शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह ----- संकल्प

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह ----- संकल्प
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कविताएँ
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1 सहभाव
2 अन्तर्ध्वन्सक
3 बाधाएँ चुनौती हैं
4 यथा-पूर्व
5 एकस्थ से हट कर
6 अब नहीं
7 प्रतीक्षक
8 मेरा देश
9 नहीं तो
10 हमारे इर्द-गिर्द
11 एक नगर और रात की चीखें
12 आकस्मिक
13 बस एक बार !
14 निकष
15 नियति
16 अन्तःशल्य
17 आत्म-कथा
18 अनचहा
19 समाधि-लेख
20 ग़लतफ़हमियों का बोझ
21 प्रक्रिया
22 पुनर्वार
23 प्रतिज्ञा-पत्र
24 भले ही
25 स्व-रुचि
26 टूटा व्यक्तित्व
27 जीवनी
28 अंध-काल
29 आओ जलाएँ
30 समता का गान
31 होली
32 विश्व-श्री
33 जनतंत्र-आस्था
34 गणतंत्र-स्मारक
35 प्रण

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(1) सहभाव
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आओ —
दूरियाँ
देशान्तरों की
व्यक्तियों की
अत्यधिक सामीप्य में
बदलें।
बहुत मज़बूत
अन्तर-सेतु
बाँधें !
आओ —
अजनबीपन
हृदय का
अनुभूतियों का
सांत्वना
आश्वास में
बदलें।
परस्पर मित्रता का
गगन-चुम्बी केतु
बाँधें !
आओ —
अविद्या-अज्ञता
धर्मान्तरों की
भिन्नता विश्वास की
समधीत सम्यक् बोध में
बदलें।
सुनिश्चित
विश्व-मानव-हेतु
साधें!

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(2) अन्तर्ध्वन्सक
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कौन है,
वह कौन है ?
जो —
हमारे स्वप्नों में
ख़लल डालता है,
हमारे
बनाये-सजाये
चित्रों को विकृत कर
बदल डालता है,
उनकी विराटता को
बौना कर देता है,
उनकी उन्मुक्तता में
कुण्ठा भर देता है !

वह कौन है ?
वह दुस्साहसी कौन है ?
जो —
हर संगत लकीर को
जगह-जगह से तोड़ कर
असंगत लिबास पहना देता है,

परिवेश की अर्थवत्ता छीन कर
अनर्गल वैशिष्ट्य से गहना देता है !
सही परिप्रेक्ष्य से
विस्थापित कर
हास्यास्पद भूमिकाओं की
चितकबरी प्लास्टर झड़ी
दीवारों पर
उल्टा टाँग देता है !

हमारे विश्वासों की
जीवन्त प्रतिमाओं को
खण्डित कर
कोलतारी स्वाँग देता है !

यह
किसका अट्टहास है ?
चारों ओर लहराते
नागफाँस हैं !

पर, सावधान !
मैं
इतिहास को दोहराने नहीं दूँगा,
आतताइयों को
निरीह लाशों को रौंदते
विजय-गान गाने नहीं दूँगा !

इन स्वप्नों की
इन चित्रों की
गत्यात्मकता,
अनुभूत-सिद्ध वास्तविकता

दूर-पास फैले
असंख्य-अदृश्य
भेदियों के जालों को
तोड़ेगी,
मानव-मानव के बीच
पहली बार
सच्चा रिश्ता जोड़ेगी !

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(3) बाधाएँ: चुनौती हैं!
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बाधाएँ —
निरुत्साहित नहीं करतीं हमें,
प्रतिक्षण बनातीं
बल सजग।
कठिनाइयों के सामने
पग डगमगाते हैं नहीं,
प्रत्युत्
लगा कर पंख बिजली के
धरा-आकाश का विस्तार लेते नाप !

बाधाएँ —
‘विकट, दुर्लंध्य, अविजित’
है निरा अपलाप !

बाधाएँ —
बनातीं परमुखापेक्षी नहीं हमको,
बाधाएँ —
बनाती हैं न किंचित दीन
उद्यमहीन हमको।

वे जगातीं
सुप्त अन्तर-शक्तियाँ सारी
न भय रहता, न लाचारी !

कौंधती बिजली सबल तन में
उभरते दृढ़ नये संकल्प मन में !

बाधाएँ: चुनौती हैं !
इन्हें स्वीकारना —
पर्याय:
मानवता-महत्ता का !
इन्हें स्वीकारना —
उद्घोष:
जीवन की चिरन्तन
ऊर्ध्व सत्ता का !
इन्हें स्वीकारना —
पहचान :
तेजस्वी,
सतत गतिमान
मानव के पराक्रम की !
इन्हें स्वीकारना —
अनुभूति :
चिर-परिचित
मनुज-इतिहास-प्रमाणित
अथक श्रम की !

बाधाएँ —
हतोत्साहित नहीं करतीं कभी
बाधाहरों को !
वे बनातीं
और भी दृढ़
धारणाओं को।

कठिन के सामने मेधा
कभी होती नहीं दूषित,
वरन् उद्भावना उन्मेष से भर
और हो उठती प्रखर !

प्रत्येक बाधा
हीन होगी,
नष्टशून्य-विलीन होगी !

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(4) यथा-पूर्व
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हमें
सामर्थ्य-क्षमता का
परिज्ञान कैसे हो ?

हमें
सम्भावनाओं का
अनुमान कैसे हो ?

हम अपरिणामी, तटस्थ, अयुक्त
स्थितियों में
जीते हैं !

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(5) एकस्थ से हटकर
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स्थितियाँ
जब बदलती नहीं —
गतिशीलता
अवरुद्ध होती है,
कहीं एकस्थ हो
आवेश का विस्तार खोती है।

स्थितियों का
बदलना / टूटना
बेहद ज़रूरी है,
भले ही —
नयी स्थितियाँ
नितान्त विरुद्ध हों
संदिग्ध हों।

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(6) अब नहीं
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अब सम्भव नहीं
बीते युगों की नीतियों पर
एक पग चलना,
निरावृत आज
शोषक-तंत्र की
प्रत्येक छलना।

अब नहीं सम्भव तनिक
बीते युगों की मान्यताओं पर
सतत गतिशील
मानव-चेतना को रुद्ध कर
बढ़ना।

सकल गत विधि-विधानों की
प्रकट निस्सारता,
किंचित नहीं सम्भव
मिटाना अब
बदलते लोक-जीवन की
नयी गढ़ना।

शिखर नूतन उभरता है
मनुज सम्मान का,
हर पक्ष नव आलोक में डूबा
निखरता है
दमित प्रति प्राण का,
नव रूप
प्रियकर मूर्ति में
ढल कर सँवरता है
सबल चट्टान का।

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(7) प्रतीक्षक
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अभावों का मरुस्थल
लहलहा जाये,
नये भावों भरा जीवन
पुनः पाये,
प्रबल आवेगवाही
गीत गाने दो !

गहरे अँधेरे के शिखर
ढहते चले जाएँ,
उजाले की पताकाएँ
धरा के वक्ष पर
सर्वत्र लहराएँ,
सजल संवेदना का दीप
हर उर में जलाने दो !
गीत गाने दो !

अनेकों संकटों से युक्त राहें
मुक्त होंगी,
हर तरफ़ से
वृत्त टूटेगा
कँटीले तार का
विद्युत भरे प्रतिरोधकों का,
प्राण-हर विस्तार का !

उत्कीर्ण ऊर्जस्वान
मानस-भूमि पर
विश्वास के अंकुर
जमाने दो !
गीत गाने दो !

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(8) मेरा देश
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प्रत्येक दिशा में
आशातीत
प्रगति के लम्बे डग भरता,
‘वामन-पग’ धरता
मेरा देश
निरन्तर बढ़ता है !
पूर्ण विश्व-मानव की
सुखी सुसंस्कृत अभिनव मानव की
मूर्ति
अहर्निश गढ़ता है !
मेरा देश
निरन्तर बढ़ता है !

प्रतिक्षण सजग
महत् आदर्शों के प्रति,
बुद्धि-सिद्ध
विश्वासों के प्रति।

मेरा देश
सकल राष्ट्रों के मध्य अनेकों
सहयोगों के,
पारस्परिक हितों के,
आधार सुदृढ़
निर्मित करता है !
तम डूबे
कितने-कितने क्षितिजों को
मैत्री की नूतन परिभाषा से
आलोकित करता है !
समता की
अनदेखी
अगणित राहों को
उद्घाटित करता है !

उसने तोड़ दिये हैं सारे
जाति-भेद औ वर्ण-भेद,
नस्ल भेद औ’ धर्म-भेद।

सच्चे अर्थों में
मेरा देश
मनुज-गौरव को
सर्वोपरि स्थापित करता है !
मृतवत्
मानव-गरिमा को
जन-जन में
जीवित करता है !

मेरा देश
प्रथमतः
भिन्न-भिन्न
शासन-पद्धित वाले राष्ट्रों को
अपनाता है !
शांति-प्रेम का
अप्रतिम मंत्र
जगत में गुँजित कर
भीषण युद्धों की
ज्वाला से आहत
मानवता को
आस्थावान बनाता है !
संदेहों के
गहरे कुहरे को चीर
गगन में
निष्ठा-श्रद्धा के
सूर्य उगाता है !

उन्नति के
सोपानों पर चढ़ता
मेरा देश,
निरन्तर
बहुविध
बढ़ता मेरा देश !

