गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

डॉ0 महेन्द्रभटनागर का काव्य-संग्रह == अनुभूत-क्षण

डा0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह === अनुभूत-क्षण
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1 प्रेय
2 भाग्य-विरुद्ध
3 संघर्ष
4 अनुभव-सिद्ध
5 सावधान
6 इच्छित
7 अदम्य
8 सार्थकता
9 जीवन
10 प्रतिक्रिया
11 शुभकामनाएँ
12 यथार्थ : आदर्श
13 साहस
14 कारगिल प्रयाण पर
15 हमारा गौरव
16 निष्फल
17 दीप्र
18 संकल्पित
19 अभिलषित
20 बसंती हवा
21 कुहराच्छादित नभ
22 शीतार्द्र
23 हेमन्त
24 निष्कर्ष
25 तुम ...
26 प्रतीक
27 तुम
28 सुख-बोध
29 उपकृत
30 उत्सव
31 असंगत
32 एकाकी
33 अकेला
34 पटाक्षेप
35 विस्मय
36 मर्माहत
37 खंडित मन
38 संन्यास-चेतना
39 संबंध
40 सहवर्ती
41 वेदना
42 अंतिम अनुरोध
43 सलाह
44 दम्भ
45 अभिप्रेत वंचित
46 अप्रभावित
47 आत्म-निरीक्षण
48 वास्तविकता
49 विराम-पूर्व (1)
50 विराम-पूर्व (2)
51 बोध
52 सच है
53 स्वागत 21वीं शती का
54 अभिनन्दित क्षण
55 विजयोल्लास

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(1) प्रेय
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आस्था - दीप / जलता रहे
सपना एक / पलता रहे
आत्म-साधन के लिए इतना बहुत है !
.

जीवन - चक्र / चलता रहे
यम का पाश / छलता रहे
प्राण - धारण के लिए इतना बहुत है !

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(2) भाग्य-विरुद्ध
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प्रतिपल जब हिलते हैं
रचना-धर्मी हाथ,
चरणों का मिलता है
जब गति-धर्मी साथ,

तब बनती है तसवीर !
तब बनती है तक़दीर !

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(3) संघर्ष
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घुटन, बेहद घुटन है !
होंठ.... / हाथ.... / पैर
निष्क्रिय बद्ध
जन - जन क्षुब्ध.... / क्रुद्ध !

प्राण - हर
आतंक - ही - आतंक
है परिव्याप्त
दिशाओं में / हवाओं में !

इस असह वातावरण को
बदलना
ज़रूरी है !
इंसानियत को
बचाने के लिए
हर आदमी का अब सँभलना
ज़रूरी है !

जलन, बेहद जलन है,
तपन, बेहद तपन है !

हर क्षितिज
गहरे धुएँ से है घिरा
आग....
शोले उगलती आग,
लहराती
आकाश छूतीं अग्नि लपटें !
इनको बुझाना
ज़रूरी है !

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(4) अनुभव-सिद्ध
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तय है कि
काली रात गुज़रेगी,
भयावह रात गुज़रेगी !
असफल रहेगा
हर घात का आघात,
पराजित रात गुज़रेगी !

यक़ीनन हम
मुक्त होंगे
त्रासदायी स्याह घेरे से,
रू--रू होंगे
स्वर्णिम सबेरे से,
अरुणिम सबेरे से !

तय है
अँधेरे पर
उजाले की विजय
तय है !

पक्षी चहचहाएंगे,
मानव प्रभाती गान गाएंगे !

उतरेंगी
गगन से सूर्य-किरणें
नृत्य की लय पर,
धवल मुसकान भर - भर !

तय है कि
संघातक कठिन दु:सह अँधेरी
रात गुज़रेगी !

कुचक्रों से घिरा आकाश
बिफरेगा,
आहत ज़िन्दगी इंसान की
सँवरेगी !

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(5) सावधान
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अँधेरा है, अँधेरा है,
बेहद अँधेरा है !
घुप अँधेरे ने
सारी सृष्टि को
अपने जाल में / जंजाल में
धर दबोचा है,
घेरा है !

नहीं; लेकिन
तनिक भयभीत होना है,
हार कर मन में
पल एक निष्क्रिय बन
सोना है !
तय है
कुछ क्षणों में
रोशनी की जीत होना है !

आओ
रोशनी के गीत गाएँ !
सघन काली अमावस है
पर्व दीपों का मनाएँ !

तम घटेगा
तम छँटेगा
तम हटेगा !

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(6) इच्छित
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घूमा बहुत हूँ
घन अँधेरे में,
भटका बहुत हूँ
मन-अँधेरे में !

लिए
तम-राख लथपथ तन,
अविराम घूमा हूँ,
दिन - रात घूमा हूँ !

अब तो
रोशनी की धार में
जम कर नहाऊंगा,
सत्य के
आलोक-झरने में उतर
शेष जीवन-भर नहाऊंगा !

रोशनी में डूब कर
रोशनी में तैर कर
तन बहाऊंगा
मन बहाऊंगा
जी - भर नहाऊंगा !

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(7) अदम्य
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दूर-दूर तक
छाया सघन कुहर
कुहरे को भेद
डगर पर बढ़ते हैं हम !
.

चट्टानों ने जब-जब
पथ अवरुद्ध किये
चट्टानों को तोड़
नयी राहें गढ़ते हैं हम !
.

ठंडी तेज़ हवाओं के
वर्तुल झोंके आते हैं
तीव्र चक्रवातों के सम्मुख
सीना ताने
पग-पग अड़ते हैं हम !
.

सागर-तट पर टकराता
भीषण ज्वारों का पर्वत
उमड़ी लहरों पर चढ़
पूरी ताक़त से लड़ते हैं हम !
.

दरियाओं की बाढ़ें
तोड़ किनारे बहती हैं
जल भँवरों / आवेगों को
थाम;
सुरक्षा-यान चलाते हैं हम !
.

काली अंधी रात क़यामत की
धरती पर घिरती है जब-जब
आकाशों को जगमग करते
आशाओं के / विश्वासों के,
सूर्य उगाते हैं हम !
मणि-दीप जलाते हैं हम !
.

ज्वालामुखियों ने जब-जब
उगली आग भयावह
फैले लावे पर
घर अपना
बेख़ौफ़ बनाते हैं हम !
.

भूकम्पों ने जब-जब
नगरों गाँवों को नष्ट किया
पत्थर के ढेरों पर
बस्तियाँ नयी
हर बार बसाते हैं हम !
.

परमाणु-बमों / उद्जन-शस्त्रों की
मारों से
आहत भू-भागों पर
देखो कैसे
जीवन का परचम फहराते हैं हम !
चारों ओर
नयी अंकुराई हरियाली
लहराते हैं हम !
.

कैसे तोड़ोगे इनके सिर ?
कैसे फोड़ोगे इनके सिर ?
.

दुर्दम हैं,
इनमें अद्भुत ख़म है !
.

काल-पटल पर अंकित है
'जीवन-अपराजित है !'

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(8) सार्थकता
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आओ
दीवारों के घेरों
परकोटों से
बाहर निकलें !
अपने सुख-चिन्तन से
ऊपर उठ कर
जग-क्रन्दन को
स्वर-सरगम में बदलें !

मुरझाये रोते चेहरों को
मुसकानें बाँटें,
उनके जीवन-पथ पर
छितराया कुहरा छाँटें !
रँग दें
घनघोर अँधेरे को
जगमग तीव्र उजालों से,

त्रासों और अभावों की
निर्मम मारों से,
हारों को, लाचारों को
ढक दें
लद-लद पीले-लाल गुलाबों की
जयमालों से !

घर-घर जाकर
सहमे-सहमे बच्चों को
प्यारी-प्यारी मोहक किलकारी दें,

कँकरीली और कँटीली परती पर
रंग-बिरंगी लहराती फुलवारी दें !

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(9) जीवन
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हर आगत पल का
स्वागत है !

मेरे हाथ पकड़
उठता है दिन,
मेरे कंधों पर चढ़
बढ़ता है दिन !

मेरे मन से
अभिनव रचना
करता है दिन,
मेरे तन से
सृष्टि नयी
गढ़ता है दिन !

लड़ मेरे बल पर
जीता है दिन,
क्षण-क्षण मेरे जीने पर
जीता है दिन !

मेरी गति से
सार्थक होता काल अमर,
मैं ही हूँ
अविजित अविराम समर,

मेरे सम्मुख हर
पर्वत-बाधा नत है,
हर आगामी कल का
स्वागत है !

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(10) प्रतिक्रिया
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अणु-विस्फोट से
जाग्रत महात्मा बुद्ध की बोली

सुनिश्चित शान्ति हो,
सर्वत्र
सद्गति-सतग्रह की कान्ति हो !
सुरक्षित
सभ्यता, संस्कृति, मनुजता हो,
दुनिया से लुप्त दनुजता हो !

मानव-लोक
हिंसा-क्रूरता से मुक्त हो,
परस्पर प्रेम-ममता युक्त हो !
मना पाये नहीं
पशु-बल कहीं भी अब
मरण-त्योहार !

सार्थक तभी
यह ज्ञान का, विज्ञान का
उत्कृष्ट आविष्कार !
अनुपम और अद्भुत
मानवी उपहार !

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(11) शुभकामनाएँ
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रक्त-रंजित
इस शती का वर्ष अंतिम
शक्ति-पूजा का
तपस्या-साधना का वर्ष हो !

आगत शती में
जय मनुजता की दनुजता पर
सुनिश्चित हो,
प्रत्येक मुख पर
सिद्धि की उपलब्धि का
अंकित
सरल-सुन्दर हर्ष हो !

मानव-हृदय से
दुष्टता, पशुता, निठुरता दूर हो,
हिंसा-दर्प सारा चूर हो;
दृष्टि में ममता भरी भरपूर हो !

हर व्यक्ति दूषित वृत्तियाँ त्यागे,
परस्पर प्रेम हो
सद्भावना जागे !
हर व्यक्ति को हो प्राप्त
नव-बुद्धत्व
मानस-तीर्थ।
आत्मा का सतत उत्कर्ष हो !
शुभ-कामनाओं से भरा नव वर्ष हो !

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(12) यथार्थ / आदर्श
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जीवन और जगत जैसा हमको प्रत्यक्ष दिखा,
वैसा, हाँ केवल वैसा, हमने निष्पक्ष लिखा !

मानव-समता का स्वप्न, हमारा आदर्श सदा,
जिसको धारण कर, जन-जन जीवन-उत्कर्ष सधा !

प्रतिश्रुत हैं हम, शोषण-रहित समाज बनाएंगे,
प्रतिबद्ध कि हम जगती पर ही स्वर्ग बसाएंगे !

इतिहास बनाने की अभिनव दृष्टि हमारी है,
उत्कृष्ट समुन्नत नव जीवन-सृष्टि प्रसारी है !


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(13) साहस
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माना, निरीह है आदमी किसी
अनहोनी के प्रति,
चाहे कितना समर्थ हो कोई
पर, जीतती नियति !
क्षण में ढह जाती मानव-निर्मिति
बलवान है प्रकृति,

है लेकिन स्वीकार हर चुनौती
हो जो भी परिणति,

नहीं रुकेगी, मानव ज्ञान और
विज्ञान की प्रगति !

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(14) कारगिल-प्रयाण पर
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सीमाओं की रक्षा करने वाले वीर जवानो !
दुश्मन के शिविरों पर चढ़ कर भारी प्रलय मचा दो,
मातृभूमि पर बर्बर हत्यारों की बिखरें लाशें
तोपों के गर्जन-तर्जन से दुश्मन को दहला दो !

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(15) हमारा गौरव
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भारत का चट्टानी सीना है
कारगिल !
टकराएँ चाहे कितने ही
अणु-बम
इसका पाया लेकिन
कभी सकता हिल !

छल और कपट से
लुक-छिप कर घुस आये
दुश्मन को धकियानेवाला
पर्वतराज कारगिल !
नहीं कभी यह हुआ / होगा
गाफ़िल !
बर्बर धोखेबाज़ों की
लाशों का ढेर लगाने वाला
काल - कारगिल !
अब तो भैया
इसका नाम सिर्फ़
दुश्मन का दहलाता दिल !

सीमा का प्रहरी सैनिक है यह
कार - कारगिल !
भारत-माता का स्वस्तिक है यह
कार - कारगिल !

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(16) निष्फल
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प्रमाणित यह कि
जिसके पास
है अधिकार; है धन
शक्तिशाली
वह।

शक्तिशाली ने
स्वार्थ-साधन में,
वासनाओं की अहर्निश पूर्ति में
दुर्बल-वर्ग को
लूटा - खसोटा,
जिस तरह चाहा
समय भोगा !

हर जगह निर्मित
वैभव-द्वीप उसके,
फैला हुआ है
चक्रवर्ती राज्य उसका,
उसी का गूँजता सर्वत्र
जय-जयकार !

दुष्कर दीखता बनना
शोषण-मुक्त, समता-युक्त
अभिनव विश्व का आकार।
शक्तिशाली
क्यों नहीं बनता
महा मानव,
न्याय-धर्मी लोकप्रिय
अवतार !

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(17) दीप
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अवशेष स्वयं को कर
दहता जो
जीवन - भर !

दूर-दूर तक
राहों का
हरता अँधियारा,
अन्तर - ज्वाला से
घर - घर
भरता उजियारा :

उसके सर्वोत्तम सक्षम
प्रतिनिधि हम,
तम-हर ज्योतिर्गम !

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(18) संकल्पित
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प्रज्ज्वलित-प्रकाशित
दीप हैं हम !
सिर उठाये,
जगमगाती रोशनी के
दीप हैं हम !
वेगवाही अग्नि-लहरों से
लहकते चिन्ह-धर,
ध्रुव-दीप हैं हम !

शांत प्रतिश्रुत
दृढ़ प्रतिज्ञाबद्ध
छायी घन-अँधेरी शक्ति का
पीड़न-भरा
साम्राज्य हरने के लिए,
सर्वत्र
नव आलोक-लहरों से
उफ़नता ज्वार
भरने के लिए !

हमारा दीप्त
द्युति-अस्तित्व
करता लोक को आश्वस्त,
जन-समुदाय की प्रत्येक आशंका
विनष्ट-निरस्त !
भर उठता
सहज हर्षानुभूति से
हर दबा भय-त्रस्त !
होता एक क्षण में
रुद्ध मार्ग प्रशस्त !
प्रतिबद्ध हैं हम
व्यक्ति के मन में
उगी-उपजी
निराशा का, हताशा का
कठिन संहार करने के लिए !
हर हत हृदय में
प्राणप्रद उत्साह का
संचार करने के लिए !

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(19) अभिलषित
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दिन भर
धरती पर लेटी पसरी
रेशम जैसी
चिकनी-चिकनी दूब से,
आँगन में उतरी
खुली-खुली
फैली बिखरी
हेमा-हेमा धूप से,
यह अलबेला
एकाकी
जम कर खेला !
दिन भर खेला !

दिन भर
ताजे टटके गदराए
फूलों की छाँह में,
हरिआए - हरिआए
शूलों की बाँह में,
उनकी मादक-मादक गंधों में
अटका-भटका;
ऊला-भूला !
शर्मीली-शर्मीली भोली
कलियों की,
लम्बी-लम्बी पतली-पतली
फलियों की,
डालों-डालों झूला !
लिपट-लिपट कर
टहनी-टहनी पत्ती-पत्ती झूला !
दिन भर झूला !

दिन भर
सुन्दर रंगों छापों वाली साड़ी पहने
उड़ती मुग्धा तितली पर,
वासन्ती रंग-रँगी
मदमाती प्रेम-प्रगल्भा
प्रौढ़ा सरसों पर,
जी भर राँचा,
संग-संग खेतों-खेतों नाचा !
दिन भर नाचा !

दिन भर
इमली के / अमरूदों के पेड़ों पर
चोरी-चोरी डोला,
झरबेरी के कानों में
जा-जा,
चुपके-चुपके
जाने क्या-क्या बोला !
दिन भर डोला !

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(20) बसंती हवा
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तन को
छूती गुज़री
जो मतवाली युवा हवा
इतनी अच्छी
पहले कभी
, सचमुच, मुझे लगी !

मन को
ठंडक पहुँचाती गुज़री
जो मदहोश हवा
ऐसी मोहक
पहले कभी
, सचमुच, मुझे लगी !

बिलकुल अपनी सगी-सगी,
बेहद.... बेहद प्यार पगी,
ठगने आयी थी; स्वयं ठगी !

लिपट-लिपट कर
बाहों - बाहों झूली,
सिहर-सिहर कर
झूमी,
सुधबुध भूली !

वस्त्रों से खेली,
केशों से खेली,
अंग - अंग से खेली !
ईश्वर जाने !
अल्हड़पन में
कितनी मदगंधा ले ली !

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(21) कुहराच्छादित-नभ
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पड़ा हुआ है कम्बल ओढ़े
पसरा-पसरा जागा अम्बर !
.

