट रहा अशक्त सिर्फ़ वर्ग यह !
.

सेठ के मकान में भरा अनाज है,
ज़मीनदार के मकान में भरा अनाज है,
कौन जीव एक जो उदास ?
घूमते अबंध मूर्ख से कठोर,
लाल-लाल दाँत
पान से रँगे बता रहे
समूह-के-समूह का
निकाल रक्त पी चुके !
सफ़ेद वस्त्र
सूक्ष्म तार-तार से बना पहन
एक क्या अनेक कह रहेµ
‘कि मिल रहा न ज्वार-बाजरा।’
गेहुँ से भरी हुई
अजीब तोंद ले !
.

(विषम प्रयास स्वाभिमान का)
उठो किसान औ’ मजूर
एकता तुम्हें बुला रही,
अकाल ग्रस्त-त्रस्त
जब समस्त मालवा !
.

(39) अमन की रोशनी
.......................................

युद्ध-अन्धकार-वक्ष फाड़
जगमगा रही
नवीन शांति की किरण !
जंगखोर-शक्ति के
तमाम व्यूह तोड़
बढ़ रहे
सशक्त विश्व के चरण !
आसमान में असंख्य हाथ
उठ रहे
कि हम बिना
समस्त
युद्ध-सर्प-दंश काटकर,
व बर्बरों के हाथ से
सरल-सुशील सभ्यता-वधू
निकालकर
न चैन से कभी भी
बैठ पाएंगे !
असंख्य दृष्टियाँ लगी हुईं
नवीन राह पर,
कि हम
बिना प्रभात के हुए
व तामसी निशा
विनाश के हुए
(नहीं-नहीं !)
अपार नींद के समुद्र में
कभी न डूब पाएंगे !
क्योंकि बद्ध-द्वार
युद्ध-दुर्ग के खुले,
व शक्ति के प्रहार से
तमाम अस्त्र-शस्त्र
ध्वस्त हो रहे !
जंगबाज़
(जो कि विश्व का उलूक-वर्ग है)
अमन की रोशनी से
त्रस्त हो रहे !
.

(40) जंगबाज़
..............................

लड़खड़ा रहे तमाम जंगबाज़,
टूटकर बिखर गया
कुचाल-साज़ !
.

जागरूक विश्व ने दिया रहस्य खोल,
असलियत बता रहा मनुष्य
पीट ढोल !
.

चोर और मुफ़्तख़ोर बौखला रहे,
सत्य और नेकनीयती बता रहे —
कि ख़ून हम बहा रहे
किसी न स्वार्थ-सिद्धि के लिए,
वरन्
स्वतंत्रता, विकास, लोकतंत्रा के लिए !
.

पर, प्रकट हुए वहीं
अभाव रोग कोढ़
मौत-ग्रस्त भुखमरी,
अनेक आफ़तें बुरी-बुरी
सदैव ही रही घिरीं !
.

समझ गया हरेक व्यक्ति आज
ये तभी
तमाम लड़खड़ा रहे हैं जंगबाज़ !
.

(41) ज़िन्दगी कैसे बदलती है !
....................................................

यह झोपड़ी है फूस की,
जिसकी पुरानी भग्न दीवारें,
व आधी छत खुली!
.

इस रात में
जो है बड़ी ठंडी,
खड़ी है मौन, तम से ग्रस्त !
.

उसमें ले रहे हैं साँस
कोई तीन प्राणी,
हार जिनने
आज तक किंचित न मानी !
.

भूमि पर लेटे हुए,
गुदड़ी समेटे और गट्ठर से बने
निज ज्वाल-जीवन से हरारत पा
कुहर के बादलों में
गर्म साँसें खींचते हैं !
और उसका शक्तिशाली उर
दबाकर भेदते हैं !
.

भग्न यदि दीवार है
पर, भग्न आशा है नहीं !
विश्वास धूमिल
और दृढ़ आवाज़ बंदी है नहीं !
कल देख लेना
ज़िन्दगी कैसे बदलती है !
.

(42) नयी नारी
..............................

तुम नहीं कोई
पुरुष की ज़र-ख़रीदी चीज़ हो,
तुम नहीं
आत्मा-विहीना सेविका
मस्तिष्क हीना-सेविका,
गुड़िया हृदयहीना !
.

नहीं हो तुम
वहीं युग-युग पुरानी
पैर की जूती किसी की,
आदमी के
कुछ मनोरंजन-समय की
वस्तु केवल !
.

तुम नहीं कमज़ोर,
तुमको चाहिए ना
सेज फूलों की !
नहीं मझधार में तुम
अब खड़ी शोभा बढ़ातीं
दूर कूलों की !
.