प्रतिश्रुत है —
नष्ट विषमता करने,
निर्धनता हरने !
जन-मंगलकारी
गंगा घर-घर पहुँचाने !
होठों पर
मुसकानों के फूल खिलाने,
जीवन को
जीने योग्य बनाने !

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(9) नहीं तो
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यदि मेरे देश में
गाँधी और नेहरू जैसों ने
जन्म नहीं लिया होता
तो —
हैवानियत के शिकंजे
हमारे हाथों-पाँवों में
कसे होते !
यहाँ
वहाँ
सभी जगह
मौत के सौदागर बसे होते !
हम
जो आज
तेज़ी से बढ़ते जाते हैं,
नये, मज़बूत और सुन्दर भारत को
फ़ौलादी दृढ़ता से
गढ़ते जाते हैं,
नयी रोशनी की किरणें
फैलाते
अज्ञान की अँधेरियों से
लड़ते जाते हैं;
घुटनों-घुटनों
फ़िरक़ापरस्ती की दलदल में
धँसे होते,

हम सब
बदरंग हो गये होते,
दिलों से
बेहद तंग हो गये होते !
हमारे एकता के स्वप्न सारे
टूटते,
पशुबल समर्थक
समृद्धि सारी
लूटते !

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(10) हमारे इर्द-गिर्द
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मेरे देश में
ओ करोड़ों मज़लूमो !
तुम्हें
अभी फुटपाथों से
छुटकारा नहीं मिला,
खौलते ख़ून के समुन्दर में
तैरते-तैरते
किनारा नहीं मिला !
बीसवीं शताब्दी के
इस आँठवें दशक में भी
सिर पर
खुला आसमान है,
नीचे
नंगी धरती।
सूनी निगाहें
ठण्डी आहें
विकलांग निरीहता
सर्दी, बरसात, आँधी !

मोटे-मोटे
खादीपोश
बदकिरदार
व्यापारियों-पूँजीपतियों,
मकान-मालिकों,
कॉलोनी-धारियों,
वकील-नेताओं के
मुँह में
यथा-पूर्व
विराजमान है — ‘गाँधी’!
बँगलों और कोठियों में
दीवारों पर
टँगे हैं गाँधी !
(या सलीब पर लटके हैं गाँधी!)
तिकड़मी मस्तिष्क के
बद-मिज़ाज
नये भारत के ये ‘भाग्य-विधाता’
‘एम्बेसेडर’ में
धूल उड़ाते
मज़लूमों पर थूकते
मानवता के रौंदते
अलमस्त घूमते हैं,
किंचित सुविधाओं के इच्छुक
उनके चरण चूमते हैं !

मेरी पूरी पीढ़ी हैरान है !
नेतृत्व कितना बेईमान है !

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(11) एक नगर और रात की चीखें
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मन्दिरों की घण्टियाँ बज रही हैं !
सैकड़ों श्रद्धालु
हाथ जोड़े खड़े होंगे
नत-मस्तक हो रहे होंगे।

वृक्षों, गुम्बदों, भवनों,
खपरैलों, टिनों पर
कुहर-कण पहने
अँधेरा उतरता चला आ रहा है,
जाड़े की शाम
सात बजे से ही गहरा गयी !
घरों के द्वार-वातायन
बंद हो गये !
सड़कों पर
हलकी पीली रोशनी फेंकते हैं
बिजली के खम्भे,
दो-एक स्कूटर
या मोटर साइकिलें
भड़भड़ाती हुई निकल जाती हैं,
कभी-कभी कहीं ढोल बज उठते हैं।
बस-स्टैण्ड पर
लाउड-स्पीकर अभी बोल रहा है
अमुक-अमुक जगह पर जाने वाले
यात्रियों को आगाह करता हुआ।

रात का ठण्डापन बढ़ता जाता है !
रात का सूनापन बढ़ता जाता है !

‘यह आकाशवाणी है,
रात के पौने-नौ बजे हैं।’
और
फिर सर्कस के शेर
दहाड़ने लगे
(ज़रूर दस बजने वाले होंगे।)
सोने से पहले
नींद की गफ़लत में
डूबने से पहले
एक भिखारी
चीखता है —
‘दो-रोटी और दाल,
पेट का सवाल !
है कोई देने वाला
इतने बड़े-बड़े घरों में ?
बस, दो-रोटी और दाल,
मैं भूखा हूँ।’

किसी घर के द्वार नहीं खुलते,
कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती।
भिखारी अड़ जाता है :
‘इस गली से
मैं
रोटी लिये बिना
नहीं जाऊँगा !’
और वह चीखता जाता है —
‘दो-रोटी और दाल,
पेट का सवाल !’
उसकी चीख
सबको दहला देती है,
सुख-सुविधाओं को चैंका देती है !

(भिखारी यदि ख़ूनी बन जाये,
दरवाज़ा तोड़ कर अन्दर घुस आये!)

आतंक की परतें
चेहरों पर बिछने लगती हैं,
घरों की रोशनियाँ
बुझने लगती हैं,
दरवाज़ों पर ताले
झूलने लगते हैं !

भिखारी
चीखता रहता है,
अपनी शक्ति के बाहर
चीखता रहता है।

और जब
किसी दयालु के दरवाज़े ने
उसे कुछ शान्त किया,
उसके बुनियादी सवाल को
एक रात के लिए
हल किया,
सन्नाटा और मुखरित हो चुका था,
वृक्षों, गुम्बदों, भवनों,
खपरैलों, टिनों पर
कुहरा और संघनित हो चुका था !
रात
और ठण्डी और काली
हो चुकी थी,
रात
निहायत बेशर्म और नंगी
हो चुकी थी !

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(12) आकस्मिक
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स्थूल निर्जीव पदार्थों की
प्रत्येक गति
नियति
कार्य-कारण-बद्ध है,
सृष्टि का प्रत्येक कम्पन
धीमा
अथवा विराट
प्राकृतिक नियमों से सिद्ध है।

पर,
संवेदनशील प्राणियों की
पारस्परिक
संगति
निकटता
आत्मीयता
मात्र एक संयोग है !

तभी तो —
इतनी बड़ी दुनिया में
अरबों मनुष्यों की दुनिया में
करोड़ों लोग अकेले हैं,
किसी का साथ पाने के लिए
किसी को
हमसफ़र बनाने के लिए
आकुल हैं,
व्याकुल हैं !

आवश्यकताएँ हैं :
पर,
पूर्तियाँ नहीं !
अर्चनाएँ हैं :
पर,
मूर्तियाँ नहीं !

भटकनें हैं :
बाट नहीं !
नदियाँ हैं :
घाट नहीं !

सर्वत्र
तलाश-ही-तलाश है !
ज़िन्दगी:
डोलती
बोलती
लाश है !

हाथ आया स्वर्ण
जब
मिट्टी में बदल जाता है,
बड़ी कोशिशों से पाया
अपनाया
जब
पराया निकल जाता है !
तब
लगता है:
जीवन कारण-हीन है !
मनुष्य
सचमुच, दीन है !
प्रतीक्षा करो !
अनाचक की
प्रतीक्षा करो !

जीवित सम्पर्क
बनाये नहीं जाते,
बन जाते हैं !
मनचाहे स्वप्न
बुलाये नहीं जाते,
स्वतः आते हैं !

ओ विश्व भर के
अभिशप्त मानवो !
प्रतीक्षा करो !

अचानक की
प्रतीक्षा करो !

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(13) बस, एक बार!
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स्नेह-तरलित दो नयन
मुझको देख लें —
बस,
एक बार !

दो
प्रणय-कम्पित हाथ
मुझको थाम लें —
बस,
एक बार !

सर्पिल भुजाएँ दो
मुझको बाँध लें —
बस,
एक बार,

दो
अग्निवाही होंठ
मुझको चूम लें —
बस,
एक बार !

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(14) निकष
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किसी मधु-गन्धिका के
प्यार की ऊष्मा-किरण
मुझको
छुए तो —
मोम हूँ !
किसी मुग्धा
चकोरी के
अबोध
अधीर
भटके
दो नयन
मुझ पर
पड़ें तो —
सोम हूँ !


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(15) नियति
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मझधार में बहते हुए
बस, देखते जाओ
किनारे-ही-किनारे,
पर नहीं,
वे बन सकेंगे
एक दिन भी
तुम थके-हारे
अकेले के
सहारे !

क्योंकि वे अधिकृत,
तुम अवांछित !
सतत बहते रहो,
प्रतिकूलता
सहते रहो !

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(16) अन्तःशल्य
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रह गये
कितने अदेखे फूल,
अन्तस में अजाने
हूलते हैं शूल !

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(17) आत्म-कथा
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क्या जीता हूँ !
अनुदिन कड़वाहट पीता हूँ,
मधु का सागर लहराता हैµ
पर,
कितना रीता हूँ !
सचमुच,
क्या जीता हूँ ?

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(18) अनचहा
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मैंने नहीं चाहा —
दृष्टि-पथ पर दूर तक
रंगीन सपनों के चरण
न घूमें!

मैंने नहीं चाहा —
जीवन के गगन में
सावनी के स्वर
न गूँजें!
रस-वर्षिणी
घन बदलियाँ
न झूमें!

मैंने नहीं चाहा —
मधु कल्पनाओं के
विफलता की थकन से
पंख जाएँ टूट,
यौवन
उमड़ती ज्वार की लहरें
न चूमे !
पर,
सब अनचहा होता गया,
स्वप्न सारे
हो गये विकलांग,
सावन की सरसता
खो गयी,
अनुरक्त अन्तस की
मधुरता जब
विषैली हो गयी !