दिन चढ़ आया कितना; फिर भी
हिलने का लेता नाम नहीं,
केवल सोना - सोना; इसका,
किंचित भी कोई काम नहीं,
ठंड अधिक का किये बहाना
पक्का बना हुआ घन-चक्कर !
.
गर्म दुपहरी आने पर अब
लगता, सचमुच, कुछ हिला-डुला,
दूर क्षितिज की सीमाओं पर
दिखता कम्बल भी खुला-खुला,
तनिक क्षणों में, बाँधेगा लो
सारा अपना बोरा-बिस्तर !

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(22) शीतार्द्र
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उतरी धीमे-धीमे
फिर-फिर ओस रात-भर !

हिम-शीतल सन्नाटा
छाया सुप्त धरा पर,
फूलों - पत्तों नाची
प्रीति-पुतरिका बनकर,
कारीगर कुहरे ने
किया सृजन कनात-घर !

यहाँ-वहाँ जगह-जगह
बिखरे जल-कण हीरे,
घात लगाये फिरते
पवन झकोरे धीरे,
पहरेदार सरीखा
जागा, हर प्रपात, झर !

ख़ूब जमी है महफ़िल
अध्यक्ष बनी रजनी,
प्रिय को कस कर बाँधे
जागी-सोयी सजनी,
किसी दिशा में दबका
बैठा, नव प्रभात, डर !

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(23) हेमन्त
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भीगी-भीगी भारी रात,
नींद आती सारी रात !

घोर अंधेरा चारों ओर
दूर अभी तो लोहित भोर
थमा हुआ है सारा शोर
ऐसे मौसम में चुप क्यों हो,
कहो कोई मन की बात !

कुहरा बरस रहा चुपचाप
अतिशय उतरा नभ का ताप
व्योम-धरा का मौन मिलाप
ऐसे लमहों में पास रहो,
थर-थर काँपेगा हिम गात !

नीरवता का मात्र प्रसार
तरुदल हिलते खेतों पार
जब-तब बज उठते हैं द्वार
खोल गवाक्ष झाँको बाहर,
मादक पवन लगाये घात !

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(24) निष्कर्ष
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ज़िन्दगी में प्यार से सुन्दर
कहीं
कुभी भी नहीं !
कुछ भी नहीं !

जन्म यदि वरदान है तो
इसलिए ही, इसलिए !
मोह से मोहक सुगंधित
प्राण हैं तो इसलिए !

ज़िन्दगी में प्यार से सुखकर
कहीं
कुछ भी नहीं !
कुछ भी नहीं !

प्यार है तो ज़िन्दगी महका
हुआ इक फूल है !
अन्यथा; हर क्षण, हृदय में
तीव्र चुभता शूल है !

ज़िन्दगी में प्यार से दुष्कर
कहीं
कुछ भी नहीं !
कुछ भी नहीं !

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(25) तुम....
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जब - जब
मुसकुराती हो
बहुत भाती हो !
तुम
हर बात पर क्यों
मुसकुराती हो !

जब - जब
सामने जा स्वच्छ दर्पण के
सुमुखि !
शृंगार करती हो,
धनुषाकार भौंहों - मध्य
केशों से अनावृत भाल पर
नव चाँद की
बिन्दी लगाती हो,
स्वयं में भूल
फूली ना समाती हो
बहुत भाती हो !

नगर से दूर जा कर
फिर
नदी की धार में
मोहक किसी की याद में
दीपक बहाती हो
बहुत भाती हो !
मुग्धा लाजवंती तुम
बहुत भाती हो !
जब बार - बार
मधुर स्वरों से
मर्म-भेदी
चिर-सनातन प्यार का
मधु - गीत गाती हो
पूजा - गीत गाती हो
बहुत भाती हो !

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(26) प्रतीक
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अर्ध्द-खिले फूलों का
सह-बंधन
तुम
मेरे कमरे में रख
जाने कब
चली गयीं !
जैसे
चमकाता किरणें
कई-कई
अन-अनुभूत अछूते
भावों का दर्पण
तुम
मेरे कमरे में रख
जाने कब,

अपने हाथों
छली गयीं !

जीवन का अर्थ
अरे
सहसा बदल गया,
गहरे-गहरे गिरता
जैसे कोई सँभल गया
भर राग उमंगें
नयी-नयी !
भर तीव्र तरंगें
नयी-नयी !

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(27) तुम...
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गौरैया हो
मेरे ऑंगन की
उड़ जाओगी !

आज
मधुर कलरव से
गूँज रहा घर,
बरस रहा
दिशि - दिशि
प्यार - भरा
रस - गागर,
डर है
जाने कब
जा दूर बिछुड़ जाओगी !

जब - तक
रहना है साथ
रहे हाथों में हाथ,
सुख - दुख के
साथी बन कर
जी लें दिन दो - चार,
परस्पर भर - भर प्यार,
मेरे जीवन - पथ की पगडंडी हो
जाने कब और कहाँ
मुड़ जाओगी !


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(28) सुख-बोध
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बड़ी प्रतीक्षा के बाद खिले हैं
गमले में फूल,
पीले - पीले पुलकित फूल
झबरीले गेंदे के
टटके फूल !

बड़ी प्रतीक्षा के बाद खिले हैं
जीवन में फूल,
कोमल - कोमल गद गद् फूल,
मादन - मन भावों के
मादक फूल !
बड़े दिनों के बाद
मिले हैं
सावन - भादों के उपहार,
बड़े दिनों के बाद
सजे हैं
दरवाज़ों पर बंदनवार !

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(29) उपकृत
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इन फूलों ने
मेरे घर - ऑंगन में
ख़ुशबू भर दी है,
एकाकी बोझिल
जीवन की
सारी तनहाई
हर ली है !
इन फूलों को
खिलने दो,
डालों पर
हिलने दो !

मेरे जर्जर तन से
ऊसर मन से
भावाकुल
मिलने दो !

इन फूलों ने
जग के ऑंगन को
महकाया है,
रंग - बिरंगी आभा से
लहकाया है !

इन फूलों को
खिलने दो,
डालों के झूलों पर
हिलने दो !

दुनिया-भर के लोगों से
हँस-हँस मिलने दो,
लिपट-लिपट कर
मिलने दो !

इन फूलों ने
भयंकर धरती
मनहर कर दी है,
हाँ, हाँ.....
नाना प्रेम-प्रसंगों से
भर दी है !

इन फूलों को
पर्वत - पर्वत
खिलने दो,
मरुथल - मरुथल
खिलने दो,
जंगल - जंगल
खिलने दो,
बस्ती - बस्ती
खिलने दो,
घर - घर
दर - दर
खिलने दो !

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(30) उत्सव
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फूलो !
रंग - बिरंगे फूलो !

गमले - गमले फूलो
क्यारी - क्यारी फूलो
आनन्द - मगन हो फूलो !

फूलो !
रंग - बिरंगे फूलो !
डालों - डालों झूलो
भर - भर पेंगें झूलो
मंद हवा में झूलो !

फूलो !
रंग - बिरंगे फूलो !
नव कलियों को छू लो
पत्ती - पत्ती छू लो
हारित चुनरी छू लो !

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(31) असंगत
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निर्जन जंगल में
खिलते-झरते फूलों का,
शूलों की शय्या पर
मूक विकल घायल फूलों का
हार्दिक स्वागत !

रंग - बिरंगे रस - वर्र्षी
रक्तिम फूलों का
उल्लास - भरा / उत्साह - भरा
मन - भावन स्वागत !

ऊबड़ - खाबड़
बाधक
कंटकमय पथ पर
राहत देते फूलों का
अन्तरतम से हार्दिक स्वागत !

लेकिन; केवल
पग - पग चुभते शूलों का अनुभव,
दूर - दूर तक बजता
खड़खड़ कर्कश उनका रव
करता तन आहत,
मन आहत !
हे स्रष्टा !
एकांगी जीवन की रचना से
बचना !

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(32) एकाकी
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भव्य भवनों से भरे
रौशनी में तैरते
सौन्दर्य के प्रतिबिम्ब
इस नगर में
कौन है परिचित तुम्हारा ?
कौन परिचित है ?

जिससे सहज बोलें
मिलें जब-तब.....
हृदय के भेद खोलें !
जिसे समझें
आत्मीय.....विश्वसनीय !
नि:संकोच जिसको
लिखें प्रिय-पत्र,
या दूरवाणी से करें सम्पर्क,

जिसके द्वार पर जा
दें अधिकार से दस्तक
पुकारें नाम !

ऐसा कौन है
परिचित तुम्हारा ?
अजनबी हैं सब,
अपरिचित हैं,
इतने बड़े-फैले नगर में !
कोई-कहीं
आता नहीं अपना
नज़र में !

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(33) अकेला
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अब तो, अरे
कोई याद तक करता नहीं,
आता नहीं !

मृत्यु के आगोश में
ज़िन्दगी खामोश है
अब तो, अरे
कोई गीत
मन रचता नहीं,
गाता नहीं !
वाद्य चुप हैं
कोई स्वर
बजता है / उभरता है !

जो थे
बीच पथ में खो गये,
जो हैं
थके - हारे / ऊब - मारे
सो गये !
किसको बुलाएँ,
किसको जगाएँ ?
दुनिया अपरिचित हो गयी,
हम बिराने हो गये !

किसके पास जाएँ,
किसे अपना बनाएँ ?
लीन हैं सब
स्वयं में,
अपने हर्ष में
ग़म में !
नहीं कोई रहा अब संग,
ज़िन्दगी बेरंग !

--------------------------
(34) पटाक्षेप
--------------------------

हो गयी शाम !

कोई नहीं आयगा,
भूल जाओ
सभी नाम !
हो गयी शाम !

मत करो रोशनी
अँधेरा भला है,
देख लूँ स्वप्न
हर बार जिसने
छला है !
विवश मूक मन में
पला है !

नहीं शेष
कोई काम !
हो गयी शाम !
सो लूँ
सरे-शाम,
अविराम!
आयाम.....
आयाम!

--------------------------
(35) विस्मय
--------------------------

कौन छीन ले गया हँसी फूलों की ?
कौन दे गया अरे, फ़सल शूलों की ?
कौन आह! फिर-फिर कलपाता, निर्दय
याद दिला कर, चिर-विस्मृत भूलों की ?

--------------------------
(36) मर्माहत
--------------------------

मुँह कड़वा है
घूँटें कैसे भरें ?

जीना लाचारी है
मन बेहद भारी है !
छद्म हँसी से
स्वागत कैसे करें ?

उजड़ा सूखा उपवन
नीरस नीरव जीवन
फूल कहाँ अब ?
पीले पत्ते झरें !

--------------------------
(37) खंडित मन
--------------------------

विश्वास
टूटता है जब
हिल उठती है धरती
अन्तर की,
अन्दर-ही-अन्दर
अपार रक्त-ज्वार बहता है !

लेकिन
व्यक्ति मौन रह
कुटिल - नियति के
संहारक प्रहार सहता है,
मूक अर्द्ध-मृत
अंगारों की शैया पर
पल-पल दहता है !

चीत्कारों और कराहों की
पृष्ठभूमि पर
मर - मर जीता है,
अट्ठहास भर - भर
काल-कूट पीता है !

विश्वास टूटता है जब,
साथ छूटता है जब !

--------------------------
(38) संन्यास - चेतना
--------------------------

अपनों का
कुटिल विश्वासघाती खेल
जब झेल लेता है
सरल विश्वास-धर्मी आदमी,
तब.....
एकांत में
रोता-तड़पता है,
दुर्भाग्य पर
रह-रह कलपता है !

किन्तु;
हत्या नहीं करता,
आत्म-हंता भी नहीं बनता;
अकेला
मानसिक नरकाग्नि में
खामोश जलता है,
स्वयं को दे असंगत सांत्वना
फिर-फिर भुलावे में भटकता है,
यों ही स्वयं को
बारम्बार छलता है !

उसे बुज़दिल नहीं समझो
जानता है वह
कुछ हासिल नहीं होगा
किसी को कोसने से।
भागना क्या
भोगने से !

--------------------------
(39) संबंध
--------------------------

विश्वास का जब दुर्ग
ढहता है
आदमी लाचार हो
गहनतम वेदना....
मूक सहता है !

तैयार होता है
निरर्थक ज़िन्दगी
जीने के लिए,
प्रति-दिन
कड़वी घूँट पीने के लिए !

जीवन-शेष दहता है !
विश्वास का जब दुर्ग
ढहता है !

या फिर
आत्म-हंता बन
शून्य में ख़मोश बहता है !
विसर्जित कर अस्तित्व
चुपचाप कहता है

किसी का भी
अरे, विश्वास मत तोड़ो,
विश्वास बंधन है,
विश्वास जीवन है !

--------------------------
(40) सहवर्ती
--------------------------

वेदना-धर्मी तरंगों !
और कितना
और कब-तक
गुदगुदाओगी मुझे ?

कितना और
कब-तक और
बेसाख्ता
हँसाओगी मुझे ?

भुज-बन्ध में भर
और कितनी देर तक
और कितनी दूर तक
अनुरक्त सहयोगी
बनाओगी मुझे ?

वेदना-धर्मी तरंगों !
क्रूर
आहत-चेतना-कर्मी तरंगों !

--------------------------
(41) वेदना
--------------------------

जीवन
निष्फल जाता
सह लेता,
जब-तब
शोकाकुल स्वर से
कविता कह लेता !
लेकिन
रिसते घावों का
पीड़क अनुभव सहना,
जीवन-भर
तीव्र दहकती भट्ठी में
पल-पल दहना
संहारक है
निर्मम हत्या-कारक है !

यह तो
सारा सागर गँदला है,
जाने
कितने-कितने जन्मों का
बदला है !

--------------------------
(42) अंतिम अनुरोध
--------------------------

निर्धन
बेहद निर्धन हूँ,
जाते-जाते
मुझको भी
जीने को
कुछ दे दो !

जो सचमुच
मेरा अपना हो
सुखदायी
मीठा सपना हो !

प्यासा
बेहद प्यासा हूँ,
जाते-जाते
मुझको भी
पीने को
कुछ दे दो !

निर्मल गंगा-जल हो,
झरता मधु-स्रव कल हो !

यों तो
अंतिम क्षण तक
तपना ही तपना है,
यात्रा-पथ पर
छाया तिमिर घना है !

एकाकी
जीवन अभिशप्त बना,
हँसना-रोना सख्त मना !

--------------------------
(43) सलाह
--------------------------

बहुत थके हो तन
हारे अशक्त मन
सो लो !

गुज़री ज़िन्दगी
अजब दुशवार में,
तेज़ चक्रवातों बीच
गूँजते हाहाकार में !

दुखी व्यथित मन,
गहन चोट खाये तन !
खो
याददाश्त,
तनिक स्वस्थ
हो लो !
बहुत थके हो
सो लो !

--------------------------
(44) दम्भ
--------------------------

मुझे :
छत दी / सुरक्षा दी
प्रतिष्ठा दी
एक प्यारा नाम
रिश्ते का दिया
क्या इसलिए
यह कथन चरितार्थ हो
'नफ़रत करो :
पाप-कारक कर्म से ;
पाप-चारी से नहीं ?'

पाप क्या है ?
पुण्य क्या है ?
सत्य क्या है ?

--------------------------
(45) अभिप्रेत-वंचित
--------------------------

जब
वांछित / काम्य / अभीप्सित
नहीं मिला,
जीने का क्या अर्थ रहा ?

कोसों फैले
लह-लह लहराते उपवन में
जब
हृदय-समायी : मन भायी
गंध-भरा
पुलकित पाटल नहीं खिला ;
जीवन-भर का तप व्यर्थ रहा !
जीने का क्या अर्थ रहा !

जब अन्तर-तम में
हर क्षण, हर पल
केवल मर्मान्तक त्रास सहा !

माना
बहुमूल्य अनेकों उपहार मिले
हीरों के हार मिले,
अनगिनत सफलताओं पर
असंख्य कंठों से
नभ-भेदी जय-जयकार मिले,
सर्वोच्च शिखर सम्मान मिले,
पग-पग पर वरदान मिले !

किन्तु;
नहीं पाया मन-चाहा
लगता है :
दुर्लभ जीवन निष्कर्म गया,
जैसे भंग हुई
लगभग साधित-कठिन तपस्या !

दहका दाह अभावों का,
हर सपना भस्म हुआ !
निर्धन, निष्फल, भिक्षु अकिंचन
जैसे नहीं किसी की लगी दुआ !

--------------------------
(46) अप्रभावित
--------------------------

वर्षों
जी लिया जीवन अकेले,
शेष भी
चुपचाप जी लेंगे !

विष-जल पी लिया
दिन.... रात
बेबस,
मृत्यु की उत्सुक प्रतीक्षा में !
भविष्य विनाश वीक्षा में !

विषज हर द्रव्य
हँस कर
शेष जीवन-हेतु
अपने-आप पी लेंगे !

मत करो चिन्ता -
निवासी विष-निलय का मैं,
महा शिवतीर्थ हूँ
अपने समय का मैं !


--------------------------
(47) आत्म-निरीक्षण
--------------------------

जीवन भर
कुछ भी
अच्छा नहीं किया !
ऐसे तो
जी लेते हैं सब,
कुछ भी लोकोत्तर
जीवन नहीं जिया !
अपने में ही
रहा रमा,
हे सृष्टा !
करना सदय क्षमा !

--------------------------
(48) वास्तविकता
--------------------------

सँभलते - सँभलते...
समय तीव्र गति से गुज़रता गया !
सब व्यवस्थित बिखरता गया !
हस्तगत था अरे जो
अचानक फिसलता गया ....
हर क़दम पर
सँभलते-सँभलते !

हर तार टूटा
सँवरते-सँवरते
कि फिरफ़िर उलझता गया !
बंध हर और कसता गया ;
सूत्र क्रमश: सुलझते-सुलझते
उलझता गया,
हर क़दम पर
सँवरते-सँवरते !

ज़िन्दगी कट गयी ज़िन्दगी
सीखते-सीखते,
खो गये कंठ-स्वर
चीखते-चीखते,
शास्त्र संगीत का
सीखते-सीखते !

--------------------------
(49) विराम - पूर्व : 1
--------------------------

स्मृतियाँ फ़ूल हैं !
रंग-बिरंगे
खिलखिलाते फूल हैं !

स्मृतियाँ
जागती हैं जब
लगता है कि मानों
सज गये हर द्वार बंदनवार
चारों ओर !
जीवन महकता है
सुगन्धों से,
जीवन छलकता है
मधुर मादन रसों से
जीवन जगमगाता है
चटक नवजात रंगों से !
आदमी
ऐसे क्षणों में डूब जाता
स्वप्न के मधु लोक में
सुध-बुध भूल !

दीखता सर्वत्र
अनुकूल-ही-अनुकूल,
जैसे डालियों पर
झूलते हों फूल !

झूमते हों
प्रिय अनुभूतियों के फूल !

--------------------------
(50) विराम - पूर्व : 2
--------------------------

स्मृतियाँशूल हैं !
धँसते नुकीले शूल हैं !

स्मृतियाँ
जागती हैं जब
लगता है कि मानों
उड़ रही है धूल चारों ओर,
जीवन दहकता
कष्टकर नरकाग्नि में,
जीवन लड़खड़ाता चीखता
सुनसान में,
भर हत हृदय में हूल !
आदमी
ऐसे क्षणों में टूट गिरता
तिमिरमय घन गुहा में
हिल उखड़ आमूल !
दीखता सर्वत्र
प्रतिकूल-ही-प्रतिकूल,
भेदते अन्त:करण को
तीव्र चुभते शूल !
अनइच्छित
दुखद अनुभूतियों कें शूल

--------------------------
(51) बोध
--------------------------

अद्भुत
कश--कश में
दिन.... हफ्ते... महीने....वर्ष
गुज़रते जा रहे,
विस्मय !
नहीं वश में
अरे, कुछ भी नहीं वश में,
'विवशता'
अर्थ :
जीवन तो नहीं ?

एक दिन
यों ही अचानक
हो जाएगा लय
सब !
कहीं क्या दीखती है
विभाजक-रेख ?
फिर क्या कहा जाए
सार्थक / व्यर्थ ?

अस्तित्व
लुप्त होने के लिए,
जन्म-जागृति
सुप्त होने के लिए,
फिर,
यह कश--कश किसलिए ?

गुज़रने दो
रात दिन / दिन रात
पल-क्षण,
काल-क्रम अविरत,
विषम-सम !

--------------------------
(52) सच है
--------------------------

ज़िन्दगी शुरू हुई
कि अन्त गया !
अभी-अभी हुई सुबह
कि अंधकार छा गया !

आसमान में
सतत बिखर-बिखर
किरण-किरण
विलीन हो गयी
कि दूर-दूर तक
प्रखर प्रकाश की
अजस्र धार खो गयी ?

यहाँ-वहाँ सभी जगह
अपार शोर था,
व्योम के हरेक छोर तक
लाल-लाल भोर था,
राग था,
गीत था,
प्यार था,
मीत था,
विलुप्त सब !

रुको ज़रा
प्रकाश आयगा,
प्रकाश का प्रवाह आयगा !
नया विहान छायगा !

--------------------------
(53) स्वागत : 21वीं शती का
--------------------------

आगामी सौ वर्षों में
वि-ज्ञान सूर्य की
अभिनव किरणों से
आलोकित हो
मानव-मन !

अंधे विश्वासों से
अंधी आस्था से
ऊपर उठ कर,
मिथ्या जड़ आदिम
तथाकथित धर्मों की
कट्टरता से
हो कर मुक्त
नयी मानवता का
सच्चा पूजक हो
जन-जन !

एक अभीप्सित
व्यापक विश्व-धर्म में
दीक्षित हो
पूर्ण लोक,
फेंके उतार
गतानुगत खोखले विचारों का
सड़ा-गला निर्मोक !
क्षयी विगलित
कुष्ठ-कोष आवरण कवच,
जिससे दीखे केवल
सच...सच !

आगामी सौ वर्षों में
स्थापित हो साम्राज्य
दया ममता करुणा का,
फैले
अभिमंत्रित संस्कृत शीतल
जल वरुणा का

वीभत्स घृणा-दर्शन
हिंसा से,
आहत मानव मन पर
तन पर !

वसुधा
आप्लावित हो
उन्नत भावों सद्भावों से,
आच्छादित हो
मर्यादित न्यायोचित प्रस्तावों से !
हो लुप्त जगत से
बर्बरता
क्रूर दनुजता
ध्वंसक वैर विकलता,
सब
देव सहिष्णु बनें,
पालनकर्ता विष्णु बनें !

--------------------------
(54) अभिनन्दित - क्षण
--------------------------

शुभ-संकल्पों की
फहराती
कल्याण-पताका
सौभाग्य-पताका,
आयी पृथ्वी पर
नयी शती
इक्कीसवीं शती !

उड़ती
अति-सुन्दर
स्वर्ग-वधू-सम
श्वेताम्बर लहराती,
नवयुग-मंडप में
स्थापित करती
शान्ति-कलश सुख,
स्वस्ति मुख
आयी पृथ्वी पर
नयी शती
इक्कीसवीं शती !

मानव के
चिर-इच्छित सपनों को
धरती पर
करने साकार,
देने
उसकी सर्वोत्तम रचना को
दृढ़ आधार,
उतरी
जन-मानस पर
नयी शती
इक्कीसवीं शती !
स्वागत !
श्रम-रत
हम
करते हार्दिक स्वागत !

--------------------------
(55) विजयोल्लास
--------------------------

हमने चाहा
जी लें जब-तक आये
नयी शती !
हमने चाहा
धड़कन बंद हो
जब-तक आये
हँसती-गाती
नयी शती !
पूरी होती
इस इच्छा पर
कौतूहल है,
मानव-आस्था में
सच;
कितना बल है !
अद्भुत बल है !
हमने चाहा
जी लें जब-तक आये
नयी शती !
आख़िर ही गयी
थिरकती नयी शती
सचमुच
ही गयी
ठुमकती नयी शती !
मृत्यु पराजित
जीवन जीत गया !
सफल तपस्या,
पहनूंगा अब
सुविधा से परिधान नया !
--------------------------

रचना-काल : सन् 1997-2000
प्रकाशन-वर्ष : सन् 2001
प्रकाशक : इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली — 110 006

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

डॉ0 महेन्द्रभटनागर का काव्य-संग्रह ---- "नयी चेतना"

महेंद्रभटनागर का काव्य संग्रह --- नयी चेतना

=====================================

1 बिजलियाँ गिरने नहीं देंगे !
2 ललकार
3 आज़ादी का त्योहार
4 अपराजित
5 चेतना
6 काटो धान
7 रोक न पाओगे
8 जागते रहेंगे
9 नया इंसान
10 आँधी
11 झंझावात
12 नव-निर्माण
13 ज़िन्दगी का कारवाँ
14 बढ़ते चलो
15 नये इंसान से तटस्थ-वर्ग
16 नयी दिशा
17 परम्परा
18 गन्तव्य
19 क्या हुआ
20 दूर खेतों पार
21 युग और कवि
22 विश्वास
23 आश्वस्त
24 दीपक जलाओ
25 आभास होता है
26 आज देखा है
27 मुझे भरोसा है
28 मुख को छिपाती रही
29 नया समाज
30 युगान्तर
31 छलना
32 मत कहो
33 नया युग
34 पदचाप
35 भोर का आह्नान
36 निरापद
37 सुर्खियाँ निहार लो
38 युग-परिवर्तन
39 नयी संस्कृति
40 गंगा बहाओ
41 नयी रेखाएँ
42 भविष्य के निर्माताओ!
43 मेघ-गीत
44 बरगद
45 कवि

=====================================

(1) बिजलियाँ गिरने नहीं देंगे !
=====================================

कुछ लोग
चाहे ज़ोर से कितना
बजाएँ युद्ध का डंका
पर, हम कभी भी
शांति का झंडा
ज़रा झुकने नहीं देंगे !
हम कभी भी
शांति की आवाज़ को
दबने नहीं देंगे !

क्योंकि हम
इतिहास के आरम्भ से
इंसानियत में,
शांति में
विश्वास रखते हैं,
गौतम और गांधी को
हृदय के पास रखते हैं !

किसी को भी सताना
पाप सचमुच में समझते हैं,
नहीं हम व्यर्थ में पथ में
किसी से जा उलझते हैं !

हमारे पास केवल
विश्व-मैत्री का
परस्पर प्यार का संदेश है,

हमारा स्नेह -
पीड़ित ध्वस्त दुनिया के लिए
अवशेष है !
हमारे हाथ -
गिरतों को उठाएंगे,
हज़ारों
मूक, बंदी, त्रस्त, नत,
भयभीत, घायल औरतों को
दानवों के क्रूर पंजों से बचाएंगे !

हमें नादान बच्चों की हँसी
लगती बड़ी प्यारी ;
हमें लगती
किसानों के
गड़रियों के
गलों से गीत की कड़ियाँ
मनोहारी !

खुशी के गीत गाते इन गलों में
हम
कराहों और आहों को
कभी जाने नहीं देंगे !
हँसी पर ख़ून के छींटे
कभी पड़ने नहीं देंगे !

नये इंसान के मासूम सपनों पर
कभी भी बिजलियाँ गिरने नहीं देंगे !
1950

=====================================
(2) ललकार
=====================================

शैतान के साम्राज्य में तूफ़ान आया है,
जो ज़िन्दगी को मुक्ति का पैग़ाम लाया है !
इंसान की तक़दीर को बदलो,
भयभीत हर तस्वीर को बदलो,
हमारे संगठित बल की यही ललकार है !
.

मासूम लाशों पर खड़ा साम्राज्य हिलता है,
तम चीर कर जन-शक्ति का सूरज निकलता है,
चट्टान जैसे माथ उठते हैं,
फ़ौलाद से दृढ़ हाथ उठते हैं
अमन के शत्रु से जो छीनते हथियार हैं !
हमारे संगठित बल की यही ललकार है !
.

लो रुक गया रक्तिम प्रखर सैलाब का पानी,
अब दूर होगी आदमी की हर परेशानी !
सूखी लताएँ लहलहाती हैं,
नव-ज्योति सागर में नहाती हैं,
खुशी के मेघ छाये हैं, बरसता प्यार है !
हमारे संगठित बल की यही ललकार है !
.
1951

=====================================
(3) आज़ादी का त्योहार
=====================================

लज्जा ढकने को
मेरी खरगोश सरीखी भोली पत्नी के पास
नहीं हैं वस्त्र,
कि जिसका रोना सुनता हूँ सर्वत्र !
घर में, बाहर,
सोते-जगते
मेरी आँखों के आगे
फिर-फिर जाते हैं
वे दो गंगाजल जैसे निर्मल आँसू
जो उस दिन तुमने
मैले आँचल से पौंछ लिए थे !

मेरे दोनों छोटे
मूक खिलौनों-से दुर्बल बच्चे
जिनके तन पर गोश्त नहीं है,
जिनके मुख पर रक्त नहीं है,
अभी-अभी लड़कर सोये हैं,
रोटी के टुकड़े पर,
यदि विश्वास नहीं हो तो
अब भी
तुम उनकी लम्बी सिसकी सुन सकते हो
जो वे सोते में
रह-रह कर भर लेते हैं !
जिनको वर्षा की ठंडी रातों में
मैं उर से चिपका लेता हूँ,
तूफ़ानों के अंधड़ में
बाहों में दुबका लेता हूँ !

क्योंकि, नये युग के सपनों की ये तस्वीरें हैं !
बंजर धरती पर
अंकुर उगते धीरे-धीरे हैं !

इनकी रक्षा को
आज़ादी का त्योहार मनाता हूँ !
अपने गिरते घर के टूटे छज्जे पर
कर्ज़ा लेकर
आज़ादी के दीप जलाता हूँ !
अपने सूखे अधरों से
आज़ादी के गाने गाता हूँ !
क्योंकि, मुझे आज़ादी बेहद प्यारी है!
मैंने अपने हाथों से
इसकी सींची फुलवारी है !

पर, सावधान ! लोभी गिद्धो !
यदि तुमने इसके फल-फूलों पर
अपनी दृष्टि गड़ाई,
तो फिर
करनी होगी आज़ादी की
फिर से और लड़ाई !
1951

=====================================
(4) अपराजित
=====================================

हो नहीं सकती पराजित युग-जवानी !

संगठित जन-चेतना को,
नव-सृजन की कामना को,
सर्वहारा-वर्ग की युग -
युग पुरानी साधना को,
आदमी के सुख-सपन को,
शंति के आशा-भवन को,
और ऊषा की ललाई
से भरे जीवन-गगन को,
मेटने वाली सुनी है क्या कहानी ?

पैर इस्पाती कड़े जो
आँधियों से जा लड़े जो,
हिल न पाये एक पग भी
पर्वतों से दृढ़ खड़े जो,
शत्रु को ललकारते हैं,
जूझते हैं, मारते हैं,
विश्व के कर्तव्य पर जो
ज़िन्दगी को वारते हैं,
कब शिथिल होती, प्रखर उनकी रवानी !

शक्ति का आह्वान करती,
प्राण में उत्साह भरती,
सुन जिसे दुर्बल मनुज की
शान से छाती उभरती,
जो तिमिर में पथ बताती,
हर दिशा में गूँज जाती,
क्रांति का संदेश नूतन
जा सितारों को सुनाती,
बंद हो सकती नहीं जन-त्राण-वाणी !
1951

=====================================
(5) चेतना
=====================================

हर दिशा में जल उठी ज्वाला नयी,
लालिमा जीवन-जगत पर छा गयी !

है नयी पदचाप से गुंजित मही,
ज्योति अभिनव हर किरण बिखरा रही !

छिन्न सदियों का अँधेरा हो गया,
राह पर जगमग सबेरा है नया !

यह विगत युग का न कोई साज़ है,
रूप ही बदला धरा ने आज है !

वर्ग-भेदों को मिटाने चेतना
कर रही सामान्य की आराधना !

काल बदला और बदली सभ्यता,
दे रही नव फूल संस्कृति की लता !

फूल वे जिनमें मधुर सौरभ भरा,
मुसकराती पा जिन्हें भू-उर्वरा !

स्वार्थ, शोषण की इमारत ढह रही,
भग्न ढूहों पर सृजन-सरि बह रही !

शीत के लघु-ताप से सिकुड़े हुओ,
पास आता जा रहा ‘क्यूरो सिवो’ !

धूप से झुलसे हुए ‘होरी’ कृषक
आ रही ‘जल की हवा’ जीवन-जनक !

उर लगाले जीर्ण ‘धनिया’-देह को
(रोक ले रे ! छलछलाते स्नेह को !)

आज तो आकाश अपना हो गया,
आदमी का, सत्य सपना हो गया !
1948

=====================================
(6) काटो धान
=====================================

काटो धान, काटो धान,
काटो धान !

सारे खेत
देखो दूर तक कितने भरे,
कितने भरे / पूरे भरे !
घिर लहलहाते हैं
न फूले रे समाते हैं!
हवा में मिल
कुसुम-से खिल

उठो, आओ,
चलो, इन जीर्ण कुटियों से
बुलाता है तुम्हें, साथी !
खुला मैदान !

जब हिम-नदी का चू पड़ा था जल
अनेकों धार में चंचल,
हिमालय से
बहायी जो गयी थी धूल
उसमें आज खिलते रे श्रमिक !
तेरे पसीने से सिँचे
प्रति पेड़ की हर डाल में
सित, लाल, पीले, फूल !
जीन के लिए देती तुम्हें
ओे ! आज भू माता
सहज वरदान !

आकाश में जब घिर गये थे
मॉनसूनी घन सघन काले,
हृदय सूखे हुए
तब आश-रस से भर गये थे
झूम मतवाले !

किसी
सुन्दर, सलोनी, स्वस्थ, कोमल, मधु
किशोरी के नयन
कुछ मूक भाषा में
नयी आभा सजाए जगमगाए श्वेत-कजरारे !
हुए साकार
भावों से भरे
अभिनव सरल जीवन लिए,
नूतन जगत के गान !

