गुरुवार, 1 जुलाई 2010

डॉ0 महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह ------ जीने के लिए

डॉ0 महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह ------ जीने के लिए



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कविताएँ
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1 जीने के लिए
2 आग्रह
3 शुभैषी
4 कामना
5 कविता-प्रार्थना
6 धर्म
7 गौरैया
8 पहचान
9 आतंक के घेरे में
10 धर्मयज्ञ
11 आरज़ू
12 सन् 1986 . में
13 अग्नि-परीक्षा
14 नये इंसानों से
15 दूसरा मन्वन्तर
16 इतिहास-सृष्टाओ !
17 दरिद्र-नारायण
18 माहौल
19 विजय-विश्वास
20 मंत्र
21 चरम-बिन्दु
22 महत्त्वपूर्ण
23 अनुवाद: एक सेतु
24 भवन
25 मुक्ति-बोध (1)
26 मुक्ति-बोध (2)
27 उमंग
28 सम्मोहन
29 अननुभूत: अस्पर्शित
30 अतृप्ति-भेंट
31 इतवार का एक दिन
32 वास्तविकता
33 लाचारी
34 विरुद्ध
35 कृतकार्य
36 विश्लेषण
37 उपलब्धि
38 एक साध: अधूरी
39 कृतज्ञता
40 अपूर्ण


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(1) जीने के लिए
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दहशत दिशाओं में
हवाएँ गर्म
गंधक से, गरल से;

किन्तु मंज़िल तक
थपेड़े झेलकर
अविराम चलना है !

शिखाएँ अग्नि की
सैलाब-सी
रह-रह उमड़ती हैं ;

किन्तु मंज़िल तक
चटख कर टूटते शोलों-भरे
वीरान रास्तों से
गुज़रना है,
तपन सहना
झुलसना और जलना है !

सुरंगें हैं बिछी
बारूद की
चारों तरफ़
नदियों पहाड़ों जंगलों में ;

किन्तु मंज़िल तक
अकेले
खाइयों को ; खंदकों को
लौह के पैरों तले
हर बार दलना है !

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(2) आग्रह
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आदमी को
मत करो मजबूर !
इतना कि
बेइंसाफ़ियों को झेलते —
वह जानवर बन जाय !
या
बेइंतिहा
दर्द की अनुभूतियों को भोगते —
वह खण्डहर बन जाय !

आदमी को
मत करो मज़बूर
इतना कि उसको
ज़िन्दगी
लगने लगे
चुभता हुआ
रिसता हुआ
नासूर !
आदमी को
मत करो
यों
इस क़दर मजबूर !

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(3) शुभैषी
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बद्दुआओं का
असर होता अगर ;
वीरान
यह आलम
कभी का
हो गया होता !

जाग उठता
हर क़दम पर
आदमी का दर्प-दुर्वासा !
चिरन्तन
प्रेम का सोता
रसातल में
कभी का
खो गया होता !

कहाँ हो तुम
पुनीत शकुन्तले !
अभिशाप की
जीवन्त पंकिल प्रतिक्रिया !
कहाँ हो तुम ?

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(4) कामना
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कभी तो ऐसा हो
कि हम
अपने को ऊँचा महसूस करें,
भले ही
चंद लमहों के लिए।

कभी तो ऐसा हो
कि जी सकें हम
ज़िन्दगी सहज
कृत्रिम मुसकान का
मुखौटा उतार कर,
बेहद तरस गया है
आदमी
सच्चे क़हक़हों के लिए !

कभी तो हम
रू-ब-रू हों
आत्मा के विस्तार से,
कितना तंग-दिल है
आदमी
अपरिचित
परोपकार से !

अंधकार भरे मन में
कभी तो
विद्युत कौंधे !
बड़ा महँगा
हो गया है
रोशनी का मोल ;
अदा कर रहा
हर आदमी
एकमात्र कृपण महाजन का
मसख़रा रोल !

कभी तो हम
तिलांजलि दें
अपने बौनेपन को
अपने ओछेपन को,
और अनुभव करें
शिखर पर पहुँचने का उल्लास !
कभी तो हो हमें
भले ही
चंद लमहों के लिए,
ऊँचे होने का अहसास !

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(5) कविता-प्रार्थना
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आदमी को
आदमी से जोड़ने वाली,
क्रूर हिंसक भावनाओं की
उमड़ती आँधियों को
मोड़ने वाली,
उनके प्रखर
अंधे वेग को — आवेग को
बढ़
तोड़ने वाली
सबल कविता —
ऋचा है, / इबादत है !
उसके स्वर
मुक्त गूँजें आसमानों में,
उसके अर्थ ध्वनित हों
सहज निश्छल
मधुर रागों भरे
अन्तर-उफ़ानों में !

आदमी को
आदमी से प्यार हो,
सारा विश्व ही
उसका निजी परिवार हो !

हमारी यह
बहुमूल्य वैचारिक विरासत है !
महत्
इस मानसिकता से
रची कविता —
ऋचा है, इबादत है !

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(6) धर्म
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प्यार करना
ज़िन्दगी से: जगत से
आदमी का धर्म है !

प्यार करना
मानवों से
मूक पशुओं पक्षियों जल-जन्तुओं से
वन-लताओं से
द्रुमों से
आदमी का धर्म है !

प्यार करना
कलियों और फूलों से
विविध रंगों-सजी-सँवरी
तितलियों से
आदमी का धर्म है !

प्यार करना
इन्द्रजालों से रचे
अद्भुत
विशृंखल-सूत्र
सपनों से,
मधुरतम कल्पनाओं में
गमन करती
सुकोमल-प्राण परियों से
आदमी का धर्म है !

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(7) गौरैया
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गौरैया
बड़ी ढीठ है,
सब अपनी मर्ज़ी का करती है,
सुनती नहीं ज़रा भी
मेरी,
बार-बार कमरे में आ
चहकती है ; फुदकती है,
इधर से भगाऊँ
तो इधर जा बैठती है,
बाहर निकलने का
नाम ही नहीं लेती !
जब चाहती है
आकाश में
फुर्र से उड़ जाती है,
जब चाहती है
कमरे में
फुर्र से घुस आती है !
खिड़कियाँ-दरवाजें बंद कर दूँ ?
रोशनदानों पर गत्ते ठोंक दूँ ?
पर, खिड़कियाँ-दरवाज़े भी
कब-तक बंद रखूँ ?
इन रोशनदानों से
कब-तक हवा न आने दूँ ?
गौरैया नहीं मानती।

वह इस बार फिर
मेरे कमरे में
घोंसला बनाएगी,
नन्हें-नन्हें खिलौनों को
जन्म देगी,
उन्हें जिलाएगी.... खिलाएगी !

मैंने बहुत कहा गौरैया से —
मैं आदमी हूँ
मुझसे डरो
और मेरे कमरे से भाग जाओ !

पर, अद्भुत है उसका विश्वास
वह मुझसे नहीं डरती,
एक-एक तिनका लाकर
ढेर लगा दिया है
रोशनदान के एक कोने में !

ढेर नहीं,
एक-एक तिनके से
उसने रचना की है प्रसूति-गृह की।
सचमुच, गौरैया !
कितनी कुशल वास्तुकार हो तुम,
अनुभवी अभियन्ता हो !
यह घोंसला
तुम्हारी महान कला-कृति है,
पंजों और चोंच के
सहयोग से विनिर्मित,
तुम्हारी साधना का प्रतिफल है !
कितना धैर्य है गौरैया, तुममें !

इस घोंसले में
लगता है —
ज़िन्दगी की
तमाम ख़ुशियाँ और बहारें
सिमट आने को आतुर हैं !

लेकिन ; यह —
सजावट-सफ़ाई पसन्द आदमी
सभ्य और सुसंस्कृत आदमी
कैसे सहन करेगा, गौरैया
तुम्हारा दिन-दिन उठता-बढ़ता नीड़ ?
वह एक दिन
फेंक देगा इसे कूडे़दान में !

गौरैया ! यह आदमी है
कला का बड़ा प्रेमी है, पारखी है !
इसके कमरे की दीवारों पर
तुम्हारे चित्र टँगे हैं !
चित्र —
जिनमें तुम हो,
तुम्हारा नीड़ है,
तुम्हारे खिलौने हैं !

गौरैया ! भाग जाओ,
इस कमरे से भाग जाओ !
अन्यथा ; यह आदमी
उजाड़ देगा तुम्हारी कोख !
एक पल में ख़त्म कर देगा
तुम्हारे सपनों का संसार !

और तुम
यह सब देखकर
रो भी नहीं पाओगी।
सिर्फ़ चहकोगी,
बाहर-भीतर भागोगी,
बेतहाशा
बावली-सी / भूखी-प्यासी !

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(8) पहचान
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इन अट्टालिकाओं का
गगन-चुम्बी
कला-कृत
इन्द्र-धनुषी
स्वप्न-सा
अस्तित्व
कितना घिनौना है
हमें मालूम है !

इनकी ऊँचाइयों का रूप
कितना
क्षुद्र, खंडित और बौना है
हमें मालूम हैं !

परियों-सी सजी-सँवरी
इन अंगनाओं का
अवास्तव छद्म आकर्षण
कितना सुशोभन है
हमें मालूम है !

गौर-वर्णी
कमल-पंखुरियाँ छुअन
कितनी
सुखद, कोमल व मोहन है
हमें मालूम है !

परिचित हम
सुगन्धित रस-भरे
इन स्निग्ध फूलों की
चुभन से,
कामना-दव से
दहकती
देह की आदिम जलन से,
वासना-मद से
महकती
देह की आदिम तपन से,
इनका बिछौना
कितना सलोना है
हमें मालूम है !

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(9) आतंक के घेरे में
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एक बहुत बड़ी और गहरी
साज़िश की गिरफ़्त में है देश !

चालाक और धूर्त गिरोहों के
चंगुल में फँसा
छद्म धर्म और बर्बर जातीयता के
दलदल में धँसा,
एक बहुत बड़ी और घातक
जहालत में है देश !