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(19) समाधि-लेख
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कोई नहीं है तुम्हारे लिए
कोई नहीं है किसी के लिए,
दुनिया निरी ख़ुदग़रज़ है !

मरण पर हमारे —
कोई विकल बन
करुण गीत गाये
व आँसू बहाये,
मधुर याद में
(ज़िन्दगी भर !)
सजल प्राण-दीपक जलाये,
यह सोचना —
एक खाली मरज़ है !
दुनिया बड़ी ख़ुदग़रज़ है !

स्वयं को न दें
व्यर्थ
इतनी महत्ता,
समझ लें
उचित
भ्रम-रहित हो
स्व-अस्तित्व की
अर्थवत्ता,
इसमें नहीं कुछ हरज़ है !
जब कि
दुनिया निपट ख़ुदग़रज़ है !

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(20) ग़लतफ़हमियों का बोझ
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हमारे पारस्परिक संबंधों को
बरसों के पनपते-बढ़ते रिश्तों को
निकटता और आत्मीयता को
ग़लतफ़हमी
अक्सर पुरज़ोर झकझोर देती है
तोड़ देती है,
हमें एक दूसरे के विपरीत
मोड़ देती है !

हमारे सौमनस्य का अतीत
झूठा बेमानी हो लेता है,
हमारे सद्भाव का इतिहास
महज़ एक स्वाँग साबित हो
सारे व्यतीत घटना-चक्रों को
अकल्पित अद्भुत सन्दर्भों की पीठिका में
प्रस्थापित कर देता है !

हम
अन्यथा के प्रति आश्वस्त हो
सचाई की व्याख्या
बदलने के लिए
विवश हो जाते हैं,
अँधेरे में
और अँधेरे में
और-और अँधेरे में
खो जाते हैं !

ग़लतफ़हमी
मानव-आस्था के मर्म को
निरन्तर विदलित करती है,
जीवन-रस को
एक और अनेक ग़लतफ़हमियाँ
निरन्तर खोखला कर
अवशोषित करती हैं !

ग़तलफ़हमियों का शिकार बनना
सचमुच
एक शाप है,
ग़लतफ़हमियों को बार-बार भोगना
सचमुच
एक विषम शाप-ज्वर संताप है !

न जाने
किन शापों के फलस्वरूप
मुझे
ग़लतफ़हमियों के तोहफ़े,
मिथ्या आरोपों
और लांछनों के तोहफ़े
खूब मिले हैं,
जिन्हें
जीवन की पीठ पर लादे
मैं घूम रहा हूँ !
ग़लतफ़हमियों का यह गट्ठर
अपने आकार में
और कितना फैलेगा-बढ़ेगा ?
यह मेरी जिजीविषा के वेग को
और कितना रोकेगा ?

क्या सारे रिश्तों को तोड़ दूँ ?
ग़लतफ़हमियों के इस बोझ को
एक-बारगी फेंक दूँ ?
व्यक्ति और समाज की
चिन्ता से मुक्त
जीवन को
निर्जीव पदार्थ सत्ता से जोड़ दूँ ?
संवेदन का गला घोंट दूँ ?

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(21) प्रक्रिया
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मैंने
जीवन का व्याकरण
नहीं पढ़ा,
शायद,
इसीलिए —
सही अर्थों में
जीना नहीं आया !

आत्म-प्रकाशन में
असफल अभिव्यक्ति-सा
प्रभाव-शून्य बना रहा,
इसीलिए —
रात-दिन
घर-बाहर
अनमना रहा !

मैंने
जीवन-जगत व्यवहार के
विशिष्ट शब्दों
शब्द-रूपों
और उनके प्रयोगों का
ज्ञान हासिल नहीं किया,
इसीलिएµ
तथाकथित समाज ने
मुझे अपने में
शामिल नहीं किया !
मैंने नहीं सीखा
व्यक्ति-व्यक्ति में
भेद करना,
स्थूल और सूक्ष्म
अन्तर-प्रणाली की
वैज्ञानिकता
मेरी समझ में नहीं आयी,
जो कुछ कहा
वह
व्याख्या की परिधि में
नहीं समाया,
शायद,
इसीलिए मेरा कथन
किसी को नहीं भाया !

मैंने
जीवन का व्याकरण
नहीं पढ़ा,
शायद,
इसीलिए —
अन्यों की तरह
सुख-चैन का
जीना नहीं आया !

निरन्तर
जीवन की अभिधा में
पलता रहा,
लाक्षणिकता के
गूढ़ व्यंजना के
आडम्बर नहीं फैलाये,
बहु-प्रचलित कडवे तेल के दिये-सा
आले में
चुपचुप जलता रहा,

मुहावरेदानी के
रुपहले ट्यूब
तैल-लेपित दीवारों पर
नहीं रोशनाये,
शायद,
इसीलिए —
समाज का मन-रंजन नहीं हुआ
वांछित आवर्जन नहीं हुआ !

दुनिया की चमक-दमक में
डूबा-इठलाया नहीं,
वक्र ताल पर
ध्वनि-सिद्ध कोई गीत
गाया नहीं,
अलंकार-सज्जित पात्र में
रीति-बद्ध ढंग से
जीवन का रस
पीना नहीं आया !

मैंने
जीवन का व्याकरण
नहीं पढ़ा,
शायद,
इसीलिए —
निपुण विदग्धों के समकक्ष
जीना नहीं आया !


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(22) पुनर्वार
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मैं
एक वीरान बीहड़
जंगल में रहता हूँ,
अहर्निश
निपट एकाकीपन की
असह्य पीड़ा
सहता हूँ !

मैंने
यह यंत्राणा-गृह
कोई
स्वेच्छा से नहीं वरा,
मैंने
कभी नहीं चाहा
निर्लिप्त
निस्संग
जीवन का यह
जँगलेदार कठघरा !

जिसमें
शंकाओं से भरा
सन्नाटा जगता है,
जीना
अर्थ-हीन अकारण-सा
लगता है !

समय-असमय
जब दहक उठते हैं
मुझमें
हिंस्र पशुता के
अग्नि-पर्वत,
प्रतिशोध-प्रतिहिंसा के
लावा नद
जब लहक उठते हैं
आहत
क्षत-विक्षत
चेतना पर,
तब यह
वीरान बीहड़ जंगल ही
निरापद प्रतीत होता है !

(सचमुच
कितना बेबस
मानव के लिए
अतीत होता है !)

यह गुंजान वन
यह अकेलापन
मेरी विवशता है !
मुझे
विवशता की पीड़ा
सहने दो,

दहने दो,
दहने दो !

जंगल जल जाएंगे,
लौह-कठघरे गल जाएंगे !

मैं आऊंगा
फिर आऊंगा,
निज को विसर्जित कर
सामूहिक चेतना का अंग बन
अन्तहीन भीड़ में
मिल जाऊंगा !

स्व के दंश जहाँ
तिरोहित हो जाएंगे,
या अवचेतना की
अथाह गहराइयों में
सो जाएंगे !

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(23) प्रतिज्ञा-पत्र
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टूट
गिरने दो
पीड़ाओं के पहाड़
बार-बार
अमत्र्य व्यक्तित्व मैं
अविदलित रहूंगा !
आसमान पर
घिरने दो
वेगवाही
स्याह बदलियाँ,
गरजने दो
सर्वग्रही प्रचण्ड आँधियाँ
लौह का अस्तित्व मैं
अपराजित रहूंगा !

लक्ष-लक्ष
वृश्चिकों के
डंक-प्रहार,
उठने दो
अंग-अंग में
विष-दग्ध लहरें ज्वार
व्रतधर सहिष्णु मैं
अविचलित रहूंगा !

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(24) भले ही
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भले ही —
काटती हों
चेतना को,
दंश जैसी
ये तुम्हारी
डाह-संकेतक
उपेक्षा-बोधनी
दृग-भंगिमाएँ !

भले ही —
सालती हों
मर्म को
उपहास-प्रेरित
ये तुम्हारी
अग्नि-शर-व्यंग्योक्तियों की
क्रूर-धर्मी यातनाएँ !
सामने प्रस्तुत
विकर्षण-युक्त प्रतिमाएँ !
इन्हें पहचानता हूँ,
आदि से इतिहास इनका
जानता हूँ।
है सही उपचार इनका
पास मेरे,
कुछ नहीं बनता-बिगड़ता
आज यदि
ठहरी रहें ये
क्षितिज घेरे !

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(25) स्व-रुचि
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फोटो में मुझे
अपनी शक़्ल नहीं भायी !
मैंने पुनः
बड़े उत्साह से
अपने चित्र खिँचवाये —
भिन्न-भिन्न पोज़ दिये,
फोटोग्राफ़र के संकेतों पर
गम्भीरता कम कर मुसकराया भी,
चेहरे पर भावावेश लाया भी,
पर पुनः मुझे उन फोटुओं में भी
अपनी शक़्ल नहीं भायी,
तनिक भी स्व-रुचि को
रास नहीं आयी !

पर, क्या वे शक्लें
मेरी नहीं ?
क्या वे बहुरंगी पोज़
मेरे नहीं ?

वस्तुतः
हम फोटो में यथार्थ आकृति नहीं,
अपने सौन्दर्य-बोध के अनुरूप
अपने को चित्रित देखना चाहते हैं,
अपने ऐबों को
गोपित या सीमित देखना चाहते हैं !