जो सृष्टि के निर्माण हित बोए
तुम्हारी साधना ने बीज थे
वे पल्लवित !
सपने पलक की छाँह में
पा चाह
शीतल ज्योत्स्ना की गोद में खेले !
(अरी इन डालियों को बाँह में ले ले !)
उठो !
कन्या-कुमारी से अखिल कैलाश के वासी
सुनो, गूँजी नयी झंकार !
हर्षित हो उठो!
परिवार सारे गाँव के
देखो कि चित्रित हो रहे अरमान !

टूटे दाँत / सूखे केश,
मुख पर
झुर्रियों की वह सहज मुसकान,
प्रमुदित मुग्ध
फैला विश्व में सौरभ
महकता नभ,
सजग हो आज
मेर देश का अभिमान !
1948

=====================================
(7) रोक न पाओगे
=====================================

जग में आज सुनायी देती आवाज़ नयी,
जिसकी प्रतिध्वनि भू के कण-कण में गूँज गयी !

समझ गये शोषित-पीड़ित जिसका अर्थ सभी,
अब तो जन-शक्ति-विपथ के साधन व्यर्थ सभी !

मूक जनों को आज गिरा का वरदान मिला,
श्रमजीवी-जन को अपना प्यारा गान मिला,

युग-युग की अवरुद्ध उपेक्षित नव-राह खुली,
जन-पथ के सब द्वार खुले, जग-जनता निकली !

विजयी घोषों से फट-फट पड़ती है तुरही,
काँप रहा है आज गगन, काँपी आज मही !

विशृंखल; वर्गों की निर्मित सारी कड़ियाँ,
देश-काल की अब सीमा मिटने की घड़ियाँ !

नक़ली दीवारो ! नहीं रुकगी नयी हवा ,
बस, कर दो राह कि बचने की है यही दवा !

जर्जर संस्कृति के रक्षक भागो ! आग लगी !
इन अँगारों से तो लपटों की धार जगी !

इसको और हृदय से चिपटाना घातक है,
आसक्ति, तुम्हारी ही काया की भक्षक है !
1948

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(8) जागते रहेंगे
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आग बन गया
उपेक्षितों का वर्ग ;
कि ढह रहा प्रवंचना का दुर्ग !
पत्थरों के कोयले धधक उठे,
लपट मशाल बन
हवा के संग
अंधकार पर प्रहार कर रही !

जगमगा उठी
दमित युगों की रात;
पर्व है ‘नुशूर’ का —
मृतक शरीर कब्र फोड़
जागता है नींद छोड़ !

जंगलों के पेड़
खड़खड़ा उठे !
ये आँधियाँ हैं
जो कभी उड़ी नहीं,
ये बिजलियाँ हैं
जो कभी गिरी नहीं,
कि बदलियाँ गभीर
जो कभी घिरी नहीं !
गरज से कड़कड़ा रहा
दंत पीस क्रुद्ध दिग-दिगन्त !

संगठित समूह की दहाड़ से
नये समाज में
तमाम शोषकों के कागज़ी पहाड़
राख हो रहे !
कि जड़ समेत सब उखड़
हवा के तामसी महल
सहज में ख़ाक हो रहे !

यह आग है कि
बर्फ़ की तहों से दब न पायगी,
कि क्षिप्र जल की धार से
कभी भी बुझ न पायगी !
जब तलक है
अंधकार शेष इस ज़मीन पर
तब तलक
अमीर खटमलों-सा
चूसता रहेगा निर्धनों का रक्त !
हर गली में
भूत की डरावनी हँसी
निराट गूँजती रहेगी
तब तलक !

प्रसुप्त
प्रस्तरों की चादरों को छोड़,
प्रांशु भाल,
प्राज्य शक्ति,
ध्रुव प्रतीति ले
उठा रहा प्रहारना का अस्त्रा !
है असाँच-गर्व मृत,
असार —
अस्तमन, विधुर, विपन्न ;
अब विभीषिका-विभावरी
विभास से विभीत पिंगला !

नवीन ज्योति का
सशक्त कारवाँ चला,
कि गिर रहा है टूट-टूट कर
क़दम-क़दम पर अंधकार !
जागते रहेंगे हम,
कि जब तलक
यह रुद्ध-राह-द्वार
खुल न जायगा,
यह वर्ग-भेद, जाति-द्वेष
मिट न जायगा,
हमारी धमनियों में
ख़ून खौलता रहेगा
तब तलक !
1949

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(9) नया इंसान
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आज नया इंसान, पड़ी चरणों की, तोड़ रहा ज़ंजीर !

उबल उठा है स्वस्थ युगों की ताक़त का उन्माद,
जन-जन के बंदी जीवन को करने को आज़ाद,
उजड़े ध्वस्त घरों को फिर से करना है आबाद,
आगे बढ़ना है सदियों का छाया सघन अँधेरा चीर !

हिलते महलों की दीवारों से आती आवाज़,
भय से ग्रस्त कि मानों हो ही गिरने वाली गाज,
मिटनेेवाला है अब जग का शोषक-जीर्ण-समाज,
निश्चय, अब रह न सकेंगे दुनिया में आदमख़ोर अमीर !

जन-बल के क़दमों की आहट से गूँजा संसार,
दुर्बल बन दुश्मन का वक्ष दहलता है हर बार,
खुलते जाते अवरुद्ध-पंथ के लो सारे द्वार,
अब धार नहीं बाक़ी, खा ज़ंग गयी सामंती-शमशीर !

सत्य प्रखर अब सम्मुख आया, जीत गया विश्वास,
वांछित नवयुग पास कि लुप्त हुआ पिछला आभास,
अब रखनी न सुरक्षित मन में कोई खोयी आस,
दुनिया के परदे पर, हर मानव की आज नयी तसवीर !
आज नया इंसान, पड़ी चरणों की, तोड़ रहा ज़ंजीर !
1950

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(10) आँधी
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बड़ा शोर करती उठी आज आँधी,
क्षितिज-से-क्षितिज तक घिरी आज आँधी !

समुन्दर जिसे देखकर खिलखिलाया,
निखिल सृष्टि काँपी प्रलय-भय समाया !

पुराने भवन सब गिरे लड़खड़ाकर,
बड़ी तेज़ आयीं हवाएँ हहर कर !

दिवाकर किसी का छिपा थाम दामन,
दहलता भयावह बना विश्व-आँगन !

उमड़ता नये जोश में वन्य-दरिया,
लहरता नवल होश में वन्य-दरिया !

रुकेगी न आँधी सरीखी जवानी,
बना कर रहेगी नयी ही कहानी !

असम्भव कि ठहरे रुकावट पुरानी,
शिथिल हो न पायी कभी भी रवानी !

न रोके रुकेगी बड़ी शक्तिशाली,
न फीकी पड़ेगी कभी द्रोह लाली !

कि चीलें उतरती चली आ रही हैं,
अँधेरी घटाएँ घुमड़ छा रही हैं !

मगर खोल सीना अकेला डगर पर
बढ़ा जा रहा जूझता जो निरन्तर,

वही व्यक्ति दृढ़ शक्ति-युग का तरुण है,
बदलना धरा को कि जिसकी लगन है !

विरोधी रुकावट मिटाता चला जो,
नदी शांति की नव बहाता चला जो,

वही क्रांति आभास-दृष्टा सदा से,
वही विश्व-इतिहास-स्रष्टा सदा से,

उसी की सबल मुक्त लंबी भुजाएँ
नये ख़ून से मोड़ देंगी हवाएँ !
1951

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(11) झंझावात
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पूरब में
नयी जन-चेतना का
आज झंझावात आया है !
अमिट विश्वास ने
इंसान के उर में,
बड़ा मज़बूत
अपना घर बनाया है!

तभी तो —
दुश्मनों के शक्तिशाली दुर्ग पर
क्रोधित हवाएँ
दौड़तीं ललकारतीं
जा जूझ टकरायीं,
कि जिससे दुर्ग के
प्राचीर, गुम्बज, कोट
होते हैं धराशायी !

उभरती शक्ति जनता की
दबाये अब नहीं दबती,
धधकती द्रोह की ज्वाला
बुझाये अब नहीं बुझती !
अथक संघर्ष चारों ओर
नूतन ज़िन्दगी का है,
कि नूतन ज़िन्दगी वह जो
मिटाये मिट नहीं सकती !

गगन को घेर कर
चिनगारियाँ जिसकी
चमकती और उड़ती हैं,
उसी के ताप से
फ़ौलाद की दृढ़ शृंखलाएँ दृप्त
मुड़ती हैं !
बड़ी गहरी घटाएँ
आसमानों पर घुमड़ती हैं !

न सरकेगी कभी चटृन
जिस पर उठ रही
दुर्भेद्य नव दीवार !
हिंसक भेड़ियों
नंगे लुटेरों की
कहीं नीचे दबी है लाश !
होगी सर्वहारा-वर्ग की
निश्चय सुरक्षा;
क्योंकि आया आज पूरब में
नयी जन-चेतना का
तीव्र झंझावात !
1950

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(12) नव-निर्माण
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मैं निंरतर राह नव-निर्माण करता चल रहा हूँ
और चलता ही रहूँगा !

राह — जिस पर कंटकों का
जाल, तम का आवरण है,
राह — जिस पर पत्थरों की
राशि, अति दुर्गम विजन है,
राह — जिस पर बह रहा है
टायफ़ूनी-स्वर-प्रभंजन,
राह — जिस पर गिर रहा हिम
मौत का जिस पर निमंत्रण,

मैं उसी पर तो अकेला दीप बनकर जल रहा हूँ,
और जलता ही रहूँगा !

आज जड़ता-पाश, जीवन
बद्ध, घायल युग-विहंगम,
फड़फड़ाता पर, स्वयं
प्राचीर में फँस, जानकर भ्रम,
मौन मरघट स्तब्धता है
स्वर हुआ है आज कुंठित,
सामने बीहड़ भयातंकित
दिशाएँ कुहर गुंठित,

विश्व के उजड़े चमन में फूल बनकर खिल रहा हूँ
और खिलता ही रहूँगा !
1948

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(13) ज़िन्दगी का कारवाँ
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ज़िन्दगी का कारवाँ रुकता नहीं, रुकता नहीं !

ये क्षणिक तूफ़ान तो आते गुज़र जाते,
केश केवल कुछ हवा में उड़ बिखर जाते !
पर, सतत गतिमय क़दम इंसान के कब डगमगाये ?
और ताक़त से इसी क्षण पैर जनबल ने उठाये !
ज़िन्दगी का कारवाँ यह
आफ़तों के सामने झुकता नहीं, झुकता नहीं !

रह नहीं सकती हमेशा यामिनी काली,
रोज़ फूटेगी नयी आकाश से लाली
देख कर जिसको, मनुज हर, दौड़ कर स्वागत करेगा,
पर, तिमिर से डर भयावह रुग्ण क्या साँसें भरेगा ?
ज़िन्दगी का कारवाँ यह
भाग्य के निर्मित सितारों को कभी तकता नहीं !

मेघ के टुकड़े सरीखा यह अकेलापन,
है बड़ा इससे कहीं चलता हुआ जीवन !
राह चाहे जल-विहीना, वृक्ष-हीना, रेतमय हो,
राह चाहे व्यक्तिहीना, घर-विहीना, ज्योति लय हो,
ज़िन्दगी का कारवाँ यह
हार कर संघर्ष-पथ पर भूल कर थकता नहीं !

जिस हृदय ने साफ़ अपना लक्ष्य देख लिया
वह तो बहाएगा सदा ही आश का दरिया !
लड़खड़ाता चल रहा जो, मौत की तसवीर है वह,
जो रुका है मध्य पथ में, रोग-वाहक नीर है वह,
ज़िन्दगी का कारवाँ यह
मिट निराशा की नदी में डूब बह सकता नहीं !
1952

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(14) बढ़ते चलो
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राह पर बढ़ते चलो !

दूर मंज़िल है तुम्हारी,
पर, क़दम होंगे न भारी,
आज तक युग की जवानी ने कभी हिम्मत न हारी !
आँधियों से जूझनेवालो !
निडर हँस-हँस प्रखर बढ़ते चलो !

बल अमिट विश्वास का है,
बल अतुल इतिहास का है,
बल अथक भावी जगत में फिर नये मधुमास का है,
ओ युवक ! निज रक्त से नव-दृढ़
इमारत विश्व में गढ़ते चलो !

तम बिखरता जा रहा है,
नव सबेरा आ रहा है,
सृष्टि का कण-कण सृजन का गीत अभिनव गा रहा है,
इसलिए तुम भी
नये युग की प्रतिष्ठा के लिए लड़ते चलो !
1952


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(15) नये इंसान से तटस्थ-वर्ग
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ओ नये इंसान !
तुमसे एक मुझको बात करनी है;
बात वह ऐसी कि जिसको
वर्ग के मेरे अनेकों
मर्द, औरत,
वृद्ध, बच्चे, नवयुवक
सब चाहते हैं आज तुमसे पूछना।

और वह है ज़िन्दगी की
आज से बेहतर, नयी, खुशहाल
प्यारी ज़िन्दगी की बात !

जो कि उस दिन,
याद है मुझको
अधर में रुक गयी थी,
क्योंकि तुम संघर्ष में रत थे !
विराधी चोट से सारे
तुम्हारे अंग आहत थे !

तुम्हारे पास, पर,
उज्ज्वल भविष्यत् का बड़ा विश्वास था,
आदमी की शक्ति का इतिहास था;
उसकी विजय का चित्र
आँखों में उभरता था,
युगों का स्नेह
इस घायल धरित्री पर बिखरता था,

तभी तो तुम
दमन के बादलो को चीर कर
काली मुसीबत की
भयानक रात का उर भेद कर,
अभिनव किरण बनकर
नये इंसान की संज्ञा
जगत से पा रहे हो !
और उसको तुम
प्रगति पथ पर
सतत ले जा रहे हो !

पास मंज़िल है,
उछलता भोर का दिल है,
बड़ा नज़दीक साहिल है !

भरोसा है मुझे निश्चय
तुम्हारे हर इरादे पर,
अकेली बात इतनी है
कि तुम कैसी नयी दुनिया बनाओगे ?
हृदय में आज मेरे भी
नयी रंगीन दुनिया की
नयी तसवीर है,
दुनिया को बदलने की
प्रसविनी पीर है !
क्या तुम उसे भी देख
मुझको साथ लेकर चल सकोगे ?

क्योंकि मैं अबतक
विलग, निर्लिप्त तुमसे
मध्यवर्ती,
दूर,
और तटस्थ था !

1951


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(16) नयी दिशा
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चारों ओर है गतिरोध !
पथ अवरुद्ध,
खंडित मान्यताएँ हीन,
जर्जर रूढ़ियों की सामने प्राचीन
फैली ‘चीन की दीवार’ !
कैसे चढ़ सकोगे
और कैसे कर सकोगे पार ?

बोलो !
ये पुरातन नीतियाँ, विश्वास,
मृत औ’ संकुचित दर्शन पुराना ले,
पुरानी धारणाओं से,
पुरानी कल्पनाओं से
कभी क्या जीत पाओगे ?
कभी अपने बनाये लक्ष्य को
साकार कर क्या देख पाओगे ?

बदलते विश्व के सम्मुख,
कि अनुसंधान
जब विज्ञान के बढ़ते चले जाते,
नये साधन, कलें नूतन
व आविष्कार बढ़ प्रतिपल
चुनौती आज
गर्वोन्नत ‘जगत की छत’ खड़े पामीर को देते,
उठे एवरेस्ट,
गहन प्रशान्त-सागर को,
अनेकों ग्रह-सितारों को,
चमकते दूर चंदा को,
नये उन्नत विचारों के सहारे
जो सतत अधिकार में अपने
सदा करते बढ़े जाते !
हुए पूरे
न होनी आज चाहों के सभी सपने !

ज़रा उठ खोल तो आँखें
नयी फैली दमकती रोशनी के सामने !
लो फिर करो उपयोग,
तुम हर वस्तु का उपभोग !
मनुज हो तुम
लिए बल-बुद्धि का भंडार,
मनुजता के सभी अधिकार,
प्रगति का है तुम्हें वरदान,
दुर्दम शक्ति का अभिमान,
तुम्हारा ध्येय है
तोड़ो पुरानी ज़िन्दगी के तार,
जिनमें बज न सकती अब मधुर झंकार !
कहाँ तक कर सकोगे शोध ?
है सब व्यर्थ सारा क्रोध !

जब सब डगमगायी हैं दिवारें
नींव से -
गिर कर रहेंगी ही,
कि जब ये आँधियाँ चल दीं क्षितिज से
शीघ्र आ घिर कर रहेंगी ही !

तुम्हें तो छोड़ना है
आज यह अपनत्व की
हर वासना का रूप,
कर दो बन्द
तम से ग्रस्त अवनति कूप !
असफल मोह से कर द्रोह,
मिथ्या स्वप्न की माया,
खड़ी बन शून्य की
निस्सार धुँधली क्षीण-सी छाया
कि जिसमें है न कोई आज आकर्षण !
निरर्थक क्या ?
अरे घातक !

सजग हो जा
नहीं तो नाश निश्चित है,
खड़ा हो जा
सुदृढ़ चट्टान-सा बनकर
नहीं तो धर्म तेरा रे कलंकित है,
कि बढ़कर रोक ले तूफ़ान
वरना आज
पौरुष धैर्य विगलित है !
न हो भयभीत
तेरे सामने हुंकारता है बढ़
ज़माना नव्य,
भावी विश्व की ले कल्पना दृढ़ भव्य !

जनता की प्रखर आवाज़
गूँजी आज,
जो किंचित नहीं अब चाहती है
‘ताजवालों’ का कहीं भी राज !

पीड़ित, त्रास्त, शोषित, सर्वहारा की
उमड़ती बाढ़-सी धारा,
लगाकर यह गगन-भेदी सबल नारा —
नयी दुनिया बनानी है !
न होगा चिन्ह जिसमें एक भी
मृत घृणित पूँजीवाद का,
बरबाद होगा विश्व से
हर रूप तानाशाह का,
केवल जगत् नव-साम्य-पथ पर
ले सकेगा साँस,
सुख की साँस !
जिसमें आश
नूतन ज़िन्दगी की ही भरी होगी,
कि जिसकी राह पर चलकर
धरा सूखी हरी होगी !
मिटा देगा उसी पथ का बटोही
दुःख के पर्वत,
विषमता की गहनतम खाइयाँ
सब पाट देगा
कर्म का उत्साह,
नूतन चेतना की प्रेरणा से
ये पुराने सब
क़िले, दीवार, दर्रे टूट जाएँगे !
1949

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(17) परम्परा
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परम्परा, परम्परा, परम्परा !

जकड़ लिया
मिटा दिया
निशान धूल झोंक कर
युगों चला लिया,
गुलाम हो गये
बना स्वयं अनेक रीतियाँ
प्रथा बनाम रूढियाँ !

नवीन स्वर नहीं सुना ?
नया स्वरूप भी नहीं दिखा ?
बदल गया जहान
सत्य आ गया खरा !
कहाँ गयी
परम्परा, परम्परा, परम्परा ?

अंध मान्यता,
कठोर मान्यता,
असार मान्यता !
अरे बता -
कि धर्म ... धर्म ... धर्म ... की पुकार
मच रही,
यहाँ वहाँ सभी जगह
कि मार-धाड़,
हो गया मनुज गवाँर,

कौन-सा अमूल्य धर्म वह सुना रहा ?

क़ुरान ?
वेद ? उपनिषद ? पुराण ?
बाइबिल ?
सभी बदल चुके !
नवीन ग्रन्थ और एक ‘ईश’ चाहिए,
कि जो युगीन जोड़ दे
नया, नया, नया !
व लहलहा उठे
मनुज-महान-धर्म की
सड़ी-गली लता !

सुधार मान्यता,
नवीन मान्यता,
सशक्त मान्यता !

न व्यर्थ मोह में पड़ो
न कुछ यहाँ धरा !
बदल परम्परा, परम्परा, परम्परा !
1948

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(18) गन्तव्य
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यह जीवन का गन्तव्य नहीं !

निष्फल क्षय-ग्रस्त कराहों का,
इन सूनी-सूनी राहों का,
असफल जीवन की आहों का,
स्वप्न-निमीलित, मोह-ग्रसित यह
जाग्रत-उर का मन्तव्य नहीं !

वैयक्तिक स्वार्थों पर निर्मित ,
आत्म-तुष्टि के साधन सीमित,
पथ पार्थिव सुख पर कर लक्षित,
जन-मन-रागों से दूर कहीं
मानवता का भवितव्य नहीं !

बीते युग पर पछताने का,
या याद पुरानी गाने का,
है ध्येय न आज ज़माने का,
युग की वाणी से रही विमुख
एकांत-कला क्या भव्य कहीं ?
1952

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(19) क्या हुआ?
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वही शिथिल, अस्वस्थ, रुग्ण है शरीर,
क्या हुआ पहन लिया नवीन चीर ?
वही थके चरण,
वही दबे नयन,
कि क्या हुआ क्षणिक सुरा
उतर गयी गले ?
निमिष नज़र के सामने
अगर यह छा गया चमन !
सपन बहार आ गयी !

समीर है वही गरम-गरम,
मरण-वरण बुख़ार
वही गिर रही
उसी प्रकार
शीश से मनुष्य के
अशेष रक्त-धार !
झनझना रहे
हृदय के तार-तार !
1951

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(20) दूर खेतों पार
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शीत की काली भयावह रात !

दूर खेतों पार जर्जर ढूह
जीवन स्तब्ध,
धुंध भीषण, काँपती प्रति रूह ;
जन-मन दग्ध,
मूक प्राणों के दमन की बात !

मर्म पर अंतिम विनाशक चोट
घायल त्रास्त,
ले तिरस्कृत प्राण, रज में लोट
पीड़ा ग्रस्त
बद्ध, शोषित, रक्त से तन स्नात !

एक रोदन का करुणतम शोर
गौरव नष्ट,
छा रहा वैषम्य-विष चहुँ ओर
संस्कृति भ्रष्ट,
साँस प्रति कंपन सिहरता गात !

नाशकारी गाज सिर पर टूट
मानव दीन,
सभ्यता का अर्थ हिंसा लूट
ममता हीन,
खो गया तम के विजन में प्रात !
1951

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(21) युग और कवि
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नाश का क्रन्दन भरा,
यह हार का
दारिद्र्य का
दुर्भिक्ष का
अवरुद्ध पथ का
युद्ध का
मिटता हुआ,
बंधुत्व से हटता हुआ
इतिहास है, इतिहास है !
संस्कृति, कला औ’ सभ्यता का
सामने मानों खड़ा उपहास है !

जब आज दानव कर रहा
शोषण भयंकर
रूप मानव का बनाये,
और उठती जा रही है
स्नेह, ममता की
मनुज-उर-भावनाएँ,
बढ़ रही हैं तीव्र गति से
श्वास पर हर
चिर बुभुक्षित मानवों के
दग्ध-जीवन की
विषैली गैस-सी घातक कराहें !

ध्वंस का
निर्मम मरण का,
घोर काला
यातना का
चित्रा यह म्रियमाण है !
उजड़ा हुआ है अन्दमन-सा !
सिहरता तीखा मरण का गान है !

आदर्श सारे गिर रहे;
मानव बुझा कर
ज्ञान का दीपक
निविड़तम-बद्ध दुनिया
देखना बस चाहता है;
क्योंकि उसके पाप अगणित
कौन है जो देख पाएगा ?

धरा पर
‘शांति, सुख, नवयुग-व्यवस्था’ के लिए
वह लूट लेगा
विश्व का सर्वस्व !
लोभी ! लड़ रहा है,
कर रहा है ध्वस्त
कितने लहलहाते खेत,
मधु जीवन !
रही है मिट मनुजता ही स्वयं
मानो कि की
‘हाराकिरी’ भगवान ने !

है मंद जीवन-दीप की
आभा सुनहली।
युग हुआ शापित कलंकित ;
किन्तु तुम होना न किंचित
धैर्य विगलित, चरण विजड़ित !

कवि उठो !
रचना करो,
तुम एक ऐसे विश्व की
जिसमें कि सुख-दुख बँट सकें,
निर्बन्ध जीवन की
लहरियाँ बह चलें,
निद्र्वन्द्व वासर
स्नेह से परिपूर्ण रातें कट सकें,
सब की,
श्रमात्मा की, गरीबों की
न हो व्यवधान कोई भी !

नये युग का नया संदेश दो!
हर आदमी को आदमी का वेश दो !
1947

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(22) विश्वास
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बढ़ो विश्वास ले, अवरोध पथ का दूर होएगा !

तुम्हारी ज़िन्दगी की आग बन अंगार चमकेगी,
अँधेरी सब दिशाएँ रोशनी में डूब दमकेंगी,
तुम्हारे दुश्मनों का गर्व चकनाचूर होएगा !

सतत गाते रहो वह गीत जिसमें हो भरी आशा,
बताए लक्ष्य की दृढ़ता तुम्हारी आँख की भाषा,
विरोधी हार कर फिर तो, तुम्हारे पैर धोएगा !

मुसीबत की शिलाएँ सब चटककर टूट जाएँगी,
गरजती आँधियाँ दुख की विनत हो धूल खाएँगी,
तुम्हारे प्रेरणा-जल से मनुज सुख-बीज बोएगा !
1951

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(23) आश्वस्त
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ज़िन्दगी के दीप जिसने हैं बुझाये,
और भू के गर्भ से
उगते हुए पौधे मिटाये,
शस्य-श्यामल भूमि को बंजर किया जिसने,
नवल युग के हृदय पर मार
पैना गर्म यह खंजर दिया जिसनेµ
उसी से कर रही है लेखनी मेरी बग़ावत !
रुक नहीं सकती
कि जब तक गिर न जाएगा धरा पर
आततायी मत्त गर्वोन्नत,
रुक नहीं सकता कभी स्वर
जब मुखर होकर
गले से हो गया बाहर,
रुक नहीं सकता कभी तूफ़ान
जिसने व्योम में हैं फड़फड़ाए पर,
रुक नहीं सकता कभी दरिया
कि जिसने खोल आँखें
ख़ूब ली पहचान बहने की डगर !
वह तो फैल उमड़ेगा,
कि चढ़कर पर्वतों की छातियों पर
कूद उछलेगा !
सभी पथ में अड़ी भीतें
गरज उन्मुक्त तोड़ेगा !

मुझे विश्वास है साथी —
तुम्हारे हाथ
इतने शक्तिशाली हैं
कि प्रतिद्वन्द्वी पराजित हो
अवनि पर लोट जाएगा,
तुम्हारी आँख में
उतरी बड़ी गहरी चमकती तीव्र
लाली है
कि जिससे आज मैं आश्वस्त हूँ !
युग का अँधेरा छिन्न होएगा,
सभी फिर से बुझे दीपक
नयी युग-चेतना के स्नेह को पाकर
लहर कर जल उठेंगे !
सृष्टि नूतन कोपलों से भर
सुखी हो लहलहाएगी !
कि मेरी मोरनी-सी विश्व की जनता
नये स्वर-गीत गाएगी !
व खेतों में निडर हो
नाचकर पायल बजाएगी !
1952

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(24) दीपक जलाओ
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आज मेरे स्नेह से दीपक जलाओ !

विश्व कुहराच्छन्न, धूमिल सब दिशाएँ,
चल रही हैं घोर प्रतिद्वन्द्वी हवाएँ,
त्राण मेरे अंक में, आकर समाओ !

आज नूतन फूटती आओ जवानी,
मुक्त स्वर में गूँज लो अवरुद्ध वाणी,
यह नवल संदेश युग का, कवि, सुनाओ !

गिर रही हैं जीर्ण दीवारें सहज में,
टूटती हैं शीर्ण मीनारें सहज में,
हो नया निर्माण, जर्जरता हटाओ !

आज मेरी बाहुओं का बल तुम्हारा,
आज मेरा शीश - प्रण अविचल तुम्हारा,
त्रास्त, घायल, सुप्त दुनिया को जगाओ !
1950

=====================================
(25) आभास होता है
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आभास होता है —
कि सदियों बद्ध बंधन
आज खुलकर ही रहेंगे !
इन धुएँ के बादलों से
आग की लपटें लरज कर
व्योम को
निज बाहुओं में घेर लेंगी !
शक्तिमत्ता-मद
विषैला-नद जलेगा,
हर उपेक्षित भीम गरजेगा
तुमुल संगर धरा पर !

गढ़ दमन के
राह के फैले हुए आटे सदृश
संघर्ष की भीषण हहरती
आँधियों के बीच
उड़ मिट जाएँगे !

विश्वास होता है —
कि दौड़ा आ रहा
उन्मुक्त युग-खग,
सब पुरातन जाल जर्जर तोड़कर !

अब तो जलेगा
सत्य का अंगार !
जिसके ही लिए
यह आज तक अविश्रांत
लालायित रहा है
पीड़ितों भूले हुओं का
जागता संसार !
मोचन शोक,
दुख हततेज,
गिर रही है भंगिमा
माया विभेदन,
दीखती अभिनव-किरण
1950

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(26) आज देखा है
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आज देखा है —
मनुज को ज़िन्दगी से जूझते,
संघर्ष करते !
वंचना की टूटती चट्टान की आवाज़
कानों ने सुनी है,
और पैरों को हुआ महसूस
धरती हिल रही है !
आज मन भी
दे रहा निश्चय गवाही —
दुःख-पूर्णा-रात काली
अब क्षितिज पर गिर रही है !
भूमि जननी को हुआ कुछ भास
उसकी आस का संसार
नूतन अंकुरों का
उग रहा अंबार !
सूखे वृक्ष के आ पास
बहती वायु कुछ रुक
कह रही संदेश ऐसा
जो नया,
बिलकुल नया है !
सुन जिसे खग डाल का
अब चोंच अपनी खोलने को
हो रहा आतुर,
प्रफुल्लित,
फड़फड़ाकर कर पर थकित !
छतनार यह काला धुआँ
अब दीखता हलका
नहीं गाढ़ा अँधेरा है
वही कल का !
1951

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(27) मुझे भरोसा है
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मैं क़ैद पड़ा हूँ आज
अँधेरी दीवारों में;
दीवारें —
जिनमें कहते हैं
रहती क़ैद हवा है,
रहता क़ैद प्रकाश !
जहाँ कि केवल फैला
सन्नाटे का राज !
पर, मैं तो अनुभव करता हूँ
बेरोक हवा का,
आँखों से देखा करता हूँ
लक्ष-लक्ष ज्योतिर्मय-पिण्डों को,
मुझको तो
खूब सुनायी देती हैं
मेरे साथी मनुजों के
चलते, बढ़ते, लड़ते
क़दमों की आवाज़ !
मेरे साथी मनुजों के
अभियानों के गानों की
अभियानों के बाजों की
आवाज़ !

मुझे भरोसा है —
मेरे साथी आकर
कारा के ताले तोड़ेंगे,
जन-द्रोही सत्ता का
ऊँचा गर्वीला मस्तक फोड़ेंगे !

इंसान नहीं फिर कुचला जाएगा,
इंसान नहीं फिर
इच्छाओं का खेल बनाया जाएगा !
1951

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(28) मुख को छिपाती रही
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धुआँ ही धुआँ है,
नगर आज सारा नहाता हुआ है !

अँगीठी जली हैं
व चूल्हे जले हैं,
विहग
बाल-बच्चों से मिलने चले हैं !

निकट खाँसती है
छिपी एक नारी
मृदुल भव्य लगती कभी थी,
बनी थी
किसी की विमल प्राण प्यारी !

उसी की शक़ल अब
धुएँ में सराबोर है !
और मुख की ललाई
अँधेरी-अँधेरी निगाहों में खोयी !

जिसे ज़िन्दगी से
न कोई शिकायत रही अब,
व जिसके लिए
है न दुनिया
भरी स्वप्न मधु से
लजाती हुयी नत !

अनेकों बरस से
धुएँ में नहाती रही है !
कि गंगा व यमुना-सा
आँसू का दरिया
बहाती रही है !
फटे जीर्ण दामन में
मुख को छिपाती रही है !

मगर अब चमकता है
पूरब से आशा का सूरज,
कि आती है गाती किरन,
मिटेगी यह निश्चय ही
दुख की शिकन !
1951

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(29) नया समाज
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करवटें बदल रहा समाज,
आज आ रहा है लोकराज !

ध्वस्त सर्व जीर्ण-शीर्ण साज़,
धूल चूमते अनेक ताज !

आ रही मनुष्यता नवीन,
दानवी प्रवृत्तियाँ विलीन !

अंधकार हो रहा है दूर;
खंड-खंड और चूर-चूर !

रश्मियों ने भर दिया प्रकाश,
ज़िन्दगी को मिल गयी है आश।

चल पड़ा है कारवाँ सप्राण
शक्तिवान, संगठित, महान !

रेत-सा यह उड़ रहा विरोध,
मार्ग हो रहा सरल सुबोध;

बढ़ रहा प्रबल प्रगति-प्रसार,
बिजलियों सदृश चमक अपार !

देख काल दब गया विशाल,
आग जल उठी है लाल-लाल !

उठ रहा नया गरज पहाड़,
मध्य जो वह खा गया पछाड़ !

पिस गया गला-सड़ा पुराण,
बन रहा नवीन प्राणवान !

गूँजता विहान-नव्य-गान;
मुक्त औ’ विरामहीन तान !
1949

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(30) युगान्तर
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आँधी उठी है समुन्दर किनारे
बढ़ती सतत कुछ न सोचे-विचारे,
लहरें उमड़तीं बिना शक्ति हारे
रफ़्तार यह तो समय की !

मानव निकलते चले आ रहे हैं,
उन्मत्त हो गीत नव गा रहे हैं,
रंगीन बादल बिखर छा रहे हैं !
झंकार यह तो समय की !

जर्जर इमारत गिरी डगमगाकर,
आमूल विष-वृक्ष गिरता धरा पर,
बहता पिघल पूर्ण प्राचीन पत्थर,
है मार यह तो समय की !