आत्मीय रिश्तों का पक्षधर
दोस्ती के
सपनों व अरमानों का घर,
एक बहुत बड़ी और भयावह
दहशत में है देश !

संलग्न
सभ्य और नये इंसानों की अवतारणा में,
संलग्न
शांति और अहिंसा की
कठिनतम साधना में,
एक बहुत बड़ी और भारी
मुसीबत में है देश !

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(10) धर्मयज्ञ
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आधुनिक विश्व में
‘धर्म’ के नाम पर
कैसा जुनून है ?
सभ्य प्रदेशों में
ज़िन्दा
बर्बर ‘कानून’ है,
सर्वत्र —
ख़ून-ही-ख़ून है !

नये इंसानो !
बेहतर की कामना करो,
धर्म के ठेकेदारों का
सामना करो !
विकृत धर्मों की
खुलकर अवमानना हो
(चाहे व्यापक विनाश सम्भावना हो।)

मनुष्य — मनुष्य है,
पशु नहीं !
उसे प्रबोध दो,
वह समझेगा, सँभलेगा, बदलेगा !

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(11) आरज़ू
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कितना अच्छा होगा
जब दुनिया में सिर्फ़ रहेंगे
ईश्वर से अनभिज्ञ,
प्राणी-प्राणी प्रेम-प्रतिज्ञ !

फिर
ना मंदिर होंगे, ना मसजिद
ना गुरुद्वारे, ना गिरजाघर !

कितनी होगी हैरत !
मारेगा कौन किसे ?
फिर कौन करेगा नफ़रत ?
सिर्फ़ मुहब्बत होगी,
होगी गै़रत !
सब ‘तनखैया’ होंगे,
भैया-भैया होंगे !

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(12) सन् 1986 . में
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इसने
उसको
भून दिया
गोली से;

क्योंकि
भिन्न था
वह
बोली से !

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(13) अग्नि-परीक्षा
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काली भयानक रात,
चारों ओर
झंझावात,
पर, जलता रहेगा —
दीप...
मणिदीप
सद्भाव का,
सहभाव का !
उगती जवानी
देश की
होगी नहीं गुमराह !
उजले देश की
जाग्रत जवानी
लक्ष्य युग का भूल
होगी नहीं गुमराह
तनिक तबाह !

मिटाना है उसे —
जो कर रहा हिंसा,
मिटाना है उसे —
जो धर्म के उन्माद में
फैला रहा नफ़रत,
लगाकर घात
गोली दाग़ता है
राहगीरों पर
बेक़सूरों पर !
मिटाना है उसे —
जिसने बनायी ;
धधकती बारूद-घर
दरगाह !
इन गंदे इरादों से
नये युग की जवानी
तनिक भी
होगी नहीं गुमराह !

चाहे रात काली और हो,
चाहे और भीषण हों
चक्रवात-प्रहार,
पर,
सद्भाव का: सहभाव का
ध्रुव-दीप / मणि-दीप
निष्कम्प जलता रहेगा !
साधु जीवन की
सतत साधक जवानी
आधुनिक,
होगी नहीं गुमराह !

भले ही
वज्रवाही बदलियाँ छाएँ,
भले ही
वेगवाही आँधियाँ आएँ,
सद्भावना का दीप
सम्यक् धारणा का दीप
संशय-रहित हो
अविराम / यथावत्
जलता रहेगा !
एक पल को भी
न टूटेगा
प्रकाश-प्रवाह !
विचलित हो,
नहीं होगी
जवानी देश की
गुमराह !

उभरीं विनाशक शक्तियाँ
जब-जब,
मनुजता ने
दबा कुचला उन्हें
तब-तब !

अमर —
विजय विश्वास !
इतिहास
चश्मदीद गवाह !
जलती जवानी देश की
होगी नहीं गुमराह !

एकता को
तोड़ने की साज़िशें
नाकाम होंगी,
हम रहेंगे
एक राष्ट्र अखंड
शक्ति प्रचंड !

सहन
हरगिज़ नहीं होगा
देश के प्रति
छल-कपट विश्वासघात
गुनाह !
मेरे देश की
विज्ञान-आलोकित जवानी
अंध-कूपों में
कभी होगी नहीं गुमराह !

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(14) नये इंसानों से
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पहले
सोचते हैं हम
अपने घर-परिवार के लिए।

फिर —
अपने धर्म
अपनी जाति
अपने प्रांत
अपनी भाषा, और
अपनी लिपि के लिए !

आस्थाएँ: संकुचित।
निष्ठाएँ: सीमित परिधि में कै़द।

हम अपने इस सोच की
रक्षा के लिए
मानव-रक्त की
नदियाँ बहा देते हैं,
पड़ोसियों को
गोलियों से भून देते हैं,
वहशी बन जाते हैं
आदमख़ोर हिंस्र
जानवर से भी अधिक,
भयानक शक़्ल
धारण कर लेते हैं !
हमारे ‘महान’ और ‘शहीद’ बनने का
एक मात्र रास्ता यही है !

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
यह सोच
हमारी चेतना का
अंग बन चुका है,
हम इससे मुक्त नहीं हो पाते !

बार-बार हमारा ईश्वर
हमें उकसाता है —
हम दूसरों के ईश्वरों की
हत्या कर दें
उनके अस्तित्व चिन्ह तोड़ दें
और स्वर्ग का स्थान
केवल अपने लिए
सुरक्षित समझें।

साक्षी है इतिहास
कि देश हमें नहीं दिखता,
विश्व-मानवता का लिबास
हमें नहीं फबता।

इस पृथ्वी पर मात्र
हम रहेंगे —
हमारे धर्म वाले
हमारी जाति वाले
हमारे प्रांत वाले
हमारी ज़बान वाले
हमारी लिपि वाले,
यही हमारा देश है,
यही हमारा विश्व है !

कौन तोड़ेगा
इस पहचान को ?
ख़ाक करेगा
इस गलीज़ जहान को ?
नये इंसानो !
आओ, क़रीब आओ
और मानवता की ख़ातिर
धर्म-विहीन, जाति-विहीन
समाज का निर्माण करो
देशों की
भौगोलिक रेखाएँ मिटा कर !
विभिन्न भाषाओं
विभिन्न लिपियों को
मानव-विवेक की
उपलब्धि समझो !
नये इंसानो !
अब चुप मत रहो
तटस्थ मत रहो !

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(15) दूसरा मन्वन्तर
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भविष्य वह
आएगा कब
जब —
मनुष्य कहलाएगा
मात्रा ‘मनुष्य’ !
उसकी पहचान
जुड़ी रहेगी कब-तलक
देश से
धर्म से
जाति-उपजाति से
भाषा-विभाषा से
रंग से
नस्ल से ?

मनुष्य के मौलिक स्वरूप को
किया जाएगा रेखांकित कब ?
मनुष्य को
‘मनुष्य’ मात्र
किया जाएगा लक्षित कब ?

उसका लोक एक है
उसकी रचना एक है
उसकी वृत्तियाँ एक हैं
उसकी आवश्यकताएँ एक हैं,
उसका जन्म एक है
उसका अन्त एक है

मनुष्य का विभाजन
कब-तलक
किया जाता रहेगा ?
वह आख़िर कब-तलक
बर्बर मन की
चुभन-शताब्दियाँ सहेगा ?

तोड़ो —
देशों की कृत्रिम सीमा-रेखाओं को,
तोड़ो —
धर्मों की
असम्बद्ध - अप्रासंगिक,
दक़ियानूस
आस्थाओं को,
तोड़ो —
जातियों-उपजातियों की
विभाजक व्यवस्थाओं को।

अर्जित हैं
भाषाओं-विभाषाओं की भिन्नताएँ,
प्रकृति नियंत्रित हैं
रंगों-नस्लों की
बहुविध प्रतिमाएँ !

ये सब
मानव को मानव से
जोड़ने में
बाधक न हों,
ये सब
मानव को मानव से
तोड़ने में
साधक न हों !

अवतरित हो
नया देवदूत, नया पैग़म्बर, नया मसीहा
इक्कीसवीं सदी का
महान मानव-धर्म
प्रतिष्ठित हो,
अन्य लोकों में पहुँचने के पूर्व
मानव की पहचान
सुनिश्चित हो !

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(16) इतिहास-सृष्टाओ!
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इंसान की तक़दीर को
बदले बिना —
इंसान जो
अभिशप्त है : संत्रस्त है
जीवन-अभावों से !
इंसान जो
विक्षत प्रताड़ित क्षुब्ध पीड़ित
यातनाओं से, तनावों से !
उस दुखी इंसान की
तक़दीर को बदले बिना ;
संसार की तसवीर को
बदले बिना —
संसार जो
हिंसा, विगर्हित नग्न पशुता ग्रस्त,
रक्त-रंजित,
क्रूरता से युक्त
घातक अस्त्र-बल-मद-मस्त !
उस बदनुमा संसार की
तसवीर को बदले बिना ;
इतिहास-द्रष्टाओ !
सुखद आरामगाहों में
तनिक सोना नहीं, सोना नहीं !
संघर्ष-धारा से विमुख
होना नहीं, होना नहीं !

हर भेद की प्राचीर को
तोड़े बिना,
पैरों पड़ी ज़ंजीर को
तोड़े बिना,
इतिहास-सृष्टाओ !
सतत श्रम-साध्य
निर्णायक विजय-अवसर
अरे, खोना नहीं, खोना नहीं ।

इंसान की तक़दीर को
बदले बिना,
संसार की तसवीर को
बदले बिना,
सोना नहीं, सोना नहीं !

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(17) दरिद्र-नारायण
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दो जून
रोटी तक जुटाने में
नहीं जो कामयाब,
ज़िन्दगी
उनके लिए —
क्या ख़ाक होगी ख़्वाब !
कोई ख़ूबसूरत ख़्वाब !
उनके लिए तो
ज़िन्दगी —
बस,
कश-म-कश का नाम,
दिन-रात
पिसते और खटते
हो रही उनकी
निरन्तर
उम्र तमाम !

वंचित
उच्चतर अनुभूतियों से जो —
भला उनके लिए
संस्कृति-कला का
अर्थ क्या ?
उपयोग क्या ?

