बुधवार, 6 जनवरी 2010

डॉ. महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह --- मृत्यु-बोध : जीवन-बोध























डॉ. महेंद्रभटनागर का कविता संग्रह --- मृत्यु-बोध : जीवन-बोध


रचना-काल : सन् 2000-2001
प्रकाशन-वर्ष : सन् 2002
प्रकाशक : इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली — 110 006







(1) आभार
..................

मृत्यु है;
मृत्यु निश्चित है,
अटल है —
जीवन इसलिए ही तो
इतना काम्य है !
इसलिए ही तो
जीवन-मरण में
इतना परस्पर साम्य है !
.
मृत्यु ने ही
जीवन को दिया सौन्दर्य
इतना
अशेष - अपार !
मृत्यु ने ही
मानव को दिया
जीवन-कला-सौकर्य
इतना
सिँगार-निखार !
.
निःसंदेह
है स्वीकार्य —
नश्वरता,
मर्त्य दर्शन / भाव
प्रतिपल मृत्यु-तनाव !
आभार
मृत्यु के प्रति
प्राण का आभार !

(2) आभार; पुनः
................................

मौत ने ज़िन्दगी को
बड़ा ख़ूबसूरत बना दिया,
.

लोक को,
असलियत में
सुखद एक जन्नत
बना दिया,
.

अर्थ हम प्यार का
जान पाये, तभी तो
सही-सही,
.

आदमी को
अमर देव से;
और उन्नत बना दिया !

(3) काल-चक्र
...........................

निर्मम है
काल-चक्र
अतिशय निर्मम !
जिसके नीचे
जड़-जंगम
क्रमशः पिसता और बदलता
हर क्षण, हर पल !
थर-थर कँपता भू-मंडल !
.

अदृश्य
निःशब्द किये
अविरत घूम रहा
यह काल-चक्र
निर्विघ्न ... निर्विकार !
.

इसके सम्मुख
स्थिरता का कोई
अस्तित्व नहीं,
इसकी गति से
सतत नियन्त्रित
जीवन और मरण,
धरती और गगन !

(4) निरुद्विग्न
............................

मृत्यु से डरते रहेंगे
तो
हो जायगा
जीना निरर्थक !
भार बोझिल
शुष्क नीरस
निर्विषय मानस।
.

अतः
सार्थक तभी
जीवन,
मरण-डर मुक्त हो
हर क्षण।
.

अशुभ है
नाम लेना
मृत्यु-भय का,
या प्रलय का
इसी कारण।

(5) चिन्तन
.........................

मृत्यु ?
एक प्रश्न-चिन्ह !
भेद जानना
दुरूह ही नहीं;
मनुष्य के लिए
अ-ज्ञात
सब।
देह पंच-तत्त्व में विलीन
सब बिखर-बिखर !
समाप्त।
.
प्राण लौटना नहीं;
न सम्भवी
पुनः सचेत कर सकें,
रहस्य ज्ञात कर सकें
स्वयं जब नहीं।
मरण - प्रहेलिका
अजब प्रहेलिका !
अबूझ आज तक
गज़ब प्रहेलिका !
.
प्रयत्न व्यर्थ —
मृत्यु-अर्थ व्यक्त हो सके;
जटिल कठिन
विचारणा।

(6) पहेली
......................

क्या कहा ?
तन
रहने योग्य नहीं रहा;
.

इसलिए ...
आत्मन !
तुम चले गये।
.

नये की चाह में
किसी राह में;
.

कहाँ ?
लेकिन कहाँ ??
.

अज्ञात है,
सब अज्ञात है !
घुप अँधेरी रात है,
रहस्यपूर्ण
हर बात है !

.

प्रश्न किसका है ?
उत्तर किसका है ?

(7) सचाई
.......................

मृत्यु नहीं होती
तो ईश्वर का भी अस्तित्व नहीं होता,
कभी नहीं करता
मानव
प्रारब्धवाद से समझौता !
.

ईश्वर प्रतीक है
ईश्वर प्रमाण है
मानव की लाचारी का,
मृत्यूपरान्त तैयारी का।
.

स्वर्ग-नरक का
सारा दर्शन-चिन्तन
कल्पित है,
मानव
मृत्यु-दूत की आहट से
हर क्षण आतंकित है,
रह-रह रोमांचित है !
मालूम है उसे —
‘मृत्यु सुनिश्चित है !’
इसीलिए पग-पग पर
आशंकित है !
यही नहीं
तथाकथित मर्त्य-लोक से
नितान्त अपरिचित है;
वह।
अतः तभी तो
जाता है
ईश्वर की शरण में
पाने चिर-शान्ति मरण में !
.