रोड़े बिछे थे हज़ारों डगर में
नौका कभी भी न डोली भँवर में,
बढ़ती गयी व्यक्ति-झंझा समर में
पतवार यह तो समय की !

इंसान लेता नयी आज करवट,
सम्मुख नयन के उठा है नया पट,
गूँजी जगत में युगान्तर की आहट,
ललकार यह तो समय की !
1950


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(31) छलना
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आज सपनों की
नहीं में बात करता हूँ !
चाँद-सी तुमको समझकर
अब न रह-रह कर
विरह में आह भरता हूँ !

नहीं है
रुग्ण मन के
प्यार का उन्माद बाक़ी,
अब न आँखों में सतत
यह झिलमिलाती
तुम्हारे रूप की झाँकी !

कि मैंने आज
जीवित सत्य की
तसवीर देखी है,
जगत की ज़िन्दगी की
एक व्याकुल दर्द की
तसवीर देखी है !
किसी मासूम की उर-वेदना
बन धार आँसू की
धरा पर गिर रही है,
औैर चारों ओेर है जिसके
अँधेरे की घटा,
जा रूठ बैठी है
सबेरे की छटा !

उसको मनाने के लिए अब
मैं हज़ारों गीत गाऊँगा,
अँधेरे को हटाने के लिए
नव ज्योति प्राणों में सजाऊँगा !

न जब तक
सृष्टि के प्रत्येक उपवन में
बसन्ती प्यार छाएगा,
न जब तक
मुसकराहट का नया साम्राज्य
धरती पर उतर कर जगमगाएगा,
कि तब तक
पास आने तक न दूँगा
याद जीवन में तुम्हारी !

क्योंकि तुम
कर्तव्य से संसार का मुख मोड़ देती हो !
हज़ारों के
सरल शुभ-भावनाओं से भरे उर तोड़ देती हो !
1952

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(32) मत कहो
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आज भय की बात मुझसे मत कहो,
आज बहकी बात मुझसे मत कहो !

प्राण में तूफ़ान-से अरमान हैं,
कंठ में नव-मुक्ति के नव-गान है !

ज्वार तन में स्वस्थ यौवन का बहा,
नष्ट हों बंधन, सबल उर ने कहा !

है तरुण की साधना, गतिरोध क्या ?
है तरुण की चेतना, अवरोध क्या ?

द्वंद्व भीषण, है चुनाती सामने,
बीज भावी क्रान्ति बोती सामने !

बद्ध प्रतिपग पर समस्त समाज है;
आग में तपना सभी को आज है !
.
आज जन-जन को शिथिलता छोड़ना,
है नहीं कर्तव्य से मुख मोड़ना !

इस लगन की अग्नि से जर्जर जले
रक्त की प्रति बूँद की सौगन्ध ले —

प्राण का उत्सर्ग करना है तुम्हें,
विश्व भर में प्यार भरना है तुम्हें !

धर्म मानव का बसाना है तुम्हें,
कर्म जीवन का दिखाना है तुम्हें !

मर्म प्राणों का बताना है तुम्हें,
ज्योति से निज, तम मिटाना है तुम्हें !

विश्व नव-संस्कृति प्रगति पर बढ़ चला,
भ्रष्ट जीवन मिट समय के संग गला !

काल की गति, भाग्य का दर्शन मरण,
आज हैं प्रत्येक स्वर के नव-चरण !

जीर्णता पर हँस रही है नव्यता,
खिल रहीं कलियाँ भ्रमर को मधु बता !

ध्वंस के अंतिम विजन-पथ पर लहर,
सृष्टि के आरम्भ के जाग्रत-प्रहर !

जागरण है, जागते ही तुम रहो,
नींद में खोये हुए अब मत बहो !

आज भय की बात मुझसे मत कहो,
आज बहकी बात मुझसे मत कहो !
1950

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(33) नया युग
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ओ ! मनुजता की
करुण, निस्पंद बुझती ज्योति
मेरे स्नेह से भर
प्रज्ज्वलित हो जा !
निविड़-तम-आवरण सब
विश्व-व्यापी जागरण में
आ सहज खो जा !

हिमालय-सी
भुजाओं में भरी है शक्ति
जन-जन रोक देंगे आँधियों को,
फ़ेक देंगे दूर
बढ़ती ज्वार की लहरें !

नयी विकसित
युगों की साधना की फूटती आभा,
नयी पुलकित
युगों की चेतना की जागती आशा !

दलित, नत, भग्न ढूहों से
उठी है आज
नव-निर्माण की दृढ़ प्रेरणा !
ध्रुव सत्य
होगी कल्पना साकार !
अभिनव वेग से
संसार का कण-कण
नया जीवन, नया यौवन, लहू नूतन,
सुदृढ़तम शक्ति का
संचार पाएगा !

नया युग यह
प्रखर दिनकर सरीखा ही नहीं,
पर, है पहुँच आगे बड़ी इसकी —
घने फैले हुए जंगल
भयानक मत्त ‘एवर-ग्रीन’,
भूतल ठोस के नीचे,
अतल जल के
जहाँ बस है नहीं रवि का
वहाँ तक है
नये युग के विचारों का
अथक संग्राम !

कैसे बच सकोगे
ओ पलायन के पुजारी !
आज अपनी बुद्धि की हर गाँठ को
लो खोल,
बढ़कर आँक लो
नूतन सजग युग का समझकर मोल !
1950

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(34) पदचाप
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पड़ रहे नूतन क़दम
फ़ौलाद-से दृढ़,
और छोटी पड़ रही छाया
नये युग आदमी की आज !
धरती सुन रही पदचाप
अभिनव ज़िन्दगी की !
बज रही झंकार,
मुखरित हो रहा संसार,
नव-नव शक्ति का संचार !

परिवर्तन !
बदलती एक के उपरान्त
सुन्दरतर
जगत् की प्रति निमिष तसवीर,
घटती जा रही है पीर,
जागी आदमी की आज तो
सोयी हुई तक़दीर !

रुक गया
मेरे जिगर का दर्द,
बरसों का उमड़ता
नैन का यह नीर !
गीले नेत्र करुणा-पूर्ण
तुझको देखते विश्वास से दृढ़तर,
यही आशा लगाये हैं
कि जब यह उठ रहा परदा पुराना
तब नया ही दृश्य आएगा,
कि पहले से कहीं खुशहाल
दुनिया को दिखाएगा !

1949


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(35) भोर का आह्वान
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खुल रही आँखें
नयी इस ज़िन्दगी के भोर में !
उठ रहा
उठते दिवाकर संग जन-समुदाय,
भर कर भावना बहुजन हिताय !

अंतर से निकलती आ रही हैं
विश्व के कल्याण की
काली अँधेरी रात के तारों सरीखी,
एक के उपरान्त अगणित शृंखला-सी
नव्य-जीवन की सुनहरी आब-सी
स्वर्गिक दुआएँ !

देख ली है आज
नयनों ने नये युग की धधकती आग,
जिसकी उड़ रहीं चिनगारियाँ
हर ग्राम-वन-सागर-नगर के व्योम में !

उस घास की गंजी सरीखा
जो लपट से ग्रस्त धू-धू जल रही है,
ध्वस्त होता जा रहा
छल, झूठ, आडम्बर !

कि जिसके वक्ष पर यह हो रहा है
रोशनी-सा
दौड़ता अभिनव-किरण-सा आज मन्वंतर !
कि विद्युत वेग भी पीछे
लरज कर रह गया,
लाखों हरीकेनी हवाएँ तक
ठिठक कर रह गयीं;
लाखों उबलते भूमि के ज्वालामुखी तक
जम गये,
बह न पाया एक पग भी देखकर लावा !
गगन के फट गये बादल
व खंडित हो गयी सारी गरज !
भव का भयानकतम भविष्यत् भी
भरे भय भग गया !

विश्वास है —
यह अब न आएगा कभी,
ऐसा ग्रहण फिर
ग्रस न पाएगा कभी
जन-चेतना के सूर्य को !
रे आज सदियों रुद्ध जनता-कंठ
सहसा खुल गया
संसार के इस शोर में !
खुल रही आँखें
नयी इस ज़िन्दगी के भोर में !
1950

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(36) निरापद
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नयी रोशनी है,
नयी रोशनी है !
निरापद हुआ आज जीवन,
निराशा पुरावृत विसर्जन !

विषादित-युगों की निशा भी गगन से
अँधेरा उठाकर भगी इस जलन से।

महाबल विपुल अब भुजाएँ उठाकर
विरोधी सभी ताक़तों को
गरजकर बिगड़ क्रुद्ध
ललकारता है !
गुनाहों के पर्वत
पिघल कर धँसे जा रहे हैं !
(सुमन शुष्क उपवन में
खिलते चले जा रहे हैं !)

बदलते जगत पर
पुरातन गलित नीति
हरगिज़
नहीं थोपनी है !
नयी रोशनी है !
1949


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(37) सुर्खियाँ निहार लो!
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नये विचार लो !
समाज की गिरी दशा सुधार लो,
सुधार लो !

रुका प्रवाह फिर बहे,
सप्राण गीति-स्वर कहे,
हृदय अपार स्नेह-धन
भरे उठें असंख्य जन,
प्रभात को धरा जगो पुकार लो,
पुकार लो !

वतन सुसंगठित रहे,
न एक जन दमित रहे,
न भूख-प्यास शेष हो,
बना नवीन वेश हो,
समय बहाल, सुर्खियाँ निहार लो,
निहार लो !

विभोर हर्ष-धार में,
सफ़ेद लाल प्यार में,
बहो, बहो, बहो, बहो !
बनी नयी कुटीर है, विहार लो,
विहार लो !
1950


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(38) युग-परिवर्तन
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नये प्रभात की प्रथम किरण
विलोक मुसकरा रहा गगन !

इधर-उधर सभी जगह
नवीन ज़िन्दगी के फूल खिल गये,
सिहर-सिहर कि झूम-झूम
एक दूसरे को चूम-चूम मिल गये !

धूल बन गया पहाड़ अंधकार का,
अटूट वेग है ज़मीन पर
नयी बयार का !

कि साथ-साथ उठ रहे चरण,
कि साथ-साथ गिर रहे चरण !
नये प्रभात की नयी बहार बीच
जगमगा उठा गगन !
कि झिलमिला उठा गगन !

उर्वरा धरा सुहाग पा गयी,
शरीर में हरी निखार आ गयी !

निहार लो उभार रूप का
पड़ा है सिर्फ़
रेशमी महीन आवरण
अतेज घूप का !

बिजलियों ने कर लिया शयन,
हहरती आँधियाँ पड़ीं शरण,
विकास का सशक्त काफ़िला नवीन
कर रहा सुदृढ़ भवन-सृजन !
बेशरम रुके खड़े हैं राह पर,
कि कापुरुष के कंठ से
निकल रहा कराह-स्वर,
सभीत दुर्बलों के बंद हैं नयन,
व मोच खा गये चरण !
1950

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(39) नयी संस्कृति
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युग-रात्रि
निश्चय
विश्व के प्रत्येक नभ से मिट गयी !
अभिनव प्रखर-स्वर्णिम-किरण बन
झिलमिलाती आ रही
संस्कृति नयी !

सामने जिसके
विरोधी शक्तियाँ तम की बिखरती जा रहीं,
पर, ये विरोधी शक्तियाँ
कोई थकी जर्जर नहीं,
किन्तु;
इनसे जूझने का आ गया अवसर !

यही वह है समय
जब बल नया पाता विजय !

हमला ज़रूरी है,
कि देशों, जातियों, वर्गों सभी की
यह परस्पर की
मिटाना आज दूरी है !

इसी के ही लिए
प्राचीन-नूतन द्वन्द्व की आवाज़ है,
प्राचीन — जो म्रियमाण,
जिसका आज
विशृंखल हुआ सब साज़ है !
जिसकी रोशनी सारी
नये ने छीन ली,
और जिसके हाथ से निकला
समस्त समाज है !
बस, पास केवल एक धुँधली याद है,
जिसका तड़पता शेष यह उन्माद है —
‘बीते युगों में हम सुखी थे;
किंतु अब रथ सभ्यता का
तीव्र गति से बढ़
पतन-पथ पर
जगत का नाश करने हो रहा आतुर !’

हमें अब जान लेना है
विनाशी तत्त्व घातक हैं वही
जो आज यह झूठा तिमिर करते विनिर्मित,
और रक्षक-दीप बनने का
विफल गीदड़ सरीखा स्वाँग भरते हैं !
कि धोखे से उदर अपना
भरा हर रोज़ करते हैं।
भला ऐसे मनुज
क्या लोक के कुछ काम आते हैं ?
नयी हर बात से मुख मोड़ लेते हैं
समय के साथ चलना भूल जाते हैं !

नज़र से
क्रीट, बेबीलोन के खण्डहर गुज़रते हसिं !
बहाना है न उनको देखकर आँसू,
न उनकी अब प्रशंसा के
हज़ारों गीत गाने हैं !
नहीं बीते युगों के दिन बुलाने हैं !
नया युग आ रहा है जो
उसी के मार्ग में हमको
बिछाने फूल हैं कोमल,
उसी के मार्ग को हमको
बनाना है सरल !
जिससे नयी संस्कृति-लता के कुंज में
हम सब खुशी का
गा सकें नूतन तराना !
भूलकर दूख-दर्द
जीवन का पुराना !
1950

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(40) गंगा बहाओ
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आज ऊसर भूमि पर गंगा बहाओ !

उच्च दृढ़ पाषाण गिर-गिर कर चटकते,
रेत के कण नग्न धरती पर चमकते,
अग्नि की लहरें हवा में बह रही हैं;
रूप घन का शांतिमय जग को दिखाओ !

त्रास्त नत मानव प्रकम्पित पात से झर,
झुक गये सब आततायी के चरण पर,
थूक ठोकर नाश दुख निर्मम मरण पर;
आत्म-धन उत्सर्ग की ध्रुव लौ जगाओ !

बह चुकी हैं ख़ून की नदियाँ, बिरानी
भू हुई, सत् की असत् ने कुछ न मानी,
और फूटा भय-ग्रसित-रक्तिम-सबेरा,
सूर्य पर छाये हुए बादल हटाओ !
1950


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(41) नयी रेखाएँ
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इन धुँधली-धुँधली रेखाओं
पर, फिर से चित्र बनाओ मत !

दुनिया पहले से बदल गयी,
आभा फैली है नयी-नयी,
यह रूप पुराना, नहीं-नहीं !
आँखों से ओझल है कल की
संस्कृति की गंगा का पानी,
टूटी-टूटी-सी लगती है
गत वैभव की शेष कहानी,
जिसमें मन से झूठी, कल्पित
बातों को सोच मिलाओ मत !

पहले के बादल बरस चुके,
अब तो खाली सब थके-रुके,
यह गरज बरसने वाली कब ?
नव-अंकुर फूट रहे रज से
भर कर जीवन की हरियाली,
निश्चय है, फूटेगी नभ से
जनयुग के जीवन की लाली,
निस्सार, मिटा, जर्जर, खोया
फिर से आज अतीत बुलाओ मत !
1948

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(42) भविष्य के निर्माताओ!
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जिन सपनों को साकार करोगे तुम
उन पर मुझको विश्वास बड़ा,
मैं देख रहा हूँ
क़दम-क़दम पर आज तुम्हारे
स्वागत को युग का इन्सान खड़ा !
जिसके फ़ौलादी हाथों में
हँसते फूलों की खुशबू वाली माला है,
जिसने जीवन की सारी
जड़ता और निराशा का
वारा-न्यारा कर डाला है !
वह माला वह इन्सान
तुम्हारे उर पर डालेगा;
क्योंकि तुम्हारा वक्षस्थल
जन-जन की पीड़ा से बोझिल है,
क्योंकि तुम्हारे फ़ौलादी तन का
मख़मल जैसा मन
युग-व्यापी क्रन्दन से
हो-हो उठता चंचल है !
तुम ही हो जो
इन फूलों की क़ीमत समझोगे,
फिर सारी दुनिया में
हँसते फूलों का उपवन
नभ के नीचे लहराएगा !
मानव फूलों से प्यार करेगा,
अपनी ‘श्रद्धा’ का शृंगार करेगा,
बच्चों को चूमेगा,
उनके साथ रोज़
हरे लॉन पर ‘घोड़ा-घोड़ा’ खेलेगा !
नयनों में आँसू तो आएँगे
पर, वे बेहद मीठे होंगे !
मरघट की आग जलेगी यों ही
पर, उसमें न किसी के
अरमान अधूरे होंगे !
जैसे अब मिलना दुर्लभ है
‘ईश’ जगत में
वैसे ही तब भी होगा,
पर, हमको-तुमको
(सच मानो !)
उसकी इतनी चिन्ता ना होगी !
उसका और हमारा अन्तर
निश्चय ही मिट जाएगा,
जिस दिन मानव का सपना
सच हो जाएगा !
1953

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(43) मेघ-गीत
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उमड़ते-गरजते चले आ रहे घन
घिरा व्योम सारा कि बहता प्रभंजन
अँधेरी उभरती अवनि पर निशा-सी
घटाएँ सुहानी उड़ीं दे निमन्त्रण !

