शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह ----- संकल्प

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह ----- संकल्प
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कविताएँ
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1 सहभाव
2 अन्तर्ध्वन्सक
3 बाधाएँ चुनौती हैं
4 यथा-पूर्व
5 एकस्थ से हट कर
6 अब नहीं
7 प्रतीक्षक
8 मेरा देश
9 नहीं तो
10 हमारे इर्द-गिर्द
11 एक नगर और रात की चीखें
12 आकस्मिक
13 बस एक बार !
14 निकष
15 नियति
16 अन्तःशल्य
17 आत्म-कथा
18 अनचहा
19 समाधि-लेख
20 ग़लतफ़हमियों का बोझ
21 प्रक्रिया
22 पुनर्वार
23 प्रतिज्ञा-पत्र
24 भले ही
25 स्व-रुचि
26 टूटा व्यक्तित्व
27 जीवनी
28 अंध-काल
29 आओ जलाएँ
30 समता का गान
31 होली
32 विश्व-श्री
33 जनतंत्र-आस्था
34 गणतंत्र-स्मारक
35 प्रण

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(1) सहभाव
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आओ —
दूरियाँ
देशान्तरों की
व्यक्तियों की
अत्यधिक सामीप्य में
बदलें।
बहुत मज़बूत
अन्तर-सेतु
बाँधें !
आओ —
अजनबीपन
हृदय का
अनुभूतियों का
सांत्वना
आश्वास में
बदलें।
परस्पर मित्रता का
गगन-चुम्बी केतु
बाँधें !
आओ —
अविद्या-अज्ञता
धर्मान्तरों की
भिन्नता विश्वास की
समधीत सम्यक् बोध में
बदलें।
सुनिश्चित
विश्व-मानव-हेतु
साधें!

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(2) अन्तर्ध्वन्सक
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कौन है,
वह कौन है ?
जो —
हमारे स्वप्नों में
ख़लल डालता है,
हमारे
बनाये-सजाये
चित्रों को विकृत कर
बदल डालता है,
उनकी विराटता को
बौना कर देता है,
उनकी उन्मुक्तता में
कुण्ठा भर देता है !

वह कौन है ?
वह दुस्साहसी कौन है ?
जो —
हर संगत लकीर को
जगह-जगह से तोड़ कर
असंगत लिबास पहना देता है,

परिवेश की अर्थवत्ता छीन कर
अनर्गल वैशिष्ट्य से गहना देता है !
सही परिप्रेक्ष्य से
विस्थापित कर
हास्यास्पद भूमिकाओं की
चितकबरी प्लास्टर झड़ी
दीवारों पर
उल्टा टाँग देता है !

हमारे विश्वासों की
जीवन्त प्रतिमाओं को
खण्डित कर
कोलतारी स्वाँग देता है !

यह
किसका अट्टहास है ?
चारों ओर लहराते
नागफाँस हैं !

पर, सावधान !
मैं
इतिहास को दोहराने नहीं दूँगा,
आतताइयों को
निरीह लाशों को रौंदते
विजय-गान गाने नहीं दूँगा !

इन स्वप्नों की
इन चित्रों की
गत्यात्मकता,
अनुभूत-सिद्ध वास्तविकता

दूर-पास फैले
असंख्य-अदृश्य
भेदियों के जालों को
तोड़ेगी,
मानव-मानव के बीच
पहली बार
सच्चा रिश्ता जोड़ेगी !

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(3) बाधाएँ: चुनौती हैं!
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बाधाएँ —
निरुत्साहित नहीं करतीं हमें,
प्रतिक्षण बनातीं
बल सजग।
कठिनाइयों के सामने
पग डगमगाते हैं नहीं,
प्रत्युत्
लगा कर पंख बिजली के
धरा-आकाश का विस्तार लेते नाप !

बाधाएँ —
‘विकट, दुर्लंध्य, अविजित’
है निरा अपलाप !

बाधाएँ —
बनातीं परमुखापेक्षी नहीं हमको,
बाधाएँ —
बनाती हैं न किंचित दीन
उद्यमहीन हमको।

वे जगातीं
सुप्त अन्तर-शक्तियाँ सारी
न भय रहता, न लाचारी !

कौंधती बिजली सबल तन में
उभरते दृढ़ नये संकल्प मन में !