अतः तभी तो
गाता है —
एक-मात्र
‘राम नाम सत्य है !’
अरे, जन्म-मृत्यु कुछ नहीं
उसी का
विनोद-क्रूर कृत्य है !

(8) मृत्यु-रूप
......................

मृत्यु प्राकृतिक हो
या आकस्मिक दुर्घटना हो
निष्कर्ष एक है —
अन्त-कर्म जीवन का,
होना चेतनहीन
सक्रिय तन का,
सदा-सदा को होना सुप्त
हृदय-स्पन्दन का !
दोनों ही तथाकथित
विधि-लेख है,
भाग्य-लिपि अदृष्ट अमिट रेख है !
लेकिन
जीवन-वध
चाहे आत्म-हनन हो,
या हत्या-भाव-वहन हो,
या व्यक्ति और समाज रक्षा हेतु
दरिन्दों का दमन-दलन हो,
नहीं मरण;
है प्राण-हरण।
भले ही अंत एक
मृत्यु !
सही मृत्यु या अकाल मृत्यु।

(9) निष्कर्ष
........................

मृत्यु ?
प्रश्न-चिन्ह।
.

स्थिर
अनुत्तरित
अड़ा,
विरुद्ध बन
खड़ा।
.

पर, नहीं
मनुष्य हार मानना,
तनिक न ईश कल्पना
बचाव में,
सवाल के जवाब में,
नहीं, नहीं !
.

रहस्य मृत्यु का
निरावरण ... प्रकट
अवश्य
अवश्य
एक दिन !

(10) जन्म-मृत्यु
............................

मृत्यु :
जन्म से बँधी
अटूट डोर है,
.

जन्म :
एक ओर;
मृत्यु :
दूसरा प्रतीप छोर है !
.

जन्म — एक तट
मरण — विलोम तीर;
.

जन्म :
हर्ष क्यों ?
मृत्यु :
पीर ... !
क्यों ?
जन्म-मृत्यु
जब समान हैं ?
.

एक / रूपवान;
दूसरा / महानिधान है !
.

जन्म —
सूत्रपात है,
मृत्यु —
नाश है: निघात है !
.

जन्म ... ज्ञात,
मृत्यु ... अ-ज्ञात !
.

जन्म: आदि,
मृत्यु: अन्त है !
जन्म: श्रीगणेश,
मृत्यु: क्षिति दिगन्त है !
.

जन्म: हाँ, हयात है,
मृत्यु: हा! विघात है !
.

जन्म: नव-प्रभात है,
मृत्यु: घोर रात है !

(11) युग्म
..................

चारों ओर फैली
मरुभूमि रेतीली
बुझते दीपक लौ-सी
भूरी
पिंगल।
पीत-हरित
जल-रहित
ढलती उम्र
मरणासन्न !
.

लेकिन
अनगिनती
लहराते ... हरिआते
मरुद्वीप !
कँटीले
पत्ते रहित
पनपते पेड़ —
जीवन-चिन्ह
पताकाएँ !
जलाशय —
आशय ... जीवन-द
प्राणद !

(12) विलोम
.......................

जीवन : हर्षोल्लास
मृत्यु : अंतिम निश्वास
मधुर राग / चीत्कार !
शुभ-कृत / हाहाकार !

(13) समान
...................

प्रात भी अरुण
सान्ध्य भी अरुण
प्रात-सान्ध्य एक हैं।

जन्म पर रुदन
मृत्यु पर रुदन
जन्म-मृत्यु एक हैं।

यही
सही विवेक है,
यथार्थ ज्ञान है,
व्यर्थ
और ... और ध्यान है।

(14) साखी
....................

इतने उदास क्यों होते हो ?
होशोहवास क्यों खोते हो ?
जीवन - बहुमूल्य है; सही
है अटल मृत्यु; क्यों रोते हो ?

(15) कामना
......................

जिएँ समस्त शिशु तरुण
अकाल मृत्यु है करुण।

(16) वास्तव
......................

‘‘मृत्यु —
जन्म है
पुनः - पुनः
आत्म - तत्त्व का।’’
असत्य; इस विचार को
कि सत्य मान लें ?
अंध मान्यता
तर्क हीन मान्यता !

प्राण / पंच - तत्त्व में विलीन,
अंत / एक सृष्टि का,
अंत / एक व्यक्ति का,
एक जीव का।
कहीं नहीं
यहाँ ... वहाँ।
.

सही यही
कि लय सदैव को।
.
न है नरक कहीं,
न स्वर्ग है कहीं,
यथार्थ लोक सत्य है।
मृत्यु सत्य है,
जन्म सत्य है।

(17) जीवन-दर्शन
............................

बहिर्गति —
भौतिक स्पन्दन;
अन्तर-गति
जीवन।
.

जीवन गति का वाहक —
मैं
सतत नियन्त्रक —
मैं
जब - तक
गतिशील रहेगा जीवन
इतिहास रचेगा
मानव-मन
मानव-तन।
.

लय हो न कभी;
जीवन लयवान रहे,
कण-कण गतिमान रहे।
.

लयगत होना
अन्तर गति खोना।

(18) चरैवेति
....................

संघर्षों-संग्रामों से
जीवन की निर्मिति,
होना निष्क्रिय
ज्ञापक - आसन्न मरण का,
थमना — जीवन की परिणति।
जीवन: केवल गति,
अविरति गति !
क्रमशः विकसित होना,
होना परिवर्तित
जीवन का धारण है !
स्थिरता
प्राण-विहीनों का
स्थापित लक्षण है !
.

जीवन में कम्पन है, स्पन्दन है,
जीवन्त उरों में अविरल धड़कन है !
.

रुकना
अस्तित्व - विनाशक
अशुभ मृत्यु को आमंत्रण,
.

चलते रहना ... चलते रहना !
एक मात्र मूल-मंत्र
साधक जीवन !

(19) प्रयोगरत
.......................

आदमी में —
चाह जीवन की
सनातन और सर्वाधिक प्रबल है;
.

जब कि
हर जीवन्त की
अन्तिम सचाई
मृत्यु है !
हाँ, अन्त निश्चित है,
अटल है !
.

लेकिन / सत्य है यह भी —
अमरता की: अजरता की
लहकती वासना का वेग
होगा कम नहीं,
अद्भुत पराक्रम आदमी का
चाहता कलरव,
रुदन मातम नहीं !
.
हर बार
ध्रुव मृति की चुनौती से
निरन्तर जूझना स्वीकार !
मृत्युंजय
बनेगा वह; बनेगा वह !

(20) सार्थकता
.......................

जीना-भर
जीवन-सार्थकता का
नहीं प्रमाण,
जीना —
मात्र विवशता
जैसे — मृत्यु ..... प्रयाण।
.

जो स्वाभाविक
उसके धारण में
कोई वैशिष्ट्य नहीं,
संज्ञा
प्राणी होना मात्र
मनुष्य नहीं।
.

मानव - महिमा का
उद्घोष तभी,
मन में हो
सच्चा तोष तभी —
जब हम जीवन को
अभिनव अर्थ प्रदान करें,
भरे अँधेरे में
नव - नव ज्योतिर्लोकों का
संधान करें।
.

सृष्टि-रहस्यों को ज्ञात करें,
चाँद-सितारों से बात करें।
परमार्थ
हमारे जीने का लक्ष्य बने,
हर भौतिक संकट
पग-पग पर भक्ष्य बने।
.

इतनी क्षमताएँ
अर्जित हों,
फिर,
प्राण भले ही
मृत्यु समर्पित हों,
.

कोई ग्लानि नहीं,
कोई खेद नहीं,
इसमें
किंचित मतभेद नहीं,
.

जीवन सफल यही
जीवन विरल यही
धन्य मही !

(21) प्रार्थना
...................

वांछित
अमरता नहीं;
चाहता हूँ
अजरता।
सकल स्वास्थ्य, आरोग्य
निरुद्विग्नता —
तन और मन की।
.

अभिप्रेत वरदान यह
कल्पित किसी ईश से —
नहीं।
.

स्व-साधित सतत साधना से —
आराधना से नहीं।
.

तन क्लेश-मुक्त
मन क्लेश-मुक्त
.

हाँ,
एक-सौ-और-पच्चीस वर्षों
जिएँ हम!
अपने लिए,
दूसरों के लिए।

(22) मृग - तृषा
.........................

उच्छृंखल और महत्त्वाकांक्षी
मानव
धन के पीछे भाग रहा है
सुख के पीछे भाग रहा है
जीवन की क़ीमत पर।
आश्चर्य अरे
इस अद्भुत दूषित नीयत पर !
.

जीवन है तो / धन-योग बनेगा,
जीवन है तो / सुख-भोग सधेगा !
.

खंडित और विशृंखल जीवन
रोग-ग्रस्त / हत घायल जीवन
क्षण-भंगुर
मृत्यु-कुण्ड में
गिरने को आतुर !
.

अंधा, संभ्रम, अज्ञानी
मानव
धन ही वर्चस्व समझ रहा है
सुख को सर्वस्व समझ रहा है !
.

बहुमूल्य मिला जो जीवन / धो बैठेगा,
जीवन की नेमत / खो बैठेगा !

(23) संकल्प
....................

पूर्ण निष्ठावान
हम,
आश्वस्त हो उतरे
विकट जीवन-मरण के
द्वन्द्व में !
बन सिपाही
अमर जीवन-वाहिनी के,
घिर न पाएंगे
विपक्षी के किसी
छल-छन्द में !
.

हार जाएँ,
पर, वर्चस्व मानेंगे नहीं
तनिक भी मरण का,
अधिकार अपना
छिनने नहीं देंगे
जीवन वरण का !
जयघोष गूँजेगा
चरम निश्वास तक,
संघर्षरत
बल-प्राण जूझेगा
शेष आस / प्रयास तक !

(24) जयघोष
....................

सारा विश्व सोता है —
इतनी रात गुज़रे
कौन रोता है ?
.

सुना है —
पास के घर में
मृत्यु का धावा हुआ है,
सत्य है —
कोई मुआ है !
.

यमदूत के
तीखे छुरे ने
आदमी को फिर
छुआ है !
.

पहुँचो
अमृत-सम्वेदना-लहरें लिए,
यह आदमी
फिर-फिर जिए !
.

जीवन-दुंदुभी बजती रहे,
क्षण-क्षण
भले ही, अरथियाँ सजती रहें !

(25) आह्नान
....................

अलख
जगाने वाले आये हैं,
नव-जीवन का
प्रिय मधु गीत
सुनाने वाले आये हैं !
सोहर गाने वाले आये हैं !
उर-वीणा के तार-तार पर
जीवन-राग
बजाने वाले आये हैं !
.

मन से हारो !
जागो !
तन के मारो !
जागो !
.

जीवन के
लहराते सागर में
कूदो
ओ गोताख़ोरो !
जड़ता झकझोरो !

(26) एक दिन
.....................

जीवन
विजयी होगा
विश्वास करें,
नीच मीच से
न डरें; न डरें !
हर संशय का
नाश-विनाश करें !
जीवन जीतेगा
विश्वास करें !
.

घनघोर अँधेरा
मौत मरी का
छाएगा / डरपाएगा;
सूरज के बल पर / दम पर
विश्वास करें !
.

इसका
क़तरा-क़तरा फ़ाश करें !
चारों ओर प्रकाश भरें !
जीवन जीतेगा
विश्वास करें !

(27) उद्देश्य
.................

हम
जो जीवन के शिल्पी हैं
केवल जीवन की
बात करें,
जीवन की सार्थकता खोजें,
जीवन - तत्त्वों को
ज्ञात करें !
.

मरण
हमारा हरण करे तो
उस पर बढ़ कर
आघात करें,
जीवन का
जय - जयकार करें,
यम का
मृति का
संघात करें !

(28) अभीष्ट
..................

जीवन-उपवन में
मृत्यु सर्पिणी का
अस्तित्व न हो,
मृत्यु भीत से आतंकित
मानव-व्यक्तित्व न हो !
.

हर मानव
भोगे जीवन
संदेह रहित,
हो हर पल उसका
मधुरित सिंचित !
.

जीवन - धर्मी
जीवन से खेले,
भरपूर जिये जीवन
हर सुख की बाँहें
बाँहों में ले !

(29) मन-वांछित
...........................

जब-तक
जीना चाहा
हमने;
ख़ूब जिये !
मानों
वर्षा में भी
जलते रहे दिये !

नहीं किसी की
रही कृपा,
जूझे —
अपने बल पर
विश्वास किये !

(30) सिद्ध
.................

जिजीविषु —
नहीं करेगा
मृत्यु-प्रतीक्षा !
सोना
सच्चा खरा तपा —
क्यों देगा
अग्नि-परीक्षा ?
.

भ्रम तोड़ो,
काल-चक्र को मोड़ो !
जीवन से नाता जोड़ो !
जड़ता छोड़ो !

(31) स्वस्थ दृष्टि
.........................

स्वयं को
शाश्वत समझ कर
जीते हैं,
निश्चिन्त
हँसते और गाते हैं,
बेफ़िक्र
खाते और पीते हैं;
जीना
क्या इसे ही
हम कहें ?
.

अंत से
जब रू-ब-रू हों,
अन्यथा
अनभिज्ञ ही उससे रहें,
क्या
जीना इसे ही
हम कहें ?

(32) साम्य
..................

गाता हूँ
विजय के गीत
गाता हूँ !
मृत्यु पर
जीवन जगत की जीत
गाता हूँ !
अति प्रिय वस्तु
जीवन-विस्फुरण की
बेधड़क जयकार
गाता हूँ !
.

क़ब्रिस्तान के आकाश में
जो गूँजते हैं स्वर
परिन्दों के
स्वच्छन्द रिन्दों के
अनुवाद हैं —
मेरी
जीवन-भावनाओं के !
सहचार हैं —
मेरी
जीवन-अर्चनाओं के !

(33) दह्‌तअंगेज़
.........................

सावधान !
फहरा दी है
हमने
घर-घर, गाँव-गाँव, नगर-नगर
जीवन की
नव-जीवन की
लाल पताकाएँ !
.

बस्ती-बस्ती, चैराहों-सतराहों पर,
यहाँ-वहाँ —
ठाँव-ठाँव !
लहरा दी हैं
रक्त-पताकाएँ !
.

अब नहीं चलेगा
आतंकी, घातक, जन-भक्षी,
मद-ज्वर-ग्रस्त
मरण-राक्षस का
कोई भी दावँ !
.

तन के भीतर घुस कर
घात लगाता है,
अपने को अविजित यम का
दूत बताता है,
तन के भीतर
विस्फोटक-बारूद
बिछाता है,
.

और ...
अदृश स्थानों से
छिप-छिप कर
दूरस्थ-नियन्त्रित-यंत्र चलाता है !
देखें
अब और किधर से आता है !

(34) मृत्यु-दर्शन
..........................

मृत्यु :
सुनिश्चित है जब;
व्यर्थ इस क़दर
क्यों होते हो
आशंकित,
आतंकित !
.

मृत्यु से अरे कह दो —
‘जब चाहे आना; आये।’
.

इस समयावधि तो
आओ,
मिल कर नाचें-गाएँ !
नाना वाद्य बजाएँ !
.
तोड़ें मौन;
मृत्यु की चिन्ता
करता है कौन ?

(35) आमंत्रण
......................

मृत्यु —
आना,
एक दिन ज़रूर आना !
और मुझे
अपने उड़नखटोले में
बैठा कर ले जाना;
दूर ... बहुत दूर
नरक में !
.
जिससे में
नरक-वासियों को
संगठित कर सकूँ,
उन्हें विद्रोह के लिए
ललकार सकूँ,
ज़िन्दगी बदलने के लिए
तैयार कर सकूँ !
.
नहीं मानता मैं
किसी चित्रगुप्त को
किसी यमराज को;
चुनौती दूंगा उन्हें !
बस, ज़रा कूद तो जाऊँ
नरक-कुण्ड में !
मिल जाऊँ
नरक-वासियों के
विशाल झुण्ड में !

(36) मृत्यु-परी से —
...............................

मृत्यु आओ —
हम तैयार हैं !
मत समझो
कि लाचार हैं ।
.

पूर्व-सूचना
दोगी नहीं क्या ?
आभार मेरा
लोगी नहीं क्या ?
.

आओगी —
बिना आहट किये
आश्चर्य देती !
नटखट बालिका की तरह !
.

ठीक है,
स्वीकार है !
मेरी चहेती,
तुम्हारा खेल यह
स्वीकार है !
.

चुपचाप आओ,
मृत्यु आओ
हम तैयार हैं !
.

अच्छी तरह
समझते हैं —
कि जीवन-पुस्तिका का
उपसंहार हो तुम !
.

इसलिए —
मेरे लिए
पूर्णता का
शुभ-समाचार हो तुम !
.