कि बरसो जलद रे जलन पर निरंतर
तपी और झुलसी विजन-भूमि दिन भर,
करो शान्त प्रत्येक कण आज शीतल
हरी हो, भरी हो प्रकृति नव्य सुन्दर !

झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी हो,
जगत मंच पर सौम्य शोभा खड़ी हो,
गगन से झरो मेघ ओ! आज रिमझिम,
बरस लो सतत, मोतियों-सी लड़ी हो !

हवा के झकोरे उड़ा गंध-पानी
मिटा दी सभी उष्णता की निशानी,
नहाती दिवारें नयी औ’पुरानी
डगर में कहीं स्रोत चंचल रवानी !

कृषक ने पसीने बहाये नहीं थे,
नवल बीज भू पर उगाये नहीं थे,
सृजन-पंथ पर हल न आये अभी थे
खिले औ’पके फल न खाये कहीं थे !

दृगों को उठा कर, गगन में अड़ा कर
प्रतीक्षा तुम्हारी सतत लौ लगा कर —
हृदय से, श्रवण से, नयन से व तन से,
घिरो घन, उड़ो घन घुमड़कर जगत पर !

अजब हो छटा बिजलियाँ चमचमाएँ,
अँधेरा सघन, लुप्त हो सब दिशाएँ
भरन पर, भरन पर सुना राग नूतन
नया प्रेम का मुक्त-संदेश छाये !

विजन शुष्क आँचल हरा हो, हरा हो,
जवानी भरी हो सुहागिन धरा हो,
चपलता बिछलती, सरलता शरमती,
नयन स्नेहमय ज्योति, जीवन भरा हो !
1950

=====================================
(44) बरगद
=====================================

स्तब्धता सुनसान
पथ वीरान,
सीमाहीन नीला व्योम !
मटमैली धरा पर
वृक्ष बरगद का झुका
मानों कि है प्राचीनता साक्षात् !

निर्बल
वृद्ध-सा जर्जर शिथिल,
उखड़ी हुई साँसें,
जड़ें भू पर बिछी हैं
और गिरने के मरण-क्षण पर
भयंकर स्वप्न ने
कंपित किया झकझोर कर
भय की बना मुद्रा
खड़ा यों कर दिया !

उड़कर धूल कहना चाहती है —
‘ओ गगनचुम्बी !
गिरो
पूरी न आकांक्षा हुई,
आकर मिलो मुझसे
विवश होकर धराशायी !
न जाना मूल्य लघुता का
किया उपहास !’

जड़ के पास
खंडित औ’कुरूपा
जो रँगा सिन्दूर से
हनुमान-सा पाषाण
टिक कर गोद में बैठा
कि जिसकी अर्चना करते
मनुज कितने
नमन हो परिक्रमा करते —
व आधी रात को आ
श्वान जिसको चाटते !
1959


=====================================
(43) कवि
=====================================

युग बदलेगा कवि के प्राणों के स्वर से,
प्रतिध्वनि आएगी उस स्वर की घर-घर से !

कवि का स्वर सामूहिक जनता का स्वर है,
उसकी वाणी आकर्षक और निडर है !

जिससे दृढ़-राज्य पलट जाया करते हैं,
शोषक अन्यायी भय खाया करते हैं !

उसके आवाहन पर, नत शोषित पीड़ित,
नूतन बल धारण कर होते एकत्रित !

जो आकाश हिला देते हुंकारों से
दुख-दुर्ग ढहा देते तीव्र प्रहारों से !

कवि के पीछे इतिहास सदा चलता है,
ज्वाला में रवि से बढ़कर कवि जलता है !

कवि निर्मम युग-संघर्षों में जीता है,
कवि है जो शिव से बढ़कर विष पीता है !

उर-उर में जो भाव-लहरियों की धड़कन,
मूक प्रतीक्षा-रत प्रिय भटकी गति बन-बन,

स्नेह भरा जो आँखों में माँ की निश्छल,
लहराया करता कवि के दिल में प्रतिपल !

खेतों में जो बिरहा गाया करता है,
या कि मिलन का गीत सुनाया करता है,

उसके भीतर छिपा हुआ है कवि का मन,
कवि है जो पाषाणों में भरता जीवन!
1953

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बुधवार, 6 जनवरी 2010

डॉ. महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह --- मृत्यु-बोध : जीवन-बोध























डॉ. महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह --- मृत्यु-बोध : जीवन-बोध


रचना-काल : सन् 2000-2001
प्रकाशन-वर्ष : सन् 2002
प्रकाशक : इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली — 110 006







(1) आभार
..................

मृत्यु है;
मृत्यु निश्चित है,
अटल है —
जीवन इसलिए ही तो
इतना काम्य है !
इसलिए ही तो
जीवन-मरण में
इतना परस्पर साम्य है !
.
मृत्यु ने ही
जीवन को दिया सौन्दर्य
इतना
अशेष - अपार !
मृत्यु ने ही
मानव को दिया
जीवन-कला-सौकर्य
इतना
सिँगार-निखार !
.
निःसंदेह
है स्वीकार्य —
नश्वरता,
मर्त्य दर्शन / भाव
प्रतिपल मृत्यु-तनाव !
आभार
मृत्यु के प्रति
प्राण का आभार !

(2) आभार; पुनः
................................

मौत ने ज़िन्दगी को
बड़ा ख़ूबसूरत बना दिया,
.

लोक को,
असलियत में
सुखद एक जन्नत
बना दिया,
.

अर्थ हम प्यार का
जान पाये, तभी तो
सही-सही,
.

आदमी को
अमर देव से;
और उन्नत बना दिया !

(3) काल-चक्र
...........................

निर्मम है
काल-चक्र
अतिशय निर्मम !
जिसके नीचे
जड़-जंगम
क्रमशः पिसता और बदलता
हर क्षण, हर पल !
थर-थर कँपता भू-मंडल !
.

अदृश्य
निःशब्द किये
अविरत घूम रहा
यह काल-चक्र
निर्विघ्न ... निर्विकार !
.

इसके सम्मुख
स्थिरता का कोई
अस्तित्व नहीं,
इसकी गति से
सतत नियन्त्रित
जीवन और मरण,
धरती और गगन !

(4) निरुद्विग्न
............................

मृत्यु से डरते रहेंगे
तो
हो जायगा
जीना निरर्थक !
भार बोझिल
शुष्क नीरस
निर्विषय मानस।
.

अतः
सार्थक तभी
जीवन,
मरण-डर मुक्त हो
हर क्षण।
.

अशुभ है
नाम लेना
मृत्यु-भय का,
या प्रलय का
इसी कारण।

(5) चिन्तन
.........................

मृत्यु ?
एक प्रश्न-चिन्ह !
भेद जानना
दुरूह ही नहीं;
मनुष्य के लिए
अ-ज्ञात
सब।
देह पंच-तत्त्व में विलीन
सब बिखर-बिखर !
समाप्त।
.
प्राण लौटना नहीं;
न सम्भवी
पुनः सचेत कर सकें,
रहस्य ज्ञात कर सकें
स्वयं जब नहीं।
मरण - प्रहेलिका
अजब प्रहेलिका !
अबूझ आज तक
गज़ब प्रहेलिका !
.
प्रयत्न व्यर्थ —
मृत्यु-अर्थ व्यक्त हो सके;
जटिल कठिन
विचारणा।

(6) पहेली
......................

क्या कहा ?
तन
रहने योग्य नहीं रहा;
.

इसलिए ...
आत्मन !
तुम चले गये।
.

नये की चाह में
किसी राह में;
.

कहाँ ?
लेकिन कहाँ ??
.

अज्ञात है,
सब अज्ञात है !
घुप अँधेरी रात है,
रहस्यपूर्ण
हर बात है !

.

प्रश्न किसका है ?
उत्तर किसका है ?

(7) सचाई
.......................

मृत्यु नहीं होती
तो ईश्वर का भी अस्तित्व नहीं होता,
कभी नहीं करता
मानव
प्रारब्धवाद से समझौता !
.

ईश्वर प्रतीक है
ईश्वर प्रमाण है
मानव की लाचारी का,
मृत्यूपरान्त तैयारी का।
.

स्वर्ग-नरक का
सारा दर्शन-चिन्तन
कल्पित है,
मानव
मृत्यु-दूत की आहट से
हर क्षण आतंकित है,
रह-रह रोमांचित है !
मालूम है उसे —
‘मृत्यु सुनिश्चित है !’
इसीलिए पग-पग पर
आशंकित है !
यही नहीं
तथाकथित मर्त्य-लोक से
नितान्त अपरिचित है;
वह।
अतः तभी तो
जाता है
ईश्वर की शरण में
पाने चिर-शान्ति मरण में !
.

अतः तभी तो
गाता है —
एक-मात्र
‘राम नाम सत्य है !’
अरे, जन्म-मृत्यु कुछ नहीं
उसी का
विनोद-क्रूर कृत्य है !

(8) मृत्यु-रूप
......................

मृत्यु प्राकृतिक हो
या आकस्मिक दुर्घटना हो
निष्कर्ष एक है —
अन्त-कर्म जीवन का,
होना चेतनहीन
सक्रिय तन का,
सदा-सदा को होना सुप्त
हृदय-स्पन्दन का !
दोनों ही तथाकथित
विधि-लेख है,
भाग्य-लिपि अदृष्ट अमिट रेख है !
लेकिन
जीवन-वध
चाहे आत्म-हनन हो,
या हत्या-भाव-वहन हो,
या व्यक्ति और समाज रक्षा हेतु
दरिन्दों का दमन-दलन हो,
नहीं मरण;
है प्राण-हरण।
भले ही अंत एक
मृत्यु !
सही मृत्यु या अकाल मृत्यु।

(9) निष्कर्ष
........................

मृत्यु ?
प्रश्न-चिन्ह।
.

स्थिर
अनुत्तरित
अड़ा,
विरुद्ध बन
खड़ा।
.

पर, नहीं
मनुष्य हार मानना,
तनिक न ईश कल्पना
बचाव में,
सवाल के जवाब में,
नहीं, नहीं !
.

रहस्य मृत्यु का
निरावरण ... प्रकट
अवश्य
अवश्य
एक दिन !

(10) जन्म-मृत्यु
............................

मृत्यु :
जन्म से बँधी
अटूट डोर है,
.

जन्म :
एक ओर;
मृत्यु :
दूसरा प्रतीप छोर है !
.

जन्म — एक तट
मरण — विलोम तीर;
.

जन्म :
हर्ष क्यों ?
मृत्यु :
पीर ... !
क्यों ?
जन्म-मृत्यु
जब समान हैं ?
.

एक / रूपवान;
दूसरा / महानिधान है !
.

जन्म —
सूत्रपात है,
मृत्यु —
नाश है: निघात है !
.

जन्म ... ज्ञात,
मृत्यु ... अ-ज्ञात !
.

जन्म: आदि,
मृत्यु: अन्त है !
जन्म: श्रीगणेश,
मृत्यु: क्षिति दिगन्त है !
.

जन्म: हाँ, हयात है,
मृत्यु: हा! विघात है !
.

जन्म: नव-प्रभात है,
मृत्यु: घोर रात है !

(11) युग्म
..................

चारों ओर फैली
मरुभूमि रेतीली
बुझते दीपक लौ-सी
भूरी
पिंगल।
पीत-हरित
जल-रहित
ढलती उम्र
मरणासन्न !
.

लेकिन
अनगिनती
लहराते ... हरिआते
मरुद्वीप !
कँटीले
पत्ते रहित
पनपते पेड़ —
जीवन-चिन्ह
पताकाएँ !
जलाशय —
आशय ... जीवन-द
प्राणद !

(12) विलोम
.......................

जीवन : हर्षोल्लास
मृत्यु : अंतिम निश्वास
मधुर राग / चीत्कार !
शुभ-कृत / हाहाकार !

(13) समान
...................

प्रात भी अरुण
सान्ध्य भी अरुण
प्रात-सान्ध्य एक हैं।

जन्म पर रुदन
मृत्यु पर रुदन
जन्म-मृत्यु एक हैं।

यही
सही विवेक है,
यथार्थ ज्ञान है,
व्यर्थ
और ... और ध्यान है।

(14) साखी
....................

इतने उदास क्यों होते हो ?
होशोहवास क्यों खोते हो ?
जीवन - बहुमूल्य है; सही
है अटल मृत्यु; क्यों रोते हो ?

(15) कामना
......................

जिएँ समस्त शिशु तरुण
अकाल मृत्यु है करुण।

(16) वास्तव
......................

‘‘मृत्यु —
जन्म है
पुनः - पुनः
आत्म - तत्त्व का।’’
असत्य; इस विचार को
कि सत्य मान लें ?
अंध मान्यता
तर्क हीन मान्यता !

प्राण / पंच - तत्त्व में विलीन,
अंत / एक सृष्टि का,
अंत / एक व्यक्ति का,
एक जीव का।
कहीं नहीं
यहाँ ... वहाँ।
.

सही यही
कि लय सदैव को।
.
न है नरक कहीं,
न स्वर्ग है कहीं,
यथार्थ लोक सत्य है।
मृत्यु सत्य है,
जन्म सत्य है।

(17) जीवन-दर्शन
............................

बहिर्गति —
भौतिक स्पन्दन;
अन्तर-गति
जीवन।
.

जीवन गति का वाहक —
मैं
सतत नियन्त्रक —
मैं
जब - तक
गतिशील रहेगा जीवन
इतिहास रचेगा
मानव-मन
मानव-तन।
.

लय हो न कभी;
जीवन लयवान रहे,
कण-कण गतिमान रहे।
.

लयगत होना
अन्तर गति खोना।

(18) चरैवेति
....................

संघर्षों-संग्रामों से
जीवन की निर्मिति,
होना निष्क्रिय
ज्ञापक - आसन्न मरण का,
थमना — जीवन की परिणति।
जीवन: केवल गति,
अविरति गति !
क्रमशः विकसित होना,
होना परिवर्तित
जीवन का धारण है !
स्थिरता
प्राण-विहीनों का
स्थापित लक्षण है !
.

जीवन में कम्पन है, स्पन्दन है,
जीवन्त उरों में अविरल धड़कन है !
.

रुकना
अस्तित्व - विनाशक
अशुभ मृत्यु को आमंत्रण,
.

चलते रहना ... चलते रहना !
एक मात्र मूल-मंत्र
साधक जीवन !

(19) प्रयोगरत
.......................

आदमी में —
चाह जीवन की
सनातन और सर्वाधिक प्रबल है;
.

जब कि
हर जीवन्त की
अन्तिम सचाई
मृत्यु है !
हाँ, अन्त निश्चित है,
अटल है !
.

लेकिन / सत्य है यह भी —
अमरता की: अजरता की
लहकती वासना का वेग
होगा कम नहीं,
अद्भुत पराक्रम आदमी का
चाहता कलरव,
रुदन मातम नहीं !
.
हर बार
ध्रुव मृति की चुनौती से
निरन्तर जूझना स्वीकार !
मृत्युंजय
बनेगा वह; बनेगा वह !

(20) सार्थकता
.......................

जीना-भर
जीवन-सार्थकता का
नहीं प्रमाण,
जीना —
मात्र विवशता
जैसे — मृत्यु ..... प्रयाण।
.

जो स्वाभाविक
उसके धारण में
कोई वैशिष्ट्य नहीं,
संज्ञा
प्राणी होना मात्र
मनुष्य नहीं।
.

मानव - महिमा का
उद्घोष तभी,
मन में हो
सच्चा तोष तभी —
जब हम जीवन को
अभिनव अर्थ प्रदान करें,
भरे अँधेरे में
नव - नव ज्योतिर्लोकों का
संधान करें।
.

सृष्टि-रहस्यों को ज्ञात करें,
चाँद-सितारों से बात करें।
परमार्थ
हमारे जीने का लक्ष्य बने,
हर भौतिक संकट
पग-पग पर भक्ष्य बने।
.

इतनी क्षमताएँ
अर्जित हों,
फिर,
प्राण भले ही
मृत्यु समर्पित हों,
.

कोई ग्लानि नहीं,
कोई खेद नहीं,
इसमें
किंचित मतभेद नहीं,
.

जीवन सफल यही
जीवन विरल यही
धन्य मही !

(21) प्रार्थना
...................

वांछित
अमरता नहीं;
चाहता हूँ
अजरता।
सकल स्वास्थ्य, आरोग्य
निरुद्विग्नता —
तन और मन की।
.

अभिप्रेत वरदान यह
कल्पित किसी ईश से —
नहीं।
.

स्व-साधित सतत साधना से —
आराधना से नहीं।
.

तन क्लेश-मुक्त
मन क्लेश-मुक्त
.

हाँ,
एक-सौ-और-पच्चीस वर्षों
जिएँ हम!
अपने लिए,
दूसरों के लिए।

(22) मृग - तृषा
.........................