बाधाएँ: चुनौती हैं !
इन्हें स्वीकारना —
पर्याय:
मानवता-महत्ता का !
इन्हें स्वीकारना —
उद्घोष:
जीवन की चिरन्तन
ऊर्ध्व सत्ता का !
इन्हें स्वीकारना —
पहचान :
तेजस्वी,
सतत गतिमान
मानव के पराक्रम की !
इन्हें स्वीकारना —
अनुभूति :
चिर-परिचित
मनुज-इतिहास-प्रमाणित
अथक श्रम की !

बाधाएँ —
हतोत्साहित नहीं करतीं कभी
बाधाहरों को !
वे बनातीं
और भी दृढ़
धारणाओं को।

कठिन के सामने मेधा
कभी होती नहीं दूषित,
वरन् उद्भावना उन्मेष से भर
और हो उठती प्रखर !

प्रत्येक बाधा
हीन होगी,
नष्टशून्य-विलीन होगी !

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(4) यथा-पूर्व
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हमें
सामर्थ्य-क्षमता का
परिज्ञान कैसे हो ?

हमें
सम्भावनाओं का
अनुमान कैसे हो ?

हम अपरिणामी, तटस्थ, अयुक्त
स्थितियों में
जीते हैं !

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(5) एकस्थ से हटकर
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स्थितियाँ
जब बदलती नहीं —
गतिशीलता
अवरुद्ध होती है,
कहीं एकस्थ हो
आवेश का विस्तार खोती है।

स्थितियों का
बदलना / टूटना
बेहद ज़रूरी है,
भले ही —
नयी स्थितियाँ
नितान्त विरुद्ध हों
संदिग्ध हों।

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(6) अब नहीं
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अब सम्भव नहीं
बीते युगों की नीतियों पर
एक पग चलना,
निरावृत आज
शोषक-तंत्र की
प्रत्येक छलना।

अब नहीं सम्भव तनिक
बीते युगों की मान्यताओं पर
सतत गतिशील
मानव-चेतना को रुद्ध कर
बढ़ना।

सकल गत विधि-विधानों की
प्रकट निस्सारता,
किंचित नहीं सम्भव
मिटाना अब
बदलते लोक-जीवन की
नयी गढ़ना।

शिखर नूतन उभरता है
मनुज सम्मान का,
हर पक्ष नव आलोक में डूबा
निखरता है
दमित प्रति प्राण का,
नव रूप
प्रियकर मूर्ति में
ढल कर सँवरता है
सबल चट्टान का।

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(7) प्रतीक्षक
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अभावों का मरुस्थल
लहलहा जाये,
नये भावों भरा जीवन
पुनः पाये,
प्रबल आवेगवाही
गीत गाने दो !

गहरे अँधेरे के शिखर
ढहते चले जाएँ,
उजाले की पताकाएँ
धरा के वक्ष पर
सर्वत्र लहराएँ,
सजल संवेदना का दीप
हर उर में जलाने दो !
गीत गाने दो !

अनेकों संकटों से युक्त राहें
मुक्त होंगी,
हर तरफ़ से
वृत्त टूटेगा
कँटीले तार का
विद्युत भरे प्रतिरोधकों का,
प्राण-हर विस्तार का !

उत्कीर्ण ऊर्जस्वान
मानस-भूमि पर
विश्वास के अंकुर
जमाने दो !
गीत गाने दो !

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(8) मेरा देश
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प्रत्येक दिशा में
आशातीत
प्रगति के लम्बे डग भरता,
‘वामन-पग’ धरता
मेरा देश
निरन्तर बढ़ता है !
पूर्ण विश्व-मानव की
सुखी सुसंस्कृत अभिनव मानव की
मूर्ति
अहर्निश गढ़ता है !
मेरा देश
निरन्तर बढ़ता है !

प्रतिक्षण सजग
महत् आदर्शों के प्रति,
बुद्धि-सिद्ध
विश्वासों के प्रति।

मेरा देश
सकल राष्ट्रों के मध्य अनेकों
सहयोगों के,
पारस्परिक हितों के,
आधार सुदृढ़
निर्मित करता है !
तम डूबे
कितने-कितने क्षितिजों को
मैत्री की नूतन परिभाषा से
आलोकित करता है !
समता की
अनदेखी
अगणित राहों को
उद्घाटित करता है !

उसने तोड़ दिये हैं सारे
जाति-भेद औ वर्ण-भेद,
नस्ल भेद औ’ धर्म-भेद।

सच्चे अर्थों में
मेरा देश
मनुज-गौरव को
सर्वोपरि स्थापित करता है !
मृतवत्
मानव-गरिमा को
जन-जन में
जीवित करता है !