सब व्यर्थ !
(जो न समर्थ।)
यद्यपि; सतत श्रम-रत;
किन्तु जीवन-भर
निराश-हताश !
जिनके पास
थोड़ा चैन करने को
नहीं अवकाश !

उनके लिए है
नृत्य-नाटक-काव्य के
सारे प्रदर्शन,
दूरदर्शन
व्यंग्य मात्र !
वे - केवल हमारे
खोखले ओछे अहं के
तुष्टि-पूरक-पात्र !
पहले चाहिए उन्हें —
शोषण-मुक्ति,
महिमा-युक्त गरिमा,
मान की सम्मान की रोटी,
सुरक्षा और शिक्षा !
चाहिए ना एक कण भी
राज्य की या व्यक्ति की
करुणा, दया, भिक्षा !

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(18) माहौल
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देश के असली खेवनहार
नेता अफ़सर ठेकेदार !
सारी दौलत के हक़दार,
राष्ट्र-भक्त झण्डाबरदार !
इनकी तिकड़म का संसार
करदे शासन को लाचार,
हमको तुमको बे-घरबार
ये मशहूर बड़े बटमार !
दुष्टाचारी हैं मक्कार,
है धिक्कार इन्हें धिक्कार !
.....
गूँजी किसकी यह ललकार —
जागी जनता, भागो यार !

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(19) विजय-विश्वास
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लड़ाई हमारी
अधूरी रहेगी नहीं,
बीच में ही
रुकेगी नहीं
जो —
मेहनतकश सबल साहसिक शूर है
नाम: ‘मज़दूर’ है

उसकी लड़ाई
अन्तिम विजय तक
थमेगी नहीं !
और होगी कड़ी
और होगी बड़ी,
संसार में
फैलती जायगी यह
लगातार !
बर्बर दमन से
कभी ख़त्म होगी नहीं,
कमज़ोर धीमी
पड़ेगी नहीं !

आश्वस्त हम —
यह युद्ध
शोषण-विरुद्ध,
अवरुद्ध होगा नहीं !

हर रुकावट
मिटाकर,
लड़ाई हमारी
सतत
भय-मुक्त
जारी रहेगी !
रुकेगी नहीं !

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(20) मंत्र
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स्थापित हो
समता
मानव-मानव में समता
युग-युग वांछित-इच्छित समता !

प्रजाति-जाति-वर्ण-धर्म मुक्त
हो मनुष्य-लोक,
हो नहीं
मनुष्य के मिलाप में
भेद-भाव, रोक-टोक !
पहचान मनुज की
मात्र एक —
मानव तन, मानव मन।
अनुभव-चिन्तन से
उपजे विवेक
पहचान मनुज की
मात्र एक।

अवतरित हो
ममता
मानव-मानव में ममता
मादक मादन मायल ममता।
ध्वस्त करो
अन्धी पौराणिकता
मानव-मानव के प्रति पाशविकता।

मानव ! मत भटको अब,
कल्पित भाग्य-विधानों पर
मानव ! मत अटको अब।

मूरखता, मूरखता, मूरखता।
केवल वंचकता, वंचकता।
इससे मुक्त करो
जीवन और मनुज को,
धृष्ट-दुष्ट
धर्मध्वजियों धूर्तों से
रक्षित हो मानवता।
हो सदा-सदा को दूर
विषमता,
जागे दलितों में
अपराजित अद्भुत क्षमता।
स्थापित हो
इंसानी दुनिया में
ख़ुशहाली
माली समता,
सामूहिक सामाजिक
गौरवशाली समता।

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(21) चरम-बिन्दु
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एक लमहा
फ़र्क है —
होने,
न होने में !
बहुत सूक्ष्म सीमा है
अस्तित्व
और
अनस्तित्व के मध्य,
फ़र्क है
सिर्फ़ रेखा भर
हँसने
और रोने में !

बहुत सूक्ष्म अन्तर है
अभिव्यक्ति में
अन्तःकरण की !
सम्भव नहीं है
खींचना सरहद
जनम की, मरण की !

स्थितियाँ —
समतुल्य हैं लगभग !
युग-युग सँजोयी साध
कब किस क्षण अचानक
मूर्त हो जाए ;
अमूर्त हो जाए ;
एक पल झपकी
बहुत है
पाने और खोने में !
एक लमहा
फ़र्क है —
होने;
न होने में !

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(22) महत्त्वपूर्ण
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चीजें —
कोई रूप-स्वरूप तो लें,
आख़िर कोई तो रूप लें !
हम पहुँचे तो सही
(ग़लत या सही)
किसी नतीज़े पर,
किसी घर.....दर
किसी ठिकाने भर !

यों वियाबान में
कब-तक भटकेंगे ?
यों आग की भट्ठी में
कब-तक
तरल-तरल तड़पेंगे ?
चीजें —
कोई शक़्ल तो लें !
आखि़र कोई तो शक़्ल लें !

मंसूबों की रेखाएँ —
स्पष्ट या धुँधला
कोई आकार-चिन्ह लें तो
आख़िर, कोई आकार-चिन्ह तो लें !
कि हम जान सकें
दिशाएँ
दूरियाँ
विस्तार !

विचार —
अमूर्त विचार साकार तो हों,
चिन्तन-लोक की गहराइयों में
किसी तरह तो हों साकार
अमूर्त विचार,
कि हम बना सकें दिमाग़
और पहना सकें
उन्हें
कोई भाषा-प्रारूप।
कहीं से
कोई तो रोशनी की किरन फूटे
अन्धकार तो छँटे
और हम अन्ध-कूप से

आएँ बाहर,
कम-से-कम बाहर तो आएँ,
चीजें —
रंग-रूप तो लें
हवा-धूप तो लें !
चीजें —
कोई रूप-स्वरूप तो लें !

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(23) अनुवाद: एक सेतु
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अनुवाद
मात्र भाषान्तर नहीं
वह सेतु है !

एक मन को दूसरे से
जोड़ने का,
परस्पर अजनबीपन
तोड़ने का !

विश्व-मानव के
शिथिल सम्बन्ध-सूत्रों को
पिरोने और कस कर बाँधने का,
आत्म-हित में
दृढ़ अटूट प्रगाढ़
मैत्री साधने का !

अनुवाद —
साधन है
देशान्तरों के - व्यक्तियों के
बीच निर्मित
अतल गहराइयों में
पैठने का,
निःशंक हो
द्विविधा रहित
मिल बैठने का।

लाखों-करोड़ों मानवों के मध्य
सह-संवाद है
अनुवाद।
अनजान मानव-लोक के
बाहर व भीतर व्याप्त
गहरे अँधेंरे का
दमकती रोशनी में
सफल रूपान्तर।
नहीं है
मात्र भाषान्तर !

माध्यम है —
अपरिचय को
गहन आत्मीयता में बदलने का,
हर संकीर्णता से मुक्त हो
बाहर निकलने का !
सभ्यता-संस्कार है !
अनुवाद !

भाषिक चेतना का
शक्त एक प्रतीक है,
सम्प्रेषण विधा का
एक रूप सटीक है !
अनुवाद —
मानव-विवेक
प्रतिष्ठ सार्थक
केतु है !
अनुवाद —
मात्र भाषान्तर नहीं;
वह सेतु है !

----------------------------------
(24) भवन
----------------------------------

कुएँ की दीवारों जैसा
ऊँचा परकोटा,
सँकरे-सँकरे गलियारों जैसा
हर कमरा छोटा,
जिसमें,
ना उपवन
ना आँगन
आधुनिक वास्तु-कला का अंकन ?
या
संकुचित हृदय की
प्रतिकृति,
स्वकेन्द्रित मन का
दर्पण !

----------------------------------
(25) मुक्ति-बोध (1)
----------------------------------

लगता है,
बहुत कुछ बदला हुआ !
नया-नया !
लगता है,
बरसों का चढ़ा जुआ
सहसा उतर गया !
बरसों से,
लम्बी सँकरी
कँकरीली-पथरीली
अनइच्छित सड़कों से
तन पर, मन पर
भारी बोझा ढोते
गुज़रता रहा,
नट की तरह
रोज़-रोज़
एक ही खम्भे पर
चढ़ता-उतरता रहा !

शुक्र है,
अब मुक्त हूँ
हवा की तरह,
कहीं भी जाऊँ,
उडूँ, नाचूँ, गाऊँ !

शुक्र है,
उन्मुक्त हूँ,
लहर की तरह !
जब चाहूँ -
लहराऊँ — बल खाऊँ,
चट्टानों पर लोटूँ
पहाड़ियों से कूदूँ
वनस्पतियों पर बिछलूँ,
दौडूँ
बेतहाशा दौडूँ
या
किसी सरोवर में पसर जाऊँ,
बूँद-बूँद बिखर जाऊँ !

मुक्त हूँ,
कुछ इस तरह
जैसे कि
पिँजरे का द्वार
अचानक खुल जाए
पंख फड़फड़ाता तोता
दूर आकाश में उड़ जाए,
हम-उम्र हमजोलियों में मिल जाए,
हम-ख़्वाबा के साथ खेले
उसे आगोश में ले ले
नोचे चूमे !
जो चाहे
जब चाहे
बोले —
ऊँचे या धीमे
आतुर या हौले !

लगता है —
बरसों के लिपटे नागफाँस
कट गए,
ज़हरीली बारिश के मेघ
हट गए !
अब
चंदन-वृक्षों पर
कस्तूरी फूल खिलेंगे
मधुर-स्रवा-सम
फूलों के गुच्छ लगेंगे !
जो कभी हुआ नहीं
लगता है —
अब होगा !

क्योंकि —
बहुत-कुछ
दिखता है
नया - नया
बदला हुआ !

----------------------------------
(26) मुक्ति-बोध (2)
----------------------------------

अब
बेफ़िक्री से सोऊँगा,
बेफ़िक्री से टहलूँगा
‘जनक-ताल’ तक टहलूँगा,
अब नहीं होगी हड़बड़ी
तोड़ दी है हथकड़ी
हर कड़ी !

घंटों नहाऊँगा,
सुरे-बेसुरे
नाना गीत गा-गा कर
नहाऊँगा !

कहाँ हैं
मेरे
‘पाकीज़ा’ और गीतादत्त के रिकार्ड ?
रात के सन्नाटे में
बार-बार बजाऊँगा !
जब-तब गुनगुनाऊँगा !

ओ मेरे उपवन के पौधो !
तुम्हें अब कोई शिकायत नहीं होगी,
जी-भर देखूंगा
सींचूँगा
बाँहों में बाँधूँगा !
ओ कनेर, कचनार, अमरूद !
अब उदास मत रहो
ओ रजनीगंधा ! ओ बेला !
अब हताश मत रहो,
तुम्हारी गंध
रोम-रोम से अनुभूत होगी,
हर साँस जैसे
प्रसून-प्रसूत होगी !

अनजान में भी
अब नहीं रौंदूँगा
ओ मेरे उपवन की
सब्ज़ घास !
रहूंगा पास,
मख़मली तन पर लोटूंगा
आदिम कामना से भर,
सुकोमल हाथ फेरूंगा
ओ स्निग्ध रचना !
हो
प्रफुल्ल-वदना !
हर क्षण अपना है,
सच सपना है !

----------------------------------
(27) उमंग
----------------------------------

सान्ध्य काल
धूप-छाँह बीच,
गिर रही फुहार
रिमझिमा रहा
गगन !

बार-बार
द्वार थपथपा रहा
समय / अ-समय
किस क़दर
उतावला पवन !

दूर-पास
खेत हाट चौक में
अधीर
जान-बूझ
भीग-भीग
थरथरा रहा
प्रिया बदन !

----------------------------------
(28) सम्मोहन
----------------------------------

मधु-ऋतु
आगमन पर
बंधु,
इतराओ नहीं !
इतना भरोसा मत करो
मधु-ऋतु मोहिनी पर,
इस क़दर
धरती-गगन में झूम कर
उल्लास-रस गाओ नहीं !

अस्तित्व
इसकी सुरभि का
कुछ दिनों का,
भोग-अनुभव
कुछ क्षणों का !

मधु-ऋतु गंध पर
विश्वास कर
निर्भर नहीं इतना रहो
मन !
भावना की तीव्र धारों में
नहीं इतना बहो
मन !

यह अल्प-जीवी
बिखर कर
छितर जाएगी,
रख न पाओगे
तनिक भी
बाँध कर तुम !
यह मनोरम गंध
मधु-ऋतु की !
वस्तु —
लहराती हुई,
आकाश की ऊँचाइयाँ
छूती हुई,
उन्मुक्त अल्हड़
मंद शीतल वायु की
जुड़वाँ सहेली !

मत करो इच्छा
समझने-जानने की
गूढ़ उलझी जटिल और अबूझ
पहेली !

चेतना हत
भूल कर
होना न सम्मोहित,
समर्पित;
स्पर्श पा
मधुमास का,
उसकी सुखद
मधु-श्वास का !

----------------------------------
(29) अनुभूत: अस्पर्शित
----------------------------------

ओ,
लहकती बहकती
बसन्ती हवाओ !
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ !
अनुराग भर-भर
गुँजा फागुनी स्वर
न ठहरो
न गुज़रो
इधर से
बसन्ती हवाओ !

भटकती बहकती
बसन्ती हवाओ !
मुझे ना डुबाओ
उफ़नते उमड़ते
भरे पूर रस के
कुओं में, सरों में,
मधुर रास-रज के
कुओं में, सरों में,
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ।
ओ, बसन्ती हवाओ !
दहकती चहकती
बसन्ती हवाओ !

अभिशप्त
यह क्षेत्र वर्जित
सदा से,
न आओ इधर
यह विवश !
एक
सुनसान वीरान मन को
समर्पित
सदा से,
न आओ इधर
ओ, बसन्ती हवाओ !
गमकती खनकती
बसन्ती हवाओ !
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ !

तप्त प्यासे
कुओं में, सरों में
नहीं यों

भिगोओ मुझे !
इन
अवश अंग
युग-युग पिपासित
कुओं में, सरों में
नहीं यों
भिगोओ मुझे !

ओ, बसन्ती हवाओ !
मचलती छलकती
बसन्ती हवाओ !
छुओ मत मुझे
इस तरह
मत छुओ !
यह
अननुभूत ओझल अस्पर्शित
सदा से !
न आओ इधर
यह
उपेक्षित अदेखा अचीन्हा
सदा से !

----------------------------------
(30) अतृप्ति: भेंट
----------------------------------

अब
क्या दे सकता हूँ तुम्हें —
एक गढ़ी-बनी
स्थिर मूर्ति के सिवा !
बिखरी विभूति के सिवा !

जो हूँ
बन चुका हूँ
ढल चुका हूँ,
प्रदत्त कोश की अधिकांश साँसें
गिन चुका हूँ,
फल चुका हूँ !

अब नहीं मुमकिन —
प्रयोग बतौर
तोडूँ-तराशूँ और,
अधबना रह जाएगा,
शेष न कह पाएगा !

ज़िन्दगी के इस चरण पर
कमज़ोर कंधों पर उम्र के
उतरता-डूबता सूरज मैं
क्या दे सकता हूँ तुम्हें
ऊष्मा की
पहचानी मांसल अनुभूति के सिवा।

तुम हो
उफ़नते अतल सागर की तरह,
जलती धधकती वासनाएँ तुम्हारी
अनापे अम्बर की तरह,
तुम्हें क्या दे सकता हूँ भला
हे भाविनी,

कल्पना प्रभूति के सिवा,
उत्तेजना आपूर्ति के सिवा !

----------------------------------
(31) इतवार का एक दिन
----------------------------------

पूरा दिन
बीत गया इन्तज़ार में,
तमाम लोगों के इन्तज़ार में।

नहीं आया अप्रत्याशित भी,
नहीं टकराया अवांछित भी।

बीत गया
पूरा दिन,
लमहे-लमहे गिन।
इतवार इस बार का
नहीं लाया कोई समाचार
अच्छा या बुरा
रुचिकर या क्षुब्धकारक।

निरन्तर ऊहापोह में
गुज़र गया पूरा दिन।

इस या उस के
दर्शन की चाह में,
घूमते-टहलते
कमरों की राह में।

बस, सुबह-सुबह
आया अख़बार,
और दूध वाले ने
प्रातः - सायं बजायी घंटी
नियमानुसार।

अन्यथा कहीं कोई
पत्ता तक न खड़खड़ाया,
एक पक्षी तक
मेरे आकाश के इर्द-गिर्द
नहीं मँडराया।

बीत गया पूरा दिन
इन्तज़ार बन,
मूक लाचार बन।

----------------------------------
(32) वास्तविकता
----------------------------------

ज़िन्दगी ललक थी; किन्तु भारी जुआ बन गयी,
ज़िन्दगी फ़लक थी; किन्तु अंधा कुआँ बन गयी,
कल्पनाओं रची, भावनाओं भरी, रूप - श्री
ज़िन्दगी ग़ज़ल थी; बिफर कर बददुआ बन गयी !

----------------------------------
(33) लाचारी
----------------------------------

आरोपित अचाही ज़िन्दगी जी ली,
हरक्षण, हर क़दम शर्मिन्दगी जी ली,
हम से पूछते इतिहास अब क्या हो
दुनिया की जहालत गन्दगी जी ली !

----------------------------------
(34) विरुद्ध
----------------------------------

असलियत हम छिपाते रहे उम्र भर
झूठ को सच बताते रहे उम्र भर,
आप-बीती सुनायी, कहानी बता
दर्द में गुनगुनाते रहे उम्र भर !

----------------------------------
(35) ‘कृतकार्य
----------------------------------

जी, वाह ! क्या वाहवाही मिली,
ता-उम्र कोरी तबाही मिली,
दौलत बहुत, दर्द की, बच रही
सच, ज़िन्दगी भारवाही मिली !

----------------------------------
(36) विश्लेषण
----------------------------------

गँवाया ही गँवाया,
कुछ नहीं पाया,
ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया !
जो बच पाये
नुकीले शूल हैं,
जो उठा लाये
बेरंग बासी फूल हैं,
पास में
देखो धूल
कितनी धूल है !

राह पर
हर मोड़ पर,
घर में
या कि बाहर,
हाट में, बाज़ार में
विश्वास के हाथों
सदा लुटते रहे !
अपनों से
परायों से
हमेशा
छल-कपट की
तेज़ धारों की कटारों के तले
बेहद सरलता से
अरे, कटते रहे !
लोगों की
तमाम रची-बुनी
चतुराइयों-चालाकियों से
उनकी हीनताओं-क्षुद्रताओं से
बहुत चाहा —
बचना;
किन्तु
ओढ़ी सौम्यता शालीनता की
आरोपित मुखौटों की
कठिन
बेहद कठिन
पहचानना रचना !
उनके छद्म से बचना !

नहीं है शेष
कोई भी विरासत,
ढह गयी
जो
श्रम-पसीने से
बनायी थी इमारत !

----------------------------------
(37) उपलब्धि
----------------------------------

उछलती-कूदती
विपरीत
लहरों से
निरन्तर जूझते,
जीवन-मरण के बीच
अस्थिर झूलते,
दिन रात
कितनी कश-म-कश के बाद
कूल मिला !

धीरज से
कठिनतम साधना के बाद,
जीवन-सत्त्व-स्पन्दन भर
जड़ों को सींच
टटका
मुसकराता
एक
फूल खिला !

----------------------------------
(38) एक साध: अधूरी
----------------------------------

जी करता है
आज का दिन
ज़िन्दगी की कश-म-कश से
हटकर
बंद कमरे में
सोए-सोए गुज़ार दूँ !

न जाने
कितने बरसों से
निश्चिन्त बेख़बर हो
आदिम-राग का, अनुराग का
अहसास भर
सोया नहीं !

जी करता है
आज का दिन
निश्चेष्ट शिथिल चुप रह
चित्रमाला में अतीत की
खोए-खोए गुज़ार दूँ !
न जाने
कितने बरसों से
उजड़े गाँवों की राहों में
छूटे नगरों की बाँहों में
खोया नहीं !
जी करता है
आज का दिन
सारे वादे, काम, प्रतिज्ञाएँ
भूल कर
गंगा की लहरों-सी
तुम्हारी याद में
रोए-रोए गुज़ार दूँ !

न जाने
कितने बरसों से
तुम्हारी तसवीर से
रू-ब-रू हो
रोया नहीं !

----------------------------------
(39) कृतज्ञता
----------------------------------

छोड़ दो
यह ठोर
मन !
किसका इन्तज़ार यहाँ
अब और
मन !
ढल गया दिन
उतर आयी शाम,
घिर रहा
चारों दिशाओं में
अँधेरा
घनेरा !
करो स्वीकार
मन !
यह अकेलापन,
बड़े सुख से
करो स्वीकार
मन !

हे ख़ुदा !
शुक्रगुज़ार,

तेरा
बेहद
शुक्रगुज़ार !

----------------------------------
(40) अपूर्ण
----------------------------------

कुछ रह गया
अनकहा !
क्षेपक कहें
या चुप रहें

कुछ रह गया
अन सहा !
----------------------------------

रचना-काल : सन् 1977-1986
प्रकाशन-वर्ष : सन् 1990
प्रकाशक : सर्जना प्रकाशन, ग्वालियर — 474 002 [म.प्र.]
सम्प्रति उपलब्ध : 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' [खंड : 3],
: ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड : 3] में।

शुक्रवार, 21 मई 2010

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य संग्रह === आहत युग

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य संग्रह === आहत युग
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संकलित कवितायेँ

1. संग्राम : और
2. अमानुषिक
3. फ़तहनामा
4. त्रासदी
5. होगा कोई
6. हॉकर
7. आत्मघात
8. लोग
9. आपात्काल
10. जागते रहना
11. ज़रूरी
12. इतिहास का एक पृष्ठ
13। वसुधैवकुटुम्बकम्
14. भ्रष्टाचार
15. अंत
16. रक्षा
17. तमाशा
18. वोटों की दुष्ट-नीति
19. घटनाचक्र
20. निष्कर्ष
21. आत्म-संवेदन
22. दिशा-बोध
23. स्वीकार
24. अवधान
25. सामना
26. अकारथ
27. असह
28. मूरत अधूरी
29. मजबूर
30. एक रात
31. सहसा
32. स्वागत
33. वर्षा-पूर्व
34. कामना-सूर्य
35. एक सत्य
36. उपलब्धि
37. विचार-विशेष
38. सार्थकता
39. अलम्
40. चाह
41. सम्भव [एक]
42. सम्भव [दो]
43. विपत्
44. स्वतंत्र



(1) संग्राम; और
-------------------

जिस स्वप्न को
साकार करने के लिए —
सम्पूर्ण पीढ़ी ने किया
संघर्ष
अनवरत संघर्ष,
सर्वस्व जीवन-त्याग;
वह
हुआ आगत !
*
कर गया अंकित
हर अधर पर हर्ष,
चमके शिखर-उत्कर्ष !
प्रोज्ज्वल हुई
हर व्यक्ति के अंतःकरण में
आग,
अभिनव स्फूर्ति भरती आग !
संज्ञा-शून्य आहत देश
नूतन चेतना से भर
हुआ जाग्रत,
सघन नैराश्य-तिमिराच्छन्न कलुषित वेश
बदला दिशाओं ने,
हुआ गतिमान जन-जन
स्पन्दन-युक्त कण-कण !
*
आततायी निर्दयी
साम्राज्यवादी शक्ति को
लाचार करने के लिए —
नव-विश्वास से ज्योतित
उतारा था समय-पट पर
जिस स्वप्न का आकार
वह,
हाँ, वह हुआ साकार!
*
लेकिन तभी....
अप्रत्याशित-अचानक
तीव्रगामी / धड़धड़ाते / सर्वग्राही,
स्वार्थ-लिप्सा से भरे
भूकम्प ने
कर दिए खंडित —
श्रम-विनिर्मित
गगन-चुम्बी भवन,
युग-युग सताये आदमी के
शान्ति के, सुख के सपन !
*
इसलिए; फिर
दृढ़ संकल्प करना है,
वचन को पूर्ण करना है,
विकृत और धुँधले स्वप्न में
नव रंग भरना है,
कमर कस कर
फिर कठिन संघर्ष करना है !


(2) अमानुषिक
--------------------

आज फिर
खंडित हुआ विश्वास,
आज फिर
धूमिल हुई
अभिनव ज़िन्दगी की आस !
*
ढह गये
साकार होती कल्पनाओं के महल !
बह गये
अतितीव्र अतिक्रामक
उफनते ज्वार में,
युग-युग सहेजे
भव्य-जीवन-धारणाओं के अचल !
*
आज छाये; फिर
प्रलय-घन,
सूर्य- संस्कृति-सभ्यता का
फिर ग्रहण-आहत हुआ,
षड्यंत्रों-घिरा
यह देश मेरा
आज फिर
मर्माहत हुआ !
*
फैली गंध नगर-नगर
विषैली प्राणहर बारूद की,
विस्फोटकों से
पट गयी धरती,
सुरक्षा-दुर्ग टूटे
और हर प्राचीर
क्षत-विक्षत हुई !
*
जन्मा जातिगत विद्वेष,
फैला धर्मगत विद्वेष,
भूँका प्रांत-भाषा द्वेष,
गँदला हो गया परिवेश !
सर्वत्र दानव वेश !
घुट रही साँसें
प्रदूषित वायु,
विष-घुला जल
छटपटाती आयु !


(3) फतहनामा
-------------------

आतंक सियापा !
छलनी / खून-सनी
बेगुनाह लाशें,
खेतों-खलियानों में
छितरी लाशें,
सड़कों पर
बिखरी लाशें !
*
निरीह
माँ, पत्नी, बहनें, पुत्रियाँ,
पिता, बन्धु, मित्र, पड़ोसी —
रोके आवेग
थामे आवेश
नत मस्तक
मूक विवश !
*
जश्न मनाता
पूजा-घर में
सतगुरु-ईश्वर-भक्त
खु़दा-परस्त !


(4) त्रासदी
----------------

दहशत : सन्नाटा
दूर-दूर तक सन्नाटा !
*
सहमे-सहमे कुत्ते
सहमे-सहमे पक्षी
चुप हैं।
*
लगता है-
क्रूर दरिन्दों ने
निर्दोष मनुष्यों को फिर मारा है,
निर्ममता से मारा है !
रातों-रात
मौत के घाट उतारा है !
सन्नाटे को गहराता
गूँजा फिर मज़हब का नारा है !
ख़तरा,
बेहद ख़तरा है !
*
रात गुज़रते ही
घबराए कुत्ते रोएंगे,
भय-विह्वल पक्षी चीखेंगे !
*
हम
आहत युग की पीड़ा सह कर
इतिहासों का मलबा ढोएंगे !


(5) होगा कोई
-----------------

एक आदमी / झुका-झुका / निराश
दर्द से कराहता हुआ
तबाह ज़िन्दगी लिए
गुज़र गया।
*
एक आदमी / झुका-झुका / हताश
चोट से लहूलुहान
चीखता हुआ / पनाह माँगता / अभी-अभी
गुज़र गया।


(6) हॉकर से
------------------

यह क्या
रोज़-रोज़
तरबतर खून से
अख़बार फेंक जाते हो तुम
घर में मेरे ?
*
तमाम हादसों से रँगा हुआ
अंधाधुंध गोलियों के निशान
पृष्ठ-पृष्ठ पर स्पष्ट उभरते !
*
छूने में.....पढ़ने में इसको
लगता है डर,
लपटें लहराता
जहर उगलता
डसने आता है अख़बार !
*
यद्यपि
यही ख़बर सुन कर
सोता हूँ हर रात
कि कोई कहीं
अप्रिय घटना नहीं घटी,
तनाव है
किन्तु नियंत्रण में है सब !

(7) आत्मघात
-------------------

हम खुद
तोड़ रहे हैं अपने को !
ताज़्जुब कि
नहीं करते महसूस दर्द !
इसलिए कि
मज़हब का आदिम बर्बर उन्माद
नशा बन कर
हावी है
दिल पर सोच-समझ पर।
हम ख़ुद
हथगोले फोड़ रहे हैं अपने ही ऊपर !
पागलपन में
अपने ही घर में
बारूद बिछा कर सुलगा आग रहे हैं
अपने ही लोगों पर करने वार-प्रहार !
*
हम ख़ुद
छोड़ रहे हैं रूप आदमी का
और पहन आये हैं खालें जानवरों की
गुर्राते हैं
छीनने-झपटने जानें
अपने ही वंशधरों की !

(8) लोग
--------------

चल रहे हैं लोग
सिर्फ़ पीछे भीड़ के !
*
जाना कहाँ
नहीं मालूम,
हैं बेख़बर
निपट महरूम,
*
घूमते या इर्द -
गिर्द अपने नीड़ के !
*
छाया इधर-
उधर जो शोर,
आया कहीं
न आदमखोर ?
*
सरसराहट आज
जंगलों में चीड़ के !

(9) आपात्काल
--------------------

तूफ़ान
अभी गुज़रा नहीं है !
बहुत कुछ टूट चुका है
टूट रहा है,
मनहूस रात
शेष है अभी !
*
जागते रहो
हर आहट के प्रति सजग
जागते रहो !
न जाने
कब.....कौन
दस्तक दे बैठे —
शरणागत।
*
ज़हर उगलता
फुफकारता
आहत साँप-सा तूफ़ान
आख़िर गुज़रेगा !
सब कुछ लीलती
घनी स्याह रात भी
हो जाएगी ओझल !
*
हर पल
अलस्सुबः का इंतज़ार
अस्तित्व के लिए !

(10) जागते रहना
---------------------

जागते रहना, जगत में भोर होने तक !
*
छा रही चारों तरफ़ दहशत
रो रही इंसानियत आहत
वार सहना, संगठित जन-शोर होने तक !
*
मुक्त हो हर व्यक्ति कारा से
जूझना विपरीत धारा से
जन-विजय संग्राम के घनघोर होने तक !
*
मौत से लड़ना, नहीं थकना
अंत तक बढ़ना नहीं रुकना
हिंसकों के टूटने - कमज़ोर होने तक !

(11) ज़रूरी
-----------------

इस स्थिति को बदलो
कि आदमी आदमी से डरे,
इन हालात को हटाओ
कि आदमी आदमी से नफ़रत करे !
*
हमारे बुज़ुर्ग
हमें नसीहत दें कि
बेटे, साँप से भयभीत न होओ
हर साँप ज़हरीला नहीं होता,
उसकी फूत्कार सुन
अपने को सहज बचा सकते हो तुम।
हिंस्र शेर से भी भयभीत न होओ
हर शेर आदमखोर नहीं होता,
उसकी दहाड़ सुन
अपने को सहज बचा सकते हो तुम !

पशुओं से, पक्षियों से
निश्छल प्रेम करो,
उन्हें अपने इर्द-गिर्द सिमटने दो
अपने तन से उन्हें लिपटने दो,
कोशिश करो कि
वे तुमसे न डरें
तुम्हें देख न भगें,
पंख फड़फड़ा कर उड़ान न भरें,
चाहे वह
चिड़िया हो, गिलहरी हो, नेवला हो !
*
तुम्हारे छू लेने भर से बीरबहूटी
स्व-रक्षा हेतु
जड़ बनने का अभिनय न करे !
तुम्हारी आहट सुन
खरगोश कुलाचें भर-भर न छलाँगे
सरपट न भागे !
*
लेकिन
दूर-दूर रहना
सजग-सतर्क
इस आदमजाद से !
जो-
न फुफकारता है, न दहाड़ता है,
अपने मतलब के लिए
सीधा डसता है,
छिप कर हमला करता है !
कभी-कभी यों ही
इसके-उसके परखचे उड़ा देता है !
फिर चाहे वह
आदमी हो, पशु हो, पक्षी हो,
फूल हो, पत्ती हो, तितली हो, जुगनू हो !
*
अपना, बस अपना
उल्लू सीधा करने
यह आदमी
बड़ा मीठा बोलता है,
सुनने वाले कानों से मधुरस घोलता है !
*
लेकिन
दबाए रखता है विषैला फन,
दरवाजे पर सादर दस्तक देता है,
'जयराम जी‘ की करता है !
तुम्हारे गुण गाता है !
और फिर
सब कुछ तबाह कर
हर तरफ से तुम्हें तोड़ कर
तडपने-कलपने छोड़ जाता है !
*
आदमी के सामने ढाल बन कर जाओ,
भूखे-नंगे रह लो
पर, उसकी चाल में न आओ !
ऐसा करोगे तो
सौ बरस जिओगे, हँसोगे, गाओगे !
*
इस स्थिति को बदलना है
कि आदमी आदमी को लूटे,
उसे लहूलुहान करे,
हर कमज़ोर से बलात्कार करे,
निर्द्वन्द्व नृशंस प्रहार करे,
अत्याचार करे !
और फिर
मंदिर, मसज़िद, गिरजाघर, गुरुद्वारा जाकर
भजन करे,
ईश्वर के सम्मुख नमन करे !
*
(12) इतिहास का एक पृष्ठ
----------------------------

सच है —
घिर गये हैं हम
चारों ओर से
हर क़दम पर
नर-भक्षियों के चक्रव्यूहों में,
भौंचक-से खड़े हैं
लाशों-हड्डियों के
ढूहों में !
*
सच है —
फँस गये हैं हम
चारों ओर से
हर क़दम पर
नर-भक्षियों के दूर तक
फैलाए-बिछाए जाल में,
छल-छद्म की
उनकी घिनौनी चाल में !
*
बारूदी सुरंगों से जकड़ कर
कर दिया निष्क्रिय
हमारे लौह-पैरों को
हमारी शक्तिशाली दृढ़ भुजाओं को !
भर दिया घातक विषैली गंध से
दुर्गन्ध से
चारों दिशाओं की हवाओं को !
*
सच है -
उनके क्रूर पंजों ने
है दबा रखा गला,
भींच डाले हैं
हर अन्याय को करते उजागर
दहकते रक्तिम अधर !
मस्तिष्क की नस-नस
विवश है फूट पड़ने को,
ठिठक कर रह गये हैं हम !
खंडित पराक्रम
अस्तित्व / सत्ता का अहम् !
*
सच है कि
आक्रामक-प्रहारक सबल हाथों की
जैसे छीन ली क्षमता त्वरा —
अब न हम ललकार पाते हैं
न चीख पाते हैं,
स्वर अवरुद्ध
मानवता-विजय-विश्वास का,
सूर्यास्त जैसे
गति-प्रगति की आस का !
अब न मेधा में हमारी
क्रांतिकारी धारणाओं-भावनाओं की
कड़कती तीव्र विद्युत कौंधती है,
चेतना जैसे
हो गयी है सुन्न जड़वत् !
*
चेष्टाहीन हैं / मजबूर हैं,
हैरान हैं,
भारी थकन से चूर हैं !
*
लेकिन
नहीं अब और
स्थिर रह सकेगा
आदमी का आदमी के प्रति
हिंसा-क्रूरता का दौर !
*
दृढ़ संकल्प करते हैं
कठिन संघर्ष करने के लिए,
इस स्थिति से उबरने के लिए !
*
(13) वसुधैवकुटुम्बकम्
-------------------------

जाति, वंश, धर्म, अर्थ के नामाधार पर
आदमी आदमी में करना
भेद-विभेद,
किसी को निम्न
किसी को ठहराना श्रेष्ठ,
किसी को कहना अपना
किसी को कहना पराया —
आज के उभरते-सँवरते नये विश्व में
गंभीर अपराध है,
अक्षम्य अपराध है।
*
करना होगा नष्ट-भ्रष्ट
ऐसे व्यक्ति को / ऐसे समाज को
जो आदमी-आदमी के मध्य
विभाजन में रखता हो विश्वास
अथवा
निर्धनता चाहता हो रखना क़ायम।
*
सदियों के अनवरत संघर्ष का
सह-चिन्तन का
निष्कर्ष है कि
हमारी-सबकी
जाति एक है — मानव,
हमारा-सबका
वंश एक है — मनु-श्रद्धा,
हमारा-सबका
धर्म एक है — मानवीय,
हमारा-सबका
वर्ग एक है — श्रमिक।
*
रंग रूप की विभिन्नता
सुन्दर विविधरूपा प्रकृति है,
इस पर विस्मय है हमें
इस पर गर्व है हमें,
सुदूर आदिम युग में
लम्बी सम्पर्क दूरियों ने
हमें भिन्न-भिन्न भाषा-बोल दिए,
भिन्न-भिन्न लिपि-चिह्न दिए।
*
किन्तु आज
इन दूरियों को
ज्ञान-विज्ञान के आलोक में
हमने बदल दिया है नज़सदीकियों में,
और लिपि-भाषा भेद का अँधेरा
जगमगा दिया है
पारस्परिक मेल-मिलाप के प्रकाश में,
मैत्री-चाह के अदम्य आवेग ने
तोड़ दी हैं दीवारें / रेखाएँ
जो बाँटती हैं हमें
विभिन्न जातियों, वंशों, धर्मों, वर्गों में।

(14) भ्रष्टाचार
------------------

गाजर घास-सा
चारों तरफ़
क्या खूब फैला है !
देश को हर क्षण
पतन के गर्त में
गहरे ढकेला है,
करोड़ों के
बहुमूल्य जीवन से
क्रूर वहशी
खेल खेला है !
*
वर्जित गलित
व्यवहार है,
दूषित भ्रष्ट
आचार है।

(15) अंत
--------------

जमघट ठगों का
कर रहा जम कर
परस्पर मुक्त जय-जयकार !
*
शीतक-गृहों में बस
फलो-फूलो,
विजय के गान गा
निश्चिन्त चक्कर खा,
हिँडोले पर चढ़ो झूलो !
जीवन सफल हो,
हर समस्या शीघ्र हल हो !
*
धन सर्वस्व है, वर्चस्व है,
धन-तेज को पहचानते हैं ठग,
उसकी असीमित और अपरम्पार महिमा
जानते हैं ठग !
*
किन्तु;
सब पकड़े गये
कानून में जकड़े गये
सिद्ध स्वामी; राज नेता सब !
धूर्त मंत्री; धर्मचेता सब !
*
अचम्भा ही अचम्भा !
हिडिंबा है; नहीं रम्भा !
*
मुखौटे गिर पड़े नक़ली
मुखाकृति दिख रही असली !
*
(16) रक्षा
--------------

देश की नव देह पर
चिपकी हुई
जो अनगिनत जोंके-जलौकें,
रक्त-लोलुप
लोभ-मोहित
बुभुक्षित
जोंके-जलौकें —
आओ
उन्हें नोचें-उखाड़ें,
धधकती आग में झोंकें !
उनकी
आतुर उफ़नती वासना को
फैलने से
सब-कुछ लील लेने से
अविलम्ब रोकें !
देश की नव देह
यों टूटे नहीं,
ख़ुदगरज़ कुछ लोग
विकसित देश की सम्पन्नता
लूटे नहीं !
*
(17) तमाशा
----------------

तुम भी घिसे-पिटे सिक्के
फेंक कर चले गये?
अफसोस
कि हम इस बार भी छले गये!
*
देखो-
खोटा सिक्का है न
'धर्म-निरपेक्षता‘ का ?
और दूसरा यह
'सामाजिक न्याय-व्यवस्था‘ का ?
मात्र ये नहीं
और हैं सपाट घिसे काले सिक्के —
'राष्ट्रीय एकता‘ के / 'संविधान-सुरक्षा‘ के
जो तुम इस बार भी
विदूषक के कार्य-कलापों-सम
फेंक कर चले गये!
*
तुम तो भारत-भाग्य-विधाता थे !
तुमसे तो
चाँदी-सोने के सिक्कों की
की थी उम्मीद,
किन्तु की कैसी मिट्टी पलीद !
*
अद्भुत अंधेरे तमाशा है
घनघोर निराशा है,
यह किस जनतंत्र-प्रणाली का ढाँचा है ?
जनता के मुँह पर
तड़-तड़ पड़ता तीव्र तमाचा है !
*
(18) वोटों की दुष्टनीति
-------------------------