उच्छृंखल और महत्त्वाकांक्षी
मानव
धन के पीछे भाग रहा है
सुख के पीछे भाग रहा है
जीवन की क़ीमत पर।
आश्चर्य अरे
इस अद्भुत दूषित नीयत पर !
.

जीवन है तो / धन-योग बनेगा,
जीवन है तो / सुख-भोग सधेगा !
.

खंडित और विशृंखल जीवन
रोग-ग्रस्त / हत घायल जीवन
क्षण-भंगुर
मृत्यु-कुण्ड में
गिरने को आतुर !
.

अंधा, संभ्रम, अज्ञानी
मानव
धन ही वर्चस्व समझ रहा है
सुख को सर्वस्व समझ रहा है !
.

बहुमूल्य मिला जो जीवन / धो बैठेगा,
जीवन की नेमत / खो बैठेगा !

(23) संकल्प
....................

पूर्ण निष्ठावान
हम,
आश्वस्त हो उतरे
विकट जीवन-मरण के
द्वन्द्व में !
बन सिपाही
अमर जीवन-वाहिनी के,
घिर न पाएंगे
विपक्षी के किसी
छल-छन्द में !
.

हार जाएँ,
पर, वर्चस्व मानेंगे नहीं
तनिक भी मरण का,
अधिकार अपना
छिनने नहीं देंगे
जीवन वरण का !
जयघोष गूँजेगा
चरम निश्वास तक,
संघर्षरत
बल-प्राण जूझेगा
शेष आस / प्रयास तक !

(24) जयघोष
....................

सारा विश्व सोता है —
इतनी रात गुज़रे
कौन रोता है ?
.

सुना है —
पास के घर में
मृत्यु का धावा हुआ है,
सत्य है —
कोई मुआ है !
.

यमदूत के
तीखे छुरे ने
आदमी को फिर
छुआ है !
.

पहुँचो
अमृत-सम्वेदना-लहरें लिए,
यह आदमी
फिर-फिर जिए !
.

जीवन-दुंदुभी बजती रहे,
क्षण-क्षण
भले ही, अरथियाँ सजती रहें !

(25) आह्नान
....................

अलख
जगाने वाले आये हैं,
नव-जीवन का
प्रिय मधु गीत
सुनाने वाले आये हैं !
सोहर गाने वाले आये हैं !
उर-वीणा के तार-तार पर
जीवन-राग
बजाने वाले आये हैं !
.

मन से हारो !
जागो !
तन के मारो !
जागो !
.

जीवन के
लहराते सागर में
कूदो
ओ गोताख़ोरो !
जड़ता झकझोरो !

(26) एक दिन
.....................

जीवन
विजयी होगा
विश्वास करें,
नीच मीच से
न डरें; न डरें !
हर संशय का
नाश-विनाश करें !
जीवन जीतेगा
विश्वास करें !
.

घनघोर अँधेरा
मौत मरी का
छाएगा / डरपाएगा;
सूरज के बल पर / दम पर
विश्वास करें !
.

इसका
क़तरा-क़तरा फ़ाश करें !
चारों ओर प्रकाश भरें !
जीवन जीतेगा
विश्वास करें !

(27) उद्देश्य
.................

हम
जो जीवन के शिल्पी हैं
केवल जीवन की
बात करें,
जीवन की सार्थकता खोजें,
जीवन - तत्त्वों को
ज्ञात करें !
.

मरण
हमारा हरण करे तो
उस पर बढ़ कर
आघात करें,
जीवन का
जय - जयकार करें,
यम का
मृति का
संघात करें !

(28) अभीष्ट
..................

जीवन-उपवन में
मृत्यु सर्पिणी का
अस्तित्व न हो,
मृत्यु भीत से आतंकित
मानव-व्यक्तित्व न हो !
.

हर मानव
भोगे जीवन
संदेह रहित,
हो हर पल उसका
मधुरित सिंचित !
.

जीवन - धर्मी
जीवन से खेले,
भरपूर जिये जीवन
हर सुख की बाँहें
बाँहों में ले !

(29) मन-वांछित
...........................

जब-तक
जीना चाहा
हमने;
ख़ूब जिये !
मानों
वर्षा में भी
जलते रहे दिये !

नहीं किसी की
रही कृपा,
जूझे —
अपने बल पर
विश्वास किये !

(30) सिद्ध
.................

जिजीविषु —
नहीं करेगा
मृत्यु-प्रतीक्षा !
सोना
सच्चा खरा तपा —
क्यों देगा
अग्नि-परीक्षा ?
.

भ्रम तोड़ो,
काल-चक्र को मोड़ो !
जीवन से नाता जोड़ो !
जड़ता छोड़ो !

(31) स्वस्थ दृष्टि
.........................

स्वयं को
शाश्वत समझ कर
जीते हैं,
निश्चिन्त
हँसते और गाते हैं,
बेफ़िक्र
खाते और पीते हैं;
जीना
क्या इसे ही
हम कहें ?
.

अंत से
जब रू-ब-रू हों,
अन्यथा
अनभिज्ञ ही उससे रहें,
क्या
जीना इसे ही
हम कहें ?

(32) साम्य
..................

गाता हूँ
विजय के गीत
गाता हूँ !
मृत्यु पर
जीवन जगत की जीत
गाता हूँ !
अति प्रिय वस्तु
जीवन-विस्फुरण की
बेधड़क जयकार
गाता हूँ !
.

क़ब्रिस्तान के आकाश में
जो गूँजते हैं स्वर
परिन्दों के
स्वच्छन्द रिन्दों के
अनुवाद हैं —
मेरी
जीवन-भावनाओं के !
सहचार हैं —
मेरी
जीवन-अर्चनाओं के !

(33) दह्‌तअंगेज़
.........................

सावधान !
फहरा दी है
हमने
घर-घर, गाँव-गाँव, नगर-नगर
जीवन की
नव-जीवन की
लाल पताकाएँ !
.

बस्ती-बस्ती, चैराहों-सतराहों पर,
यहाँ-वहाँ —
ठाँव-ठाँव !
लहरा दी हैं
रक्त-पताकाएँ !
.

अब नहीं चलेगा
आतंकी, घातक, जन-भक्षी,
मद-ज्वर-ग्रस्त
मरण-राक्षस का
कोई भी दावँ !
.

तन के भीतर घुस कर
घात लगाता है,
अपने को अविजित यम का
दूत बताता है,
तन के भीतर
विस्फोटक-बारूद
बिछाता है,
.

और ...
अदृश स्थानों से
छिप-छिप कर
दूरस्थ-नियन्त्रित-यंत्र चलाता है !
देखें
अब और किधर से आता है !

(34) मृत्यु-दर्शन
..........................

मृत्यु :
सुनिश्चित है जब;
व्यर्थ इस क़दर
क्यों होते हो
आशंकित,
आतंकित !
.

मृत्यु से अरे कह दो —
‘जब चाहे आना; आये।’
.

इस समयावधि तो
आओ,
मिल कर नाचें-गाएँ !
नाना वाद्य बजाएँ !
.
तोड़ें मौन;
मृत्यु की चिन्ता
करता है कौन ?

(35) आमंत्रण
......................

मृत्यु —
आना,
एक दिन ज़रूर आना !
और मुझे
अपने उड़नखटोले में
बैठा कर ले जाना;
दूर ... बहुत दूर
नरक में !
.
जिससे में
नरक-वासियों को
संगठित कर सकूँ,
उन्हें विद्रोह के लिए
ललकार सकूँ,
ज़िन्दगी बदलने के लिए
तैयार कर सकूँ !
.
नहीं मानता मैं
किसी चित्रगुप्त को
किसी यमराज को;
चुनौती दूंगा उन्हें !
बस, ज़रा कूद तो जाऊँ
नरक-कुण्ड में !
मिल जाऊँ
नरक-वासियों के
विशाल झुण्ड में !

(36) मृत्यु-परी से —
...............................

मृत्यु आओ —
हम तैयार हैं !
मत समझो
कि लाचार हैं ।
.

पूर्व-सूचना
दोगी नहीं क्या ?
आभार मेरा
लोगी नहीं क्या ?
.

आओगी —
बिना आहट किये
आश्चर्य देती !
नटखट बालिका की तरह !
.

ठीक है,
स्वीकार है !
मेरी चहेती,
तुम्हारा खेल यह
स्वीकार है !
.

चुपचाप आओ,
मृत्यु आओ
हम तैयार हैं !
.

अच्छी तरह
समझते हैं —
कि जीवन-पुस्तिका का
उपसंहार हो तुम !
.

इसलिए —
मेरे लिए
पूर्णता का
शुभ-समाचार हो तुम !
.

आओ,
मृत्यु आओ,
हम तैयार हैं !
प्रतीक्षा में तुम्हारी
सज-धज कर
तैयार हैं !

(37) निवेदन
.....................

मृत्यु —
क्या हुआ
यदि तुम स्त्री-लिंग हो,
तुम्हें मित्र बना सकता हूँ !
शरमाती क्यों हो ?
.

आओ
हमजोली बनो ना !
हमख़ाना नहीं तो
हमसाया बनो ना !
.

चाँद के टुकड़े जैसी तुम !
सामने वाली खिड़की से
झाँकना,
आँकना !
.

और एक दिन अचानक
मुझे साथ ले
चल पड़ना
प्रेत-लोक में !
यों ही
नोकझोंक में !


(38) मृत्यु-विधि
.........................

स्वप्न देखते
आती होगी मृत्यु,
तन से
प्राण चले जाते होंगे
तभी।
.

स्वप्न देखता रहता आदमी
दिवंगत हो जाता होगा !
.

वह क्या जाने ?
.

दुनिया वालों से पूछो
जिन्होंने —
तन पर रख
ढक दी है चादर !
क्या हुआ ?
हुआ क्या ?
आख़िर ?

(39) तुलना
..................

शिव में
शव में
अन्तर है मात्र इकार का
(तीसरे वर्ण वार का।)
.

शिव —
मंगलकारी है
सुख झड़ता है !
शव —
अनिष्ट-सूचक
केवल सड़ता है !
.

शिव के तीन नेत्र हैं,
शव अंधा है !
.

कैसा गोरखधंधा है ?

(40) अन्तर
....................

आपने याद किया
आभार !
मीठा दर्द दिया
स्वीकार !
.

कितना अद्भुत है संयोग
कि अन्तिम विदा
अरे ! ओ प्रेम प्रथम !
आये
ओझल होती राह पर,
लिए चाह —
जो कभी पूरी होनी नहीं,
कभी वास्तव स्थूल छुअन से
सह-अनुभूत हमारी
यह दूरी होनी नहीं !
.

जाता हूँ —
याद लिए जाता हूँ,
दर्द लिए जाता हूँ !

(41) अन्त
.................

समर —
अब कहाँ है ?
सफ़र —
अब कहाँ है ?
.

थम गया सब
बहता उछलता नदी-जल तरल,
जम गया सब —
नसों में रुधिर की तरह !
.

दर्द से
देह की हड्डियाँ सब
चटखती लगातार,
अब कौन
इन्हें दबाए
टूटती आख़िरी साँस तक ?
अँधेरे-अँधेरे घिरे
जब न कोई
पास तक !
.

लहर अब कहाँ
एक ठहराव है,
ज़िन्दगी अब —
शिथिल तार;
बिखराव है !

(42) आघात
...................

मैंने ...
जीवित रखा तुम्हें —
अतः तुम्हारी
जीवित गलित लाश भी
ढोऊंगा !
मूक विवश ढोऊंगा !
.

विश्वासों का ख़ून किया
तुमने,
अरमानों को
जलती भट्ठी में भून दिया
तुमने !
छल-छद्म का
सफल अभिनय कर,
जीवन के हर पल में
दर्द असह भर !
.

प्यारा नहीं बना,
हत्यारा नहीं बना !
अरे ! नहीं छीना जीने का हक़;
यदपि हुआ बेपरदा शक,
हर शक !
.

जीवित रखा जब
नरकाग्नि में दहूंगा
बन संवेदनहीन
सब सहूंगा !

पहले या फिर
सब को
चिर-निद्रा में सोना है,
मिट्टी-मिट्टी होना है !
.

ओ बदक़िस्मत !
फिर, कैसा रोना है ?

(43) सत्य
................

प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे,
उड़ जाएंगे !
प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे !
.

काहे इतना जतन करे,
शाम-सबेरे भजन करे,
तेरे वश में क्या है रे
मन्दिर-मन्दिर नमन करे,
.

इक दिन तन के पिंजर से
प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे !
जो कभी न
वापस आएंगे !
उड़ जाएंगे
प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे !

(44) निश्चिति
....................

तय है कि
तू
एक दिन
मृत्यु की गोद में
मौन
सो जायगा !
.

तय है कि
तू
एक दिन
मृत्यु के घोर अँधियार में
डूब
खो जायगा !
.

तय है कि
तू
एक दिन
त्याग कर रूप श्री
भस्म में सात्
हो जायगा !

(45) घोषणा
...................

दुनिया वालों से
कह दो —
अब
महेन्द्रभटनागर सोता है !
चिर-निद्रा में सोता है !
.

जो
होना होता है;
वह होता है !
रे मानव !
तू क्यों रोता है ?
.

जीवन
जो अपना है,
उस पर भी
अपना अधिकार नहीं,
घर-धन
जो अपना है
उसमें भी
सचमुच
कोई सार नहीं !
उसके
तुम दावेदार नहीं !
.

बन कर
मौन विरक्त - विरागी

चल देते हैं
छोड़ सभी,
चल देते हैं
नये-पुराने नाते-रिश्ते
तोड़ सभी !
.

रे इस क्षण का
अनुभव
सब को करना है,
मृत्यु अटल है
फिर
उससे क्या डरना है ?
.

ओ, मृत्यु अमर !
तुम समझो चाहे
लाचार मुझे,
उपसंहार मुझे,
स्वेच्छा से
करता हूँ अंगीकार तुम्हें
तन-मन से स्वीकार तुम्हें !
.

सुखदायी
मिट्टी की शैया पर सोता हूँ !
इस मिट्टी के
कण - कण में मिल कर
अपनापन खोता हूँ !
नव जीवन बोता हूँ !
जैसे जीवन अपनाया
वैसे
हे, मृत्यु
तुम्हें भी अपनाता हूँ !
.

जाता हूँ,
दुनिया से जाता हूँ !
सुन्दर घर, सुन्दर दुनिया से
जाता हूँ !
सदा ... सदा को
जाता हूँ !

(46) नमन
.................

अलविदा !
जग की बहारो
अलविदा !
ओ, दमकते चाँद
झिलमिलाते सित सितारो
अलविदा !
पहाड़ो ... घाटियो
ढालो ... कछारो
अलविदा !
उफ़नती सिन्धु-धारो
अलविदा !
.

फड़फड़ाती
मोह की पाँखो,
छलछलाती
प्यार की आँखो
अलविदा !
.

अटूटे बंध की बाँहो
अधूरी छूटती चाहो
अलविदा !
अलविदा !

(47) अलविदा !
........................

प्रारब्ध के मारे हुए
हम,
ज़िन्दगी के खेल में
हारे हुए
हम,
.

हाय !
अपनों से सताए,
हृदय पर चोट खाए,
सिर झुकाए
मौन
जाते हैं सदा को —
.

कभी भी
याद मत करना,
आज के दिन भी
सुनो,
स्मृति-दीप मत रखना !

(48) तपस्वी
....................

मृत्यु पर पाने विजय
सिद्धार्थ - साधक
एक और चला !
.

जिसने हर चरण
यम-वाहिनी की
छल-कुचालों को दला !
.

किसी भी व्यूह में
न फँसा,
मौत पर
अपना कठिन फंदा कसा !
.

गा रहा है जो
ज़िन्दगी के गीत
मृत्यु-कगार पर,
एक दिन —
पा जायगा
पद अमर
अपना बदल कर रूप !
.

रखना सुरक्षित
इस धरोहर को
बना कर स्तूप !

(49) मृत्यु-पत्र
.......................

रोना नहीं,
दीन-निरीह होना नहीं !
.

आघात सहना,
संयमित रहना।
.

आडम्बरों से मुक्त
अन्तिम कर्म हो,
ध्यान में बस
पारलौकिक-पारमार्थिक मर्म हो !
.

मृत्यूपरान्त जगत व जीवन

न जाना किसी ने
न देखा किसी ने ....
निर्धारित व्यवस्थाएँ समस्त
कपोल-कल्पित है,
सब अतर्कित हैं।
अनुसरण उनका अवांछित है !
अंधानुयायी रे नहीं बनना,
ज्ञान के आलोक में
हो संस्कार-पूत उपासना।
.

आदेश यह
सद्धर्म सद्भावना।

(50) कृतकर्मा
......................

दुःख क्यों ?
शरीर-धर्म की पूर्ति पर
दुःख क्यों ?
.

अंत —
चिन्ह पूर्णता,
सफल चरण
दुःख क्यों ?
.

जीव की समाप्ति
एक क्रम
दुःख क्यों ?
.

शेष
जीवनी वृतान्त
अर्थ सिद्धि दो,
नाम दो।

आख़िरी सलाम लो !

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