आओ,
मृत्यु आओ,
हम तैयार हैं !
प्रतीक्षा में तुम्हारी
सज-धज कर
तैयार हैं !

(37) निवेदन
.....................

मृत्यु —
क्या हुआ
यदि तुम स्त्री-लिंग हो,
तुम्हें मित्र बना सकता हूँ !
शरमाती क्यों हो ?
.

आओ
हमजोली बनो ना !
हमख़ाना नहीं तो
हमसाया बनो ना !
.

चाँद के टुकड़े जैसी तुम !
सामने वाली खिड़की से
झाँकना,
आँकना !
.

और एक दिन अचानक
मुझे साथ ले
चल पड़ना
प्रेत-लोक में !
यों ही
नोकझोंक में !


(38) मृत्यु-विधि
.........................

स्वप्न देखते
आती होगी मृत्यु,
तन से
प्राण चले जाते होंगे
तभी।
.

स्वप्न देखता रहता आदमी
दिवंगत हो जाता होगा !
.

वह क्या जाने ?
.

दुनिया वालों से पूछो
जिन्होंने —
तन पर रख
ढक दी है चादर !
क्या हुआ ?
हुआ क्या ?
आख़िर ?

(39) तुलना
..................

शिव में
शव में
अन्तर है मात्र इकार का
(तीसरे वर्ण वार का।)
.

शिव —
मंगलकारी है
सुख झड़ता है !
शव —
अनिष्ट-सूचक
केवल सड़ता है !
.

शिव के तीन नेत्र हैं,
शव अंधा है !
.

कैसा गोरखधंधा है ?

(40) अन्तर
....................

आपने याद किया
आभार !
मीठा दर्द दिया
स्वीकार !
.

कितना अद्भुत है संयोग
कि अन्तिम विदा
अरे ! ओ प्रेम प्रथम !
आये
ओझल होती राह पर,
लिए चाह —
जो कभी पूरी होनी नहीं,
कभी वास्तव स्थूल छुअन से
सह-अनुभूत हमारी
यह दूरी होनी नहीं !
.

जाता हूँ —
याद लिए जाता हूँ,
दर्द लिए जाता हूँ !

(41) अन्त
.................

समर —
अब कहाँ है ?
सफ़र —
अब कहाँ है ?
.

थम गया सब
बहता उछलता नदी-जल तरल,
जम गया सब —
नसों में रुधिर की तरह !
.

दर्द से
देह की हड्डियाँ सब
चटखती लगातार,
अब कौन
इन्हें दबाए
टूटती आख़िरी साँस तक ?
अँधेरे-अँधेरे घिरे
जब न कोई
पास तक !
.

लहर अब कहाँ
एक ठहराव है,
ज़िन्दगी अब —
शिथिल तार;
बिखराव है !

(42) आघात
...................

मैंने ...
जीवित रखा तुम्हें —
अतः तुम्हारी
जीवित गलित लाश भी
ढोऊंगा !
मूक विवश ढोऊंगा !
.

विश्वासों का ख़ून किया
तुमने,
अरमानों को
जलती भट्ठी में भून दिया
तुमने !
छल-छद्म का
सफल अभिनय कर,
जीवन के हर पल में
दर्द असह भर !
.

प्यारा नहीं बना,
हत्यारा नहीं बना !
अरे ! नहीं छीना जीने का हक़;
यदपि हुआ बेपरदा शक,
हर शक !
.

जीवित रखा जब
नरकाग्नि में दहूंगा
बन संवेदनहीन
सब सहूंगा !

पहले या फिर
सब को
चिर-निद्रा में सोना है,
मिट्टी-मिट्टी होना है !
.

ओ बदक़िस्मत !
फिर, कैसा रोना है ?

(43) सत्य
................

प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे,
उड़ जाएंगे !
प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे !
.

काहे इतना जतन करे,
शाम-सबेरे भजन करे,
तेरे वश में क्या है रे
मन्दिर-मन्दिर नमन करे,
.

इक दिन तन के पिंजर से
प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे !
जो कभी न
वापस आएंगे !
उड़ जाएंगे
प्राण-पखेरू
उड़ जाएंगे !

(44) निश्चिति
....................

तय है कि
तू
एक दिन
मृत्यु की गोद में
मौन
सो जायगा !
.

तय है कि
तू
एक दिन
मृत्यु के घोर अँधियार में
डूब
खो जायगा !
.

तय है कि
तू
एक दिन
त्याग कर रूप श्री
भस्म में सात्
हो जायगा !