दलितों की गलियों से
कूचों और मुहल्लों से,
उनकी झोपड़पट्टी के
बीचों-बीच बने-निकले
ऊबड़-खाबड़, ऊँचे-नीचे
पथरीले-कँकरीले सँकरे पथ से
निकल रहा है
दलितों का
आकाश गुँजाता, नभ थर्राता
भव्य जुलूस !
*
नहीं किराये के
गलफोडू नारेबाज़ नक़लची
असली है, सब असली हैं जी —
मोटे-ताजे, हट्टे-कट्टे
मुश्टंडे-पट्ठे,
कुछ तोंद निकाले गोल-मटोल
ओढे महँगे-महँगे खोल !
*
सब देख रहे हैं कौतुक —
दलितों के
नंग-धड़ंग घुटमुंडे
काले-काले बच्चे,
मैली और फटी
चड्डी-बनियानों वाले
लड़के-फड़के,
झोंपडयों के बाहर
घूँघट काढ़े दलितों की माँ-बहनें
क्या कहने !
चित्र-लिखी-सी देख रही हैं,
पग-पग बढ़ता भव्य जुलूस,
दलितों का रक्षक, दलितों के हित में
भरता हुँकारें, देता ललकारें
चित्र खिँचाता / पीता जूस !
निकला अति भव्य जुलूस !

कल नाना टीवी-पर्दों पर
दुनिया देखेगी
यह ही, हाँ यह ही —
दलितों का भव्य जुलूस !
*
अफ़सोस !
नहीं है शामिल इसमें
दलितों की टोली,
अफ़सोस !
नहीं है शामिल इसमें
दलितों की बोली !

(19) घटनाचक्र
------------------

हमने नहीं चाहा
कि इस घर के
सुनहरे-रुपहले नीले
गगन पर
घन आग बरसे !
*
हमने नहीं चाहा
कि इस घर का
अबोध-अजान बचपन
और अल्हड़ सरल यौवन
प्यार को तरसे !
*
हमने नहीं चाहा
कि इस घर की
मधुर स्वर-लहरियाँ
खामोश हो जाएँ,
यहाँ की भूमि पर
कोई
घृणा प्रतिशोध हिंसा के
विषैले बीज बो जाए !
*
हमने नहीं चाहा
प्रलय के मेघ छाएँ
और सब-कुछ दें बहा,
गरजती आँधियाँ आएँ
चमकते इंद्रधनुषी
स्वप्न-महलों को
हिला कर
एक पल में दें ढहा !
*
पर,
अनचाहा सब
सामने घटता गया,
हम
देखते केवल रहे,
सब सामने
क्रमशः
उजड़ता टूटता हटता गया !

(20) निष्कर्ष
----------------

उसी ने छला
अंध जिस पर भरोसा किया,
उसी ने सताया
किया सहज निःस्वार्थ जिसका भला !
*
उसी ने डसा
दूध जिसको पिलाया,
अनजान बन कर रहा दूर
क्या खूब रिश्ता निभाया !
*
अपरिचित गया बन
वही आज
जिसको गले से लगाया कभी,
अजनबी बन गया
प्यार,
भर-भर जिसे गोद-झूले झुलाया कभी !
*
हमसफ़र
मुफलिसी में कर गया किनारा,
ज़िन्दगी में अकेला रहा
और हर बार हारा !

(21) आत्म-संवेदन
---------------------

हर आदमी
अपनी मुसीबत में
अकेला है !
यातना की राशि-सारी
मात्र उसकी है !
साँसत के क्षणों में
आदमी बिल्कुल अकेला है !
*
संकटों की रात
एकाकी बितानी है उसे,
घुप अँधेरे में
किरण उम्मीद की जगानी है उसे !
हर चोट
सहलाना उसी को है,
हर सत्य
बहलाना उसी को है !
*
उसे ही
झेलने हैं हर क़दम पर
आँधियों के वार,
ओढ़ने हैं वक्ष पर चुपचाप
चारों ओर से बढ़ते-उमड़ते ज्वार !
सहनी उसे ही ठोकरें —
दुर्भाग्य की,
अभिशप्त जीवन की,
कठिन चढ़ती-उतरती राह पर
कटु व्यंग्य करतीं
क्रूर-क्रीड़ाएँ
अशुभ प्रारब्ध की !
उसे ही
जानना है स्वाद कड़वी घूँट का,
अनुभूत करना है
असर विष-कूट का !
अकेले
हाँ, अकेले ही !
*
क्योंकि सच है यह —
कि अपनी हर मुसीबत में
अकेला ही जिया है आदमी !
*
(22) दिशा-बोध
-------------------

निरीहों को
हृदय में स्थान दो
सूनापन-अकेलापन मिटेगा !
*
जिनको ज़रूरत है तुम्हारी —
जाओ वहाँ,
मुसकान दो उनको
अकेलापन बँटेगा !
*
अनजान प्राणी
जोकि
चुप गुमसुम उदास-हताश बैठे हैं
उन्हें बस, थपथपाओ प्यार से
मनहूस सन्नाटा छँटेगा !
*
ज़िन्दगी में यदि
अँधेरा-ही अँधेरा है,
न राहें हैं, न डेरा है,
रह-रह गुनगुनाओ
गीत को साथी बनाओ
यह क्षणिक वातावरण ग़म का
हटेगा !
ऊब से बोझिल
अकेलापन कटेगा
*
(23) स्वीकार
----------------

अकेलापन नियति है,
हर्ष से
झेलो इसे !
*
अकेलापन प्रकृति है,
कामना-अनुभूति से
ले लो इसे !
*
इससे भागना-बचना —
विकृति है !
मात्र अंगीकार करना —
एक गति है !
इसलिए स्वेच्छा वरण,
मन से नमन !
*

(24) अवधान
-----------------

कश-म-कश की ज़िन्दगी में
आदमी को चाहिए
कुछ क्षण अकेलापन !
कर सके
गुज़रे दिनों का आकलन !
किसका सही था आचरण,
कौन कितना था जरूरी
या कि किसने की तुम्हारी चाह पूरी,
प्यार किसका पा सके,
किसने किया वंचित कपट से
की उपेक्षा
और झुलसाया
घृणा-भरती लपट से !
*
जानना यदि सत्य जीवन का
तथ्य जीवन का
अकेलापन बताएगा तुम्हें,
सार्थक जिलाएगा तुम्हें !
*
वरदान —
सूनापन अकेलापन !
किसी को मत पुकारो,
पा इसे
मन में न हारो !
रे अकेलापन महत् वरदान है,
अवधान है !
*
(25) सामना
------------------

पत्थर-पत्थर
जितना पटका
उतना उभरा !
*
पत्थर-पत्थर
जितना कुचला
उतना उछला !
*
कीचड़ - कीचड़
जितना धोया
उतना सुथरा !
*
कालिख - कालिख
जितना साना
जितना पोता
उतना निखरा !
असली सोना
बन कर निखरा !
*
ज़ंजीरों से
तन को जब - जब
कस कर बाँधा
खुल कर बिखरा
उत्तर - दक्षिण
पूरब - पश्चिम
बह - बह बिखरा !
*
भारी भरकम
चंचल पारा
बन कर लहरा !
*
हर खतरे से
जम कर खेला,
वार तुम्हारा
बढ़ कर झेला !
*

(26) अकारथ
-----------------

दिन रात भटका हर जगह
सुख-स्वर्ग का संसार पाने के लिए !
*
कलिका खिली या अधखिली
झूमी मधुप को जब रिझाने के लिए !
*
सुनसान में तरसा किया
तन-गंध रस-उपहार पाने के लिए !
*
क्या-क्या न जीवन में किया
कुछ पल तुम्हारा प्यार पाने के लिए !
*
डूबा व उतराया सतत
विश्वास का आधार पाने के लिए !
*
रख ज़िन्दगी को दाँव पर
खेला किया, बस हार जाने के लिए !
*
(२७) असह
---------------

बहुत उदास मन
थका-थका बदन !
बहुत उदास मन !
*
उमस भरा गगन
थमा हुआ पवन
घुटन घुटन घुटन !
*
घिरा तिमिर सघन
नहीं कहीं किरन
भटक रहे नयन !
*
बहुत निराश मन
बहुत हताश मन
सुलग रहा बदन
जलन जलन जलन !
*
(28) मूरत अधूरी
--------------------

तय है कि अब यह ज़िन्दगी
मुहलत नहीं देगी
अब और तुमको ज़िन्दगी
फुरसत नहीं देगी !
*
गुज़रे दिनों की याद कर, कब-तक दहोगे तुम ?
विपरीत धारों से उलझ, कितना बहोगे तुम ?
रे कब-तलक तूफ़ान के धक्के सहोगे तुम ?
*
यों खेलने की, ज़िन्दगी
नौबत नहीं देगी,
अब और तुमको ज़िन्दगी
क़ूवत नहीं देगी !
*
साकार हो जाएँ असम्भव कल्पनाएँ सब,
आकार पा जाएँ चहचहाती चाहनाएँ सब,
अनुभूत हों मधुमय उफनती वासनाएँ सब,
*
यह ज़िन्दगी ऐसा कभी
जन्नत नहीं देगी,
यह ज़िन्दगी ऐसी कभी
किस्मत नहीं देगी !
*

(29) मजबूर
---------------

जिन्दगी जब दर्द है तो
हर दर्द सहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
राज है यह जिन्दगी जब
खामोश रहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
है न जब कोई किनारा
तो सिर्फ़ बहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
ज़िन्दगी यदि जलजला है
तो टूट ढहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
आग में जब घिर गये हैं
अविराम दहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
सत्य कितना है भयावह !
हर झूठ कहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*

(30) एक रात
-----------------

अँधियारे जीवन-नभ में
बिजुरी-सी चमक गयीं तुम !
*
सावन झूला झूला जब
बाँहों में रमक गयीं तुम !
*
कजली बाहर गूँजी जब
श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम !
*
महकी गंध त्रियामा जब
पायल-सी झमक गयीं तुम !
*
तुलसी-चौरे पर आ कर
अलबेली छमक गयीं तुम !
*
सूने घर-आँगन में आ
दीपक-सी दमक गयीं तुम !
*
(31) सहसा
-----------------

आज तुम्हारी आयी याद,
मन में गूँजा अनहद नाद !
बरसों बाद
बरसों बाद !
*
साथ तुम्हारा केवल सच था,
हाथ तुम्हारा सहज कवच था,
सब-कुछ पीछे छूट गया, पर
जीवित पल-पल का उन्माद !
आज तुम्हारी आयी याद !
*
बीत गये युग होते-होते,
रातों-रातों सपने बोते,
लेकिन उन मधु चल-चित्रों से
जीवन रहा सदा आबाद !
आज तुम्हारी आयी याद !