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(26) टूटा व्यक्तित्व
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बचपन में
किसी ने यदि —
न देखा
स्नेह-संचित दृष्टि से
अति चाव से,
और पुचकारा नहीं
भर अंक
वत्सल-भाव से,
तो व्यक्ति का व्यक्तित्व
निश्चित
टूटता है।

यौवन में
नहीं यदि —
पा सका कोई
प्रणयिनी
संगिनी का
प्रेम :
निश्छल
एकनिष्ठ
अनन्य !
जीवन —
शुष्क
बोझिल
मरुस्थल मात्र
तृष्णा-जन्य !
तो उस व्यक्ति का व्यक्तित्व
अन्दर और बाहर से
बराबर
टूटता है।
वृद्ध होने पर
नहीं देती सुनायी
यदि —
प्रतिष्ठा-मान की वाणी,
न सुनना चाहता कोई
स्व-अनुभव की कहानी,
मूक
इस अन्तिम चरण पर
व्यक्ति का व्यक्तित्व
सचमुच,
चरमराता है
सदा को
टूट जाता है !

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(27) जीवनी
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चित्र जो
अतीत धुन्ध में
समा गया —
उसे
पुनः-पुनः उरेहना।

जो बिखर गया
जगह-जगह
व्यतीत राह पर —
उसे
विचार कर समेटना।

जो समाप्त-प्राय —
बार-बार
चाह कर
उसे सहेजना।
रीति-नीति
काव्य की नहीं !

जीवनी :
विगत प्रवाह,
जी चुके।
काव्य :
वर्तमान
वेगवान
जी रहे।

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(28) अंध-काल
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सावधान पहरुओ !
सावधान !

छा रहे अनेक दैत्य
छीनने स्वतंत्रता मनुष्य की,
वेगवान अंधकार
लीलने किरण-किरण भविष्य की,
सावधान सैनिको !
सावधान !

आज घिर रहीं प्रगाढ़
रक्त-वर्षिणी भयान बदलियाँ,
व्योम में कड़क रहीं
विनाशिनी अधीर क्रूर बिजलियाँ,

विश्व-शान्ति रक्षको !
सावधान !

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(29) आओ जलाएँ
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आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !

नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
भुवन-भाविनी भावनाएँ !

नहीं हो परस्पर विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता
आओ मिटाएँ
दलन-दानवी-दासताएँ !

कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों न नभ पर प्रभंजन
आओ बहाएँ
अधम आसुरी आपदाएँ !

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(30) समता का गान
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मानव-समता के रंगों में
आज नहा लो !

सबके तन पर, मन पर है जिन
चमकीले रंगों की आभा,
उन रंगों से आज मिला दो
अपनी मंद प्रकाशित द्वाभा,
युग-युग संचित गोपन कल्मष
आज बहा लो !

भूलो जग के भेद-भाव सब
वर्ण-जाति के, धन-पद-वय के,
गूँजे दिशि-दिशि में स्वर केवल
मानव महिमा गरिमा जय के,
मिथ्या मर्यादा का मद-गढ़
आज ढहा दो !

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(31) होली
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नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली !

आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली,
छायी, निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली !

रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली,
अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली !

उर मे बरबस आसव री ढाल गयी होली,
देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली !

स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली,
होकर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

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(32) विश्व-श्री
-----------------------------------------

देश-देश की स्वतंत्रता अमर रहे !

प्राण से अधिक
अपार प्रिय हमें स्वतंत्रता,
देश-प्रेम के लिए
कहीं नियत न अर्हता,
लोक-तंत्र-भावना सदा प्रखर रहे !

विश्व के असंख्य जन
अभेद्य हैं, समान हैं,
भाव एक हैं, यदपि
अनेक राष्ट्र-गान हैं,
साम्य-कामना ज्वलंत प्रति प्रहर रहे !

त्याज्य : जो मनुष्य की
मनुष्यता दहन करे,
ग्राह्य : जो उदार
मानवीयता वहन करे,
सर्व-धर्म-प्रेम की प्रवह लहर रहे !

-----------------------------------------
(33) जनतंत्र-आस्था
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जनतंत्र के उद्घोष से गुंजित दिशाएँ !

आज जन-जन अंग शासन का,
बढ़ गया है मोल जीवन का,
स्वाधीनता के प्रति समर्पित भावनाएँ !

अब नहीं तम सर उठाएगा,
ज्याति से नभ जगमगाएगा,
उद्देश्य-प्रेरित दृढ़ हमारी धारणाएँ ।

मूक होगी रागिनी दुख की,
मूर्त होगी कामना सुख की,
अब दूर होंगी हर तरह की विषमताएँ !



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(34) गणतंत्र-स्मारक
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गणतंत्र-दिवस की स्वर्णिम
किरणों को मन में भर लो !

आलोकित हो अन्तरतम,
गूँजे कलरव-सम सरगम,
गणतंत्र-दिवस के उज्ज्वल
भावों को मधुमय स्वर दो !

आँखों में समता झलके,
स्नेह भरा सागर छलके,
गणतंत्र-दिवस की आस्था
कण-कण में मुखरित कर दो !

पशुता सारी ढह जाये,
जन-जन में गरिमा आये,
गणतंत्र-दिवस की करुणा-
गंगा में कल्मष हर लो !

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(35) प्रण
-----------------------------------------

मानवी गरिमा सदा रक्षित-प्रतिष्ठित हो
प्रण हमारा !

भाग्य-निर्माता स्वयं हों हम,
शक्ति जनता की नहीं हो कम,
व्यक्ति की स्वाधीनता अपहृत न किंचित हो
प्रण हमारा !

एकता के सूत्र में बँधकर,
अग्रसर हों सब प्रगति-पथ पर,
धर्म-भाषा-वर्ण पर कोई न लांछित हो
प्रण हमारा !

दूर हो अज्ञान-निर्धनता
वर्ग-अन्तर-मुक्त मानवता,
अर्थ-अर्जित कुछ जनों तक ही न सीमित हो
प्रण हमारा !

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रचना-काल : सन् 1967-1971
प्रकाशन-वर्ष : सन् 1977
प्रकाशक : प्रबुद्ध भारती प्रकाशन, ग्वालियर, . प्र.
सम्प्रति उपलब्ध : 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' [खंड : 3],
महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड : 3] में

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

डॉ0 महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह ------ जीने के लिए

डॉ0 महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह ------ जीने के लिए



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कविताएँ
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1 जीने के लिए
2 आग्रह
3 शुभैषी
4 कामना
5 कविता-प्रार्थना
6 धर्म
7 गौरैया
8 पहचान
9 आतंक के घेरे में
10 धर्मयज्ञ
11 आरज़ू
12 सन् 1986 . में
13 अग्नि-परीक्षा
14 नये इंसानों से
15 दूसरा मन्वन्तर
16 इतिहास-सृष्टाओ !
17 दरिद्र-नारायण
18 माहौल
19 विजय-विश्वास
20 मंत्र
21 चरम-बिन्दु
22 महत्त्वपूर्ण
23 अनुवाद: एक सेतु
24 भवन
25 मुक्ति-बोध (1)
26 मुक्ति-बोध (2)
27 उमंग
28 सम्मोहन
29 अननुभूत: अस्पर्शित
30 अतृप्ति-भेंट
31 इतवार का एक दिन
32 वास्तविकता
33 लाचारी
34 विरुद्ध
35 कृतकार्य
36 विश्लेषण
37 उपलब्धि
38 एक साध: अधूरी
39 कृतज्ञता
40 अपूर्ण


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(1) जीने के लिए
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दहशत दिशाओं में
हवाएँ गर्म
गंधक से, गरल से;

किन्तु मंज़िल तक
थपेड़े झेलकर
अविराम चलना है !

शिखाएँ अग्नि की
सैलाब-सी
रह-रह उमड़ती हैं ;

किन्तु मंज़िल तक
चटख कर टूटते शोलों-भरे
वीरान रास्तों से
गुज़रना है,
तपन सहना
झुलसना और जलना है !

सुरंगें हैं बिछी
बारूद की
चारों तरफ़
नदियों पहाड़ों जंगलों में ;

किन्तु मंज़िल तक
अकेले
खाइयों को ; खंदकों को
लौह के पैरों तले
हर बार दलना है !

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(2) आग्रह
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आदमी को
मत करो मजबूर !
इतना कि
बेइंसाफ़ियों को झेलते —
वह जानवर बन जाय !
या
बेइंतिहा
दर्द की अनुभूतियों को भोगते —
वह खण्डहर बन जाय !

आदमी को
मत करो मज़बूर
इतना कि उसको
ज़िन्दगी
लगने लगे
चुभता हुआ
रिसता हुआ
नासूर !
आदमी को
मत करो
यों
इस क़दर मजबूर !

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(3) शुभैषी
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बद्दुआओं का
असर होता अगर ;
वीरान
यह आलम
कभी का
हो गया होता !

जाग उठता
हर क़दम पर
आदमी का दर्प-दुर्वासा !
चिरन्तन
प्रेम का सोता
रसातल में
कभी का
खो गया होता !

कहाँ हो तुम
पुनीत शकुन्तले !
अभिशाप की
जीवन्त पंकिल प्रतिक्रिया !
कहाँ हो तुम ?

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(4) कामना
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कभी तो ऐसा हो
कि हम
अपने को ऊँचा महसूस करें,
भले ही
चंद लमहों के लिए।

कभी तो ऐसा हो
कि जी सकें हम
ज़िन्दगी सहज
कृत्रिम मुसकान का
मुखौटा उतार कर,
बेहद तरस गया है
आदमी
सच्चे क़हक़हों के लिए !

कभी तो हम
रू-ब-रू हों
आत्मा के विस्तार से,
कितना तंग-दिल है
आदमी
अपरिचित
परोपकार से !

अंधकार भरे मन में
कभी तो
विद्युत कौंधे !
बड़ा महँगा
हो गया है
रोशनी का मोल ;
अदा कर रहा
हर आदमी
एकमात्र कृपण महाजन का
मसख़रा रोल !

कभी तो हम
तिलांजलि दें
अपने बौनेपन को
अपने ओछेपन को,
और अनुभव करें
शिखर पर पहुँचने का उल्लास !
कभी तो हो हमें
भले ही
चंद लमहों के लिए,
ऊँचे होने का अहसास !

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(5) कविता-प्रार्थना
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आदमी को
आदमी से जोड़ने वाली,
क्रूर हिंसक भावनाओं की
उमड़ती आँधियों को
मोड़ने वाली,
उनके प्रखर
अंधे वेग को — आवेग को
बढ़
तोड़ने वाली
सबल कविता —
ऋचा है, / इबादत है !
उसके स्वर
मुक्त गूँजें आसमानों में,
उसके अर्थ ध्वनित हों
सहज निश्छल
मधुर रागों भरे
अन्तर-उफ़ानों में !

आदमी को
आदमी से प्यार हो,
सारा विश्व ही
उसका निजी परिवार हो !

हमारी यह
बहुमूल्य वैचारिक विरासत है !
महत्
इस मानसिकता से
रची कविता —
ऋचा है, इबादत है !

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(6) धर्म
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प्यार करना
ज़िन्दगी से: जगत से
आदमी का धर्म है !

प्यार करना
मानवों से
मूक पशुओं पक्षियों जल-जन्तुओं से
वन-लताओं से
द्रुमों से
आदमी का धर्म है !

प्यार करना
कलियों और फूलों से
विविध रंगों-सजी-सँवरी
तितलियों से
आदमी का धर्म है !

प्यार करना
इन्द्रजालों से रचे
अद्भुत
विशृंखल-सूत्र
सपनों से,
मधुरतम कल्पनाओं में
गमन करती
सुकोमल-प्राण परियों से
आदमी का धर्म है !

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(7) गौरैया
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गौरैया
बड़ी ढीठ है,
सब अपनी मर्ज़ी का करती है,
सुनती नहीं ज़रा भी
मेरी,
बार-बार कमरे में आ
चहकती है ; फुदकती है,
इधर से भगाऊँ
तो इधर जा बैठती है,
बाहर निकलने का
नाम ही नहीं लेती !
जब चाहती है
आकाश में
फुर्र से उड़ जाती है,
जब चाहती है
कमरे में
फुर्र से घुस आती है !
खिड़कियाँ-दरवाजें बंद कर दूँ ?
रोशनदानों पर गत्ते ठोंक दूँ ?
पर, खिड़कियाँ-दरवाज़े भी
कब-तक बंद रखूँ ?
इन रोशनदानों से
कब-तक हवा न आने दूँ ?
गौरैया नहीं मानती।

वह इस बार फिर
मेरे कमरे में
घोंसला बनाएगी,
नन्हें-नन्हें खिलौनों को
जन्म देगी,
उन्हें जिलाएगी.... खिलाएगी !

मैंने बहुत कहा गौरैया से —
मैं आदमी हूँ
मुझसे डरो
और मेरे कमरे से भाग जाओ !

पर, अद्भुत है उसका विश्वास
वह मुझसे नहीं डरती,
एक-एक तिनका लाकर
ढेर लगा दिया है
रोशनदान के एक कोने में !

ढेर नहीं,
एक-एक तिनके से
उसने रचना की है प्रसूति-गृह की।
सचमुच, गौरैया !
कितनी कुशल वास्तुकार हो तुम,
अनुभवी अभियन्ता हो !
यह घोंसला
तुम्हारी महान कला-कृति है,
पंजों और चोंच के
सहयोग से विनिर्मित,
तुम्हारी साधना का प्रतिफल है !
कितना धैर्य है गौरैया, तुममें !

इस घोंसले में
लगता है —
ज़िन्दगी की
तमाम ख़ुशियाँ और बहारें
सिमट आने को आतुर हैं !

लेकिन ; यह —
सजावट-सफ़ाई पसन्द आदमी
सभ्य और सुसंस्कृत आदमी
कैसे सहन करेगा, गौरैया
तुम्हारा दिन-दिन उठता-बढ़ता नीड़ ?
वह एक दिन
फेंक देगा इसे कूडे़दान में !

गौरैया ! यह आदमी है
कला का बड़ा प्रेमी है, पारखी है !
इसके कमरे की दीवारों पर
तुम्हारे चित्र टँगे हैं !
चित्र —
जिनमें तुम हो,
तुम्हारा नीड़ है,
तुम्हारे खिलौने हैं !

गौरैया ! भाग जाओ,
इस कमरे से भाग जाओ !
अन्यथा ; यह आदमी
उजाड़ देगा तुम्हारी कोख !
एक पल में ख़त्म कर देगा
तुम्हारे सपनों का संसार !

और तुम
यह सब देखकर
रो भी नहीं पाओगी।
सिर्फ़ चहकोगी,
बाहर-भीतर भागोगी,
बेतहाशा
बावली-सी / भूखी-प्यासी !

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(8) पहचान
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इन अट्टालिकाओं का
गगन-चुम्बी
कला-कृत
इन्द्र-धनुषी
स्वप्न-सा
अस्तित्व
कितना घिनौना है
हमें मालूम है !

इनकी ऊँचाइयों का रूप
कितना
क्षुद्र, खंडित और बौना है
हमें मालूम हैं !

परियों-सी सजी-सँवरी
इन अंगनाओं का
अवास्तव छद्म आकर्षण
कितना सुशोभन है
हमें मालूम है !

गौर-वर्णी
कमल-पंखुरियाँ छुअन
कितनी
सुखद, कोमल व मोहन है
हमें मालूम है !

परिचित हम
सुगन्धित रस-भरे
इन स्निग्ध फूलों की
चुभन से,
कामना-दव से
दहकती
देह की आदिम जलन से,
वासना-मद से
महकती
देह की आदिम तपन से,
इनका बिछौना
कितना सलोना है
हमें मालूम है !

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(9) आतंक के घेरे में
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एक बहुत बड़ी और गहरी
साज़िश की गिरफ़्त में है देश !

चालाक और धूर्त गिरोहों के
चंगुल में फँसा
छद्म धर्म और बर्बर जातीयता के
दलदल में धँसा,
एक बहुत बड़ी और घातक
जहालत में है देश !

आत्मीय रिश्तों का पक्षधर
दोस्ती के
सपनों व अरमानों का घर,
एक बहुत बड़ी और भयावह
दहशत में है देश !

संलग्न
सभ्य और नये इंसानों की अवतारणा में,
संलग्न
शांति और अहिंसा की
कठिनतम साधना में,
एक बहुत बड़ी और भारी
मुसीबत में है देश !

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(10) धर्मयज्ञ
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आधुनिक विश्व में
‘धर्म’ के नाम पर
कैसा जुनून है ?
सभ्य प्रदेशों में
ज़िन्दा
बर्बर ‘कानून’ है,
सर्वत्र —
ख़ून-ही-ख़ून है !

नये इंसानो !
बेहतर की कामना करो,
धर्म के ठेकेदारों का
सामना करो !
विकृत धर्मों की
खुलकर अवमानना हो
(चाहे व्यापक विनाश सम्भावना हो।)

मनुष्य — मनुष्य है,
पशु नहीं !
उसे प्रबोध दो,
वह समझेगा, सँभलेगा, बदलेगा !

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(11) आरज़ू
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कितना अच्छा होगा
जब दुनिया में सिर्फ़ रहेंगे
ईश्वर से अनभिज्ञ,
प्राणी-प्राणी प्रेम-प्रतिज्ञ !

फिर
ना मंदिर होंगे, ना मसजिद
ना गुरुद्वारे, ना गिरजाघर !

कितनी होगी हैरत !
मारेगा कौन किसे ?
फिर कौन करेगा नफ़रत ?
सिर्फ़ मुहब्बत होगी,
होगी गै़रत !
सब ‘तनखैया’ होंगे,
भैया-भैया होंगे !

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(12) सन् 1986 . में
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इसने
उसको
भून दिया
गोली से;

क्योंकि
भिन्न था
वह
बोली से !

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(13) अग्नि-परीक्षा
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काली भयानक रात,
चारों ओर
झंझावात,
पर, जलता रहेगा —
दीप...
मणिदीप
सद्भाव का,
सहभाव का !
उगती जवानी
देश की
होगी नहीं गुमराह !
उजले देश की
जाग्रत जवानी
लक्ष्य युग का भूल
होगी नहीं गुमराह
तनिक तबाह !

मिटाना है उसे —
जो कर रहा हिंसा,
मिटाना है उसे —
जो धर्म के उन्माद में
फैला रहा नफ़रत,
लगाकर घात
गोली दाग़ता है
राहगीरों पर
बेक़सूरों पर !
मिटाना है उसे —
जिसने बनायी ;
धधकती बारूद-घर
दरगाह !
इन गंदे इरादों से
नये युग की जवानी
तनिक भी
होगी नहीं गुमराह !

चाहे रात काली और हो,
चाहे और भीषण हों
चक्रवात-प्रहार,
पर,
सद्भाव का: सहभाव का
ध्रुव-दीप / मणि-दीप
निष्कम्प जलता रहेगा !
साधु जीवन की
सतत साधक जवानी
आधुनिक,
होगी नहीं गुमराह !