(45) घोषणा
...................

दुनिया वालों से
कह दो —
अब
महेन्द्रभटनागर सोता है !
चिर-निद्रा में सोता है !
.

जो
होना होता है;
वह होता है !
रे मानव !
तू क्यों रोता है ?
.

जीवन
जो अपना है,
उस पर भी
अपना अधिकार नहीं,
घर-धन
जो अपना है
उसमें भी
सचमुच
कोई सार नहीं !
उसके
तुम दावेदार नहीं !
.

बन कर
मौन विरक्त - विरागी

चल देते हैं
छोड़ सभी,
चल देते हैं
नये-पुराने नाते-रिश्ते
तोड़ सभी !
.

रे इस क्षण का
अनुभव
सब को करना है,
मृत्यु अटल है
फिर
उससे क्या डरना है ?
.

ओ, मृत्यु अमर !
तुम समझो चाहे
लाचार मुझे,
उपसंहार मुझे,
स्वेच्छा से
करता हूँ अंगीकार तुम्हें
तन-मन से स्वीकार तुम्हें !
.

सुखदायी
मिट्टी की शैया पर सोता हूँ !
इस मिट्टी के
कण - कण में मिल कर
अपनापन खोता हूँ !
नव जीवन बोता हूँ !
जैसे जीवन अपनाया
वैसे
हे, मृत्यु
तुम्हें भी अपनाता हूँ !
.

जाता हूँ,
दुनिया से जाता हूँ !
सुन्दर घर, सुन्दर दुनिया से
जाता हूँ !
सदा ... सदा को
जाता हूँ !

(46) नमन
.................

अलविदा !
जग की बहारो
अलविदा !
ओ, दमकते चाँद
झिलमिलाते सित सितारो
अलविदा !
पहाड़ो ... घाटियो
ढालो ... कछारो
अलविदा !
उफ़नती सिन्धु-धारो
अलविदा !
.

फड़फड़ाती
मोह की पाँखो,
छलछलाती
प्यार की आँखो
अलविदा !
.

अटूटे बंध की बाँहो
अधूरी छूटती चाहो
अलविदा !
अलविदा !

(47) अलविदा !
........................

प्रारब्ध के मारे हुए
हम,
ज़िन्दगी के खेल में
हारे हुए
हम,
.

हाय !
अपनों से सताए,
हृदय पर चोट खाए,
सिर झुकाए
मौन
जाते हैं सदा को —
.

कभी भी
याद मत करना,
आज के दिन भी
सुनो,
स्मृति-दीप मत रखना !

(48) तपस्वी
....................

मृत्यु पर पाने विजय
सिद्धार्थ - साधक
एक और चला !
.

जिसने हर चरण
यम-वाहिनी की
छल-कुचालों को दला !
.

किसी भी व्यूह में
न फँसा,
मौत पर
अपना कठिन फंदा कसा !
.

गा रहा है जो
ज़िन्दगी के गीत
मृत्यु-कगार पर,
एक दिन —
पा जायगा
पद अमर
अपना बदल कर रूप !
.

रखना सुरक्षित
इस धरोहर को
बना कर स्तूप !

(49) मृत्यु-पत्र
.......................

रोना नहीं,
दीन-निरीह होना नहीं !
.

आघात सहना,
संयमित रहना।
.

आडम्बरों से मुक्त
अन्तिम कर्म हो,
ध्यान में बस
पारलौकिक-पारमार्थिक मर्म हो !
.

मृत्यूपरान्त जगत व जीवन

न जाना किसी ने
न देखा किसी ने ....
निर्धारित व्यवस्थाएँ समस्त
कपोल-कल्पित है,
सब अतर्कित हैं।
अनुसरण उनका अवांछित है !
अंधानुयायी रे नहीं बनना,
ज्ञान के आलोक में
हो संस्कार-पूत उपासना।
.

आदेश यह
सद्धर्म सद्भावना।

(50) कृतकर्मा
......................

दुःख क्यों ?
शरीर-धर्म की पूर्ति पर
दुःख क्यों ?
.

अंत —
चिन्ह पूर्णता,
सफल चरण
दुःख क्यों ?
.

जीव की समाप्ति
एक क्रम
दुःख क्यों ?
.

शेष
जीवनी वृतान्त
अर्थ सिद्धि दो,
नाम दो।

आख़िरी सलाम लो !

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