मेरा देश
प्रथमतः
भिन्न-भिन्न
शासन-पद्धित वाले राष्ट्रों को
अपनाता है !
शांति-प्रेम का
अप्रतिम मंत्र
जगत में गुँजित कर
भीषण युद्धों की
ज्वाला से आहत
मानवता को
आस्थावान बनाता है !
संदेहों के
गहरे कुहरे को चीर
गगन में
निष्ठा-श्रद्धा के
सूर्य उगाता है !

उन्नति के
सोपानों पर चढ़ता
मेरा देश,
निरन्तर
बहुविध
बढ़ता मेरा देश !

प्रतिश्रुत है —
नष्ट विषमता करने,
निर्धनता हरने !
जन-मंगलकारी
गंगा घर-घर पहुँचाने !
होठों पर
मुसकानों के फूल खिलाने,
जीवन को
जीने योग्य बनाने !

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(9) नहीं तो
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यदि मेरे देश में
गाँधी और नेहरू जैसों ने
जन्म नहीं लिया होता
तो —
हैवानियत के शिकंजे
हमारे हाथों-पाँवों में
कसे होते !
यहाँ
वहाँ
सभी जगह
मौत के सौदागर बसे होते !
हम
जो आज
तेज़ी से बढ़ते जाते हैं,
नये, मज़बूत और सुन्दर भारत को
फ़ौलादी दृढ़ता से
गढ़ते जाते हैं,
नयी रोशनी की किरणें
फैलाते
अज्ञान की अँधेरियों से
लड़ते जाते हैं;
घुटनों-घुटनों
फ़िरक़ापरस्ती की दलदल में
धँसे होते,

हम सब
बदरंग हो गये होते,
दिलों से
बेहद तंग हो गये होते !
हमारे एकता के स्वप्न सारे
टूटते,
पशुबल समर्थक
समृद्धि सारी
लूटते !

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(10) हमारे इर्द-गिर्द
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मेरे देश में
ओ करोड़ों मज़लूमो !
तुम्हें
अभी फुटपाथों से
छुटकारा नहीं मिला,
खौलते ख़ून के समुन्दर में
तैरते-तैरते
किनारा नहीं मिला !
बीसवीं शताब्दी के
इस आँठवें दशक में भी
सिर पर
खुला आसमान है,
नीचे
नंगी धरती।
सूनी निगाहें
ठण्डी आहें
विकलांग निरीहता
सर्दी, बरसात, आँधी !

मोटे-मोटे
खादीपोश
बदकिरदार
व्यापारियों-पूँजीपतियों,
मकान-मालिकों,
कॉलोनी-धारियों,
वकील-नेताओं के
मुँह में
यथा-पूर्व
विराजमान है — ‘गाँधी’!
बँगलों और कोठियों में
दीवारों पर
टँगे हैं गाँधी !
(या सलीब पर लटके हैं गाँधी!)
तिकड़मी मस्तिष्क के
बद-मिज़ाज
नये भारत के ये ‘भाग्य-विधाता’
‘एम्बेसेडर’ में
धूल उड़ाते
मज़लूमों पर थूकते
मानवता के रौंदते
अलमस्त घूमते हैं,
किंचित सुविधाओं के इच्छुक
उनके चरण चूमते हैं !

मेरी पूरी पीढ़ी हैरान है !
नेतृत्व कितना बेईमान है !

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(11) एक नगर और रात की चीखें
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मन्दिरों की घण्टियाँ बज रही हैं !
सैकड़ों श्रद्धालु
हाथ जोड़े खड़े होंगे
नत-मस्तक हो रहे होंगे।

वृक्षों, गुम्बदों, भवनों,
खपरैलों, टिनों पर
कुहर-कण पहने
अँधेरा उतरता चला आ रहा है,
जाड़े की शाम
सात बजे से ही गहरा गयी !
घरों के द्वार-वातायन
बंद हो गये !
सड़कों पर
हलकी पीली रोशनी फेंकते हैं
बिजली के खम्भे,
दो-एक स्कूटर
या मोटर साइकिलें
भड़भड़ाती हुई निकल जाती हैं,
कभी-कभी कहीं ढोल बज उठते हैं।
बस-स्टैण्ड पर
लाउड-स्पीकर अभी बोल रहा है
अमुक-अमुक जगह पर जाने वाले
यात्रियों को आगाह करता हुआ।

रात का ठण्डापन बढ़ता जाता है !
रात का सूनापन बढ़ता जाता है !