भले ही
वज्रवाही बदलियाँ छाएँ,
भले ही
वेगवाही आँधियाँ आएँ,
सद्भावना का दीप
सम्यक् धारणा का दीप
संशय-रहित हो
अविराम / यथावत्
जलता रहेगा !
एक पल को भी
न टूटेगा
प्रकाश-प्रवाह !
विचलित हो,
नहीं होगी
जवानी देश की
गुमराह !

उभरीं विनाशक शक्तियाँ
जब-जब,
मनुजता ने
दबा कुचला उन्हें
तब-तब !

अमर —
विजय विश्वास !
इतिहास
चश्मदीद गवाह !
जलती जवानी देश की
होगी नहीं गुमराह !

एकता को
तोड़ने की साज़िशें
नाकाम होंगी,
हम रहेंगे
एक राष्ट्र अखंड
शक्ति प्रचंड !

सहन
हरगिज़ नहीं होगा
देश के प्रति
छल-कपट विश्वासघात
गुनाह !
मेरे देश की
विज्ञान-आलोकित जवानी
अंध-कूपों में
कभी होगी नहीं गुमराह !

----------------------------------
(14) नये इंसानों से
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पहले
सोचते हैं हम
अपने घर-परिवार के लिए।

फिर —
अपने धर्म
अपनी जाति
अपने प्रांत
अपनी भाषा, और
अपनी लिपि के लिए !

आस्थाएँ: संकुचित।
निष्ठाएँ: सीमित परिधि में कै़द।

हम अपने इस सोच की
रक्षा के लिए
मानव-रक्त की
नदियाँ बहा देते हैं,
पड़ोसियों को
गोलियों से भून देते हैं,
वहशी बन जाते हैं
आदमख़ोर हिंस्र
जानवर से भी अधिक,
भयानक शक़्ल
धारण कर लेते हैं !
हमारे ‘महान’ और ‘शहीद’ बनने का
एक मात्र रास्ता यही है !

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
यह सोच
हमारी चेतना का
अंग बन चुका है,
हम इससे मुक्त नहीं हो पाते !

बार-बार हमारा ईश्वर
हमें उकसाता है —
हम दूसरों के ईश्वरों की
हत्या कर दें
उनके अस्तित्व चिन्ह तोड़ दें
और स्वर्ग का स्थान
केवल अपने लिए
सुरक्षित समझें।

साक्षी है इतिहास
कि देश हमें नहीं दिखता,
विश्व-मानवता का लिबास
हमें नहीं फबता।

इस पृथ्वी पर मात्र
हम रहेंगे —
हमारे धर्म वाले
हमारी जाति वाले
हमारे प्रांत वाले
हमारी ज़बान वाले
हमारी लिपि वाले,
यही हमारा देश है,
यही हमारा विश्व है !

कौन तोड़ेगा
इस पहचान को ?
ख़ाक करेगा
इस गलीज़ जहान को ?
नये इंसानो !
आओ, क़रीब आओ
और मानवता की ख़ातिर
धर्म-विहीन, जाति-विहीन
समाज का निर्माण करो
देशों की
भौगोलिक रेखाएँ मिटा कर !
विभिन्न भाषाओं
विभिन्न लिपियों को
मानव-विवेक की
उपलब्धि समझो !
नये इंसानो !
अब चुप मत रहो
तटस्थ मत रहो !

----------------------------------
(15) दूसरा मन्वन्तर
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भविष्य वह
आएगा कब
जब —
मनुष्य कहलाएगा
मात्रा ‘मनुष्य’ !
उसकी पहचान
जुड़ी रहेगी कब-तलक
देश से
धर्म से
जाति-उपजाति से
भाषा-विभाषा से
रंग से
नस्ल से ?

मनुष्य के मौलिक स्वरूप को
किया जाएगा रेखांकित कब ?
मनुष्य को
‘मनुष्य’ मात्र
किया जाएगा लक्षित कब ?

उसका लोक एक है
उसकी रचना एक है
उसकी वृत्तियाँ एक हैं
उसकी आवश्यकताएँ एक हैं,
उसका जन्म एक है
उसका अन्त एक है

मनुष्य का विभाजन
कब-तलक
किया जाता रहेगा ?
वह आख़िर कब-तलक
बर्बर मन की
चुभन-शताब्दियाँ सहेगा ?

तोड़ो —
देशों की कृत्रिम सीमा-रेखाओं को,
तोड़ो —
धर्मों की
असम्बद्ध - अप्रासंगिक,
दक़ियानूस
आस्थाओं को,
तोड़ो —
जातियों-उपजातियों की
विभाजक व्यवस्थाओं को।

अर्जित हैं
भाषाओं-विभाषाओं की भिन्नताएँ,
प्रकृति नियंत्रित हैं
रंगों-नस्लों की
बहुविध प्रतिमाएँ !

ये सब
मानव को मानव से
जोड़ने में
बाधक न हों,
ये सब
मानव को मानव से
तोड़ने में
साधक न हों !

अवतरित हो
नया देवदूत, नया पैग़म्बर, नया मसीहा
इक्कीसवीं सदी का
महान मानव-धर्म
प्रतिष्ठित हो,
अन्य लोकों में पहुँचने के पूर्व
मानव की पहचान
सुनिश्चित हो !

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(16) इतिहास-सृष्टाओ!
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इंसान की तक़दीर को
बदले बिना —
इंसान जो
अभिशप्त है : संत्रस्त है
जीवन-अभावों से !
इंसान जो
विक्षत प्रताड़ित क्षुब्ध पीड़ित
यातनाओं से, तनावों से !
उस दुखी इंसान की
तक़दीर को बदले बिना ;
संसार की तसवीर को
बदले बिना —
संसार जो
हिंसा, विगर्हित नग्न पशुता ग्रस्त,
रक्त-रंजित,
क्रूरता से युक्त
घातक अस्त्र-बल-मद-मस्त !
उस बदनुमा संसार की
तसवीर को बदले बिना ;
इतिहास-द्रष्टाओ !
सुखद आरामगाहों में
तनिक सोना नहीं, सोना नहीं !
संघर्ष-धारा से विमुख
होना नहीं, होना नहीं !

हर भेद की प्राचीर को
तोड़े बिना,
पैरों पड़ी ज़ंजीर को
तोड़े बिना,
इतिहास-सृष्टाओ !
सतत श्रम-साध्य
निर्णायक विजय-अवसर
अरे, खोना नहीं, खोना नहीं ।

इंसान की तक़दीर को
बदले बिना,
संसार की तसवीर को
बदले बिना,
सोना नहीं, सोना नहीं !

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(17) दरिद्र-नारायण
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दो जून
रोटी तक जुटाने में
नहीं जो कामयाब,
ज़िन्दगी
उनके लिए —
क्या ख़ाक होगी ख़्वाब !
कोई ख़ूबसूरत ख़्वाब !
उनके लिए तो
ज़िन्दगी —
बस,
कश-म-कश का नाम,
दिन-रात
पिसते और खटते
हो रही उनकी
निरन्तर
उम्र तमाम !

वंचित
उच्चतर अनुभूतियों से जो —
भला उनके लिए
संस्कृति-कला का
अर्थ क्या ?
उपयोग क्या ?

सब व्यर्थ !
(जो न समर्थ।)
यद्यपि; सतत श्रम-रत;
किन्तु जीवन-भर
निराश-हताश !
जिनके पास
थोड़ा चैन करने को
नहीं अवकाश !

उनके लिए है
नृत्य-नाटक-काव्य के
सारे प्रदर्शन,
दूरदर्शन
व्यंग्य मात्र !
वे - केवल हमारे
खोखले ओछे अहं के
तुष्टि-पूरक-पात्र !
पहले चाहिए उन्हें —
शोषण-मुक्ति,
महिमा-युक्त गरिमा,
मान की सम्मान की रोटी,
सुरक्षा और शिक्षा !
चाहिए ना एक कण भी
राज्य की या व्यक्ति की
करुणा, दया, भिक्षा !

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(18) माहौल
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देश के असली खेवनहार
नेता अफ़सर ठेकेदार !
सारी दौलत के हक़दार,
राष्ट्र-भक्त झण्डाबरदार !
इनकी तिकड़म का संसार
करदे शासन को लाचार,
हमको तुमको बे-घरबार
ये मशहूर बड़े बटमार !
दुष्टाचारी हैं मक्कार,
है धिक्कार इन्हें धिक्कार !
.....
गूँजी किसकी यह ललकार —
जागी जनता, भागो यार !

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(19) विजय-विश्वास
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लड़ाई हमारी
अधूरी रहेगी नहीं,
बीच में ही
रुकेगी नहीं
जो —
मेहनतकश सबल साहसिक शूर है
नाम: ‘मज़दूर’ है

उसकी लड़ाई
अन्तिम विजय तक
थमेगी नहीं !
और होगी कड़ी
और होगी बड़ी,
संसार में
फैलती जायगी यह
लगातार !
बर्बर दमन से
कभी ख़त्म होगी नहीं,
कमज़ोर धीमी
पड़ेगी नहीं !

आश्वस्त हम —
यह युद्ध
शोषण-विरुद्ध,
अवरुद्ध होगा नहीं !

हर रुकावट
मिटाकर,
लड़ाई हमारी
सतत
भय-मुक्त
जारी रहेगी !
रुकेगी नहीं !

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(20) मंत्र
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स्थापित हो
समता
मानव-मानव में समता
युग-युग वांछित-इच्छित समता !

प्रजाति-जाति-वर्ण-धर्म मुक्त
हो मनुष्य-लोक,
हो नहीं
मनुष्य के मिलाप में
भेद-भाव, रोक-टोक !
पहचान मनुज की
मात्र एक —
मानव तन, मानव मन।
अनुभव-चिन्तन से
उपजे विवेक
पहचान मनुज की
मात्र एक।

अवतरित हो
ममता
मानव-मानव में ममता
मादक मादन मायल ममता।
ध्वस्त करो
अन्धी पौराणिकता
मानव-मानव के प्रति पाशविकता।

मानव ! मत भटको अब,
कल्पित भाग्य-विधानों पर
मानव ! मत अटको अब।

मूरखता, मूरखता, मूरखता।
केवल वंचकता, वंचकता।
इससे मुक्त करो
जीवन और मनुज को,
धृष्ट-दुष्ट
धर्मध्वजियों धूर्तों से
रक्षित हो मानवता।
हो सदा-सदा को दूर
विषमता,
जागे दलितों में
अपराजित अद्भुत क्षमता।
स्थापित हो
इंसानी दुनिया में
ख़ुशहाली
माली समता,
सामूहिक सामाजिक
गौरवशाली समता।

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(21) चरम-बिन्दु
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एक लमहा
फ़र्क है —
होने,
न होने में !
बहुत सूक्ष्म सीमा है
अस्तित्व
और
अनस्तित्व के मध्य,
फ़र्क है
सिर्फ़ रेखा भर
हँसने
और रोने में !

बहुत सूक्ष्म अन्तर है
अभिव्यक्ति में
अन्तःकरण की !
सम्भव नहीं है
खींचना सरहद
जनम की, मरण की !

स्थितियाँ —
समतुल्य हैं लगभग !
युग-युग सँजोयी साध
कब किस क्षण अचानक
मूर्त हो जाए ;
अमूर्त हो जाए ;
एक पल झपकी
बहुत है
पाने और खोने में !
एक लमहा
फ़र्क है —
होने;
न होने में !

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(22) महत्त्वपूर्ण
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चीजें —
कोई रूप-स्वरूप तो लें,
आख़िर कोई तो रूप लें !
हम पहुँचे तो सही
(ग़लत या सही)
किसी नतीज़े पर,
किसी घर.....दर
किसी ठिकाने भर !

यों वियाबान में
कब-तक भटकेंगे ?
यों आग की भट्ठी में
कब-तक
तरल-तरल तड़पेंगे ?
चीजें —
कोई शक़्ल तो लें !
आखि़र कोई तो शक़्ल लें !

मंसूबों की रेखाएँ —
स्पष्ट या धुँधला
कोई आकार-चिन्ह लें तो
आख़िर, कोई आकार-चिन्ह तो लें !
कि हम जान सकें
दिशाएँ
दूरियाँ
विस्तार !

विचार —
अमूर्त विचार साकार तो हों,
चिन्तन-लोक की गहराइयों में
किसी तरह तो हों साकार
अमूर्त विचार,
कि हम बना सकें दिमाग़
और पहना सकें
उन्हें
कोई भाषा-प्रारूप।
कहीं से
कोई तो रोशनी की किरन फूटे
अन्धकार तो छँटे
और हम अन्ध-कूप से

आएँ बाहर,
कम-से-कम बाहर तो आएँ,
चीजें —
रंग-रूप तो लें
हवा-धूप तो लें !
चीजें —
कोई रूप-स्वरूप तो लें !

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(23) अनुवाद: एक सेतु
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अनुवाद
मात्र भाषान्तर नहीं
वह सेतु है !

एक मन को दूसरे से
जोड़ने का,
परस्पर अजनबीपन
तोड़ने का !

विश्व-मानव के
शिथिल सम्बन्ध-सूत्रों को
पिरोने और कस कर बाँधने का,
आत्म-हित में
दृढ़ अटूट प्रगाढ़
मैत्री साधने का !

अनुवाद —
साधन है
देशान्तरों के - व्यक्तियों के
बीच निर्मित
अतल गहराइयों में
पैठने का,
निःशंक हो
द्विविधा रहित
मिल बैठने का।

लाखों-करोड़ों मानवों के मध्य
सह-संवाद है
अनुवाद।
अनजान मानव-लोक के
बाहर व भीतर व्याप्त
गहरे अँधेंरे का
दमकती रोशनी में
सफल रूपान्तर।
नहीं है
मात्र भाषान्तर !

माध्यम है —
अपरिचय को
गहन आत्मीयता में बदलने का,
हर संकीर्णता से मुक्त हो
बाहर निकलने का !
सभ्यता-संस्कार है !
अनुवाद !

भाषिक चेतना का
शक्त एक प्रतीक है,
सम्प्रेषण विधा का
एक रूप सटीक है !
अनुवाद —
मानव-विवेक
प्रतिष्ठ सार्थक
केतु है !
अनुवाद —
मात्र भाषान्तर नहीं;
वह सेतु है !

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(24) भवन
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कुएँ की दीवारों जैसा
ऊँचा परकोटा,
सँकरे-सँकरे गलियारों जैसा
हर कमरा छोटा,
जिसमें,
ना उपवन
ना आँगन
आधुनिक वास्तु-कला का अंकन ?
या
संकुचित हृदय की
प्रतिकृति,
स्वकेन्द्रित मन का
दर्पण !

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(25) मुक्ति-बोध (1)
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लगता है,
बहुत कुछ बदला हुआ !
नया-नया !
लगता है,
बरसों का चढ़ा जुआ
सहसा उतर गया !
बरसों से,
लम्बी सँकरी
कँकरीली-पथरीली
अनइच्छित सड़कों से
तन पर, मन पर
भारी बोझा ढोते
गुज़रता रहा,
नट की तरह
रोज़-रोज़
एक ही खम्भे पर
चढ़ता-उतरता रहा !

शुक्र है,
अब मुक्त हूँ
हवा की तरह,
कहीं भी जाऊँ,
उडूँ, नाचूँ, गाऊँ !

शुक्र है,
उन्मुक्त हूँ,
लहर की तरह !
जब चाहूँ -
लहराऊँ — बल खाऊँ,
चट्टानों पर लोटूँ
पहाड़ियों से कूदूँ
वनस्पतियों पर बिछलूँ,
दौडूँ
बेतहाशा दौडूँ
या
किसी सरोवर में पसर जाऊँ,
बूँद-बूँद बिखर जाऊँ !

मुक्त हूँ,
कुछ इस तरह
जैसे कि
पिँजरे का द्वार
अचानक खुल जाए
पंख फड़फड़ाता तोता
दूर आकाश में उड़ जाए,
हम-उम्र हमजोलियों में मिल जाए,
हम-ख़्वाबा के साथ खेले
उसे आगोश में ले ले
नोचे चूमे !
जो चाहे
जब चाहे
बोले —
ऊँचे या धीमे
आतुर या हौले !

लगता है —
बरसों के लिपटे नागफाँस
कट गए,
ज़हरीली बारिश के मेघ
हट गए !
अब
चंदन-वृक्षों पर
कस्तूरी फूल खिलेंगे
मधुर-स्रवा-सम
फूलों के गुच्छ लगेंगे !
जो कभी हुआ नहीं
लगता है —
अब होगा !

क्योंकि —
बहुत-कुछ
दिखता है
नया - नया
बदला हुआ !

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(26) मुक्ति-बोध (2)
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अब
बेफ़िक्री से सोऊँगा,
बेफ़िक्री से टहलूँगा
‘जनक-ताल’ तक टहलूँगा,
अब नहीं होगी हड़बड़ी
तोड़ दी है हथकड़ी
हर कड़ी !

घंटों नहाऊँगा,
सुरे-बेसुरे
नाना गीत गा-गा कर
नहाऊँगा !

कहाँ हैं
मेरे
‘पाकीज़ा’ और गीतादत्त के रिकार्ड ?
रात के सन्नाटे में
बार-बार बजाऊँगा !
जब-तब गुनगुनाऊँगा !

ओ मेरे उपवन के पौधो !
तुम्हें अब कोई शिकायत नहीं होगी,
जी-भर देखूंगा
सींचूँगा
बाँहों में बाँधूँगा !
ओ कनेर, कचनार, अमरूद !
अब उदास मत रहो
ओ रजनीगंधा ! ओ बेला !
अब हताश मत रहो,
तुम्हारी गंध
रोम-रोम से अनुभूत होगी,
हर साँस जैसे
प्रसून-प्रसूत होगी !

अनजान में भी
अब नहीं रौंदूँगा
ओ मेरे उपवन की
सब्ज़ घास !
रहूंगा पास,
मख़मली तन पर लोटूंगा
आदिम कामना से भर,
सुकोमल हाथ फेरूंगा
ओ स्निग्ध रचना !
हो
प्रफुल्ल-वदना !
हर क्षण अपना है,
सच सपना है !

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(27) उमंग
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सान्ध्य काल
धूप-छाँह बीच,
गिर रही फुहार
रिमझिमा रहा
गगन !

बार-बार
द्वार थपथपा रहा
समय / अ-समय
किस क़दर
उतावला पवन !

दूर-पास
खेत हाट चौक में
अधीर
जान-बूझ
भीग-भीग
थरथरा रहा
प्रिया बदन !

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(28) सम्मोहन
----------------------------------

मधु-ऋतु
आगमन पर
बंधु,
इतराओ नहीं !
इतना भरोसा मत करो
मधु-ऋतु मोहिनी पर,
इस क़दर
धरती-गगन में झूम कर
उल्लास-रस गाओ नहीं !

अस्तित्व
इसकी सुरभि का
कुछ दिनों का,
भोग-अनुभव
कुछ क्षणों का !

मधु-ऋतु गंध पर
विश्वास कर
निर्भर नहीं इतना रहो
मन !
भावना की तीव्र धारों में
नहीं इतना बहो
मन !

यह अल्प-जीवी
बिखर कर
छितर जाएगी,
रख न पाओगे
तनिक भी
बाँध कर तुम !
यह मनोरम गंध
मधु-ऋतु की !
वस्तु —
लहराती हुई,
आकाश की ऊँचाइयाँ
छूती हुई,
उन्मुक्त अल्हड़
मंद शीतल वायु की
जुड़वाँ सहेली !

मत करो इच्छा
समझने-जानने की
गूढ़ उलझी जटिल और अबूझ
पहेली !

चेतना हत
भूल कर
होना न सम्मोहित,
समर्पित;
स्पर्श पा
मधुमास का,
उसकी सुखद
मधु-श्वास का !

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(29) अनुभूत: अस्पर्शित
----------------------------------

ओ,
लहकती बहकती
बसन्ती हवाओ !
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ !
अनुराग भर-भर
गुँजा फागुनी स्वर
न ठहरो
न गुज़रो
इधर से
बसन्ती हवाओ !

भटकती बहकती
बसन्ती हवाओ !
मुझे ना डुबाओ
उफ़नते उमड़ते
भरे पूर रस के
कुओं में, सरों में,
मधुर रास-रज के
कुओं में, सरों में,
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ।
ओ, बसन्ती हवाओ !
दहकती चहकती
बसन्ती हवाओ !

अभिशप्त
यह क्षेत्र वर्जित
सदा से,
न आओ इधर
यह विवश !
एक
सुनसान वीरान मन को
समर्पित
सदा से,
न आओ इधर
ओ, बसन्ती हवाओ !
गमकती खनकती
बसन्ती हवाओ !
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ !

तप्त प्यासे
कुओं में, सरों में
नहीं यों

भिगोओ मुझे !
इन
अवश अंग
युग-युग पिपासित
कुओं में, सरों में
नहीं यों
भिगोओ मुझे !

ओ, बसन्ती हवाओ !
मचलती छलकती
बसन्ती हवाओ !
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ !
यह
अननुभूत ओझल अस्पर्शित
सदा से !
न आओ इधर
यह
उपेक्षित अदेखा अचीन्हा
सदा से !

----------------------------------
(30) अतृप्ति: भेंट
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अब
क्या दे सकता हूँ तुम्हें —
एक गढ़ी-बनी
स्थिर मूर्ति के सिवा !
बिखरी विभूति के सिवा !

जो हूँ
बन चुका हूँ
ढल चुका हूँ,
प्रदत्त कोश की अधिकांश साँसें
गिन चुका हूँ,
फल चुका हूँ !

अब नहीं मुमकिन —
प्रयोग बतौर
तोडूँ-तराशूँ और,
अधबना रह जाएगा,
शेष न कह पाएगा !

ज़िन्दगी के इस चरण पर
कमज़ोर कंधों पर उम्र के
उतरता-डूबता सूरज मैं
क्या दे सकता हूँ तुम्हें
ऊष्मा की
पहचानी मांसल अनुभूति के सिवा।

तुम हो
उफ़नते अतल सागर की तरह,
जलती धधकती वासनाएँ तुम्हारी
अनापे अम्बर की तरह,
तुम्हें क्या दे सकता हूँ भला
हे भाविनी,

कल्पना प्रभूति के सिवा,
उत्तेजना आपूर्ति के सिवा !

----------------------------------
(31) इतवार का एक दिन
----------------------------------

पूरा दिन
बीत गया इन्तज़ार में,
तमाम लोगों के इन्तज़ार में।

नहीं आया अप्रत्याशित भी,
नहीं टकराया अवांछित भी।

बीत गया
पूरा दिन,
लमहे-लमहे गिन।
इतवार इस बार का
नहीं लाया कोई समाचार
अच्छा या बुरा
रुचिकर या क्षुब्धकारक।

निरन्तर ऊहापोह में
गुज़र गया पूरा दिन।

इस या उस के
दर्शन की चाह में,
घूमते-टहलते
कमरों की राह में।

बस, सुबह-सुबह
आया अख़बार,
और दूध वाले ने
प्रातः - सायं बजायी घंटी
नियमानुसार।

अन्यथा कहीं कोई
पत्ता तक न खड़खड़ाया,
एक पक्षी तक
मेरे आकाश के इर्द-गिर्द
नहीं मँडराया।

बीत गया पूरा दिन
इन्तज़ार बन,
मूक लाचार बन।

----------------------------------
(32) वास्तविकता
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ज़िन्दगी ललक थी; किन्तु भारी जुआ बन गयी,
ज़िन्दगी फ़लक थी; किन्तु अंधा कुआँ बन गयी,
कल्पनाओं रची, भावनाओं भरी, रूप - श्री
ज़िन्दगी ग़ज़ल थी; बिफर कर बददुआ बन गयी !

----------------------------------
(33) लाचारी
----------------------------------

आरोपित अचाही ज़िन्दगी जी ली,
हरक्षण, हर क़दम शर्मिन्दगी जी ली,
हम से पूछते इतिहास अब क्या हो
दुनिया की जहालत गन्दगी जी ली !

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(34) विरुद्ध
----------------------------------

असलियत हम छिपाते रहे उम्र भर
झूठ को सच बताते रहे उम्र भर,
आप-बीती सुनायी, कहानी बता
दर्द में गुनगुनाते रहे उम्र भर !

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(35) ‘कृतकार्य
----------------------------------

जी, वाह ! क्या वाहवाही मिली,
ता-उम्र कोरी तबाही मिली,
दौलत बहुत, दर्द की, बच रही
सच, ज़िन्दगी भारवाही मिली !

----------------------------------
(36) विश्लेषण
----------------------------------

गँवाया ही गँवाया,
कुछ नहीं पाया,
ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया !
जो बच पाये
नुकीले शूल हैं,
जो उठा लाये
बेरंग बासी फूल हैं,
पास में
देखो धूल
कितनी धूल है !

राह पर
हर मोड़ पर,
घर में
या कि बाहर,
हाट में, बाज़ार में
विश्वास के हाथों
सदा लुटते रहे !
अपनों से
परायों से
हमेशा
छल-कपट की
तेज़ धारों की कटारों के तले
बेहद सरलता से
अरे, कटते रहे !
लोगों की
तमाम रची-बुनी
चतुराइयों-चालाकियों से
उनकी हीनताओं-क्षुद्रताओं से
बहुत चाहा —
बचना;
किन्तु
ओढ़ी सौम्यता शालीनता की
आरोपित मुखौटों की
कठिन
बेहद कठिन
पहचानना रचना !
उनके छद्म से बचना !

नहीं है शेष
कोई भी विरासत,
ढह गयी
जो
श्रम-पसीने से
बनायी थी इमारत !

----------------------------------
(37) उपलब्धि
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उछलती-कूदती
विपरीत
लहरों से
निरन्तर जूझते,
जीवन-मरण के बीच
अस्थिर झूलते,
दिन रात
कितनी कश-म-कश के बाद
कूल मिला !

धीरज से
कठिनतम साधना के बाद,
जीवन-सत्त्व-स्पन्दन भर
जड़ों को सींच
टटका
मुसकराता
एक
फूल खिला !

----------------------------------
(38) एक साध: अधूरी
----------------------------------

जी करता है
आज का दिन
ज़िन्दगी की कश-म-कश से
हटकर
बंद कमरे में
सोए-सोए गुज़ार दूँ !

न जाने
कितने बरसों से
निश्चिन्त बेख़बर हो
आदिम-राग का, अनुराग का
अहसास भर
सोया नहीं !

जी करता है
आज का दिन
निश्चेष्ट शिथिल चुप रह
चित्रमाला में अतीत की
खोए-खोए गुज़ार दूँ !
न जाने
कितने बरसों से
उजड़े गाँवों की राहों में
छूटे नगरों की बाँहों में
खोया नहीं !
जी करता है
आज का दिन
सारे वादे, काम, प्रतिज्ञाएँ
भूल कर
गंगा की लहरों-सी
तुम्हारी याद में
रोए-रोए गुज़ार दूँ !

न जाने
कितने बरसों से
तुम्हारी तसवीर से
रू-ब-रू हो
रोया नहीं !

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(39) कृतज्ञता
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छोड़ दो
यह ठोर
मन !
किसका इन्तज़ार यहाँ
अब और
मन !
ढल गया दिन
उतर आयी शाम,
घिर रहा
चारों दिशाओं में
अँधेरा
घनेरा !
करो स्वीकार
मन !
यह अकेलापन,
बड़े सुख से
करो स्वीकार
मन !

हे ख़ुदा !
शुक्रगुज़ार,

तेरा
बेहद
शुक्रगुज़ार !

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(40) अपूर्ण
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कुछ रह गया
अनकहा !
क्षेपक कहें
या चुप रहें

कुछ रह गया
अन सहा !
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रचना-काल : सन् 1977-1986
प्रकाशन-वर्ष : सन् 1990
प्रकाशक : सर्जना प्रकाशन, ग्वालियर — 474 002 [म.प्र.]
सम्प्रति उपलब्ध : 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' [खंड : 3],
: ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड : 3] में।