(32) स्वागत
--------------

जूही मेरे आँगन में महकी,
रंग-बिरंगी आभा से लहकी !
*
चमकीले झबरीले कितने
इसके कोमल-कोमल किसलय,
है इसकी बाँहों में मृदुता
है इसकी आँखों में परिचय,
*
भोली-भोली गौरैया चहकी
लटपट मीठे बोलों में बहकी !
*
लम्बी लचकीली हरिआई
डालों डगमग-डगमग झूली,
पाया हो जैसे धन स्वर्गिक
कुछ-कुछ ऐसी हूली-फूली,
*
लगती है कितनी छकी-छकी
गह-गह गहनों-गहनों गहकी !
*
महकी, मेरे आँगन में महकी
जूही मेरे आँगन में महकी !
(पौत्री इरा के प्रति।)
*
(33) वर्षा-पूर्व
----------------

आज छायी है घटा
काली घटा !
*
महीनों की
तपन के बाद
अहर्निश
तन-जलन के बाद
*
हवाओं से लिपट
लहरा उठा
ऊमस भरा वातावरण-आँचर !
*
किसी ने
डाल दी तन पर
सलेटी बादलों की
रेशमी चादर !
*
मोह लेती है छटा,
मोद देती है घटा,
काली घटा !
*
(34) कामना-सूर्य
-------------------

(1)
हर व्यक्ति सूरज हो
ऊर्जा-भरा,
तप-सा खरा,
हर व्यक्ति सूरज-सा धधकता
आग हो,
बेलौस हो, बेलाग हो !

(2)
हर व्यक्ति सूरज-सा
प्रखर,
पाबन्द हो,
रोशनी का छन्द हो !
जाए जहाँ —
कण-कण उजागर हो,
असमंजस अँधेरा
कक्ष-बाहर हो !

(3)
हर व्यक्ति सूरज-सा
दमकता दिखे,
ऊष्मा भरा
किरणें धरे,
हर व्यक्ति सूरज-सा
चमकता दिखे !

(35) एक सत्य
-----------------

बन्धन
उभरता है - चुनौती बन
अस्वीकृति बन,
जगाता है सतत
विद्रोह / बल / प्रतिरोध /
ज्वाला / क्रोध।
*
बन्धन
उभरता - स्नेह की उपलब्धि बन,
स्वीकार बन,
जगाता -
मोह / अक्षय सन्धि / अर्पण चाह /
जीवन - दाह।
*
(36) उपलब्धि
-----------------

सपनों के सहारे
एक लम्बी उम्र
हमने
सहज ही काट ली —
बडे सुख से
सहन से
सब्र से !
मन के गगन पर
मुक्त मँडराती व घहराती
गहन बदली अभावों की
उड़ा दी, छाँट दी
हमने
अटल विश्वास के
दृढ़ वेगवाही वातचक्रों से,
दिन के, रैन के
अनगिनत सपनों के भरोसे !
*
मौन रह अविराम जी ली
यह कठिनतम ज़िन्दगी
हमने
अमन से, चैन से !

सपनो !
महत् आभार,
वृहत् आभार !
*
(37) विचार-विशेष
----------------------

सपने आनन-फानन साकार नहीं होते
पीढ़ी-दर-पीढ़ी क्रम-क्रम से सच होते हैं,
सपने माणव-मंत्रों से सिद्ध नहीं होते
पीढ़ी-दर-पीढ़ी धृति-श्रम से सच होते हैं !
*
(38) सार्थकता
-------------------

जिस दिन
मानव-मानव से प्यार करेगा,
हर भेद-भाव से
ऊपर उठ कर,
भूल
अपरिचित-परिचित का अन्तर
सबका स्वागत-सत्कार करेगा,
पूरा होगा
उस दिन सपना !
विश्व लगेगा
उस दिन अपना !
*
(39) अलम
---------------

आहों और कराहों से
नहीं मिटेगी
आहत तन की, आहत मन की पीर !
*
दृढ़ आक्रोश उगलने से
नहीं कटेगी
हाथों-पैरों से लिपटी ज़ंजीर !
*
जीवन-रक्त बहाने से
नहीं घटेगी
लहराती लपटों की तासीर !

आओ —
पीड़ा सह लें,
बाधित रह लें,
पल-पल दह लें !
*
करवट लेगा इतिहास,
इतना रखना विश्वास !
*
(40) चाह
--------------

जीवन अबाधित बहे,
जय की कहानी कहे !
*
आशीष-तरु-छाँह में
जन-जन सतत सुख लहे !
*
दिन-रात मन-बीन पर
प्रिय गीत गाता रहे !
*
मधु-स्वप्न देखे सदा,
झूमे हँसे गहगहे !
*
मायूस कोई न हो,
लगते रहे कहकहे !
*
हर व्यक्ति कुन्दन बने,
अन्तर-अगन में दहे !
*
अज्ञात प्रारब्ध का
हर वार हँस कर सहे !
*
(41) सम्भव — 1
------------------

आओ
चोट करें,
घन चोट करें —
परिवर्तन होगा,
धरती की गहराई में
कम्पन होगा,
चट्टानों की परतें
चटखेंगी,
अवरोधक टूटेंगे,
फूटेगी जल-धार !
*
आओ
चोट करें,
मिल कर चोट करें —
स्थितियाँ बदलेंगी,
पत्थर अँकुराएंगे,
लह-लह
पौधों से ढक जाएंगे !

(42) सम्भव — 2
------------------

आओ
टकराएँ,
पूरी ताक़त से टकराएँ,
आखर
लोहे का आकार
हिलेगा,
बंद सिंह-द्वार
खुलेगा !
मुक्ति मशालें थामे
जन-जन गुज़रेंगे,
कोने-कोने में
अपना जीवन-धन खोजेंगे !
नवयुग का तूर्य बजेगा,
प्राची में सूर्य उगेगा !
आओ
टकराएँ,
मिल कर टकराएँ,
जीवन सँवरेगा,
हर वंचित-पीड़ित सँभलेगा !

(43) विपत्
--------------

आख़िर,
गया थम !
उठा-
चीखता
तोड़ता - फोड़ता
लीलता
क्रुद्ध अंधड़ !
*
तबाही.... तबाही.... तबाही !
*
इधर भी; उधर भी
यहाँ भी; वहाँ भी !
दीखते
खण्डहर.... खण्डहर.... खण्डहर,
अनगिनत शव !
सर्वत्र निस्तब्धता,
थम गया रव !
*
दबे,
चोट खाये,
रुधिर - सिक्त
मानव... मवेशी... परिन्दे
विवश तोड़ते दम !
*
भयाक्रांत सुनसान में
सनसनाती हवा,
खा गया
अंग-प्रति-अंग
लकवा !
अपाहिज
थका शक्ति-गतिहीन जीवन,
विगत-राग धड़कन !
*
भयानक क़हर
अब गया थम,
बचे कुछ
उदासी-सने चेहरे नम !
*
सदा के लिए
खो
घरों-परिजनों को,
बिलखते
बेसहारा !
असह
कारुणिक
दृश्य सारा !
*
चलो,
तेज अंधड़
गया थम !
गहर गमज़दा हम !
*
(44) स्व-तंत्र
----------------

आकाश है सबके लिए,
अवकाश है सबके लिए !
*
विहगो !
उड़ो,
उन्मुक्त पंखों से उड़ो !
*
ऊँची उड़ानें
शक्ति-भर ऊँची उड़ानें
दूर तक
विहगो भरो !
विश्वास से ऊपर उठो;
गन्तव्य तक पहुँचो,
अभीप्सित लक्ष्य तक पहुँचो !
*
ऊँचे और ऊँचे और ऊँचे
तीव्र ध्वनि-गति से उड़ो,
निडर होकर उड़ो !
आकाश यह
सबके लिए है —
असीमित
शून्याकाश में
जहाँ चाहो मुड़ो,
जहाँ चाहो उड़ो,
*
ऐसे मुड़ो; वैसे मुड़ो,
ऐसे उड़ो; वैसे उड़ो,
सुविधा व सुभीते से उड़ो !

अपने प्राप्य को
हासिल करो !
स्वच्छंद हो, निर्द्वन्द्व हो,
ऊर्ध्वगामी, ऊर्ध्वमुख;
गगनचुम्बी उड़ानें
दूर तक
विहगो भरो !
*
न हो
कोई किसी की राह में,
बाधक न हो
कोई किसी की
पूर्ण होती चाह में !
*
स्वाधीन हों सब
स्वानुशासन में बँधे,
हम-राह हों
सँभले सधे !
*
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रचना-काल : सन् 1987-1997
प्रकाशन-वर्ष : सन् 1997
प्रकाशक : सर्जना प्रकाशन, ग्वालियर — 474 002 [म.प्र.]
सम्प्रति उपलब्ध : 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' [खंड : 3]
‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड : 3] में।
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संपर्क :
डा0 महेंद्र भटनागर
110 बलवंतनगर, गांधी रोड,
ग्वालियर - 474 002 (म. प्र.)
फोन : 0751-4092908
ई-मेल :
drmahendra02@gmail.com
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