‘यह आकाशवाणी है,
रात के पौने-नौ बजे हैं।’
और
फिर सर्कस के शेर
दहाड़ने लगे
(ज़रूर दस बजने वाले होंगे।)
सोने से पहले
नींद की गफ़लत में
डूबने से पहले
एक भिखारी
चीखता है —
‘दो-रोटी और दाल,
पेट का सवाल !
है कोई देने वाला
इतने बड़े-बड़े घरों में ?
बस, दो-रोटी और दाल,
मैं भूखा हूँ।’

किसी घर के द्वार नहीं खुलते,
कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती।
भिखारी अड़ जाता है :
‘इस गली से
मैं
रोटी लिये बिना
नहीं जाऊँगा !’
और वह चीखता जाता है —
‘दो-रोटी और दाल,
पेट का सवाल !’
उसकी चीख
सबको दहला देती है,
सुख-सुविधाओं को चैंका देती है !

(भिखारी यदि ख़ूनी बन जाये,
दरवाज़ा तोड़ कर अन्दर घुस आये!)

आतंक की परतें
चेहरों पर बिछने लगती हैं,
घरों की रोशनियाँ
बुझने लगती हैं,
दरवाज़ों पर ताले
झूलने लगते हैं !

भिखारी
चीखता रहता है,
अपनी शक्ति के बाहर
चीखता रहता है।

और जब
किसी दयालु के दरवाज़े ने
उसे कुछ शान्त किया,
उसके बुनियादी सवाल को
एक रात के लिए
हल किया,
सन्नाटा और मुखरित हो चुका था,
वृक्षों, गुम्बदों, भवनों,
खपरैलों, टिनों पर
कुहरा और संघनित हो चुका था !
रात
और ठण्डी और काली
हो चुकी थी,
रात
निहायत बेशर्म और नंगी
हो चुकी थी !

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(12) आकस्मिक
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स्थूल निर्जीव पदार्थों की
प्रत्येक गति
नियति
कार्य-कारण-बद्ध है,
सृष्टि का प्रत्येक कम्पन
धीमा
अथवा विराट
प्राकृतिक नियमों से सिद्ध है।

पर,
संवेदनशील प्राणियों की
पारस्परिक
संगति
निकटता
आत्मीयता
मात्र एक संयोग है !

तभी तो —
इतनी बड़ी दुनिया में
अरबों मनुष्यों की दुनिया में
करोड़ों लोग अकेले हैं,
किसी का साथ पाने के लिए
किसी को
हमसफ़र बनाने के लिए
आकुल हैं,
व्याकुल हैं !

आवश्यकताएँ हैं :
पर,
पूर्तियाँ नहीं !
अर्चनाएँ हैं :
पर,
मूर्तियाँ नहीं !

भटकनें हैं :
बाट नहीं !
नदियाँ हैं :
घाट नहीं !

सर्वत्र
तलाश-ही-तलाश है !
ज़िन्दगी:
डोलती
बोलती
लाश है !

हाथ आया स्वर्ण
जब
मिट्टी में बदल जाता है,
बड़ी कोशिशों से पाया
अपनाया
जब
पराया निकल जाता है !
तब
लगता है:
जीवन कारण-हीन है !
मनुष्य
सचमुच, दीन है !
प्रतीक्षा करो !
अनाचक की
प्रतीक्षा करो !

जीवित सम्पर्क
बनाये नहीं जाते,
बन जाते हैं !
मनचाहे स्वप्न
बुलाये नहीं जाते,
स्वतः आते हैं !

ओ विश्व भर के
अभिशप्त मानवो !
प्रतीक्षा करो !

अचानक की
प्रतीक्षा करो !

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(13) बस, एक बार!
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स्नेह-तरलित दो नयन
मुझको देख लें —
बस,
एक बार !

दो
प्रणय-कम्पित हाथ
मुझको थाम लें —
बस,
एक बार !

सर्पिल भुजाएँ दो
मुझको बाँध लें —
बस,
एक बार,

दो
अग्निवाही होंठ
मुझको चूम लें —
बस,
एक बार !