अब दबोगी तुम नहीं
अन्याय की सम्मुख,
नयी ताक़त, बड़ा साहस
ज़माने का तुम्हारे साथ है !
अब मुक्त कड़ियों से
तुम्हारे हाथ हैं !
तुम हो
न सामाजिक न वैयक्तिक
किसी भी क़ैदखाने में विवश,
अब रह न पाएगा
तुम्हारे देह-मन पर
आदमी का वश
.

कि जैसे वह तुम्हें रक्खे
रहो,
मुख से न अपने
भूल कर भी
कुछ कहो !
जग के
करोड़ों आज युवकों की तरफ़ से
कह रहा हूँ मैं —
‘तुम्हारा ‘प्रभु’ नहीं हूँ,
हाँ, सखा हूँ !
और तुमको
सिर्फ़ अपने
प्यार के सुकुमार-बंधन में
हमेशा
बाँध रखना चाहता हूँ !
.

(43) मुक्ति-पर्व
.............................

यह वह दिवस है
कि जिस दिन हमारे चरण से
बँधी शृंखला दासता की
तड़क कर अवनि पर गिरी थी,
व सारे जगत ने
बड़ी तेज़ आवाज़ जिसकी सुनी थी,
कि जिससे
सभी भग्न सोये हुओं की
थकी बंद आँखें खुली थीं,
व हर आततायी के
पैरों की धरती हिली थी !
.

बुभुक्षित व शोषित युगों ने
नवल आश-करवट बदलकर
बड़ी साँस लम्बी भरी जो
कि भय से उसी क्षण
सुदृढ़ देश साम्राज्यवादी
सहम कर
मरण के क़दम पर गिरे,
और खोये
समय की सबल धार में !
.

क्योंकि निश्चय —
किसी पर किसी भी तरह
.

आज छाना कठिन है !
किसी को किसी भी तरह
अब दबाना कठिन है !
.

नयी आग लेकर यह जागा तरुण है !
विरोधी ज़माने से लड़ना ही
जिसकी लगन है !
.

यह वह दिवस है
कि जिस दिन हटा आवरण सब
हमारे गगन पर
नयी रोशनी ले
नया चाँद आया,
अँधेरी दिशा चीर कर
जगमगाया ;
बड़ा आत्म-विश्वास लाया —
नहीं यह तिमिर अब घिरेगा,
न आँखों पर परदा
प्रलय का गिरेगा,
न उर-वेदना
रात-भर नृत्य करती रहेगी,
नहीं दुःख की और नदियाँ बहेंगी !
.

उभरती जवानी नयी है !
वतन की कहानी नयी है !
रुकावट सहायक बनी है,
प्रखर युग रवानी यही है !
विजय की निशानी यही है !
.

यह वह दिवस है
कि जिस दिन नयी ज़िन्दगी ने
सहज मुसकरा मुग्ध
चूमे हमारे अधर थे !
खुले कोटि
अभिनव प्रबल मुक्त स्वर थे !
.

मनायी थीं हमने
विभा-ज्ञान-त्योहार खुशियाँ,
स्वयं आन तक़दीर नाची,
व हम गा रहे थे !
कि दुनिया के सम्मुख
बड़ी तेज़ रफ़्तार से बढ़
भगे जा रहे थे !
शिराओं में लहरें
नये ख़ून की भर !
निडर बन
सहारे बिना
और देशों को लड़ने की ताक़त
दिये जा रहे थे !
पुराने सभी घाव घातक
सिये जा रहे थे !
नयी भूमि पर
एक नव शांत बस्ती
बसाये चले जा रहे थे !
.

करोड़ों
सजग औरतों के नयन थे,
करोड़ों
सबल व्यक्तियों के चरण थे,
कि जो देश का चेहरा सब
बदलने खड़े थे !
बुरी रीतियों से
कड़ी आफ़तों से लड़े थे !
.

यह वह दिवस है
कि जिस दिन
हमारी हरी भूमि पर
फूल नूतन खिले थे !
व बरसों के बिछुड़े हुये
फिर मिले थे !
युगोंबद्ध
सब जेलख़ाने खुले थे !
कि हँसते हुए
विश्व-स्वाधीनता के सिपाही
विजय गान गाते
सुखद साँस भर
आज बाहर हुए थे !
अनेकों सुहागिन ने
जिस दिन को लाने
स्वयं माँग सिन्दूर पोंछा
वही यह दिवस है !
वही यह दिवस है !
सफल आक्रमण का
अथक त्याग, बलिदान, आन्दोलनों का,
जगत जागरण का,
क्षुधित नग्न पीड़ित जनों का,
दबी धड़कनों का !

.....................................................
रचना-काल : सन्1943-1952
प्रकाशक : दीनानाथ बुक डिपो, इंदौर, म. प्र. सम्प्रति उपलब्ध : 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' [खंड : 1], ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड : 1] में

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें