बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य संग्रह ---- जिजीविषा

डॉ0 महेंद्रभटनागर का काव्य संग्रह ---- जिजीविषा

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कविताएँ
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1 हिम्मत न हारो!
2 अप्रतिहत

3 व्यथा
4 संकल्प-विकल्प
5 क्षिप्रा के किनारे
6 न रुकते चरण
7 सहारा
8 जीवन नहीं
9 हमें यह पता है —
10 साथी
11 यह नहीं मंज़िल
12 स्वर-साधना
13 भोर
14 प्राण-दीप
15 नयी किरणें
16 तूफ़ानों का स्वागत
17 दीया जलाओ !
18 परिचय
19 अमिताभ
20 आज की ज़िन्दगी
21 मध्य-वर्ग (चित्र 1)
22 मध्य-वर्ग (चित्र 2)
23 भविष्यत्
24 लेखनी से —

25 मैं कहता हूँ!
26 राही
27 अनुष्ठान
28 पटाक्षेप
29 निश्चय
30 झुकना होगा
31 तुम आज लिख लो —
32 बदल कर रहेगा
33 नयी सुबह
34 सावधान
35 नया यौवन
36 जनता
37 जवानों का गीत
38 तसवीरें
39 बहुतेरे
40 पुनर्निर्माण
41 नयी चेतना

42 विनाश-लीला
43 बन्द करो
44 आज
45 मज़लूम
46 श्रमिक
47 मानव-समता का त्योहार
48 ओ मज़दूर-किसानो !
49 अकेला नहीं हूँ
50 जवानी
51 ज्योति-पर्व
52 कवि ‘निराला’ के प्रति
53 साँझ
54 नयी ज़िन्दगी

55 ज्वार और नाविक
56 जिजीविषा


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(1) हिम्मत न हारो!
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हिम्मत न हारो !
कंटकों के बीच
मन-पाटल खिलेगा एक दिन,
हिम्मत न हारो !

यदि आँधियाँ आएँ तुम्हारे पास
उनसे खेल लो,
जितनी बड़ी चट्टान वे फेंकें तुम्हारी ओर
उसको झेल लो !

तुम तो जानते हो
आजकल बरसात के दिन हैं;
गगन में खलबली है,
दौर-दौरा है घटाओं का,
तुम्हारे सामने अस्तित्व हो उनका
सदाओं का !

लरजती बिजलियाँ;
माना,
तुम्हारे सामने हो खेल
आतिशबाज़ियाँ नाना !
निरंतर राह पर चलते रहोगे तो
तुम्हारा लक्ष्य तुमसे आ मिलेगा एक दिन !
हिम्मत न हारो !
कंटकों के बीच
मन-पाटल खिलेगा एक दिन !
हिम्मत न हारो !

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(2) अप्रतिहत

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मैं नहीं दुर्भाग्य के सम्मुख झुकूँगा
आज जीवन में हुआ असफल भले ही !

एक पल को साधना की भावना सोयी नहीं,
और जाऊँ हार, ऐसी बात भी कोई नहीं,
मैं नहीं सुनसान राहों पर थकूँगा
दूर, बेहद दूर हो मंज़िल भले ही !

आज छाया है अमावस-सा अँधेरा सब तरफ़,
पर, अभी कल मुसकराएगा सबेरा सब तरफ़,
मैं न मन की पंगु दुविधा में रुकूँगा
पास में चाहे न हो संबल भले ही !

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(3) व्यथा
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तुम नये युग के तरुण हो,
है नहीं देता तुम्हें शोभा बहाना अश्रु
प्रिय की याद में,
या बेवफ़ाई में !
कि बदली घिर रही है,
वायु मंथर मधु बसंती बह रही है,
चाँदनी आकाश में छिटकी हुई है !

और तुम हो दूर प्रिय से !
या कि प्रिय ने है किया
विश्वासघात कठोर तुमसे !

सरल तुम भावुक हृदय के जीव हो,
दिल में तुम्हारे प्यार है,
अरमान हैं,
है चाहना सुख की,
नयी स्वर्णिम विहँसती ज़िन्दगी के स्वप्न हैं !

पर, आज चकनाचूर वे,
ज्यों गिर पड़ा हो हाथ से
पाषाण पर जा ताप-मापक-यंत्र,
बहते अश्रु पारे के सदृश,
मानो रहा ही अब नहीं
कोई तुम्हारा वश !

न सोचो —
दीप बुझता जा रहा है,
और बीती याद का
तीखा, नुकीला शूल
चुभता जा रहा है !

ये कबूतर
जो कि छत पर मौन बैठे हैं
किसी की क्या कभी यों याद करते हैं ?

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(4) संकल्प-विकल्प
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आज यह कैसी थकावट ?
कर रही प्रति अंग रग-रग को शिथिल !

मन अचेतन भाव-जड़ता पर गया रुक,
ये उनींदे शांत बोझिल नैन भी थक-से गये !

क्यों आज मेरे प्राण का
उच्छ्वास हलका हो रहा है,
गूँजते हैं क्यों नहीं स्वर व्योम में ?

पिघलता जा रहा विश्वास मन का
मोम-सा बन,
और भावी आश भी क्यों दूर तारा-सी
दृष्टि-पथ से हो रही ओझल ?

व जीवन का धरातल
धूल में कंटक छिपाये
राह मेरी कर रहा दुर्गम !

गगन की इन घहरती आँधियों से
आज क्यों यह दीप प्राणों का
उठा रह-रह सहम ?

रे सत्य है,
इतना न हो सकता कभी भ्रम !

भूल जाऊँ ?
या थकावट से शिथिल होकर
नींद की निस्पंद श्वासों की
अनेकों झाड़ियों में
स्वप्न की डोरी बनाकर
झूल लूँ ?

इस सत्य के सम्मुख
झुकाकर शीश अपना
आत्म-गति को
(रुक रही जो)
रोक लूँ ?
या
सत्य की हर चाल से
संघर्ष कर लूँ आत्मबल से आज ?

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(5) क्षिप्रा के किनारे
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लड़खड़ाते पाँव हैं, सूनी डगर
झूम आगे चल रहा हूँ मैं मगर !

चाँदनी नभ में सुखद फैली हुई,
दीपकों की राह में आभा नयी,

दूर हिलता वृक्ष पीपल का, पवन-
प्रति-झकोरे पर, विमूर्छित मूक मन !

झाँकता जिसमें नशीला चाँद है,
छा गया रे कौन-सा उन्माद है ?

आरती के स्वर, रहा घंटा घहर;
उठ रहीं प्रति बार क्षिप्रा में लहर !

पंथ पगडंडी बना मैं चल रहा
मार्ग का अणु-अणु बना संबल रहा !

औरतें गाती रही थीं आ जहाँ
जा रहा था एक मुर्दा भी वहाँ !

श्वान थोड़े-से पड़े थे भोंकते,
नालियों के पास भिक्षुक कोसते,

डालियों पर बैठ उल्लू बोलते,
दूत प्रतिपल ईश के जग डोलते !

साधुओं का है अखाड़ा पास ही
है जिन्हें परमात्मा विश्वास ही ?

और मैं आगे रहा हूँ चल उधर
जीर्ण कुटिया एक प्राणों की जिधर !

लड़खड़ाते पाँव हैं, सूनी डगर !

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(6) न रुकते चरण !
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अँधेरी निराशा-निशा में
उषा की दमकती न आशा-किरण !

गगन में नहीं अब चमकते सितारे कहीं,
धरा के सभी दूर डूबे किनारे कहीं,
चला जा रहा, पर, सतत बेसहारे कहीं,
विहग उड़ हृदय के सभी आज हारे नहीं,
कठिन कंटकों से भरी राह
दुर्गम, कहीं, पर न रुकते चरण !

उगलती चली पंथ की हर कहानी गरल,
मिटाती चलीं आँधियाँ सब सुरक्षित महल,
सतत, पर प्रगतिवाह-उन्मुक्त-जीवन-सबल,
हुई साधना-प्राण की मम न किंचित विफल,
विरोधी अमंगल समय की
सुलगती प्रखरतम बुझायी जलन !

चमक कर, गरज कर डरातीं घटाएँ अगम,
निरंतर उलझती गयी हर डगर बन विषम,
कि बढ़ता गया घिर धुआँ-सा तिमिर हर क़दम,
व बुझते गये राह-संकेत-दीपक सहम,
प्रलय रात, पर, आज भय से
कहीं डबडबाए न मेरे नयन !

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(7) सहारा
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नहीं साथ मैं चाहता हूँ तुम्हारा,
भले ही मिटे ज़िन्दगी का सहारा !

जिये यदि किसी की दया माँग
तो क्या जिये ?
कभी भूल चिंता करूंगा न
अपने लिये,
ज़रा भी न अफ़सोस, चाहे बुझे यह
गगन में चमकता अकेला सितारा !

हँसूंगा न जीवित रहूंगा
सफलता बिना,
निखरता मनुज का न जीवन
विफलता बिना,
भरोसा बड़ा ही मुझे है कि बहती
हुई यह रुकेगी नहीं प्राण-धारा !

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(8) जीवन नहीं !
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जीवन नहीं, जीवन नहीं !

सौभाग्य ही केवल न मन की साध है,
रोना यहाँ दुर्भाग्य पर अपराध है,
यह भूलना —
क्षण आपदाओं के महान भविष्य के आभास;
यदि इतना नहीं विश्वास
तो ज़िन्दगी का वह कभी
दर्शन नहीं, दर्शन नहीं !

सपने नयन-आकाश में छाते रहें,
अपने लिए ही गीत हम गाते रहें,
यह भूलना —
परमार्थ, सेवा-भावना ही मानवी आधार !
यदि इतना नहीं स्वीकार
तो श्वास तेरी बद्ध, उर
धड़कन नहीं, धड़कन नहीं !

उद्यान में केवल न खिलते फूल हैं,
उड़ती हुई भी प्रति चरण पर धूल है,
यह भूलना —
अवरुद्ध बंधन-ग्रस्त जीवन से सदा विद्रोह,
यदि निज प्राण से है मोह
तो शक्ति का उन्माद क्या
यौवन नहीं, यौवन नहीं !

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(9) हमें यह पता है —
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रुकावट हटाते हुए हम चलेंगे,
अँधेरा मिटाते हुए हम चलेंगे,
हमें यह पता है —
उजेले में बिजली कभी चमचमाती नहीं है !

सजग रह सतत आज बढ़ते रहेंगे,
इमारत नयी एक गढ़ते रहेंगे,
हमें यह पता है —
जवानी मनुज की कभी लड़खड़ाती नहीं है !

ठिठक कर रुकेंगी विरोधी हवाएँ,
फिसल कर गिरेंगी सभी आपदाएँ,
हमें यह पता है —
कि हिम्मत की साँसें कभी व्यर्थ जाती नहीं हैं !

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(10) साथी
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जो जीवन की विपदाओं को
हँस-हँस झेल लिया करते हैं —
केवल वे मेरे साथी हैं !

शूल-ग्रस्त, बीहड़, पथरीली
शून्य डगर पर बड़ा अँधेरा,
पर, चलते, नयनों में भर जो
जगमग करता नया सबेरा,
निर्भय बन जीवन और मरण
से जो खेल किया करते हैं —
केवल वे मेरे साथी हैं !

जब सिर पर क्रोधित हो-हो कर
गरजा करतीं तेज हवाएँ,
हो जातीं सभी विफल, भावी
की जब आशा-आकांक्षाएँ,
तब जो उस घोर निराशा में
पापड़ बेल लिया करते हैं —
केवल वे मेरे साथी हैं !

बाधाओं से टकरा क्षण-भर
जो सीख न पाये हैं रुकना,
मंज़िल पा जाने से पहले
जो जान न पाये हैं थकना,
जीवन भर मन की तरुणाई
से जो मेल किया करते हैं —
केवल वे मेरे साथी हैं !

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(11) यह नहीं मंज़िल...
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यह नहीं मंज़िल तुम्हारी !

और चलना है तुम्हें,
और जलना है तुम्हें,
ज़िन्दगी की राह पर करना अभी संघर्ष भारी !

और पीना है गरल,
है तभी जीना सफल,
यह तुम्हारी ही परख की आ गयी है आज बारी !

सामने तूफ़ान है,
पर, बड़ा इंसान है,
पैर से जिसने मिटा दी संकटों की सृष्टि सारी !

यह मुझे विश्वास है,
बोलता इतिहास है,
मैं वहीं हूँ, काँपती जिससे कि काया ध्वंसकारी !

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(12) स्वर-साधना
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सतत आश-विश्वास के स्वर
समय-बीन पर मैं बजाता रहा हूँ !

डगर पर घिरा है अँधेरा सघन,
भयावह निखिल आज वातावरण,
घटाएँ घिरीं और गरजा गगन,
मरण की चिता पर विजय-गान गाता रहा हूँ !

समेटो मनुज प्राण-साहस अमर,
अनल में तपो जो लगा है प्रखर,
जवानी बड़ी जायगी यों निखर,
सुनाकर सबल स्वर जगत को जगाता रहा हूँ !

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(13) भोर
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क्या अभी भी रात्रि है कुछ शेष ?

स्तब्धता, लगता कि सोया भोर,
देखती आँखें क्षितिज की ओर,
सृष्टि का बदला नहीं क्यों वेष ?
क्या अभी भी रात्रि है कुछ शेष ?

दे रही ऊषा नहीं वरदान,
मौन विहगों का अभी तो गान,
उठ पड़े, पर, जाग मेरे प्राण,
सुन रहा जीवन नया संदेश !
क्या अभी भी रात्रि है कुछ शेष ?

स्वप्न से मुझको नहीं है मोह,
कर्मरत मानव-हृदय की टोह,
जागता मेरा रहे नव देश !
क्या अभी भी रात्रि है कुछ शेष ?

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(14) प्राण-दीप
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रात भर जलता रहा यह दीप प्राणों का अकेला !

वेग लेकर नाश का आया पवन था,
शक्ति के उन्माद में गरजा गगन था,
दीप, पर, अविराम जलने में मगन था,
आ नहीं जब तक गयी संसार में नव-स्वर्ण-बेला !

रात भर हँस-हँस सतत जलता रहा है,
आँधियों के बीच भी पलता रहा है,
आततायी का अहम् दलता रहा है,
मूक, हत, भयभीत मानव को दिया जगमग उजेला !

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(15) नयी किरणें
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फटते जाते / हटते जाते
सदियों की छायी
मूक उदासी के बादल !
मानों रूई के हलके
श्वेत बगूले फूले-फूले
आँधी में उड़-उड़ जाते हों !
मेरे मन की जड़ता के,
तम के, घोर निराशा के
बेछोर समाये उमड़े बादल
उर-नभ में छितराये जाते हैं !

जीवन की तमस-निशा के बाद
दिवाकर की किरणों में
बोल रहे खग,
खोल रहे अलसाए दृग !
भाव-लहरियों से पूरित सरल हृदय
दुख-वीणा के स्वर लय !

प्रतिध्वनि सुनता हूँ
आज नये जीवन की,
अंतर की अभिनव धड़कन की !
युग-युग के सोये भाव मधुर सब
धीरे-धीरे जाग रहे हैं,
कर्कशता के बर्बर प्रहरी
उलटे पैरों भाग रहे हैं !
उठता है अब भावी का परदा,
जिसकी पृष्ठभूमि पर
गत-जीवन के चित्रा
अनेकों टूटे-टूटे,
बेजोड़, अधूरे, धुँधले
देते हैं साफ़ दिखायी !

इस परिवर्तन को मुक्त बधाई,
जिसने शिथिल-शिराओं को
नव-तरुणाई की ज्वाला दी,
जीवन को जयमाला दी !

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(16) तूफ़ानों का स्वागत

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ऐसे छोटे-मोटे तूफ़ान
हमारे जीवन में अक्सर आते रहते हैं !
सिर के ऊपर, / दाएँ-बाएँ
मँडराते रहते हैं !
हर रोज़
सुबह क्या शाम
कभी भी छाते रहते हैं !

हम तूफ़ानों में पैदा होने वाले
तूफ़ानों में बढ़ने वाले
तूफ़ानी-जीवन के प्रेमी हैं !
क्योंकि हमारा अनुभव है —
तूफ़ानों से संकट के आधार
धरा की शैया पर
डर कर सो जाते हैं,
जैसे कोई डरपोक अँधेरी निशि में
बिल्ली की आहट को चोर समझकर
कम्बल में मुँह ढक कर सो जाता है,
उसकी घिग्घी बँध जाती है
वैसे ही संकट मुर्दा हो जाते हैं।

तूफ़ान कभी
कमज़ोरों का साथ नहीं देता है,
तूफ़ानी धरती पर
मज़बूत, साहसी इंसान जनमते हैं !
मोटे-मोटे, ऊँचे-ऊँचे,
पत्तों-फूलों वाले
पेड़ पनपते हैं !

आओ, हम सब ऐसे तूफ़ानों की
युग-पथ की उस पुलिया पर हो एकत्र
प्रतीक्षा में बैठें,
उनके स्वागत को बैठें।

जिससे आज सभी के जीवन की
जर्जरता, धोखे की टटिया,
मिथ्या विश्वासों की गिरती दीवारें,
युग-युग का संचित
रीति-रिवाज़ों का
सड़ा-गला कूड़ा-करकट
नभ में काफ़ी ऊँचे उड़ जाये !
और सभी के मन की धरती
साफ़ मुलायम
दुख-दर्द समझने वाली हो जाये !
पानी पड़ते ही
कोमल-कोमल गदकारे
पौधों से ढक जाये,
जिस-पर श्रम से थककर,
सोने को मन कर-कर आये !
फिर चाहे तूफ़ान हजारों
गरज-गरज कर गुज़रें,
क्योंकि —
बड़ी ही बेफ़िक्री का आलम होगा,
ऐसा तूफ़ानी सुख
दुनिया के किस आकर्षण से कम होगा ?

तो जर्जरता का मोह मिटा दो,
गढ़े-पुराने इतिहासों की
पुनरावृत्ति का स्वप्न हटा दो !
नया बनाओ, नया उगाओ !
जो तूफ़ानों को झेल सके,
उनकी बढ़ती काया को
खेल-खेल में ठेल सके !

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(17) दीया जलाओ
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यह गुज़रता जा रहा तूफ़ान
अब तो तुम
नये घर में नया दीया जलाओ !

मिट गया है
स्वप्न का वह नीड़
जिसमें चाँद-तारे जगमगाते थे,
बीन के वे तार सारे भग्न
जिनमें स्वर किसी दिन झनझनाते थे !
भूल जाऊँ —
इसलिए तुम अब
नये स्वर में नया मधु-गीत गाओ !

यह न पूछो
किस तरह मैं ज़िन्दगी की धार पर
उठता रहा, गिरता रहा,
भावनाएँ धूल पर सोती रहीं
या व्योम में उड़ती रहीं;
पर, जानता हूँ —
घूँट विष की ले चुका कितनी,
असर विष का नहीं जाता
मुझे मालूम है यह भी !
पर, ज़रा तुम
घट-सुधा का तो पिलाओ !

है अभी तो चाह बाक़ी,
और उर के द्वार पर देखो
मचलता ज्वार हँसने का
शुभे! बाक़ी,
अभी तो प्यार के अरमान बाक़ी,
फूल-से मधुमास में खोयी
अनेकों मुग्ध पागल चाँद की रातें अभी बाक़ी,
वफ़ा की, बेवफ़ाई की
हज़ारों व्यर्थ की बातें अभी बाक़ी !
तुम तनिक तो मुसकराती
साथ में मेरे चली आओ !

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(18) परिचय
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स्नेह की मधु-धार हूँ मैं !

पास जो आये न मेरे,
दूर का परिचय रखा बस,
भावना से हीन समझा
की उपेक्षा व्यंग्य से हँस,
जान पाये वे भला कब
प्रेम-पारावार हूँ मैं !

देह निर्बल देखकर जो
एक उड़ती-सी नज़र से,
फेरकर मुख, हो गये उस
क्षण अलग मेरी डगर से,
जान पाये वे भला कब
शक्ति का संसार हूँ मैं !

मुसकराया मैं न किंचित;
क्योंकि था अति क्षुब्ध-जीवन,
इसलिये जो लोग मुझको
हैं समझते मूक पाहन,
जान पाये वे भला कब
बीन की झंकार हूँ मैं !

कूल ही पर छोड़ मुझको
चल पड़े जो नाव लेकर,
ज्वार-लहरों में गये फँस,
अब गरजता सिंधु जिन पर,
जान पाये वे भला कब
मुक्ति की पतवार हूँ मैं !

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(19) अमिताभ
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छा रहा शंका-तिमिर फिर
शीत-युद्ध सभीत वातावरण में !
और लगता है —
लिपटते जा रहे पन्नग चरण में !
कान बजते फूत्कारों के स्वरों से,
शांति घायल
उड़ गयी सारे घरों से !
है प्रपीड़ित भग्न जन-मानस
परस्पर की कलह से !
स्नेह-सूखे नेत्र निर्मम,
क्रुद्ध-मुद्रा मूक हर-दम !

घिर रहीं संस्कृति-क्षितिज पर
ध्वंस संकेतक घटाएँ,
जल रही हैं फिर मनुज की
भोग-रत सूखी शिराएँ !
उग रहा फिर
स्वार्थ का जंगल
अमंगल,
देखकर जिसको नहीं खिलते कभी
फल-फूल जीवन के,
नहीं देते सुनायी
गीत सावन के !
नहीं बहते कभी
जिसमें मधुर निर्झर,
नहीं देते सुनायी
मुक्त विहगों के सरस स्वर !

इसलिये अमिताभ !
युग की दृष्टि तुम पर
है लिये विश्वास दृढ़तर;
सौम्य-मुख की हर किरन को
आज दो फिर हर नयन को !
यह नयी पीढ़ी
तुम्हारी मूक-सेवा साधना से
बलवती हो !
यह नयी पीढ़ी
तुम्हारे भव्यतम उत्सर्ग की शुभ-भावना से
बलवती हो !

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(20) आज की ज़िन्दगी
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ज़िन्दगी हँसती हुई मुरझा गयी ;
चाँद पर बदली गहन आ छा गयी !

यामिनी का रूप सारा हर लिया
कामिनी को हाय विधवा कर दिया !

आदमी की सब बहारें छीन लीं,
उपवनों की फूल-कलियाँ बीन लीं !

फट गया मन लहलहाते खेत का,
बेरहम तूफ़ान आया रेत का !

उर-विदारक दीखता है हर सपन,
सब तरफ़ से चाहनाओं का दमन !

रीति बदलीं आधुनिक संसार की,
राह सारी मुड़ गयी हैं प्यार की !

सामने बस स्वार्थ का जंगल घना
दुर्ग जिसमें डाकुओं का है बना !

मौत की शहनाइयाँ बजती जहाँ,
रंग-बिरंगी अर्थियाँ सजती जहाँ !

लेटने को हम वहाँ मजबूर हैं,
वेदना से अंग सारे चूर हैं !

इस तरह लँगड़ी हुई है ज़िन्दगी
लड़खड़ाकर गिर रही लकवा लगी !

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(21) मध्य-वर्ग (चित्र 1)
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मेघों से घिरा आकाश है !
चहुँ ओर छाया,
बंद आँखों के सदृश,
गहरा अँधेरा,
घोंसलों में मूक चिड़ियाँ
ले रहीं सुख से बसेरा,
और हर अट्टालिका में
बज रहा मनहर पियानो, तानपूरा !

पर, टपकती छत तले
सद्यः प्रसव से एक माता आह भरती है !
मगर यह ज़िन्दगी इंसान की
मरती नहीं,
रह-रह उभरती है !

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(22) मध्य-वर्ग (चित्र 2)
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दस बज रहे हैं रात के —
काफ़ी दूर पर
कुछ बेसुरे-से ढोल बजते हैं
किसी बारात के !

अति-तार स्वर से
गा रहा है रेडियो सीलोन
बासी गीत फ़िल्मी
‘आन’ के ‘बरसात’ के !

पास के घर में
थकी-सी अर्द्ध-निद्रित
तीस वर्षीया कुमारी
करवटें लेती किसी की याद में !

क्लर्क है उसका पिता
और वह उलझा हुआ है
फ़ाइलों के ढेर में !
(ज़िन्दगी के फेर में !)
सोचता है —
रात काफ़ी हो गयी,
अब शेष देखा जायगा जी बाद में !

झँपने लगीं पलकें
बडे़ बेफ़िक्र बचपन की सहेजी याद में !

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(23) भविष्यत्
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मनुष्य के भविष्य-पंथ पर
अपार अंधकार है,
प्रगाढ़ अंधकार है !
न चाँद है, न सूर्य,
बज रहा न सावधान-तूर्य !

मृत्यु के कगार पर
खड़ी मनुष्यता सभीत,
बार-बार लड़खड़ा रही !
कि उद्जनों व अणुबमों-प्रयोग से
कराह काँपती मही !
तबाह द्वीप हो रहे,

बड़े-बड़े नगर तमाम
देखते सदैव स्वप्न में ‘हिरोशिमा’ !
गगन विराट वक्ष पर
विकीर्ण लालिमा,
धुआँ, धुआँ, धुआँ !

मनुष्य के भविष्य-पंथ पर
प्रकाश चाहिए,
प्रकाश का प्रवाह चाहिए !
हरेक भुरभुरे कगार पर
सशक्त बाँध चाहिए !
अटल खड़ा रहे मनुष्य,
आँधियों के सामने
अड़ा रहे मनुष्य
शक्तिवान, वीर्यवान, धैर्यवान !

ज़िन्दगी तबाह हो नहीं,
कराह और आह हो नहीं !
हँसी !
सफ़ेद दूधिया हँसी
हरेक आदमी के पास हो !
सुखी भविष्य की
नवीन आस हो !

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(24) लेखनी से —
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लेखनी मेरी !
समय-पट पर चलो ऐसी कि जिससे
त्रास्त जर्जर विश्व का
फिर से नया निर्माण हो !
क्षत, अस्थि-पंजर, पस्त-हिम्मत
मनुज की सूखी शिराओं में
रुधिर-उत्साह का संचार हो !

ओ लेखनी मेरी, चलो !
साये हुए हैं जो
उन्हें उगते दिवाकर की ख़बर दो !
और पथ में जो रुके
उनको नयी ज्योतित डगर दो !
काफ़िला जो
रेत के नीचे दबा बेचैन है
उसे सतत आकाश-आरोहणमयी
नव-शक्ति दो !
तेवान, गोआ की ज़मी को मुक्ति दो !

भयभीत जो
उसको सबल विश्वास दो !
रोते हुए मुख पर
रुपहला हास दो !

ओ लेखनी मेरी ! चलो,
जिससे कि दकियानूस-दुनिया के
सभी दृढ़ लौह बंधन टूट जाएँ,
और संस्कृति-सभ्यता की मूर्तियाँ सब
आततायी के विषैले क्रूर चंगुल से
सदा को छूट जाएँ !

ध्वंस पर
अभिनव-सृजन-आह्नान दो,
हर आदमी के कंठ में
श्रम का सबल मधु गान दो !
प्रत्येक उर में
प्यार का सागर भरो,
धुँधले नयन में
रोशनी घर-घर भरो

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(25) मैं कहता हूँ !
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मैं शोषित दुनिया के
आज करोड़ों इंसानों से कहता हूँ,
मैं भूखों-नंगों, पददलितों,
बेबस और निरीहों की
आहों से कहता हूँ —
अब और अँधेरे में
मत खोजो पथ अपना,
अब और न देखो
अंतर की आँखों से सपना !
खोलो पलकों को साथी,
नया सबेरा
आज तुम्हारे स्वागत को तैयार !
कोयल वृक्षों के झुरमुट से
कहती आज पुकार-पुकार —
नया सबेरा, नया ज़माना
बदल गया संसार !

मैं उन लड़ने वाले,
हिमगिरि की छाती पर चढ़ने वाले,
कंटक-पथ पर बढ़ने वाले
चरणों से कहता हूँ —
अब मंज़िल बिल्कुल पास तुम्हारी,
निश्चय ही
होगी पूरी आस तुम्हारी !
युग-युग की
सारी बीमारी मिट जाएगी !
मुख पर छायी
करुण उदासी हट जाएगी !
नयी हवा में, स्वच्छ हवा में
तन को जर्जर करने वाले कीड़े-मच्छर
इस दुनिया से भग जाएंगे,
उड़कर दूर कहीं पर
कीचड़-दलदल पर मँडराएंगे !

मैं उन भारी-भरकम
युग-नभ-भेदी दुर्दम
आवाज़ों से कहता हूँ —
नवयुग का जय-जयकार करो !
अगणित कंठों में
विजयी गान भरो !
फ़ौलादी ताक़त जनता की
कल के अवरोधी दुर्गों पर
उन्मुक्त खड़ी !
हो, सचमुच, ऐसी घड़ियों की
उम्र बड़ी !

मैं उन जीने और जिलाने वालों से,
इंसानों की शक्लों में
जाग्रत शांत फ़रिश्तों से,
जनयुग को
मज़बूत बनाने वालों से कहता हूँ —

धरती खोदो !
माँ आँचल में
सोने-चाँदी के उपहार लिए,
बरसों से सतत प्रतीक्षा में
देख रही है राह तुम्हारी !
पहुँचो
आयी बड़े दिनों के बाद
ग़रीबों की बारी !

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(26) राही

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जब आज तुम्हारे नयनों ने
युग-पथ पहचान लिया,
जीवन के हर अनुभव से
अपना और पराया जान लिया,
फिर क़दमों को भय क्या है ?
हिम्मत से आगे बढ़े चलो,
निर्भय हो आगे बढ़े चलो,
ताक़त से आगे बढ़े चलो !

राही बनकर निकले हो
क्या झंझा के घोर झकोरों से,
पथ के हिंसक चोर-लुटेरों से,
कंकड़-पत्थर की अविरल बौछारों से,
नाशक अस्त्रों के तीव्र प्रहारों से
डर जाओगे ?
कायर बन कर,
पीठ दिखा कर,
भग जाओगे ?

राही बन कर निकले हो
यदि झाड़ी-काँटों के घेरे से,
पथ पर छाये सघन अँधेरे से,
टकराने में सकुचाओगे,
तो निश्चय ही —

काँटों में फँस जाओगे !
दलदल में धँस जाओगे !
मिट्टी में मिल जाओगे !

आँखों में रोष उतारो,
फ़ौलादी मुट्ठी बाँधो,
बादल से गरजो-गरजो !
पर्वत की छाती को फोड़ो,
चट्टानों की दीवारों को तोड़ो,
दुर्दम दुर्जय धारा बनकर उमड़ो !
जिससे थर-थर काँपे
अवरोधी भूतों के टोली,
हो जाए सारे अरमानों की होली !
बिखरे केवल आज तुम्हारे
विश्वासों की,
आशाओं-अभिलाषाओं की रोली !

सौगंध तुम्हें मेरे राही !
रुकना न कभी,
जब तक निज बल से
उस ताक़त का चकनाचूर न हो —
जिसने क़ैद सबेरे को कर रक्खा है !
जिसने दिल की धड़कन पर
ख़ूनी पंजा रक्खा है !
तुम उसको रवि बनकर ध्वस्त करो !
पूँजीशाही दुनिया के
वैभव-युग को अस्त करो !

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(27) अनुष्ठान

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ग़रीबी अब
अमीरी के न क़दमों पर झुकेगी !
हाथ फैलाते हुए
अब और दीखेंगे न
जूठे चार-टुकड़ों के लिए
मानव बुभुक्षित !
नग्न तन का ढाकने को औरतें
उतरे हुए अब वस्त्रा चाहेंगी नहीं !

सच है —
मिटेगी यह न युग की नव-जवानी अब
किसी की वासना की पूर्ति में !
हरगिज़ अलापेंगे नहीं
गायक कला-साधक
किसी क्षय-ग्रस्त जर्जर वर्ग के हित !

ग़रीबी ने बग़ावत का
प्रबलतम कर दिया एलान,
बुभुक्षित का
उठा है जाग फिर अभिमान !

लो, सारी दमित शोषित दुखी हत औरतें
बलिदान करने को खड़ीं तैयार !
युग की नव-जवानी मुक्त है,
नव-लालिमा से युक्त है !
उठा प्रेरक
नये कवि का नया संगीत है !
आकाश में तारों सरीखी
आज तो उसकी लिखी
ध्रुव जीत है !

उट्ठो, करोड़ों मेहनतकश नौजवानो !
विश्व का नक्शा बदलने के लिए ;
अणु-शक्ति से,
सुख से भरी
दुनिया बनाने के लिए अभिनव,
धरा पर शीघ्र लाने को
नया मानव !

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(28) पटाक्षेप

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दमन के बादलों को चीर अब बिजली चमकती है,
अँधेरा दूर होता है, नयी आभा दमकती है !
अथक जन-शक्ति के तूफ़ान छाये आसमानों पर
कि गहरी धूल के कम्बल दिशाएँ ओढ़ती डर कर !

सदा विद्रोह होता है, ज़माना जब बदलता है,
नया संसार आता है, पुराना जीर्ण जलता है,
न हिम्मत हारता इन्सान चाहे मौत मँडराये
हज़ारों ज़िन्दगी के गीत उसने शान से गाये !

भरे उत्साह, दुर्दम शक्ति, जीवन-वेग-नव दुर्धर
नया इंसान पैदा हो गया है आज धरती पर,
कि जिसके सामने प्रतिरोध आकर टूट जाता है,
अनल जिसको बड़ा गहरा प्रबल सागर बताता है !

चुनौती दे रहा वह भाग्य के निश्चित सितारों को,
बनाया जा रहा फिर से सभी युग भग्न-तारों को,
नया मनु बल समाया यांग्त्सी की स्वस्थ घाटी में
नयी बस्ती बसी पीली पुरानी मूक माटी में !

सुरंगें उड़ रहीं साम्राज्य शाहों ने बिछायीं जो,
धसकती जा रही दीवार डॉलर ने उठायी जो,
मिटेगा नस्ल का सिद्धान्त भी प्रत्येक कोने से
टिकेगा अब नहीं उद्जन-बमों की फ़स्ल बोने से !

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(29) निश्चय
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एक दिन निश्चय
तुम्हारे हर घिनौने और ज़हरीले
इरादों की समस्त जड़ें
अवनि को फोड़ उखड़ेंगी।
एक दिन निश्चय
तुम्हारी बेरहम नंगी कि ख़ूनी
वासनाओं की सड़ी धारा
धरा की धमनियों को छोड़कर
आकाश-पथ पर सूख जाएगी !
तुम्हारे स्वप्न के

सारे गगन-चुंबी महल
अभिनव प्रखर स्वर्णिम सुबह तक
पत्थरों के ढेर में
निश्चय, बदल कर
भूमि पर सोते मिलेंगे !

आज जन-जन के हृदय में आग है,
मुँह से निकलती बात भी बेलाग है !
संघर्ष से हर आदमी को
हो गयी बेहद मुहब्बत,
ज़िंदगी की पड़ गयी आदत
हमेशा राह पर चलना !
निरंतर सूर्य-सा जलना !
मनुष्यों की अथक ऐसी
निडर, दृढ़ फौज़ उगती जा रही,
जिसके क़दम पड़ते
धरा सज्जा बदलती जा रही !

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(30) झुकना होगा !
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धधकी नव-जीवन की ज्वाला पर
जितना तुम और अँधेरा फेंकोगे
वह उतनी ही द्विगणित आभा से दमकेगी !

जितने गहरे काले घन अम्बर में छाएंगे
उतनी गहरी उज्वलता से बिजली चमकेगी !

धरती पर जितनी
मनुज-रुधिर की बूँद गिरेंगी
उससे कहीं अधिक
विद्रोही जनता की फ़सल उगेगी !

जितना ज़्यादा जन-धारा को रोकोगे
उतनी ही गति से
वह अँगड़ाकर, लहराकर
पर्वत की छाती को फोड़ बहेगी !

जितना ज़्यादा निर्धन जनता को लूटोगे
उतना ही बदले में
मूल्य चुकाना होगा !

जितना ज़्यादा भोली मानवता पर
चढ़ इतराओगे
उतना ही उसके सम्मुख
घुटनों के बल झुकना होगा !

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(31) तुम आज लिख लो —
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तुम आज लिख लो —
कि थोड़े दिनों में
हज़ारों युगों की
पुरानी, सड़ी
दासता की इमारत बड़ी
भूमि पर लोटती
भग्न बिखरी मिलेगी !
अनेकों बरस से
ग़रीबों, किसानों
मजूरों व श्रमिकों के
ताजे़ रुधिर से
सनी वाटिका
पूर्ण उजड़ी मिलेगी !
दमन के धुएँ से
नयी आग बन कर
गगन में लहरती दिखेगी !

कि जिससे
लुटेरों के डेरे मिटेंगे,
व जिनकी सबेरे-सबेरे
हवा में बुझी राख उड़ती दिखेगी !

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(32) बदलकर रहेगा !
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हवा जो चली है नयी वह
गरजती हुई कल
बनेगी अथक वेग तूफ़ान का !
और जो आज
युग की हरारत से
पिघला जमा बर्फ़
वह कल
प्रवाहों की दृढ़ शक्ति बनकर के
दुनिया का नक़्शा
बदल कर रहेगा !
कि जो यह लगा है
अभी आज हलका-सा धक्का
वही कल धरा को
उलट कर, पुलट कर,
हिला कर, डुला कर,
नया रूप देकर रुकेगा !

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(33) नयी सुबह
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जो बर्फ़ीली रातों में
ओढ़े कुहर का कम्बल,
गठरी से बन
चिपका लेते उर से टाँगे निर्बल ;
अधसोये से
कुछ खोये-खोये से
देखा करते नयी सुबह का स्वप्न मनोरम,
कब होता है विश्वास कराहों से कम ?

सर्दी ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है
नव-जीवन की चिनगारी
निकट सरकती आती है।
ये आँखें देखेंगी कुछ क्षण के बाद
नया सबेरा, नया ज़माना !
नव-जीवन का नव-उन्माद !

कभी भी बुझ न सकेगा
जलता नूतन दुनिया के
आज करोड़ों मेहनतकश इंसानों की
आशाओं-अभिलाषाओं का नया चिराग़ !

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(34) सावधान
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अब और न चलने पाएगी परदापोशी,
भंग हुई है गत युग की जड़ता बेहोशी !

सावधान हो जाओ, ओ ! जन-पथ के द्रोही,
युग है दलितों का जिसकी बाट सदा जोही !

ललकार रहा है नित धरता मज़बूत क़दम
इंसान नया, नव राह बना, कर दूर वहम !

कंधों पर आज किये नव-रचना भार वहन,
टकरा कर मर्दित दग्ध-विषैला-क्रूर दमन !

निष्फल अभियान विपक्षी व्यूह हुए लुंठित,
कल की आँधी देख रही प्रतिहत राह थकित !

नव-लाली ले उगता लो जनता का सूरज,
‘नया सबेरा’ आज दमामा कहता बज-बज !

मानव के हाथों में सुदृढ़ हथौड़े का बल,
पर्वत की छाती पर चलता जनता का हल !

हरियाली लाएगा, समता विश्वास अमर,
फूटेंगे अंकुर पथरीली बंजर भू पर !

रस का सागर लहराएगा जन-जन के हित,
बरसेगा जीवन कण-कण पर मुक्त असीमित !

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(35) नया यौवन

======================

आत्म-निर्भरता, अमिट विश्वास,
अद्भुत धैर्य से
शोषित, दमित, वंचित, दुखी
जगकर बग़ावत के लिए तैयार हैं !
अब दासता का बोझ
पल भर भी नहीं स्वीकार है !

बरसों पुराने बंध ढीले हो गये,
ख़ूनी विरोधी राक्षसों के
लाल फूले गाल पीले हो गये !
साम्राज्यवादी शृंखलाएँ लौह की —
जिनने जकड़ इंसान को
दम घोंट देने का
रचा षड्यंत्र था,
जनतंत्रवादी शक्तियों की चोट से,
स्वाधीनता के प्रज्वलित अंगार से,
हर ग्रंथि से
हर जोड़ से
अब टूटती जातीं सभी !

जंगबाज़ों
ज़िन्दगी के दुश्मनों की टुकड़ियाँ
फैली हुई हैं जो
धरा के वक्ष पर कुछ इस तरह
जिससे कि लेने ही नहीं देतीं
कभी साँसें खुली;
जन-शक्ति के
उत्साह के भूकम्प से निर्मित
दरारों में दबी जातीं
हज़ारों मील गहरी कब्र बन !

जूझा नये युग का नया यौवन
अथक, दुर्दम
कि जो विष तक पचा लेगा,
मरण को सिर उठाने तक नहीं देगा,
अकेला
तप्त लोहे के चने निर्भय चबा लेगा !

यही है वह नया यौवन
बगीचों में रबर के
और फैले जंगलों में
जो मलय के आज उमड़ा है !
यही है वह नया यौवन
कि जो —
जीवित बहादुर मुक्त उत्तर-कोरिया की
हर गली में आज उमड़ा है !
बड़ी मज़बूत डॉलर से बनी
दीवार का उर भेद कर
मैदान में जो चीन के
दरिया सरीखा बाढ़-सा छा आज फैला है !
कि इण्डोचीन की लहरें
उसी के रक्त से खौलीं !
जहाँ के नौजवानों के गलों से
झर रही विद्रोह की बोली !
यही है वह नया यौवन
कि जो नव-एशिया के हर मनुज के
चेहर पर आज दमका है !
सघन काले भयावह बादलों को चीर कर
बिजली सरीखा मुक्त चमका है !

अमित-पुरुषार्थ,
अविजित-शक्ति
उज्ज्वल शांति के विश्वास को लेकर
सुखद सुन्दर नयी दुनिया बसाने को
करोड़ों हाथ कसकर
आज जो तैयार है !
जन-शक्ति के सम्मुख
रुआँसा लड़खड़ाता रोष
एटम-बॉम्ब का
बेकार है,
बेकार है !

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(36) जनता
======================

आतंक का शासन
हमेशा रह नहीं सकता;
क्योंकि जनता
कुंभकर्णी नींद सोती है नहीं !
क्योंकि जनता की
कभी भी मौत होती है नहीं !

प्रमाणों की ज़रूरत और —
यदि करनी तुम्हें महसूस
जनता के हृदय की साँस की धड़कन
किसी भी देश के इतिहास के पन्ने
पलट कर देख सकते हो !
नहीं तो आज
मेरा देश आकर घूम सकते हो !
जहाँ इंसान ने
काली निराशा की पुरानी लाश को
भू की अतल गहराइयों में गाड़ कर
रंगीन अभिनव आश के
विश्वास के पौधे लगाये हैं !
अँधेरे में हज़ारों दीप
जीवन के जलाये हैं !
जवानी से भरी नदियाँ
जहाँ पर मुक्त बहती हैं,
कि कल-कल राग में
युग का नया संदेश कहती हैं !

जहाँ इंसान
दुनिया को बदलने के लिए
बड़े उत्साह से संयुक्त होते हैं !
कड़े श्रम से
धरा पर ज़िन्दगी के बीज बोते हैं !

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(37) जवानों का गीत
======================

मिलाये क़दम से क़दम, गीत गाती,
बढ़ी जा रही है जवानों की टोली !
जवानों की टोली !

मनुज को बदलने, धरा को बदलने,
दमन की सभी शक्तियों को कुचलने,
जलाने असुर-राज की आज होली !
मिलाये क़दम से क़दम, गीत गाती,
बढ़ी जा रही है जवानों की टोली !
जवानों की टोली !

डगर में ज़रा भी न कोई रुका है,
प्रहारों के सम्मुख न कोई झुका है,
हिमालय-से सीने पै झेली है गोली !
मिलाये क़दम से क़दम, गीत गाती,
बढ़ी जा रही है जवानों की टोली !
जवानों की टोली !

इमारत नयी ये बनाने चले हैं,
कि खेतों में सोना उगाने चले हैं,
भरेंगे सताये गरीबों की झोली !
मिलाये क़दम से क़दम, गीत गाती,
बढ़ी जा रही है जवानों की टोली !
जवानों की टोली !

सबेरा हुआ है, अँधेरा मिटा है,
कि आँखों के आगे से परदा हटा है,
बिखरती गगन में नयी आज रोली !
मिलाये क़दम से क़दम, गीत गाती,
बढ़ी जा रही है जवानों की टोली !
जवानों की टोली !

बरस कर घने बादलों से धरा पर,
करोड़ों सबल मुक्त हाथों से मल कर,
युगों की पुती कालिमा सख़्त धो ली !
मिलाये क़दम से क़दम, गीत गाती,
बढ़ी जा रही है जवानों की टोली !
जवानों की टोली !

======================
(38) तसवीरें
======================

दूर कहीं पर
सामूहिक गर्जन-स्वर का
मेरे नभ की उन्मुक्त-तरंगों में कंपन !
सुबह-सुबह महसूस हुआ ऐसा
कुछ बदल गयी है दिल की धड़कन !

शायद फिर मौसम बदला है,
बर्फ़ हिमालय का पिघला है !

आज तभी तो
गंगा-यमुना की धाराएँ अँगड़ाईं !
चट्टानों को तोड़ रहीं
जाने कितना अंतर में जीवन भर लायीं !

पूरब के स्वाधीन समुद्रों में अब
डोल उठे अरमान नये,
तूफ़ान नये !
जिनके बारे में सुन तो रक्खा था
पर, वे इस धरती को
छूते देखे नहीं गये।

आज सुबह के आसमान में
आभास उन्हीं का पाया,
मानों सत्य खड़ा हो सम्मुख
छिन्न-भिन्न करके माया !
हलके-हलके कुछ बादल छाये थे
जिनमें मैंने देखे चित्रा अनेकों —
जैसे कोई सरमाया का भूत
नये इंसानों के क़दमों के नीचे
दम तोड़ रहा है !
मैंने देखा जैसे कोई
भूखों, नंगों, पददलितों को
नंदन वन में छोड़ रहा है !
मैंने देखा जैसे कोई
पंक्ति कपोतों की
ख़ुश-ख़बर सुनाने आयी है !
मैंने देखा जैसे कोई
गेहूँ की बालें बिखर-बिखर कर छायी हैं !

इन चित्रों ने मुझको दृढ़ विश्वास दिया है,
जीवन-संघर्षों में अभिनव उल्लास दिया है,
श्रमजीवी जनता की
ताक़त का आभास दिया है !
आज वही तसवीरें
नभ पर प्रतिबिम्बत हैं !

आज वही तसवीरें
जन-जन के मन पर अंकित हैं !
आज उन्हीं तसवीरों को
धरती रखने को लालायित है !

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(39) बहुतेरे
======================

आज सबेरा होता है
पर, बहुतेरे सोते हैं,
काट रहे जन आज फ़सल
पर, बहुतेरे रोते हैं !

आज नयी गंगा बहती
पर, बहुतेरे प्यासे हैं,
चातक से बन इस जल को
पीना घातक कहते हैं !

आज नयी जो चली हवा
इन खेतों-खलिहानों पर,
जन-जन लेते साँस मुक्त
पर, बहुतेरे रहे सिहर !

आज नया संसार बना
पर, कुछ कलियुग समझ रहे,
डर अपनी परछाईं से
अपने में ही उलझ रहे !

======================
(40) पुनर्निर्माण
======================

उद्धारक लगा रहे आवाज़ —
‘पुनर्निर्माण करो,
पुनरुत्थान करो,
चिर-खंडित नष्टप्राय संस्कृति का,
आदिम युग के आदर्शों का !’

बीते वर्षों के रीते घट,
तम के पट पर विगत युगों की
सभ्यता, कला म्लान आज,
ढह गया महान पुरातन !
‘जीवन-सत्यों’ की लिपि
धुल गयी अरे !
फिर से बुझे दीप को आज जलाओ,
मानवता की उस दबी राह को
खोदो !
(खो दो !)

इस नवीन ज्योति की चकाचैंध में
आँखें पथराईं-सी,
इसको हलका करना यदि
तो फिर से दबा अँधेरा फेंको !
जिससे धर्मान्ध मनुष्यों की,
सामन्तों-पूँजीपतियों की,
राजा, थोथे नेताओं की
झूठी क़लई पर आग न आये,
आँच न आये !
डर है —
कि कहीं झूठा रंग उतर ना जाये !

बुद्धि अगर बढ़ जाएगी
तो शेरों की खालों में
छिपे हुए गीदड़
अब और न जीवित रह पाएंगे !
इसीलिए आज पुनर्निर्माण करो —
नूतन संस्कृति के
इस उगते तेज़ उजाले पर
अंधकार से
पुनरुत्थान से प्रहार करो !

======================
(41) नयी चेतना
======================

आँधियाँ फिर से क्षितिज पर
मुक्त मँडराने लगीं !
जन-सिन्धु में हलचल नयी,
अँगड़ाइयाँ भर सुप्त लहरें
व्याघ्र-स्वर करती जगीं !

दूर का प्रेरक बड़ा उद्गम
रुकावट चीर कर,
चट्टान का उर भेद कर,
शायद, गरजता बढ़ प्रवाह गया !
कर लिया संचित सुदृढ़ बल फिर
अथक दुर्दम नया !
है तभी तो युग तुम्हारे
प्राण में उत्साह, जीवन, स्नेह, धड़कन !
मरकुरी-सी ज्योति

आगत युग-नयन की,
दूर है धुँधली सभी छाया सपन की !
ढीर जड़ता की गयी गिर,
तुम तभी तो देख लेते हो
छिपे अगणित विरोधी,
और उनको भी
बदल कर भेष अपना
जो तुम्हारे साथ होने का
सरासर झूठ खुफ़िया-सा वचन
विश्वास का तुमको सुनाते हैं !

सभी ये जन-विरोधी शक्तियाँ
जब मिल गयीं
लख कर निजी हित
और जर्जर ‘इन्क़लाबी गीत’ से
संसार को
नव-पथ-दिशा से रोक
भरमाने लगीं,
सम्मुख तभी तो
आँधियाँ फिर से क्षितिज पर
आज मँडराने लगीं !
संघर्ष-ज्वाला की प्रखर लपटें
पुनः अविश्रान्त लहराने लगीं ।

======================
(42) विनाश-लील (उद्जन-बम विस्फोट पर)
======================

डॉलर-मद से मतवाले मानव के
हाथों में उद्जन-बम है —

रे नयी व्यवस्था के निर्माता
सावधान !
रे जनयुग के आकांक्षी
सावधान !
समता, शान्ति, न्याय-प्रिय मानव
सावधान !

यह मानवता का रक्षक कहलाने वाला
अभी-अभी उद्जन-बम से
बिकनी टापू पर खेल चुका है,
जिसका गरलाक्त धुआँ
सम्पूर्ण प्रशान्त-महासागर में फैल चुका है !

यह वही हिमायती प्रजातन्त्र का
जिसने नागासाकी, हिरोशिमा पर
अणु-बम बरसाये थे,
जिसने जापानी-इन्सानों पर चढ़
फूहड़ मृत्यु-गीत गाये थे,
मानवता के उर्वर खेतों पर
जिसने कोढ़ उगाया था,
जिसने दिशा-दिशा में
अग्नि-कुहर बरसाया था !

वही आज फिर
उद्जन बम को तोल रहा है !
फूहड़ मृत्यु गीत गाने
मुख खोल रहा है !
जिसकी प्रारम्भिक गति से ही
ईथर में मानव-ग्रह डोल रहा है !

रे जीवन के शिल्पी
सावधान,
सुख-स्वप्नों के दर्शी
सावधान,
मुसकानों के प्रेमी
सावधान !

======================
(43) बन्द करो
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भूखों-नंगों दुखियारों की,
मानव-अधिकारों की
आवाज़ नहीं है यह !
भाई-चारे का सच्चा भाव नहीं है यह !
तूफ़ानी सागर में उलझे मानव की
उद्धारक नाव नहीं है यह !

जब संस्कृति की नंगी लाश
तुम्हारे हाथों में है,
लाखों इंसानों का ख़ून
तुम्हारे दाँतों में है
अस्मत-भक्षी दुर्गन्ध
तुम्हारी साँसों में है,
तुम करते हो
मानव-अधिकारों की बात ?
मज़लूमों की छाती पर
कर फ़ौलादी जूतों के आघात !

बस, अपने नापाक इरादों के
नारों को बन्द करो !
शोषित दुनिया के ऊपर से
गुज़र गयी है रात !
जागृति की वर्षा होती है
कागज़ की दीवारों पर
मत नक़ली रंग भरो !
मानव-अधिकारों की
आवाज़ लगाने वाले उट्ठे हैं,
अब महल
तुम्हारी थोथी मानवता का
ढह जाएगा !
जिस पर चढ़ कर ;
समता का गीत नया
हर मानव निर्भय गाएगा !

======================
(44) आज
======================


दिन-पर-दिन होता साकार हमारा सपना,
सार्थक होगा निश्चय युग-ज्वाला में तपना !

कल तक जो धुँधला-धुँधला-सा था दूर बहुत,
वह लक्ष्य हमारा आज निकट नव-आभा-युत !

कल तक जो हमको शंका से देख रहे थे,
और हमारे यश पर कीचड़ फेंक रहे थे,

समता-संस्थापन में आ रोड़े अटकाए,
व्यर्थ हमारे पथ पर आये दाएँ-बाएँ !

आज वही पहचान रहे मानवता की गति,
छोड़ रहे गत जर्जर-मिथ्या-युग के प्रति रति,

सीख रहे अभिनव आदर्शों को अपनाना,
कर्कश स्वर की जगह मधुर-जीवन का गाना !

======================
(45) मज़लूम
======================

सारे जग का सोया जन-सागर
जब अभिनव स्वर सुनकर उठा सिहर,
सबने समझा —
कहीं गिरी है ध्वंसक गाज
पर, वह तो गरजी थी मज़लूमों की आवाज़ !

शोषक-दुर्गों को दृढ़ दीवारें
तड़कीं केवल कंपन के मारे,
सबने समझा —
भूडोल उठा है दुर्दम
पर, वे तो थे मज़लूमों के कुछ कूच-क़दम !

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(46) श्रमिक
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टिकी नहीं है
शेषनाग के फन पर धरती !
हुई नहीं है उर्वर
महाजनों के धन पर धरती !
सोना-चाँदी बरसा है
नहीं ख़ुदा की मेहरबानी से,
दुनिया को विश्वास नहीं होता है
झूठी ऊलजलूल कहानी से !

सारी ख़ुशहाली का कारण,
दिन-दिन बढ़ती
वैभव-लाली का कारण,
केवल श्रमिकों का बल है !
जिनके हाथों में
मज़बूत हथौड़ा, हँसिया, हल है !
जिनके कंधों पर
फ़ौलाद पछाड़ें खाता है,
सूखी हड्डी से टकराकर
टुकड़े-टुकड़े हो जाता है !

इन श्रमिकों के बल पर ही
टिकी हुई है धरती,
इन श्रमिकों के बल पर ही
दीखा करती है
सोने-चाँदी की ‘भरती’ !

इनकी ताक़त को
दुनिया का इतिहास बताता है !
इनकी हिम्मत को
दुनिया का विकसित रूप बताता है !
सचमुच, इनके क़दमों में
भारीपन खो जाता है !
सचमुच, इनके हाथों में
कूड़ा-करकट तक आकर
सोना हो जाता है।

इसीलिए
श्रमिकों के तन की क़ीमत है !
इसीलिए
श्रमिकों के मन की क़ीमत है !

श्रमिकों के पीछे दुनिया चलती है ;
जैसे पृथ्वी के पीछे चाँद
गगन में मँडराया करता है !
श्रमिकों से
आँसू, पीड़ा, क्रंदन, दुःख-अभावों का जीवन
घबराया करता है !
श्रमिकों से
बेचैनी औ’ बरबादी का अजगर
आँख बचाया करता है !

इनके श्रम पर ही निर्मित है
संस्कृति का भव्य-भवन,
इनके श्रम पर ही आधारित है
उन्नति-पथ का प्रत्येक चरण !

हर दैविक-भौतिक संकट में
ये बढ़ कर आगे आते हैं,
इनके आने से
त्रस्त करोड़ों के आँसू थम जाते हैं !
भावी विपदा के बादल फट जाते हैं !
पथ के अवरोधी-पत्थर हट जाते हैं !
जैसे विद्युत-गतिमय-इंजन से टकरा कर
प्रतिरोधी तीव्र हवाएँ
सिर धुन-धुन कर रह जाती हैं !
पथ कतरा कर बह जाती हैं !

श्रमधारा कब
अवरोधों के सम्मुख नत होती है ?
कब आगे बढ़ने का
दुर्दम साहस क्षण भर भी खोती है ?
सपनों में
कब इसका विश्वास रहा है ?
आँखों को मृग-तृष्णा पर
आकर्षित होने का
कब अभ्यास रहा है ?

श्रमधारा
अपनी मंज़िल से परिचित है !
श्रमधारा
अपने भावी से भयभीत न चिंतित है !

श्रमिकों की दुनिया बहुत बड़ी !
सागर की लहरों से लेकर
अम्बर तक फैली !
इनका कोई अपना देश नहीं,
काला, गोरा, पीला भेष नहीं !
सारी दुनिया के श्रमिकों का जीवन,
सारी दुनिया के श्रमिकों की धड़कन
कोई अलग नहीं !
कर सकती भौगोलिक सीमाएँ तक
इनको विलग नहीं !

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(47) मानव-समता का त्योहार
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जब तक जग के कोने-कोने में न थमेगा
सामाजिक घोर विषमता का
बहता ज्वार,
हर श्रमजीवी तब तक
अविचल मुक्त मनाएगा
‘मई-दिवस’ का त्योहार !
मानव-समता का त्योहार !

वह मई-माह की पहली तारीख़
अठारह-सौ-छियासी सन् की,
जब अमरीका के शहरों में
मज़दूरों की टोली
विद्रोही बनकर निकली !
देख जिसे
थर-थर काँपी थी पूँजीवादी सरकार,
पशु बनकर मज़दूरों पर
जिसने किये दमन-प्रहार !
पर, बन्द न की जनता ने
अपने अधिकारों की आवाज़,
भर लेता था उर में
उठती स्वर-लहरों को आकाश !

वह बल था
जो धरती से जन्मा था,
वह बल था
जो संघर्षों की ज्वाला से जन्मा था,
वह बल था
जो पीड़ित इंसानों के प्राणों से जन्मा था !

फिर सोचो, क्या दब सकता था ?
पिस्तौल, मशीनगनों से क्या मिट सकता था ?
बढ़ता रहा निरन्तर
श्रमिकों का जत्था सीना ताने,
होठों पर थे जिसके
आज़ादी के, जीवन के प्रेरक गाने !
जिन गानों में
दुनिया के मूक ग़रीबों की
आहें और कराहें थीं,
जिन गानों में
दुनिया के अनगिनती मासूमों के
जीवन की चाहें थीं !
आहें और कराहें कब दबती है ?
जीवन की चाहें कब मिटती हैं ?
टकराया है मानव जोंकों से
और भविष्यत् में भी टकराएगा !

वह निश्चय ही
सद्भावों को वसुधा पर लाएगा !
वह निश्चय ही
दुनिया में समता, शान्ति, न्याय का
झंडा ऊँचा रक्खेगा !
मानव की गरिमा को जीवित रक्खेगा !

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(48) ओ मज़दूर-किसानो!
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कवि : ओ, मज़दूर - किसानो !
अपना पथ पहचानो !

श्रमजीवी गण : हुआ युगों से शोषण,
जकड़े अगणित बंधन !

बालक : अधनंगे हैं निर्धन !

औरतें : दुख और अभावों में
काट रहे हैं जीवन !

कवि : बदल चुका है जग में
आज ज़माना, मानों !
ओ, मज़दूर-किसानो !
अपना पथ पहचानो !

बालक : हम हैं सोये भूखे,
खा कुछ टुकड़े सूखे !

औरतें : स्वाभिमान खंडित
पग - पग अपमानित,
छाया तिमिर घना
जीवन भार बना !

कवि : अब हुआ नया प्रभात !
छिन्न अंध - ग्रस्त - रात !
अब हुआ नया प्रभात !

श्रमजीवी : यह सरमायादारी ?
यह क्रूर ज़मीदारी ?
.....
निर्दयी शिकारिन बन
धर कर रूप पिशाचिन

(समवेत) : टूटी हम पर !
टूटी हम पर !

कवि : अब भय की बात नहीं !
मिटने का उनका क्षण
आया है आज यहीं !
अब भय की बात नहीं !
जागो, जागो !
ओ, युग-युग से सोये

जन-जन के अरमानो !
ओ, मज़दूर - किसानो !
अपना पथ पहचानो !

सहगान : हाँ , दूर क्षितिज पर आशा के घन,
घिरता जाता प्रतिक्षण पूर्ण गगन !
नव-जीवन का संदेश सनातन
गूँज रहा जिससे जग का कण-कण !

कवि : लो, बंधन का भार ढहा जाता,
युग मुक्त-नया-संगीत सुनाता !

सहगान : हम अभिनव रूप निहार रहे,
उजड़ा तन-मन आज सँवार रहे !
हम पहचान चलेंगे अपनापन,
कोई बाँध न पाएगा लोचन!
फूटा स्वर्ण-विहान !
हम मज़दूर-किसान !

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(49) अकेला नहीं हूँ !
======================

अकेला नहीं हूँ,
अकेला नहीं हूँ,
ज़माना नया साथ है,
और मैं भी
बड़ी ही खुशी से
सदा साथ उसके !

करोड़ों भुजाएँ
मुझे आज बल दे रही हैं,
अथक शक्ति मेरी
बिना रोक के ले रही हैं !
अनेकों क़दम गिर्द मेरे
निरंतर चले जा रहे हैं,
बढ़े जा रहे हैं !
निराशा नहीं है,
निराशा नहीं है,
किसी भी तरह की विवशता नहीं है !
रुकावट ठहरती न
जन-धार के सामने
सब उखड़ती चली जा रही हैं !

कि पिघला बरफ़
किस हिमालय-शिखर का ?
नयी भूमि को जो
बनाये चला जा रहा है,
निडर शान्त बस्ती
बसाये चला जा रहा है !
हरा, लाल, पीला, गुलाबी चमन
आज उसी ने खिलाया,
मनुज को मनुजता बतायी,
दबे चेहरे की / गिरे चेहरे की
चमक भी बढ़ायी !
उसी ज़िन्दगी से मिलाओ चरण !
और हँस-हँस
उसी ज़िन्दगी से लड़ाओ नयन !

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(50) जवानी
======================

समय तो गुज़रता चला जायगा
पर, जवानी कभी भी मिटेगी नहीं !

करोड़ों युगों से
जवानी का दरिया
हज़ारों रुकावट मिटाकर
निरंतर बहा है,
व बहता रहेगा !

करोड़ों युगों से
जवानी का सरगम
नयी ज़िन्दगी का
नया गीत गाता रहा है,
व गाता रहेगा !

कि झंकार जिसकी
कभी भी दबेगी नहीं,
और
नभ में, दिशा में,
नगर में, डगर में,
बड़े शोर से गूँज
सबको जगाती रहेगी !

व सपनों की दुनिया
अँधेरे की दुनिया
सदा लड़खड़ाती रहेगी !
अँधेरा गिरेगा, अँधेरा मिटेगा,
कभी पर,
जवानी की ज्योति धुँधली पड़ेगी नहीं !

समय तो गुज़रता चला जायगा
पर, जवानी कभी भी मिटेगी नहीं !

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(51) ज्योति-पर्व
======================


मिट्टी के लघु-लघु दीपों से
जगमग हर एक भवन !

अँधियारे की लहरों से भूमि भरी,
पर, उस पर तिरती झलमल ज्योति-तरी,
जलना है, चाहे हो जाये
तारक-शशि हीन गगन !

जग पर छायी धूमिल वाष्प असुन्दर,
पर, बहता है अविरल स्नेह-समुन्दर,
युग के मन-मरुथल में तुमको
रहना है भाव-प्रवण !

विशृंखल तेज़ प्रभंजन से संसृति,
पर, मुसकाती संग नयी बन आकृति,
टूटेगा बाँध प्रलय का जब
हर नूतन सृष्टि चरण !

कोलाहल हर कोने से फूट रहा,
अब तो सपनों का बंधन टूट रहा,
खो जाएगा नव-जीवन की
हलचल में क्षीण मरण !

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(52) कवि ‘निराला’ के प्रति
======================

नवीन भावना व कल्पना-प्रसूत काव्य के
प्रवीण अग्रदूत तुम !
प्रवाह-धार-सी उठान गीत की
कि निर्विवाद शक्ति की प्रतीक
एक-एक पंक्ति,
एक-एक शब्द !
हो कहीं बड़े उदार
मधु बहार मय ग़ज़ल बटोर
गा रहे
मधुर स्वतंत्रा कोकिला सदृश !
कहीं-कहीं बड़े कठोर
घोर वज्रपात-से सशक्त
गीत गा रहे !

जगा मनुज जिन्हें विलोक
शोक-भाव, आत्मग्लानि से उठा !
चरण नवीन-काव्य के
चले नयी डगर ;
खुले नये अधर,
मिले नये विचार,
मुग्ध जग निहार !
पा अमोल फूल-बोल
मुग्ध काव्य-वाटिका !

प्रणाम लो !
अमर कला-जनक,
समस्त जन-समाज का
प्रणाम लो !

======================
(53) साँझ
======================

उस ऊँचे टीले पर
कुछ सहमी-सी
काली, नंगी, अनगढ़ चट्टान पड़ी है !
सहमी-सी —
शायद, उस पर अब कोई आकर लेटेगा !
कोई ?
हाँ, हो सकता है —
चाँद-सितारों का प्रेमी हो,
कवि हो,
प्रिय से बिछुड़ा हो,
या कि जगत से रूठा हो !

टीले के चारों ओर
बड़ी दूर-दूर तक
भूरी मिट्टी पर
हरा-हरा क़ालीन बिछा है ;
क़ालीन नहीं हो तो
कम्बल हो सकता है
जिसके अन्दर
कोई भी छिप सकता है !

पास सरोवर के
नरम हृदय की लहरों पर
सूरज की ठंडी किरणें
आलिंगन ढीला करती-सी
धीमे-धीमे
कल आने की बात
सुनाती हैं
‘देखो,
जैसे वह विहग-यूथ उड़ा आता है
हम भी आएंगे !
अब तुम सो जाओ’ !

फिर झोंका आया मंद हवा का
जैसे कोई रमणी
जॉरजेट की साड़ी पहने
निकली हो अभी निकट से !

और देखते ही
इस मन-मोहक दृश्य-चित्र पर
क्या कहें !
किस फूहड़ चित्राकार ने
काले रंग का ब्रुश
आहिस्ता-आहिस्ता
कितनी बेरहमी से चला दिया !

फिर क्या होता है
चाहे कितने ही छींटे
व्योम पर सफ़ेदी के फेंकें !

======================
(54) नयी ज़िन्दगी
======================


(रंगमंच पर एक युवक, जिसके जिसके रूखे केशों की लटें मुख के आस-पास गिरी हुई हैं, दर्द भरी आवाज़ में गाता है। मंच पर अँधेरा है, केवल युवक पर पीली-पीली रोशनी पड़ रही है। जैसे ही वह गान प्रारम्भ करता है, पर्दे के पीछे से हल्की-हल्की वाद्य-ध्वनि होती है; जो उसकी रागिनी से मेल खाती हुई है —

कितनी बेबसी के बीच गुज़री जा रही है ज़िन्दगी !

हमेशा एक-से दिन, एक-सी रातें,
वही जीवित अभावों की सड़ी बातें,
हृदय पर कर रहीं आघात,
कि कितनी दूर है बरसात ?
प्राणों का अधूरा गीत रह-रह गा रही है ज़िन्दगी !
कितनी बेबसी के बीच गुज़री जा रही है ज़िन्दगी !

वही सपने पुराने कर रहे हैं छल,
वही कंपन, वही धड़कन, वही हलचल,
हृदय पर कर रही अधिकार,
कि कितनी दूर नव-संसार ?
बारम्बार जीवन के वही क्षण पा रही है ज़िन्दगी !
कितनी बेबसी के बीच गुज़री जा रही है ज़िन्दगी !

(पर्दे के पीछे से वाद्य-ध्वनि ज़रा कुछ तेज़ हो जाती है और साथ में नारी-स्वर भी उसी लय में सुनायी देने लगता है जो अभी अस्पष्ट और धीमा है। युवक का गान चलता रहता है —

बड़ी सूखी हवाएँ आसमानों पर,
चलीं आवाज़ करतीं आशियानों पर,
हृदय में काँपता विश्वास,
कि कितनी दूर है मधुमास ?
पतझर बीच हलकी साँस ले मुरझा रही है ज़िन्दगी !
कितनी बेबसी के बीच गुज़री जा रही है ज़िन्दगी !

(वाद्य-ध्वनि और धीमी-धीमी आवाज़ के साथ, अब पास आते हुए नूपुरों की झनकार भी सुनायी देती है। युवक का स्वर कुछ धीमा पड़ जाता है, पर गान का क्रम बिना टूटे चलता रहता है —

थकावट के नशे से चूर सारा तन,
बड़ा दुर्बल, बड़ा मजबूर, हारा मन,
हृदय में रह गये अरमान,
कि कितनी दूर है मुसकान ?
छाया हड्डियों की बन अकेली छा रही है ज़िन्दगी !
कितनी बेबसी के बीच गुज़री जा रही है ज़िन्दगी !

(मंच पर एक दमकती हुई नारी - नयी ज़िन्दगी की तसवीर बन कर नृत्य करती आती है ; जिसके तन पर रंगीन प्रकाश पड़ रहा है। युवक चकित होकर उसकी ओर देखता है, उसका गान रुक जाता है। इसी समय पृष्ठभूमि का यह स्वर प्रखर हो उठता है —

भविष्यत् विश्व का नव-लक्ष्य सुन्दर है,
मगर अभिनव दिशा का पथ न बेहतर है,
बिछे कंटक कठिन, दुर्दम ;
क़दम पर गिर रहे हरदम,
कितनी आफ़तों को चीर हँसती आ रही है ज़िन्दगी !
गहरे इस अँधेरे में किरन बरसा रही है ज़िन्दगी !

(‘हँसती आ रही...’ शब्दों पर नारी का चेहरा मुसकान से भर जाता है। युवक पृष्ठभूमि के स्वरों को दोहराता हुआ ‘नयी ज़िन्दगी’ की ओर बढ़ता है। उसके रुखे केश हवा में उड़ने लगते हैं और ‘नयी ज़िन्दगी’ उसका हाथ पकड़ लेती है। एक क्षण तक वाद्य-ध्वनि, नूपुरों की झनकार और गीत के स्वर गूँजते रहते हैं।)

======================
(55) ज्वार और नाविक
======================


नाव नाविक खे रहा है !

सिंधु-उर को चीर अविरल
दौड़तीं लहरें भयंकर,
सनसनाती हैं हवाएँ
उग्र स्वर से ठीक सर पर,
छा रहा नभ में सघन तम
इस क्षितिज से उस क्षितिज तक
पास हिंसक जंतु कोई
साँस लम्बी ले रहा है !

दूर से आ मेघ गहरे
घिर रहे क्षण-क्षण प्रलय के,
घोर गर्जन कर दबाते
स्वर सबल आशा विजय के,
घूरती अवसान-बेला
मृत्यु से अभिसार है, पर
अटल साहस से सतत बढ़
यह चुनौती दे रहा है !

======================
(56) जिजिविषा
======================


जी रहा है आदमी
प्यार ही की चाह में !

पास उसके गिर रही हैं बिजलियाँ,
घोर गहगह कर घहरतीं आँधियाँ,
पर, अजब विश्वास ले
सो रहा है आदमी
कल्पना की छाँह में !
जी रहा है आदमी
प्यार ही की चाह में !

पर्वतों की सामने ऊँचाइयाँ,
खाइयों की घूमती गहराइयाँ,
पर, अजब विश्वास ले
चल रहा है आदमी
साथ पाने राह में!
जी रहा है आदमी
प्यार ही की चाह में !

बज रही हैं मौत की शहनाइयाँ,
कूकती वीरान हैं अमराइयाँ,
पर, अजब विश्वास ले
हँस रहा है आदमी
आँसुओं में, आह में!
जी रहा है आदमी
प्यार ही की चाह में!
=========================================
‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ [खंड – 2] और ‘महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा’ [खड – 2] में समाविष्ट।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

डा0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह संतरण

डा0 महेंद्रभटनागर का काव्य-संग्रह संतरण

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कविताएँ
========================
1 भवितव्य के अश्वो !
2 आस्था
3 प्रधूपिता से
4 आस्था का उपहार
5 आदमी और स्वप्न
6 जीवन
7 निवेदन
8 प्रतिकार्य
9 टूटना मत
10 अनुबोध
11 विडम्बना
12 तुम नहीं पहचान पाओगे ...
13 जीवन: एक अनुभूति
14 दोपहरी
15 एक साँझ
16 रात बीतेगी
17 अनचहा
18 क्या पता था
19 राज़ क्या है ?
20 अनाहूत स्थितियों से
21 प्रार्थना
22 अंगीकृत
23 अविश्वसनीय
24 पुनर्जन्म
25 कौन हो तुम
26 याचना
27 स्वीकार लो
28 युगों के बाद फिर
29 अभिरमण
30 उषा-दूतिका
31 फागुन में सावन
32 धरती का गीत
33 दृष्टि
34 कला-साधना
35 स्वर्ण की सौगात
36 भोर का गीत
37 माँझी
38 कौन तुम ...
39 गीत में तुमने सजाया
40 मुसकराये तुम ...
41 हे विधना
42 उषा रानी 43 सुहानी सुबह
44 लघु जीवन
45 फाग
46 वर्षा : तीन सुभाषित
47 दीप जलाओ
48 दीप-माला
49 अभिषेक
50 दीप धरो
51 रूपासक्ति
52 मोह-माया
53 रात बीती ...
54 व्यथा-बोझिल रात
55 अगहन की रात
56 दूर तुम
57 प्रिया से
58 बिरहिन
59 प्रतीक्षा
60 साध
61 स्नेह भर दो
62 रतजगा
63 वंचना
64 अब नहीं
65 गाओ
66 भोर होती है !
67 मच्छरों का संगीत
68 भूमिका
69 अंकुर
70 थमना कैसा ?
71 रात भर
72 अंधकार
73 लक्ष्य
74 आलोक
75 शुभकामनाएँ
76 दीप जलता है
77 नया भारत
78 एशिया
79 माओ और चाऊ के नाम
80 रंग बदलेगा गगन !


========================
(1) भवितव्य के अश्वो!
========================

ओ भवितव्य के अश्वो !
तुम्हारी रास
हम
आश्वस्त अंतर से सधे
मज़बूत हाथों से दबा
हर बार मोड़ेंगे !

वर्चस्वी,
धरा के पुत्र हम
दुर्धर्ष,
श्रम के बन्धु हम
तारुण्य के अविचल उपासक
हम तुम्हारी रास
ओ भवितव्य के अश्वो !
सुनो, हर बार मोड़ेंगे !

ओ नियति के स्थिर ग्रहो !
श्रम-भाव तेजोदृप्त
हम
अक्षय तुम्हारी ज्योति
ग्रस कर आज छोड़ेंगे !
तितिक्ष अडिग
हमें दुर्ग्रह नहीं अब
अंतरिक्ष अगम्य !
निश्चय
ओ नियति के पूर्व निर्धारित ग्रहो !
हम....
हम तुम्हारी ज्योति
ग्रस कर आज छोड़ेंगे !

ओ अदृष्ट की लिपियो !
कठिन प्रारब्ध हाहाकार के
अविजेय दुर्गो !
हम उमड़ श्रम-धार से
हर हीन होनी की
लिखावट को मिटाएंगे,
मदिर मधुमान श्रम संगीत से
हम
हर तबाही के अभेदे दुर्ग तोड़ेंगे !
ओ भवितव्य के अश्वो !
तुम्हारी रास मोड़ेंगे !

========================
(2) आस्था
========================

सींचो !
कण-कण को सींचो !
हर सूखे बिरवे को पानी दो,
टूटे उखड़े झाड़ों को
अभिनव बल
फिर-फिर बढ़ने की तेज़ रवानी दो
हर सूखे बिरवे को पानी दो !

नंगी-नंगी शाखों को
जल-कण मुक्ता भूषण दो
चिर बाँझ धरा को
जल का आलिंगन दो
शीतल आलिंगन दो !
शायद, गहरी-गहरी परतों के नीचे
जीवन सोया हो,
तम के गलियारों में खोया हो !

सींचो
अन्तस् की निष्ठा से सींचो,
शायद, चट्टानों को फोड़ कहीं,
नव अंकुर डहडहा उठें,
बाँझ धरा का गर्भस्थल
नूतन जीवन से कसमसा उठे !

सींचो
कण-कण को सींचो !
हर मिट्टी में गर्मी है
हर मिट्टी पूत प्रसव-धर्मी है !

========================
(3) प्रधूपिता से
========================

ओ विपथगे !
जग-तिरस्कृत,

माँग को
सिन्दूर से भर दूँ !

सहचरी ओ !
मूक रोदन की —
कंठ को
नाना नये स्वर दूँ !

ओ धनी !
अभिशप्त जीवन की —

तुझे उल्लास का वर दूँ !

ओ नमित निर्वासिता !


नील कमलों से
घिरा घर दूँ !

वंचिता ओ !
उपहसित नारी —
अरे आ
रुक्ष केशों पर
विकंपित
स्नेह-पूरित
उँगलियाँ धर दूँ !

========================
(4) आस्था का उपहार
========================

भाग्य से
अथवा जगत से
हर प्रताड़ित व्यक्ति को
आजन्म संचित स्नेह मेरा
है समर्पित !

लक्ष्य हैं जो
सृष्टि के अव्यक्त निर्मम हास के
या जगत उपहास के
प्राण गौरव की सुरक्षा के लिए
लघु गेह मेरा
है समर्पित !

ओ, विश्व भर के
पददलित पीड़ित पराजित मानवो !
जीवन्त नव आस्था
नये विश्वास के
मद महकते उत्फुल्ल गुलदस्ते
तुम्हारे साधु स्वागत में
समर्पित हैं !

जीवन को सजा लो,
लोक की मधु-गंध
प्राणों में बसा लो !

========================
(5) आदमी और स्वप्न
========================

आदमी का प्यार सपनों से
सनातन है !

मृत्यु के भी सामने
वह, मग्न होकर देखता है स्वप्न !
सपने देखना, मानों,
जीवन की निशानी है ;
यम की पराजय की कहानी है !

सपने आदमी को
मुसकराहट — चाह देते हैं,
आँसू — आह देते हैं !

हृदय में भर जुन्हाई-ज्वार,
जीने की ललक उत्पन्न कर,
पतझार को
मधुमास के रंगीन-चित्रों का
नया उपहार देते हैं !
विजय का हार देते हैं !
सँजोओ, स्वप्न की सौगात,
महँगी है !
मिली नेमत,
इसे दिन-रात पलकों में सहेजो !
‘स्वप्नदर्शी’ शब्द
परिभाषा ‘मनुज’ की,
गति-प्रगति का
प्रेरणा-आधार;
संकट-सिंधु में
संसार-नौका की
सबल पतवार ;
गौरवपूर्ण सुन्दरतम विशेषण।
स्वप्न-एषण और आकर्षण
सनातन है, सनातन है !
आदमी का प्यार सपनों से
सनातन है !

========================
(6) जीवन
========================

जीवन हमारा फूल हरसिंगार-सा
जो खिल रहा है आज,
कल झर जायगा !

इसलिए,
हर पल विरल
परिपूर्ण हो रस-रंग से,
मधु-प्यार से !
डोलता अविरल रहे हर उर
उमंगों के उमड़ते ज्वार से !

एक दिन, आख़िर,
चमकती हर किरण बुझ जायगी...
और
चारों ओर
बस, गहरा अँधेरा छायगा !
जीवन हमारा फूल हरसिंगार-सा
जो खिल रहा है आज,
कल झर जाएगा !

मत लगाओ द्वार अधरों के
दमकती दूधिया मुसकान पर,
हो नहीं प्रतिबंध कोई
प्राण-वीणा पर थिरकते
ज़िन्दगी के गान पर !

एक दिन
उड़ जायगा सब ;
फिर न वापस आयगा !
जीवन हमारा फूल हरसिंगार-सा
जो खिल रह है आज,
कल झर जायगा !

========================
(7) निवेदन
========================

फूल जो मुरझा रहे
जग-वल्लरी पर
अधखिले
कारण उसी का खोजता हूँ !

हे प्राण !
मुझको माफ़ करना
यदि तुम्हारे गीत कुछ दिन
मैं न गाऊँ !
स्वर्ण आभा-सा
सुवासित तन तुम्हारा देख
अनदेखा करूँ,
छवि पर न मोहित हो
तनिक भी मुसकराऊँ !

फूल जब मुरझा रहे
वसुधा बनी विधवा
सुमुखि !
फिर अर्थ क्या शृंगार का,
पग-नूपुरों की गूँजती झंकार का ?

हर फूल खिलने दो ज़रा,
डालियों पर प्यार हिलने दो ज़रा !

========================
(8) प्रतिकार्य
========================

रे हृदय
उत्तर दो
जगत के तीव्र दंशन का
राग-रंजित,
सोम सुरभित साँस से !

स्वीकार्य
जीवन-पंथ पर...
दर्द हर उपेक्षा का
शांत उज्ज्वल हास से !

आतिथेय
घन तिमिर के
द्वार पर
स्वर्ण किरणों की
असंशय आस से !

आराध्य
वज्रघाती देव
प्राण के संगीत से,
प्रेमोद्गार से
अभिरत रास से !

रे हृदय !
उत्तर दो
जगत के क्रूर वंचन का
स्नेहल भाव से,
विश्वास से !

========================
(9) टूटना मत
========================

रे हत हृदय,
टूटना मत !
विपद् घोर-घन-चोट सहना !
दहकती
दुखों की प्रबल भट्ठियों में
सतत मूक दहना !
अकेले
गरल-तप्त-धारों-उमड़ती
नदी में निरन्तर, निराक्रांत बहना !

अनादृत हृदय,
टूटना मत !

अँधेरी-अँधेरी घटाएँ,
सबल सनसनाती हवाएँ...!
विवह लहरता,
दबा, त्रस्त वातावरण !
क्रूर,
जैसे हुआ हो अभी,
हाँ, अभी,
राम,
सीता-हरण !
रे हृदय
टूटना मत !

नहीं दूर अब और
अभिनव, अनागत सुबह,
रुक्ष, उन्मन,
करुण, कृष्ण
छाया न ग्रस ले उसे,
मुसकराकर
बढ़ो,
हे हृदय,
सार्थ करने सुलह
पास
अभिनव, अनागत सुबह !

========================
(10) अनुबोध
========================

गहन अंतर में
पीर भर लो !
तरल आँखों में
नीर भर लो !

पीर ही देगी तुम्हारा साथ
थाम लो इसका
करुण-निधि-रेख अंकित हाथ,
हिम-शीत प्यारा हाथ !
रे यही देगा तुम्हारा साथ
वर लो !

सांध्य-जीवन के
थके बोझिल क्षणों में
कुहर-गुंठित सजल धूमिल क्षणों में
तम घिरे घर में
पीर वर लो !
लौह अंतर में
पीर भर लो !
अचल आँखों में
नीर भर लो !

ले
असीमित क्षार-सागर
वज्र-विज्ञापित-बवण्डर
अतिथि बन
मेघ आये हैं,
तुमको घेर छाये हैं
प्यार कर लो !
वेदना उपहार लाये हैं
सहज स्वीकार कर लो !
टूटते कमज़ोर कंधों पर
पर्वतों का भार
धर लो !
गहन अंतर में
पीर भर लो !
तरल आँखों में
नीर भर लो !

========================
(11) विडम्बना
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हमने
जीवन भर
हाँ,
जीवन भर
मन की हर क्यारी में
सहज खिलाये
भावों के सुरभित फूल !

हमने
जीवन भर
हाँ,
जीवन भर
मन के निस्सीम गगन में
उन्मुक्त उड़ाये
अनिंद्य कल्पनाओं के
बहुरंगी दिव्य दुकूल !

हमने
जीवन भर
हाँ,
जीवन भर
मन की गहरी-से-गहरी
उपत्यका में
वैदग्ध्य विचारों के
सूरज चाँद उगाये
कर दूर तमस आमूल !

पर,
हाय विधाता !
यह कैसी अद्भुत भूल ?
घेरे तन को
अनगिनत नागफाँस नुकीले शूल,
अविराम थपेड़े झंझा के
उपहारों में देते
वंध्य विषैली धूल !

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(12) तुम नहीं पहचान पाओगे
========================

एकरसता, एकस्वरता
बन गया है नाम जीवन का,
विषैले पन्नगों से बद्ध
मानों वृक्ष चंदन का !

सुबह होती
उदासी की विकल किरणें लिए,
अभावों के धधकते सूर्य की
आकुल विफल किरणें लिए !
तन श्लथ अलस-आहत
विरागी प्रेत-सा मन श्लथ
विगत विक्षत,
दिवस विकलांग-सा कंपित
विखंडित रथ लिये
सुनसान बीहड़ से
असह चिर वेदना का भार ले
संध्या निशा के गर्त में
जब डूब जाता है
तुम नहीं पहचान पाओगे
अभागा प्राण कितना ऊब जाता है !

रात आती है
कि मानों निठुर छलना
बन वधू साकार आती है,
रँगीले झिलमिलाते
स्वप्न परदों से
नवेली झाँक कर
सौगात तीखी वंचना की
गोद में बस डाल जाती है !
अछूती भावनाएँ तरल लहरों-सी
कड़ी चट्टान से टकरा
दरद का ज्वार लाती है !

बीतता है इस तरह जीवन
लिए बस
एकरसता एकस्वरता का
करुण संसार,
दुर्लभ —
मूच्र्छना संगीत,
पुलकित स्वर,
सुवासित हर्ष,
इन्द्रधनुषी प्यार !

========================
(13) जीवन: एक अनुभूति
========================

बिखरता जा रहा सब कुछ
सिमटता कुछ नहीं !

ज़िन्दगी :
एक बेतरतीब सूने बंद कमरे की तरह,
दूर सिकता पर पड़े तल-भग्न बजरे की तरह,
हर तरफ़ से कस रहीं गाँठें
सुलझता कुछ नहीं !

ज़िन्दगी क्या ?
धूमकेतन-सी अवांछित
जानकी-सी त्रस्त लांछित,
किस तरह हो संतरण
भारी भँवर, भारी भँवर !
हो प्रफुल्लित किस तरह बेचैन मन
तापित लहर, शापित लहर !

ज़िन्दगी:
बदरंग केनवस की तरह
धूल की परतें लपेटे
किचकिचाहट से भरी,
स्वप्नवत है
वाटिका पुष्पित हरी !
हर पक्ष भावी का भटकता है
सँभलता कुछ नहीं !

पर, जी रहा हूँ
आग पर शय्या बिछाये !
पर, जी रहा हूँ
शीश पर पर्वत उठाये !
पर, जी रहा हूँ
कटु हलाहल कंठ का गहना बनाये !
ज़िन्दगी में बस
जटिलता ही जटिलता है
सरलता कुछ नहीं !

========================
(14) दोपहरी
========================

दोपहरी का समय
अनमना...... उदास,
मैं नहीं तुम्हारे पास !

एकाकी
तंद्रिल स्वप्निल
जोह रहा अविरल बाट
खोल कक्ष-कपाट !

चिलचिलाती धूप
बोझिल बनाती और आँखों को !
साँय-साँय करती
लम्बे-लम्बे डग भरती
हवा-दूतिका
संदेश तुम्हारा कहती
मौन !

तभी मैं उठ
भर लेता बाँहों में
कर लेता स्वीकार
सरल शीतल आलिंगन
आगमन आभास तुम्हारा पाकर !
ढलती जाती दोपहरी
होती जाती अन्तर-व्यथा
गहरी....गहरी....गहरी !

========================
(15) एक साँझ
========================

जीवन
अर्थ-सूनापन !
नहीं कुछ भी नया
सदा-सा
आज भी दिन ढल गया !

भटकती धूप
आयी,
कुछ क्षण
चाहा बिताएँ साथ
पर, अँधेरा ही
आया हमारे हाथ !

डोलते आये विहंगम,
चित्रवत्
देखते केवल रहे हम !
नहीं कोई रुका;
सदा-सा
एकरस बहता रहा,
बोझिल मन थका
सहता रहा !
जीवन
अर्थ-सूनापन,
सूनापन !

========================
(16) रात बीतेगी
========================

अँधेरा....
रात गहरी है,
रात बहरी है !

बहुत समझाया कि
सो जा !
रे मन
थके ग़मगीन मन
ज़िन्दगी के खेल में हारे हुए
दुर्भाग्य के मारे हुए
रे दरिद्र मन
सो जा !

रात सोने के लिए है
सपने सँजोने के लिए है,
कुछ क्षणों को
अस्तित्व खोने के लिए है,
तारिकाओं से भरी यह रात
परियों-साथ सोने के लिए है !
सो !

दर्द है,
और सूनी रात बेहद सर्द है !

जीवन नहीं अपना रहा,
अब न बाक़ी देखना सपना रहा !

रात...
जगने के लिए है !
..... बेचैनियों की भट्ठियों में
फिर-फिर सुलगने के लिए है !

रात....
गहरी रात
बहरी रात
हमने बिता दी
जग कर बिता दी !

कल फिर यही होगा
अँधेरा आयगा !
खामोश
धीरे, बड़े धीरे
कफ़न-सा
फिर अँधेरा आयगा !
रे मन
जगने के लिए
चुपचाप
आँखें बन्द कर लेना,
भीतर सुलगने के लिए
ज़िन्दगी पर राख धर लेना !

रात
काली रात
बीतेगी .... बीतेगी !

========================
(17) अनचाहा
========================

केसर-सी मधु-गंधि
कुमारी अभिलाषाएँ,
अन्तरतम में संचित
युगों सहेजी आशाएँ
परित्यक्ता हैं !

निर्मल भोली
लगता था: मेरी हो लीं !
नेह भरी दिन भर डोलीं,
यामा में
मदहोश गुलाबी आँखें खोलीं !
रजनी-हासा
रजनी-गंधा
परित्यक्ता हैं,
आज सभी परित्यक्ता हैं !

ओ रजनी-हासा !
प्यासा.... प्यासा !
चिर साधों के उत्सव
आगत नव जीवन के
स्वागत-पर्व
सभी
गर्भ-क्षय-से पीड़क,
हीरक सपनों की रातें,
मधुजा-सी बातें
परित्यक्ता हैं !

मौन
मन-मैना,
बरसे नैना !

मधु-माधव बीत गया,
ओ ! मधुपायी
मधुरस रीत गया !

========================
(18) क्या पता था
========================

छू रही थी रवि-किरण
ऊँचाइयों को,
सृष्टि की गहराइयों को,

नव-आलोक से परिपूर्ण था
जीवन-गगन !
पहने धरा थी
स्वर्ण के अनमोल अभिनव आभरण,
गूँजते थे हर दिशा में
हर्ष-गीतों के चरण !

क्या पता था —
एक दिन ऐसे अचानक मेघ छाएंगे
बिना कारण
गरज बिजली गिराएंगे !
और हम —
असह उर-वेदना ले
मूक भटकेंगे
अँधेरे में, अँधेरे में !

नियति लेगी छीन
भू-सौभाग्य,
विक्षत कर
महकते फूल !
आँचल में भरेगी निर्दयी,
हा, इस तरह रे धूल !
अन्तर में चुभाएगी
नुकीले शूल !

और हम —
अर्थी उठा विश्वास की
मस्तक झुकाये
शोक से बोझिल हृदय ले
अग्नि-लपटों को समर्पित कर
अकेले लौट आएंगे,
व जीवन भर
विवश हो दोहराएंगे
करुण गीतों के चरण !

========================
(19) राज़ क्या है ?
========================

हवा सर्द है !
रात खामोश है
जिस तरह चुप तुम्हारे अधर !

बात क्या है ?
राज़ क्या है ?
कि जो सो गयी हर लहर !

दे रही नींद पहरा,
घिर गया तिमिर गहरा,
उठ रहा दर्द है !
हवा सर्द है !

========================
(20) अनाहूत स्थितियों से
========================

जीवन दिया है
तो
प्यार भी दो !
प्यास दी है
रसधार भी दो !

जब दिया है रूप
आत्मा को
सुघड़ तन-शृंगार भी दो !
उर दिया है
भावना का ज्वार भी दो !

मत करो वंचित
सहज अनुभूतियों से
इस तरह -
जीवन कि जीना बोझ बन जाए,
सब उम्र कट जाए
बिन गीत गाए
स्नेह-सुषमा का
सुखद सावन सजाए !

ज्योति का आकाश
आँखों को दिया
तो
अनगिनत सपने सुहाने
झूलने दो !
दर्द आँहों से
तनिक तो
चेतना को भूलने दो !

मत कसो
मजबूरियों की रस्सियों से
इस तरह —
पल भर
फड़फड़ा भी जो न पाएँ
वासनाओं के विखंडित पंख !
अनपेक्षित घृणा की
कील मत ठोंको
धड़कते वक्ष पर !
अंगार मत फेंको
सरल आसक्त आँखों पर !

जीवन दिया है
तो
लेने दो
हर फूल की मधु गंध,
जीवन दिया है
तो
सोने दो
हर लता के अंक में निर्बन्ध !

========================
(21) प्रार्थना
========================

अँधेरा दो
पराजय का अँधेरा दो
निराशा का सघन-गहरा अँधेरा दो
पर, विजय की आस मत छीनो
सुबह की साँस मत छीनो,
नये संसार के
सुख-साध्य सपनों के सहारे
करुण जीवन बिता लेंगे !
अभावों से भरा जीवन बिता लेंगे !

वंचना दो
प्रीत के हर प्रिय चरण पर वंचना दो
मृग-तृषा-सी वंचना दो
पर, अधर के गीत मत छीनो
राग का संगीत मत छीनो,
सुधा-धर कंठ से
उर भावना-विश्वास धरती पर
कल्पनाओं के सहारे
विरस यौवन बिता लेंगे,
हर सजल सावन बिता लेंगे !
अकेला अनमना यौवन बिता लेंगे !

========================
(22) अंगीकृत
========================

ओ विशालाक्षी
नील कंठाक्षी
शुभांगी !
शाप
जो तुमने दिया
अंगीकृत !

ओ पयस्विनी
कल्याणी !
विषज उपहार
जो तुमने दिया
स्वीकृत !

========================
(23) अविश्वसनीय
========================

प्रेक्षागृह में
प्रेक्षक नहीं,
मात्र मैं हूँ !
मैं —
अभिनेता,
नायक !

जिसका जीवन
प्रहसन नहीं,
त्रासद.... शोकान्त !

मैं ही जीवन की
मुख्य-कथा का निर्माता
टूटे-स्वर से
गा....ता
समाधि गान !
जिसकी करुण तान
अनाकर्षक
रस विहीन !

मैं ही भोजक
भोज्य !
आदि... मध्य... अंत
विषाद सिक्त
नील तंतु से निर्मित,
बोझिल मंथर गति से विकसित !

पर,
मादक प्रकरी-सी
तुम कौन ?
रंभा ?
उर्वशी ?
एकरस कथानक में अचानक !
यह सब ‘सहसा’ है,
अनमिल
अस्वाभाविक है !

========================
(24) पुनर्जन्म
========================

जीवन का आरम्भ:
फिर से।
उसमें सन्दर्भ न हो,
पूर्वा पर कोई संबंध न हो !

क्या वर्तमान को गत क्षण प्रदेय ?
जब दुष्कर पा लेना जीवन का प्रमेय ?

जीवन: नहीं पहेली ?
उसका अर्थ सरल हो,
उसकी भाषा प्रांजल हो,
उसमें वांछित
कोई अन्तर-कथा नहीं,
रिसते घावों की सोयी व्यथा नहीं !

जितना खोजोगे: भटकोगे,
जितनी संगति जोड़ोगे: उलझोगे !

आगत पर
बेचैनी और उदासी का दामन ?
आस्था के शीश महल पर
संदेहों के पाहन ?
नहीं, नहीं !

========================
(25) कौन हो तुम?
========================

अँधेरी रात के एकांत में
अनजान
दूरागत.....
किसी संगीत से मोहक
मधुर सद्-सांत्वना के बोल
विषधर तिक्त अंतर में
अरे ! किसने दिये हैं घोल ?

कौन ?
कौन हो तुम ?
अवसन्न जीवन-मेघ में
नीलांजना-सी झाँकतीं
आबंध वातायन हृदय का खोल !

सृष्टि की गहरी घुटन में,
दाह से झुलसे गगन में,
कौन तुम जातीं
सजल पुरवा सरीखी डोल ?

कौन हो तुम ?
कौन हो ?
संवेद्य मानस-चेतना को,
शांत करती वेदना को !

========================
(26) याचना
========================

शैल हो तुम
हैं कसे सब अंग,
विकसित-वय भरे नव-रंग !
प्रत्यूष ने
जब स्वर्ण किरणों से छुए
सुगठित कड़े उन्नत शिखर
प्रति रोम रजताचल
गया सहसा सिहर,
द्रुत स्वेद-मंडित तन
द्रवित मन,
शीर्ष चरणों तक
हुई सद्-संचरित रति-रस लहर !

शैल हो तुम
नेह-निर्झर-धार धारित,
प्राण हरिमा भाव वासित !

एक कण प्रिय नेह का
एक क्षण सुख देह का
मन-कामना
वर दो !
अनावृत पात्रा अन्तस्
भावना भर दो !

========================
(27) स्वीकार लो
========================

मेरी कामनाएँ :
गगन के वक्ष पर झिलमिल
सितारों की तरह !

मेरी वासनाएँ :
हिमालय से प्रवाहित
वेगगा भागीरथी की
शुभ्र धारों की तरह !

मेरी भावनाएँ :
महकते-सौंधते
उत्फुल्ल पाटल से विनिर्मित
रूपधर सद्यस्क हारों की तरह !

तुम्हारी अर्चना आराधना में
समर्पित हैं।
अलौकिक शोभिनी !
रमनी सुनहरी दीपकलिका से
हृदय का कक्ष ज्योतित है !

इस जन्म में
स्वीकार लो
स्वीकार लो
मेरा अछूता प्यार लो !

========================
(28) युगों के बाद फिर...
========================

युगों के बाद
सहसा आज तुम !
स्वप्न की नगरी बसाये
हाथ सिरहाने रखे सोयी हुई हो
बर्थ पर !
क्या न जागोगी ?
हुआ ही चाहता पूरा सफ़र....!

आँख खोलो
आँख खोलो
शब्द चाहे
एक भी मुझसे न बोलो !
देख,
फिर चाहे
बहाना नींद का भर लो !

युगों के बाद फिर
पा रंग नव रस
खिल उठेगा
धूप मुरझाया कुसुम !
कितने दिनों के बाद
सहसा आज तुम !

========================
(29) अभिरमण
========================

कल सुबह से रात तक
कुछ कर न पाया
कल्पना के सिंधु में
युग-युग सहेजी आस के दीपक
बहाने के सिवा !

हृदय की भित्ति पर
जीवित अजन्ता-चित्रस... रेखाएँ
बनाने के सिवा !
किस क़दर
भरमाया
तुम्हारे रूप ने !

कल सुबह से रात तक
कुछ कर न पाया;
सिर्फ़
कल्पना के स्वर्ग में
स्वच्छंद सैलानी-सरीखा
घूमा किया !
नशीली-झूमती
मकरंद-वेष्टित
शुभ्र कलियों के कपोलों को
मधुप के प्यार से
चूमा किया !
किस क़दर
मुझको सताया है
तुम्हारे रूप ने !

कल सुबह से रात तक
कुछ कर न पाया
भावना के व्योम में
भोले कपोतों के उड़ाने के सिवा !
अभावों की धधकती आग से
मन को जुड़ाने के सिवा !

भटका किया,
हर पल
तुम्हारी याद में अटका किया !

किस क़दर
यह कस दिया तन मन
तुम्हारे रूप ने !

========================
(30) उषा-दूतिका
========================

उषा का आगमन
रे रात सोये फूल अपनी गंध दो
जिससे किरन आए खिँची
पतली / सुनहली
बावली
फिर रंग अपना दो उसे
निश्छल हृदय का प्यार दो !
अंक भर-भर
मुग्ध
अपना लो !
साकार होगा हर सपन
अनुराग डूबी जब उषा का आगमन !
रे रात सोये फूल
अपनी गंध दो !
हर पाँखुरी के खोल
मुकुलित बंध दो !

========================
(31) फागुन में सावन
========================

नव उत्साह भरे
हँसिया सान धरे
गेहूँ की सूखी बालें
काट रहा
भूखा-प्यासा कृषक-कुटुम्ब
बिना विलम्ब !
असमय
चपला-नर्तन घन-गर्जन
बूँदा-बाँदी,
माटी की सोंधी गंध महकती !

पर, स्वागत पर प्रतिबन्ध,
प्रकृति मनोरम
पर, वर्षा-देव हुए हैं अंध,
तभी बेमौसम
फागुन में सावन !

========================
(32) धरती का गीत
========================

हमें तो माटी के कन-कन से मोह है
असम्भव, सचमुच, उसका क्षणिक बिछोह है,
निरंतर गाते हम उसके ही गीत हैं
हमें तो उसके अंग-अंग से प्रीत है !

========================
(33) दृष्टि
========================

माना, हमने धरती से नाता जोड़ा है,
पर, चाँद-सितारों से भी प्यार न तोड़ा है,
सपनों की बातें करते हैं हम, पर उनको
सत्य बनाने का भी संकल्प न थोड़ा है !

========================
(34) कला-साधना
========================

हर हृदय में
स्नेह की दो बूँद ढल जाएँ
कला की साधना है इसलिए !

गीत गाओ
मोम में पाषाण बदलेगा,
तप्त मरुथल में
तरल रस ज्वार मचलेगा !

गीत गाओ
शांत झंझावात होगा,
रात का साया
सुनहरा प्रात होगा !

गीत गाओ
मृत्यु की सुनसान घाटी में
नया जीवन-विहंगम चहचहाएगा !
मूक रोदन भी चकित हो
ज्योत्स्ना-सा मुसकराएगा !

हर हृदय में
जगमगाए दीप
महके मधु-सुरिभ चंदन
कला की अर्चना है इसलिए !

गीत गाओ
स्वर्ग से सुंदर धरा होगी,
दूर मानव से जरा होगी,
देव होगा नर,
व नारी अप्सरा होगी !

गीत गाओ
त्रस्त जीवन में
सरस मधुमास आ जाए,
डाल पर, हर फूल पर
उल्लास छा जाए !
पुतलियों को
स्वप्न की सौगात आए !
गीत गाओ
विश्व-व्यापी तार पर झंकार कर !
प्रत्येक मानस डोल जाए
प्यार के अनमोल स्वर पर !

हर मनुज में
बोध हो सौन्दर्य का जाग्रत
कला की कामना है इसलिए !

========================
(35) स्वर्ण की सौगात
========================

स्वर्ण की सौगात लायी भोर !

री जगो कलियो ! उठो उपहार आँचल में भरो
सज सुनहरे रूप में, मधु भाव पाटल में भरो
भर नया उन्मेष अंगों में
झूम लो नव-नव उमंगों में
गंधवह शीतल तरंगों में
प्रीति-पुलकित हर लता चितचोर !

खोल दो अंतर झरोखे द्वार वातायन सभी
अब नहीं ऐसे अँधेरे में घिरे आनन कभी
स्वर्ण-सागर में नहाओ रे
आभरण से तन सजाओ रे
नव प्रभाती गीत गाओ रे
झमझमा कर नाच ले मन-मोर !

========================
(36) भोर का गीत
========================

भोर की लाली हृदय में राग चुप-चुप भर गयी !

जब गिरी तन पर नवल पहली किरन
हो गया अनजान चंचल मन-हिरन
प्रीत की भोली उमंगों को लिए
लाज की गद-गद तरंगों को लिए
प्रात की शीतल हवा ; आ — अंग सुरभित कर गयी !

प्रिय अरुण पा जब कमलिनी खिल गयी
स्वर्ग की सौगात मानों मिल गयी,
झूमती डालें पहन नव आभरण
हर्ष पुलकित किस तरह वातावरण
भर सुनहरा रंग ऊषा कर गयी वसुधा नयी !

========================
(37) माँझी
========================

साँझ की बेला घिरी, माँझी !

अब जलाया दीप होगा रे किसी ने
भर नयन में नीर,
और गाया गीत होगा रे किसी ने
साध कर मंजीर,
मर्म जीवन का भरे अविरल बुलाता
सिन्धु सिकता तीर,
स्वप्न की छाया गिरी, माँझी !

दिग्वधू-सा ही किया होगा
किसी ने कुंकुमी शृंगार,
झिलमिलाया सोम-सा होगा
किसी का रे रुपहला प्यार,
लौटते रंगीन विहगों की दिशा में
मोड़ दो पतवार,
सृष्टि तो माया निरी, माँझी !

========================
(38) कौन तुम
========================

कौन तुम अरुणिम उषा-सी मन-गगन पर छा गयी हो ?

लोक-धूमिल रँग दिया अनुराग से,
मौन जीवन भर दिया मधु राग से,
दे दिया संसार सोने का सहज
जो मिला करता बड़े ही भाग से,
कौन तुम मधुमास-सी अमराइयाँ महका गयी हो ?

वीथियाँ सूने हृदय की घूम कर,
नव-किरन-सी डाल बाहें झूम कर,
स्वप्न छलना से प्रवंचित प्राण की
चेतना मेरी जगायी चूम कर,
कौन तुम नभ-अप्सरा-सी इस तरह बहका गयी हो ?

रिक्त उन्मन उर-सरोवर भर दिया,
भावना संवेदना को स्वर दिया,
कामनाओं के चमकते नव शिखर
प्यार मेरा सत्य शिव सुन्दर किया,
कौन तुम अवदात री ! इतनी अधिक जो भा गयी हो ?

========================
(39) गीत में तुमने सजाया
========================

गीत में तुमने सजाया रूप मेरा
मैं तुम्हें अनुराग से उर में सजाऊँ !

रंग कोमल भावनाओं का भरा
है लहरती देखकर धानी धरा
नेह दो इतना नहीं, सँभलो ज़रा
गीत में तुमने बसाया है मुझे जब
मैं सदा को ध्यान में तुमको बसाऊँ !

बेसहारे प्राण को निज बाँह दी
तप्त तन को वारिदों-सी छाँह दी
और जीने की नयी भर चाह दी
गीत में तुमने जतायी प्रीत अपनी
मैं तुम्हें अपना हृदय गा-गा बताऊँ !

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(40) मुसकराये तुम....
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मुसकराये तुम, हृदय-अरविन्द मेरा खिल गया,
देख तुमको हर्ष-गदगद, प्राप्य मेरा मिल गया !

चाँद मेरे ! क्यों उठाया
इस तरह जीवन-जलधि में ज्वार रे ?
पा गया तुममें सहारा
कामिनी ! युग-युग भटकता प्यार रे !
आज आँखों में गया बस, प्रीत का सपना नया !

रे सलोने मेघ सावन के
मुझे क्यों इस तरह नहला दिया ?
क्यों तड़प नीलांजने !
निज बाहुओं में नेह से भर-भर लिया ?
साथ छूटे यह कभी ना, हे नियति ! करना दया !

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(41) हे विधना!
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हे विधना ! मोरे आँगन का बिरवा सूखे ना !

यह पहली पहचान मिठास भरा,
रे झूमे लहराये रहे हरा,
हे विधना ! मोरे साजन का हियरा दूखे ना !

लम्बी बीहड़ सुनसान डगरिया,
रे हँसते जाए बीत उमरिया,
हे विधना ! मोरे मन-बसिया का मन रूखे ना !

कभी न जग की खोटी आँख लगे,
साँसत की अँधियारी दूर भगे,
हे विधना ! मोरे जोबन पर बिरहा ऊखे ना !

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(42) उषा रानी
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नील नभ-सर में मुदित मुग्धा उषा-रानी नहाती है !

शशि-बंध में बँध, रात भर आसव पिया
प्रतिदान जिसका प्रीति पावन से दिया
नव अंगरागों से जगत सुरभित किया
सोच हेला-हाव, अरुणिम तार रेशम के बहाती है !

नव रंग सरसिज के भरे जिसका वदन
परितोष भावों को किये जैसे वहन
प्रिय कल्पना में मंजु मंगल मन मगन
रे अकारण हर दिशा सीकर उड़ाकर गहगहाती है !

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(43) सुहानी सुबह
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जीवन की हर सुबह सुहानी हो !

भर लो हास बहारों का
नदियों कूल कछारों का
फूलों गजरों हारों का
कन-कन की हर्षान्त कहानी हो !

मीठा राग विहंगों का
पागल प्रेम उमंगों का
अंतर लाज-तरंगों का
छलिया दुनिया नहीं बिरानी हो !

शीतल नेह निगाहों से
भर दो दुनिया चाहों से
प्यार भरे गलबाहों से
लहकी-लहकी मधुर जवानी हो !

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(44) लघु जीवन
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फूलों का संसार हमारा है !

उज्ज्वल हास लुटाते हैं
मधु मकरंद उड़ाते हैं
मारुत पेंग सुहाते हैं
झंकृत उर हर तार हमारा है !

ले लो हार बनाने को
भर लो माँग सजाने को
सूना गेह बसाने को
भोला-भोला प्यार हमारा है !

हमको देख लजाओ ना
छलना भाव जताओ ना
इतना हाय सताओ ना
दो पल का शृंगार हमारा है !
फूलों का संसार हमारा है !

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(45) फाग
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फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छायी है ; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल,
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ-मँजीरे-ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच,
आया मन पिया चंचल सखी री नाच !

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(46) वर्षा
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(तीन सुभाषित)

(1)
अंक भर-भर नव सलेटी बादलों को
स्नेह-पूरित आ गयी बरसात रे !
हर मलिन उर को सहज ही दे गयी मधु
भावनाओं की नयी सौगात रे !

(2)
एक-रसता स्वर अनारत भंग कर जब
राग बन रिमझिम बरसती है घटा,
दूर क्षितिजों तक बिखर जाती अनावृत
हो तभी नव-सृष्टि की गोपन छटा !
(3)
मन-सरोवर में नयी हलचल लिए, नव
हाव से रह-रह थिरकतीं उर्मियाँ,
कौन ने, अव्यक्त मधुरस-धार में यों
प्राण मेरा आज रे नहला दिया !

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(47) दीप जलाओ
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आँगन-आँगन दीप जलाओ,
दीपों का त्योहार मनाओ !

स्वर्णिम आभा घर-घर बिखरे
मनहर आनन, कन-कन निखरे
ज्योतिर्मय सागर लहराये
काली-काली रात सजाओ !

निशि अलकों में भर-भर रोली
नाचें जगमग किरनें भोली
आलोक घटा घिर-घिर आये,
सारी सुधबुध भूल नहाओ !

हर उर अभिनव नेह भरा हो
युग-युग रोयी धन्य धरा हो,
चलो सुहागिन, थाल उठाओ
नभ-गंगा में दीप बहाओ !

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(48) दीप-माला
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आज घर-घर छा रहा उल्लास !

भर हृदय में प्रीत
मधु मदिर संगीत
आज घर-घर दीपकलिका वास !

नव सुनहरा गात
जगमगाती रात
आज घर-घर जा लुटाती हास !

कर रमन शृंगार
भर उमंग विहार
आज घर-घर दीप-माला रास !
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(49) अभिषेक
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माना, अमावस की अँधेरी रात है,
पर, भीत होने की अरे क्या बात है ?
एक पल में लो अभी —
जगमग नये आलोक के दीपक जलाता हूँ !

माना अशोभन, प्रिय धरा का वेष है
मन में पराजय की व्यथा ही शेष है,
पर, निमिष में लो अभी —
अभिनव कला से फिर नयी दुलहिन सजाता हूँ !े

कह दो अँधेरे से प्रभा का राज है,
हर दीप के सिर पर सुशोभित ताज है,
कुछ क्षणों में लो अभी —
अभिषेक आयोजन दिशाओं में रचाता हूँ !

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(50) दीप धरो
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सखि ! दीप धरो !

काली-काली अब रात न हो,
घनघोर तिमिर बरसात न हो,
बुझते दीपों में हौले-हौले,
सखि ! स्नेह भरो !

दमके प्रिय-आनन हास लिए,
आगत नवयुग की आस लिए,
अरुणिम अधरों से हौले-हौले,
सखि ! बात करो !

बीते बिरहा के सजल बरस
गूँजे मंगल नव गीत सरस
घर आये प्रियतम, हौले-हौले
सखि ! हीय हरो !

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(51) रूपासक्ति
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सोने न देती सुछवि झलमलाती किसी की !

जादू भरी रात, पिछला पहर
ओढ़े हुआ जग अँधेरा गहर
भर प्रीत की लोल शीतल लहर
सूरत सुहानी सरल मुसकराती किसी को !

गहरी बड़ी जो मिली पीर है
निर्धन हृदय के लिए हीर है
अंजन सुखद नेह का नीर है
अल्हड़ अजानी उमर जगमगाती किसी की !

रीझा हुआ मोर-सा मन मगन
बाहें विकल, काश भर लूँ गगन
कैसी लगी यह विरह की अगन
मधु गन्ध-सी याद रह-रह सताती किसी की !

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(52) मोह-माया
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सोनचंपा-सी तुम्हारी याद साँसों में समायी है !

हो किधर तुम मल्लिका-सी रम्य तन्वंगी,
रे कहाँ अब झलमलाता रूप सतरंगी,
मधुमती-मद-सी तुम्हारी मोहनी रमनीय छायी है !

मानवी प्रति-कल्पना की कल्प-लतिका बन
कर गयीं जीवन जवा-कुसुमों भरा उपवन,
खो सभी, बस, मौन मन-मंदाकिनी हमने बहायी है !

हो किधर तुम, सत्य मेरी मोह-माया री
प्राण की आसावरी, सुख धूप-छाया री
राह जीवन की तुम्हारी चित्रसारी से सजायी है !

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(53) रात बीती
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याद रह-रह आ रही है,
रात बीती जा रही है !

ज़िन्दगी के आज इस सुनसान में
जागता हूँ मैं तुम्हारे ध्यान में
सृष्टि सारी सो गयी है,
भूमि लोरी गा रही है !

झूमते हैं चित्र नयनों में कई
गत तुम्हारी बात हर लगती नयी
आज तो गुज़रे दिनों की
बेरुख़ी भी भा रही है !

बह रहे हैं हम समय की धार में
प्राण ! रखना पर भरोसा प्यार में
कल खिलेगी उर-लता जो
किस क़दर मुरझा रही है !

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(54) व्यथा-बोझिल रात
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किसी तरह दिन तो काट लिया करता हूँ
पर, मौन व्यथा-बोझिल रात नहीं कटती,
मन को सौ-सौ बातों से बहलाता हूँ
पर, पल भूल तुम्हारी मूर्ति नहीं हटती !

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(55) अगहन की रात
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तुम नहीं ; और अगहन की ठण्डी रात !

संध्या से ही सूना-सूना, मन बेहद भारी है,
मुरझाया-सा जीवन-शतदल, कैसी लाचारी है !
है जाने कितनी दूर सुनहरा प्रात !

खोकर सपनों का धन, आँखें बेबस बोझिल निर्धन
देख रही हैं भावी का पथ, भर-भर आँसू के कन,
डोल रहा अन्तर पीपल का-सा पात !

है दूर रोहिणी का आँचल, रोता मूक कलाधर
खोज रहा हर कोना, बिखरा जुन्हाई का सागर
किसको रे आज बताएँ मन की बात !

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(56) दूर तुम
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दूर तुम प्रिय, मन बहुत बेचैन !

अजनबी कुछ आज का वातावरण,
कर गया जैसे कि कोई धन हरण,
और हम निर्धन बने
वेदना कारण बने
मूक बन पछता रहे, जीवन अँधेरी रैन !

खो कहीं नीलांजना का हार रे,
अनमना सावन बरसता द्वार रे,
और हम एकान्त में
रात के सीमांत में
जागते खोये हुए-से, पल न लगते नैन !

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(57) प्रिया से
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इस तरह यदि दूर रहना था,
तो बसे क्यों प्राण में ?

है अपरिचित राह जीवन की
साथ में संबल नहीं ;
व्योम में, मन में घिरी झंझा
एक पल को कल नहीं,
यदि अकेले भार सहना था ;
तो बसे क्यों ध्यान में ?

जल रही जीवन-अभावों की
आग चारों ओर रे,
घिर रहा अवसाद अन्तर में
है थका मन-मोर रे,
इस तरह यदि मूक दहना था
तो बसे क्यों गान में ?

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(58) बिरहिन
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कब सरल मुसकान पाटल-सी बिखेरोगे सजन !

अनमना सूना बहुत बोझिल हृदय
धड़कनों के पास आओ, हे सदय !
कर रही बिरहिन प्रतीक्षा, उर भरे जीवन-जलन !

धूप में मुरझा रही यौवन-लता
मधु-बसंती प्यार इसको दो बता
मोरनी-सी नाच लूँ जी भर, रजत पायल पहन !

साथ ले चितचोर सोयी है निशा
भाविनी-सी राग-रंजित हर दिशा
रे अजाना दर्द प्राणों का, करूँ कैसे सहन !

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(59) प्रतीक्षा
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कितने दिन बीत गये
सपन न आये !

जागे सारी-सारी रात
डोला अंतर पीपर-पात
मन में घुमड़ी मन की बात
सजन न आये !

मेघ मचाते नभ में शोर
जंगल-जंगल नाचे मोर
हमको भूले री चितचोर
सदन न आये !

भर-भर आँचल कलियाँ फूल
दीप बहाये सरिता कूल
रह-रह तरसे पाने धूल
चरन न आये !

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(60) साध
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कितने मीठे सपने तुमने दे डाले
पर, धरती पर प्यार सँजोया एक नहीं !

युग-युग से जग में खोज रहा एकाकी
पर, नहीं मिला रे मनचाहा मीत कहीं,
कोलाहल में मूक उमरिया बीत गयी
सुन पाया पल भर भी मधु-संगीत नहीं,
भर-भर डाले क्षीर-सिंधु मुसकानों के
संवेदन से हृदय भिगोया एक नहीं !

एक तरफ़ तो बिखरा दीं सुषमा-पूरित
सौ-सौ मधुमासों की रंगीन बहारें,
और सहज दे डाले दोनों हाथों से
गहने रवि-शशि, तो गजरे फूल-सितारे,
पर, मेरे उर्वर जीवन-पथ पर तुमने
बीज मधुरिमा का बोया एक नहीं !

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(61) स्नेह भर दो
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आज मेरे मौन बुझते दीप में प्रिय, स्नेह भर दो !

जगमगाए वर्तिका आलोक फैले
लोक मेरा नव सुनहरा रूप ले ले
आर्द्र आनन पर अमर मुसकान खेले
मूक हत अभिशप्त जीवन, राग रंजित प्रेय वर दो !

बन्द युग-युग से हृदय का द्वार मेरा
राह भूला, तम भटकता प्यार मेरा
भग्न जीवन-बीन का हर तार मेरा
जग-जलधि में डूबते को बाँह दो, विश्वास-स्वर दो !

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(62) रतजगा
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रह-रह कहीं दूर, मधु बज रही बीन !

आयी नशीली निशा
मदमस्त है हर दिशा
घिर-घिर रही याद, सुधबुध पिया-लीन !

मधु-स्वप्न खोया हुआ
जग शांत सोया हुआ
प्रिय-रूप-जल-हीन, अँखियाँ बनी मीन !

आशा-निराशा भरे
जीवन-पिपासा भरे
दिल आज बेचैन, खामोश, ग़मगीन !

रोती हुई हर घड़ी
कैसी मुसीबत पड़ी
जैसे कि सर्वस्व मेरा लिया छीन !

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(63) वंचना
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जिसको समझा था वरदान
वही अभिशाप बन गया !

चमका ही था अभिनव चाँद
गगन में मेघ छा गये,
महका ही था मेरा बाग
कि सिर पर वज्र आ गये,
जिसको समझा था शुभ पुण्य
वही कटु पाप बन गया !

जिसको पा जीवन में स्वप्न
सँजोये ; व्यंग्य अब बने,
जगमग करता जिन पर स्वर्ण
वही अब क्षार से सने,
जिसको समझा था सुख-सार
वही संताप बन गया !

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(64) अब नहीं...
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अब नहीं मेरे गगन पर
चाँद निकलेगा !

बीत जाएगी तुम्हारी याद में सारी उमर
पार करनी है अँधेरी और एकाकी डगर ;
किस तरह अवसन्न जीवन
बोझ सँभलेगा !

शांत, बेबस, मूक, निष्फल खो उमंगों को हृदय
चिर उदासी मग्न, निर्धन, खो तरंगों को हृदय

अब नहीं जीवन-जलधि में
ज्वार मचलेगा !

नेह रंजित, हर्ष पूरित, इंद्रधनुषी फाग को
उपवनों में गूँजते रस-सिक्त पंचम-राग को
क्या पता था, इस तरह
प्रारब्ध निगलेगा !

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(65) गाओ
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गाओ कि जीवन गीत बन जाए !

हर क़दम पर आदमी मजबूर है,
हर रुपहला प्यार-सपना चूर है,
आँसुओं के सिन्धु में डूबा हुआ
आस-सूरज दूर, बेहद दूर है,
गाओ कि कण-कण मीत बन जाए !

हर तरफ़ छाया अँधेरा है घना,
हर हृदय हत, वेदना से है सना,
संकटों का मूक साया उम्र भर
क्या रहेगा शीश पर यों ही बना ?
गाओ, पराजय — जीत बन जाए !

साँस पर छायी विवशता की घुटन
जल रही है ज़िन्दगी भर कर जलन
विष भरे घन-रज कणों से है भरा
आदमी की चाहनाओं का गगन,
गाओ कि दुख संगीत बन जाए !

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(66) भोर होती है!
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और अब आँसू बहाओ मत
भोर होती है !

दीप सारे बुझ गये
आया प्रभंजन,
सब सहारे ढह गये
बरसा प्रलय-घन,
हार, पंथी ! लड़खड़ाओ मत
भोर होती है !

बह रही बेबस उमड़
धारा विपथगा,
घोर अँधियारी घिरी
स्वच्छंद प्रमदा,
आस सूरज की मिटाओ मत
भोर होती है !

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(67) मच्छरों का संगीत
(‘प्रयोगवाद’ पर व्यंग्य)
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हर रोज़ रात होते ही
अनगिनती मूक मच्छरों का
समवेत-गान
कमरे में गूँज-गूँज उठता है !
जिसमें नहीं तनिक भी
भाव कल्पना का वैभव
केवल बजता -
रव, रव, रव !

निद्रा उचटा देने वाली
यह कैसी लोरी ?
यह कैसा सरगम ?

अच्छा हो
यदि इस पर बरसे
डी. डी. टी.
झय्यम-झमझम-झय्यम !

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(68) भूमिका
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सुनहरी फ़सल के लिए
रसभरी ग़ज़ल के लिए
हृदय-भूमि को सींचना !

प्रिय अमिय-धरों के लिए
मधुरतम स्वरों के लिए
हृदय-तार को खींचना !

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(69) अंकुर
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फोड़ धरती की कड़ी चट्टान को
ऊर्धगामी शक्ति का व्यक्तित्व
अंकुर फूटता है !

आँधियों के दृढ़ प्रहारों से
सतत संघर्ष रत
नव चेतना का
दिव्य अंकुर फूटता है !

सिर उठा
फैला भुजाएँ
जब गगन में झूमता है वह
अमंगल नाश का विश्वास सारा
टूटता है !
सृष्टि की जीवन-विरोधी भावनाओं का
उमड़ता वेग
धीरज
छूटता है !

अंकुरों की राह से
हट कर चलो !
अंकुरों की बाँह से
हटकर चलो !
अंकुरों को फैलने दो
धूप में
विस्तृत खुले आकाश में !

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(70) थमना कैसा ?
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जीवन में थमना कैसा ?

गति ही चेतन जीवन है,
गति-मुक्त
मनुज का अस्तित्व नहीं,
गति ही जीवन,
ईप्सित बंधन है !

हर्ष-विषाद व निश्चय-भ्रम,
बिखरा-बिखरा दैनिक-क्रम,
जीवन की
स्वस्थ प्रखर गति का सूचक है !
जीवन में स्थिरता कैसी,
जमना कैसा ?

जीवन बहता सोता है जल का,
इसमें तनिक विचार न होता
बीते कल का !
धारा है यह,
घहर-घहरकर उमड़ेगा ;
सावन-भादों के मेघों-सा
काल-पृष्ठ पर
रह-रह घुमड़ेगा !

बहते जाओ, बहते जाओ,
गिर-गिरकर
उठ-उठकर

पथ की निर्मम चोटों को
सहते जाओ,
गति-प्रेरक गीता कहते जाओ !
भूल कहीं भी जीवन में
रुककर रमना कैसा ?

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(71) रात भर
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रात भर सन्-सन् पवन
फूस की छत और माटी की दिवारों से
शराबी की तरह
करता रहा मदहोश आलिगन !
रात भर सन्-सन् पवन !
डोलती दहशत रही भीतर कुटी के,
चार आँखें
रतजगा करती रहीं भीतर कुटी के,
तम बरसता ही रहा
पर,
घिर न पाया एक पल
आशा भरा भावी उषा-जीवन !
रात भर
गरजा किया सन् सन् पवन !

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(72) अंधकार
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शीत युद्ध से समस्त विश्व त्रास्त
हो रहा मनुष्य भय विमोह ग्रस्त !

डगमगा रही निरीह नीति-नाव
जल अथाह, नष्ट पाल-बंधु-भाव !

राष्ट्र द्वेष की भरे अशेष दाह
मित्रता प्रसार की निबद्ध राह !

मच रही अजीब अंध शस्त्र-होड़
पशु बना मनुज विचार-शक्ति छोड़ !

जन-विनाश चक्र चल रहा दुरंत
आज साधु-सभ्यता विहान अंत !

गूँजते चतुर्दिशा कठोर बोल
रम्य-शांति-राग का रहा न मोल !

एकता-सितार तार छिन्न-भिन्न !
हर दिशा उदास मूक खिन्न-खिन्न !

अस्त सूर्य, प्राण वेदना अपार
अंधकार, अंधकार, अधंकार !

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(73) लक्ष्य
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यदि सूखे युग-अधरों को मुसकान नहीं दे पाये,
अश्रु-विमोचित आँखों में यदि सपने नहीं सजाये,
असमय उजड़ी बगिया को यदि फिर से लहलहा न दी,
सूनी-सूनी डालों को यदि फिर से चहचहा न दी,
तो व्यर्थ तुम्हारा जीवन !

शोषण-अग्नि-दग्ध तन के यदि नहीं मिटाये छाले,
यदि हारे थके उरों में स्पंदित प्राण नहीं डाले,
यदि नहीं घुटन के क्षण में बरसा घर-घर में सौरभ,
और नहीं महका सारा अणु-उद्जन-धूम ग्रसित नभ,
तो व्यर्थ तुम्हारा गायन !

बढ़ता वेग नहीं रोका, यदि प्रतिद्वन्द्वी लहरों का,
हिंसक क्रुद्ध आक्रमक फन यदि कुचला न विषधरों का,
जनयुग-संस्कृति सीता की यदि लज्जा न बचा पाये,
पूँजीशाही रावण को यदि फिर से न मिटा पाये,
तो व्यर्थ तुम्हारा यौवन !

========================
(74) आलोक
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मनुष्य का भविष्य —
अंधकार से,
शीत-युद्ध-भय प्रसार से
मुक्त हो,मुक्त हो !
रश्मियाँ विमल विवेक की
विकीर्ण हों,
शक्तियाँ विकास की विरोधिनी
विदीर्ण हों !
वर्ग-वर्ण भेद से,
आदमी-ही
आदमी की क़ैद से
मुक्त हो, मुक्त हो !

चक्रवात, धूल, वज्रपात से
नवीन मानसी क्षितिज
घिरे नहीं
घिरे नहीं !
नये समाज का शिखर
गिरे नहीं, गिरे नहीं !

पुनीत दिव्य साधना,
विश्व-शांति कामना,
उषा समान भूमि को सिँगार दे,
त्रास्त जग उबार दे
प्यार से दुलार दे

नवीन भावना-पराग
आग में झुलस —
जले नहीं
जले नहीं !
अनेक अस्त्र-शस्त्र बल प्रहार से,
विषाक्त दानवी घृणा प्रचार से,
वर्तमान सभ्यता
मुक्त हो, मुक्त हो !

========================
(75) शुभकामनाएँ
========================

जो लड़ रहे
साम्राज्यवादी शक्तियों से देश,
जिनकी वीर जनता ने
किया धारण शहीदी वेश
भेजता हूँ मैं उन्हें शुभकामनाएँ —
हो विजय !
भेजता विश्वास हूँ —
हे अभय !
अन्तिम विजय तुमको मिलेगी,
आततायी-दुर्ग की दृढ़ नींव
निश्चय ही हिलेगी,
स्वार्थमय
साम्राज्य-लिप्सा से सनी
सत्ता ढहेगी !
मुक्त जनता
उठ
बुलन्दी से
निडर बन
मातृ-भू की जय कहेगी !

जानते हैं हम
जानते हो तुम
जगत की वस्तु सर्वोत्तम
व्यक्ति की स्वाधीनता है
व्यक्ति के हित में !
धरा पर
एक मानव भी
न वंचित हो
प्रथम अधिकार से
स्वाधीन जीवन से।
अतः
संघर्ष जो तुम कर रहे हो,
देश का बूढ़ी शिराओं में
युवा बल भर रहे हो
शक्ति उससे पा रहा मैं भी !
राष्ट्र की स्वाधीनता का गीत
मिल कर गा रहा मैं भी !

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(76) दीप जलता है
========================

दीप जलता है !
सरल शुभ मानवी संवेदना का स्नेह भरकर
हर हृदय में दीप जलता है !
युग-चेतना का ज्वार
जीवन-सिंधु में उन्मद मचलता है !
दीप जलता है !

तिमिर-साम्राज्य के
आतंक से निर्भय
अटल अवहेलना-सा दीप जलता है !

जगमगाता लोक नव आलोक से,
मुक्त धरती को करेंगे
अब दमन भय शोक से !

लुप्त होगा सृष्टि बिखरा तम
हृदय की हीनता का ;
क्योंकि घर-घर
व्यक्ति की स्वाधीनता का
दीप जलता है !

बदलने को धरा
नव-चक्र चलता है !
नहीं अब भावना को
गत युगों का धर्म छलता है !

सकल जड़ रूढ़ियों की
शृंखलाएँ तोड़
नव, सार्थक सबल
विश्वास का
ध्रुव-दीप जलता है !

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(77) नया भारत
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संघर्षों की ज्वाला में
हँस-हँस,
नव-निर्माणों के गीत
उमंगों के तारों पर
जन-जन गाता है,
भारत अपने सपनों को
सत्य बनाता है !

मज़बूत इरादों को लेकर
श्रम-रत हैं नर-नारी,
उगलेगा फ़ौलाद भिलाई
झूमेगी क्यारी-क्यारी !

बदला कण-कण भारत का,
बदला जीवन भारत का !

भागे मूक उदासी के साये
उल्लासों के सूरज चमके हैं,
युग-युग के त्रास्त सताये
मुरझाये मुखड़े दमके हैं !

दुर्भाग्य दफ़न अब होता है,
उन्मुक्त गगन अब होता है !
कलियाँ खिलने को तरसायीं जो,
गदराई अमराई में
भोली-भोली कोयल
मन के गीत न गा पायी जो,
अब तो
आँगन-आँगन कैसा मौसम आया !
कलियाँ नाचीं,
कोयल ने मन-भावन गायन गाया !

जीवन में अभिनव लहरें हैं,
चंदन से बुद्बुद् छहरे हैं !

क्रोधित चम्बल
खिल-खिल हँसती है,
बाँधों की बाहों में
अलबेली-सी
अपने को कसती है !
लो हिन्द महासागर से
बादल घिर आया,
धानी साड़ी पहन
धरा ने आँचल लहराया !
जीवन के बीज नये
अब बोता भारत है !
मानवता के हित में
रत होता भारत है !

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(78) एशिया
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संगठित संघर्षरत सम्पूर्ण अभिनव एशिया
जागरित आलोकमय प्रत्येक मानव एशिया,
मुक्त अब साम्राज्यवादी चंगुलों से हो रहा
सभ्यता-साहित्य-संस्कृति-अर्थ-वैभव एशिया !

चीन-भारत मित्राता का जल रहा उर-उर दिया
स्नेह-पूरित ज्योति से जिसने उजागर युग किया,
वादियों दुर्गम पहाड़ों जंगलों औ’ मरुथलों
में बसे हर ग्राम-जनपद को बना सुर-पुर दिया !

दृढ़ सुरक्षा-भावना ले पंच शर्तों की शिला
सर उठाये व्योम में अविचल खड़ी सबको मिला,
शांति से सहयोग से अविराम निज-गन्तव्य तक
सत्य, पहुँचेगा नये युग-साधकों का काफ़िला !

अब न होगा चूर सपना आदमी की प्रीत का,
और बढ़ता जायगा विश्वास उसकी जीत का,
आँसुओं का शाह भी अब छीन पाएगा नहीं
माँ-बहन के कंठ से स्वर-राग सावन-गीत का !

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(79) माओ और चाऊ के नाम
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तुम्हारी मुक्ति पर
हमने मनाया था महोत्सव —
क्या इसलिए ?
तुम्हारे मत्त विजयोल्लास पर
बेरोक उमड़ा था
यहाँ भी हर्ष का सागर —
क्या इसलिए ?
नये इन्सान के प्रतिरूप में हमने
तुम्हारा
बंधु-सम स्वागत किया था —
क्या इसलिए ?

कि तुमµ
अचानक क्रूर बर्बर आक्रमण कर
हेय आदिम हिंस्र पशुता का प्रदर्शन कर,
हमारी भूमि पर
निर्लज्ज इरादों से
गलित साम्राज्यवादी भावना से
इस तरह अधिकार कर लोगे ?
युग-युग पुरानी मित्रता को भूल
कटु विश्वासघाती बन
मनुजता का हृदय से अंत कर दोगे ?

तुम
आँसुओं के शाह बन कर
मृत्यु के उपहार लाओगे ?
पूरब से उदित होकर
अँधेरे का, धुएँ का
भर सघन विस्तार लाओगे ?
साम्यवादी वेष धर
सम्पूर्ण दक्षिण एशिया पर स्वत्व चाहोगे ?

इतिहास को —
तुमसे कभी ऐसी अपेक्षा थी नहीं
ऐसा करुण साहाय्य
तुम दोगे उसे !
नव साम्यवादी लोक को —
तुमसे कभी ऐसी अपेक्षा थी नहीं
ऐसा दुखद अध्याय
तुम दोगे उसे !

बदलो,
अभी भी है समय ;
अपनी नीतियाँ बदलो !

अभी भी है समय
पारस्परिक व्यवहार की
अपनी घिनौनी रीतियाँ बदलो !

अन्यथा;
संसार की जन-शक्ति
मिथ्या दर्प सारा तोड़ देगी !
आत्मघाती युद्ध के प्रेमी,
हठी !
बस लौट जाओ,
अन्यथा
मनु-सभ्यता
हिंसक तुम्हारा वार
तुम पर मोड़ देगी !

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(80) रंग बदलेगा गगन
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अब नहीं छाया रहेगा
शीश पर काला कफ़न !
कुछ पलों में रंग बदलेगा गगन !

दे रहा संकेत मलयानिल
थिरक !
हर डाल पर
हर पात पर
नव-जागरण आभास
मोड़ लेता विश्व का इतिहास।
गत
भयावह तम भरा पथ
पीर बोझिल शोक युग,
शुभ आगमन आलोक युग !

स्वप्निल धरा गतिमान,
निसृत लोक में नव गान
गुंजित हर दिशा
बीती निशा, बीती निशा !

चिर-प्रतीक्षित
स्वर्ण सज्जित प्रात
आया द्वार
लेकर हर हृदय को
हर्ष का, उत्साह का उपहार !

मानव लोक से अब दूर होगा
वेदना का तम गहन,
भारी उदासी से दबा वातावरण !
नव रंग बदलेगा गगन !
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