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(14) निकष
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किसी मधु-गन्धिका के
प्यार की ऊष्मा-किरण
मुझको
छुए तो —
मोम हूँ !
किसी मुग्धा
चकोरी के
अबोध
अधीर
भटके
दो नयन
मुझ पर
पड़ें तो —
सोम हूँ !


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(15) नियति
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मझधार में बहते हुए
बस, देखते जाओ
किनारे-ही-किनारे,
पर नहीं,
वे बन सकेंगे
एक दिन भी
तुम थके-हारे
अकेले के
सहारे !

क्योंकि वे अधिकृत,
तुम अवांछित !
सतत बहते रहो,
प्रतिकूलता
सहते रहो !

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(16) अन्तःशल्य
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रह गये
कितने अदेखे फूल,
अन्तस में अजाने
हूलते हैं शूल !

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(17) आत्म-कथा
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क्या जीता हूँ !
अनुदिन कड़वाहट पीता हूँ,
मधु का सागर लहराता हैµ
पर,
कितना रीता हूँ !
सचमुच,
क्या जीता हूँ ?

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(18) अनचहा
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मैंने नहीं चाहा —
दृष्टि-पथ पर दूर तक
रंगीन सपनों के चरण
न घूमें!

मैंने नहीं चाहा —
जीवन के गगन में
सावनी के स्वर
न गूँजें!
रस-वर्षिणी
घन बदलियाँ
न झूमें!

मैंने नहीं चाहा —
मधु कल्पनाओं के
विफलता की थकन से
पंख जाएँ टूट,
यौवन
उमड़ती ज्वार की लहरें
न चूमे !
पर,
सब अनचहा होता गया,
स्वप्न सारे
हो गये विकलांग,
सावन की सरसता
खो गयी,
अनुरक्त अन्तस की
मधुरता जब
विषैली हो गयी !

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(19) समाधि-लेख
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कोई नहीं है तुम्हारे लिए
कोई नहीं है किसी के लिए,
दुनिया निरी ख़ुदग़रज़ है !

मरण पर हमारे —
कोई विकल बन
करुण गीत गाये
व आँसू बहाये,
मधुर याद में
(ज़िन्दगी भर !)
सजल प्राण-दीपक जलाये,
यह सोचना —
एक खाली मरज़ है !
दुनिया बड़ी ख़ुदग़रज़ है !

स्वयं को न दें
व्यर्थ
इतनी महत्ता,
समझ लें
उचित
भ्रम-रहित हो
स्व-अस्तित्व की
अर्थवत्ता,
इसमें नहीं कुछ हरज़ है !
जब कि
दुनिया निपट ख़ुदग़रज़ है !

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(20) ग़लतफ़हमियों का बोझ
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हमारे पारस्परिक संबंधों को
बरसों के पनपते-बढ़ते रिश्तों को
निकटता और आत्मीयता को
ग़लतफ़हमी
अक्सर पुरज़ोर झकझोर देती है
तोड़ देती है,
हमें एक दूसरे के विपरीत
मोड़ देती है !

हमारे सौमनस्य का अतीत
झूठा बेमानी हो लेता है,
हमारे सद्भाव का इतिहास
महज़ एक स्वाँग साबित हो
सारे व्यतीत घटना-चक्रों को
अकल्पित अद्भुत सन्दर्भों की पीठिका में
प्रस्थापित कर देता है !

हम
अन्यथा के प्रति आश्वस्त हो
सचाई की व्याख्या
बदलने के लिए
विवश हो जाते हैं,
अँधेरे में
और अँधेरे में
और-और अँधेरे में
खो जाते हैं !

ग़लतफ़हमी
मानव-आस्था के मर्म को
निरन्तर विदलित करती है,
जीवन-रस को
एक और अनेक ग़लतफ़हमियाँ
निरन्तर खोखला कर
अवशोषित करती हैं !

ग़तलफ़हमियों का शिकार बनना
सचमुच
एक शाप है,
ग़लतफ़हमियों को बार-बार भोगना
सचमुच
एक विषम शाप-ज्वर संताप है !

न जाने
किन शापों के फलस्वरूप
मुझे
ग़लतफ़हमियों के तोहफ़े,
मिथ्या आरोपों
और लांछनों के तोहफ़े
खूब मिले हैं,
जिन्हें
जीवन की पीठ पर लादे
मैं घूम रहा हूँ !
ग़लतफ़हमियों का यह गट्ठर
अपने आकार में
और कितना फैलेगा-बढ़ेगा ?
यह मेरी जिजीविषा के वेग को
और कितना रोकेगा ?

क्या सारे रिश्तों को तोड़ दूँ ?
ग़लतफ़हमियों के इस बोझ को
एक-बारगी फेंक दूँ ?
व्यक्ति और समाज की
चिन्ता से मुक्त
जीवन को
निर्जीव पदार्थ सत्ता से जोड़ दूँ ?
संवेदन का गला घोंट दूँ ?

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(21) प्रक्रिया
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मैंने
जीवन का व्याकरण
नहीं पढ़ा,
शायद,
इसीलिए —
सही अर्थों में
जीना नहीं आया !

आत्म-प्रकाशन में
असफल अभिव्यक्ति-सा
प्रभाव-शून्य बना रहा,
इसीलिए —
रात-दिन
घर-बाहर
अनमना रहा !

मैंने
जीवन-जगत व्यवहार के
विशिष्ट शब्दों
शब्द-रूपों
और उनके प्रयोगों का
ज्ञान हासिल नहीं किया,
इसीलिएµ
तथाकथित समाज ने
मुझे अपने में
शामिल नहीं किया !
मैंने नहीं सीखा
व्यक्ति-व्यक्ति में
भेद करना,
स्थूल और सूक्ष्म
अन्तर-प्रणाली की
वैज्ञानिकता
मेरी समझ में नहीं आयी,
जो कुछ कहा
वह
व्याख्या की परिधि में
नहीं समाया,
शायद,
इसीलिए मेरा कथन
किसी को नहीं भाया !

मैंने
जीवन का व्याकरण
नहीं पढ़ा,
शायद,
इसीलिए —
अन्यों की तरह
सुख-चैन का
जीना नहीं आया !

निरन्तर
जीवन की अभिधा में
पलता रहा,
लाक्षणिकता के
गूढ़ व्यंजना के
आडम्बर नहीं फैलाये,
बहु-प्रचलित कडवे तेल के दिये-सा
आले में
चुपचुप जलता रहा,

मुहावरेदानी के
रुपहले ट्यूब
तैल-लेपित दीवारों पर
नहीं रोशनाये,
शायद,
इसीलिए —
समाज का मन-रंजन नहीं हुआ
वांछित आवर्जन नहीं हुआ !

दुनिया की चमक-दमक में
डूबा-इठलाया नहीं,
वक्र ताल पर
ध्वनि-सिद्ध कोई गीत
गाया नहीं,
अलंकार-सज्जित पात्र में
रीति-बद्ध ढंग से
जीवन का रस
पीना नहीं आया !

मैंने
जीवन का व्याकरण
नहीं पढ़ा,
शायद,
इसीलिए —
निपुण विदग्धों के समकक्ष
जीना नहीं आया !


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(22) पुनर्वार
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मैं
एक वीरान बीहड़
जंगल में रहता हूँ,
अहर्निश
निपट एकाकीपन की
असह्य पीड़ा
सहता हूँ !

मैंने
यह यंत्राणा-गृह
कोई
स्वेच्छा से नहीं वरा,
मैंने
कभी नहीं चाहा
निर्लिप्त
निस्संग
जीवन का यह
जँगलेदार कठघरा !

जिसमें
शंकाओं से भरा
सन्नाटा जगता है,
जीना
अर्थ-हीन अकारण-सा
लगता है !

समय-असमय
जब दहक उठते हैं
मुझमें
हिंस्र पशुता के
अग्नि-पर्वत,
प्रतिशोध-प्रतिहिंसा के
लावा नद
जब लहक उठते हैं
आहत
क्षत-विक्षत
चेतना पर,
तब यह
वीरान बीहड़ जंगल ही
निरापद प्रतीत होता है !

(सचमुच
कितना बेबस
मानव के लिए
अतीत होता है !)

यह गुंजान वन
यह अकेलापन
मेरी विवशता है !
मुझे
विवशता की पीड़ा
सहने दो,

दहने दो,
दहने दो !

जंगल जल जाएंगे,
लौह-कठघरे गल जाएंगे !

मैं आऊंगा
फिर आऊंगा,
निज को विसर्जित कर
सामूहिक चेतना का अंग बन
अन्तहीन भीड़ में
मिल जाऊंगा !

स्व के दंश जहाँ
तिरोहित हो जाएंगे,
या अवचेतना की
अथाह गहराइयों में
सो जाएंगे !

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(23) प्रतिज्ञा-पत्र
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टूट
गिरने दो
पीड़ाओं के पहाड़
बार-बार
अमत्र्य व्यक्तित्व मैं
अविदलित रहूंगा !
आसमान पर
घिरने दो
वेगवाही
स्याह बदलियाँ,
गरजने दो
सर्वग्रही प्रचण्ड आँधियाँ
लौह का अस्तित्व मैं
अपराजित रहूंगा !

लक्ष-लक्ष
वृश्चिकों के
डंक-प्रहार,
उठने दो
अंग-अंग में
विष-दग्ध लहरें ज्वार
व्रतधर सहिष्णु मैं
अविचलित रहूंगा !

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(24) भले ही
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भले ही —
काटती हों
चेतना को,
दंश जैसी
ये तुम्हारी
डाह-संकेतक
उपेक्षा-बोधनी
दृग-भंगिमाएँ !

भले ही —
सालती हों
मर्म को
उपहास-प्रेरित
ये तुम्हारी
अग्नि-शर-व्यंग्योक्तियों की
क्रूर-धर्मी यातनाएँ !
सामने प्रस्तुत
विकर्षण-युक्त प्रतिमाएँ !
इन्हें पहचानता हूँ,
आदि से इतिहास इनका
जानता हूँ।
है सही उपचार इनका
पास मेरे,
कुछ नहीं बनता-बिगड़ता
आज यदि
ठहरी रहें ये
क्षितिज घेरे !

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(25) स्व-रुचि
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फोटो में मुझे
अपनी शक़्ल नहीं भायी !
मैंने पुनः
बड़े उत्साह से
अपने चित्र खिँचवाये —
भिन्न-भिन्न पोज़ दिये,
फोटोग्राफ़र के संकेतों पर
गम्भीरता कम कर मुसकराया भी,
चेहरे पर भावावेश लाया भी,
पर पुनः मुझे उन फोटुओं में भी
अपनी शक़्ल नहीं भायी,
तनिक भी स्व-रुचि को
रास नहीं आयी !

पर, क्या वे शक्लें
मेरी नहीं ?
क्या वे बहुरंगी पोज़
मेरे नहीं ?

वस्तुतः
हम फोटो में यथार्थ आकृति नहीं,
अपने सौन्दर्य-बोध के अनुरूप
अपने को चित्रित देखना चाहते हैं,
अपने ऐबों को
गोपित या सीमित देखना चाहते हैं !


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(26) टूटा व्यक्तित्व
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बचपन में
किसी ने यदि —
न देखा
स्नेह-संचित दृष्टि से
अति चाव से,
और पुचकारा नहीं
भर अंक
वत्सल-भाव से,
तो व्यक्ति का व्यक्तित्व
निश्चित
टूटता है।

यौवन में
नहीं यदि —
पा सका कोई
प्रणयिनी
संगिनी का
प्रेम :
निश्छल
एकनिष्ठ
अनन्य !
जीवन —
शुष्क
बोझिल
मरुस्थल मात्र
तृष्णा-जन्य !
तो उस व्यक्ति का व्यक्तित्व
अन्दर और बाहर से
बराबर
टूटता है।
वृद्ध होने पर
नहीं देती सुनायी
यदि —
प्रतिष्ठा-मान की वाणी,
न सुनना चाहता कोई
स्व-अनुभव की कहानी,
मूक
इस अन्तिम चरण पर
व्यक्ति का व्यक्तित्व
सचमुच,
चरमराता है
सदा को
टूट जाता है !

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(27) जीवनी
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चित्र जो
अतीत धुन्ध में
समा गया —
उसे
पुनः-पुनः उरेहना।

जो बिखर गया
जगह-जगह
व्यतीत राह पर —
उसे
विचार कर समेटना।

जो समाप्त-प्राय —
बार-बार
चाह कर
उसे सहेजना।
रीति-नीति
काव्य की नहीं !

जीवनी :
विगत प्रवाह,
जी चुके।
काव्य :
वर्तमान
वेगवान
जी रहे।

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(28) अंध-काल
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सावधान पहरुओ !
सावधान !

छा रहे अनेक दैत्य
छीनने स्वतंत्रता मनुष्य की,
वेगवान अंधकार
लीलने किरण-किरण भविष्य की,
सावधान सैनिको !
सावधान !

आज घिर रहीं प्रगाढ़
रक्त-वर्षिणी भयान बदलियाँ,
व्योम में कड़क रहीं
विनाशिनी अधीर क्रूर बिजलियाँ,

विश्व-शान्ति रक्षको !
सावधान !

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(29) आओ जलाएँ
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आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !

नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
भुवन-भाविनी भावनाएँ !

नहीं हो परस्पर विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता
आओ मिटाएँ
दलन-दानवी-दासताएँ !

कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों न नभ पर प्रभंजन
आओ बहाएँ
अधम आसुरी आपदाएँ !

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(30) समता का गान
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मानव-समता के रंगों में
आज नहा लो !

सबके तन पर, मन पर है जिन
चमकीले रंगों की आभा,
उन रंगों से आज मिला दो
अपनी मंद प्रकाशित द्वाभा,
युग-युग संचित गोपन कल्मष
आज बहा लो !

भूलो जग के भेद-भाव सब
वर्ण-जाति के, धन-पद-वय के,
गूँजे दिशि-दिशि में स्वर केवल
मानव महिमा गरिमा जय के,
मिथ्या मर्यादा का मद-गढ़
आज ढहा दो !

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(31) होली
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नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली !

आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली,
छायी, निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली !

रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली,
अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली !

उर मे बरबस आसव री ढाल गयी होली,
देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली !

स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली,
होकर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

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(32) विश्व-श्री
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देश-देश की स्वतंत्रता अमर रहे !

प्राण से अधिक
अपार प्रिय हमें स्वतंत्रता,
देश-प्रेम के लिए
कहीं नियत न अर्हता,
लोक-तंत्र-भावना सदा प्रखर रहे !

विश्व के असंख्य जन
अभेद्य हैं, समान हैं,
भाव एक हैं, यदपि
अनेक राष्ट्र-गान हैं,
साम्य-कामना ज्वलंत प्रति प्रहर रहे !

त्याज्य : जो मनुष्य की
मनुष्यता दहन करे,
ग्राह्य : जो उदार
मानवीयता वहन करे,
सर्व-धर्म-प्रेम की प्रवह लहर रहे !

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(33) जनतंत्र-आस्था
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जनतंत्र के उद्घोष से गुंजित दिशाएँ !

आज जन-जन अंग शासन का,
बढ़ गया है मोल जीवन का,
स्वाधीनता के प्रति समर्पित भावनाएँ !

अब नहीं तम सर उठाएगा,
ज्याति से नभ जगमगाएगा,
उद्देश्य-प्रेरित दृढ़ हमारी धारणाएँ ।

मूक होगी रागिनी दुख की,
मूर्त होगी कामना सुख की,
अब दूर होंगी हर तरह की विषमताएँ !



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(34) गणतंत्र-स्मारक
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गणतंत्र-दिवस की स्वर्णिम
किरणों को मन में भर लो !

आलोकित हो अन्तरतम,
गूँजे कलरव-सम सरगम,
गणतंत्र-दिवस के उज्ज्वल
भावों को मधुमय स्वर दो !

आँखों में समता झलके,
स्नेह भरा सागर छलके,
गणतंत्र-दिवस की आस्था
कण-कण में मुखरित कर दो !

पशुता सारी ढह जाये,
जन-जन में गरिमा आये,
गणतंत्र-दिवस की करुणा-
गंगा में कल्मष हर लो !

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(35) प्रण
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मानवी गरिमा सदा रक्षित-प्रतिष्ठित हो
प्रण हमारा !

भाग्य-निर्माता स्वयं हों हम,
शक्ति जनता की नहीं हो कम,
व्यक्ति की स्वाधीनता अपहृत न किंचित हो
प्रण हमारा !

एकता के सूत्र में बँधकर,
अग्रसर हों सब प्रगति-पथ पर,
धर्म-भाषा-वर्ण पर कोई न लांछित हो
प्रण हमारा !

दूर हो अज्ञान-निर्धनता
वर्ग-अन्तर-मुक्त मानवता,
अर्थ-अर्जित कुछ जनों तक ही न सीमित हो
प्रण हमारा !

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रचना-काल : सन् 1967-1971
प्रकाशन-वर्ष : सन् 1977
प्रकाशक : प्रबुद्ध भारती प्रकाशन, ग्वालियर, . प्र.
सम्प्रति उपलब्ध : 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' [खंड : 3],
महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड : 3] में

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